गाँव के चौराहे पर ठेला लगाता था भैरू। छोटा सा ठेला था। चाय की केतली। पान की दुकान। कुछ बिस्कुट के पैकेट। लोग आते थे। चाय पीते थे। अखबार पढ़ते थे। भैरू की चाय गाँव में मशहूर थी। एक कप चाय में उतनी इलायची डालता था जितनी कोई नहीं डालता। बस यही था उसकी दुनिया। सुबह से रात तक ठेले पर। गर्मी हो या सर्दी। बारिश हो या धूप। भैरू अकेला था। उसकी कोई नहीं थी। न बीवी, न बच्चे, न कोई अपना। उसका घर ठेले के पीछे ही था। एक छोटी सी झोपड़ी। जहाँ वो सोता था। और सुबह फिर उठकर चाय बनाने लग जाता था। लोग उसे प्यार करते थे। पर कोई उसके घर नहीं जाता था। कोई नहीं पूछता था – भैरू, तू अकेला क्यों है? क्योंकि गाँव वालों को पता था। भैरू कभी अकेला नहीं था।
एक दिन भैरू ने सोचा – क्यों ना काली मिट्टी के पास ठेला लगा दूँ। सुना था कि वहाँ लोग कम आते हैं। पर अगर वहाँ चाय मिलने लगे तो जरूर कोई आएगा। उसने ठेला उठाया। काली मिट्टी वाली जगह पहुँचा। वहाँ का नज़ारा देखकर वो थोड़ा डरा। सारी ज़मीन काली थी। जैसे कोई काला कपड़ा बिछा दिया गया हो। कोई पेड़ नहीं। कोई घास नहीं। सिर्फ काली मिट्टी। भैरू ने ठेला लगाया। केतली रखी। चाय बनाने लगा।
पहले दिन कोई नहीं आया। दूसरे दिन कोई नहीं आया। तीसरे दिन एक बूढ़ा आदमी आया। बोला – चाय दे। भैरू ने चाय दी। बूढ़े ने पी। और चला गया। चौथे दिन दो आदमी आए। पाँचवें दिन चार। एक हफ्ते में भैरू की चाय मशहूर हो गई। पर लोग कुछ अजीब थे। वो चाय तो पीते थे पर बात नहीं करते थे। भैरू से कोई आँख नहीं मिलाता था। एक दिन भैरू ने पूछा – तुम लोग कहाँ रहते हो? किसी ने जवाब नहीं दिया। सब चुपचाप चाय पीकर चले जाते थे। भैरू को अजीब लगा पर उसने सोचा – क्या फर्क पड़ता है। चाय बिक रही है। पैसा आ रहा है। बस इतना काफी है।
एक रात भैरू ठेला बंद करके सोने जा रहा था। तभी उसने देखा – एक औरत खड़ी है। काली साड़ी पहने। चेहरा ढका हुआ। भैरू ने पूछा – चाय चाहिए? औरत ने सिर हिलाया। भैरू ने चाय बनाई। गिलास बढ़ाया। औरत ने परदा हटाया। भैरू की साँस रुक गई। वो औरत बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी। उसकी माँ मर चुकी थी। बीस साल पहले। भैरू के हाथ से गिलास गिर गया। औरत बोली – बेटा। एक शब्द। बस एक शब्द। भैरू भागा। झोपड़ी में जाकर बैठ गया। दरवाजा बंद कर लिया। रात भर नहीं सोया। सुबह जब बाहर निकला तो ठेला वहीं था। औरत नहीं थी। चाय का गिलास ज़मीन पर पड़ा था। उस गिलास के नीचे मिट्टी काली पड़ गई थी।
भैरू ने सोचा – भूल गया। सब भूल जाओ।
वो फिर ठेला लेकर काली मिट्टी पर आ गया। दिन भर चाय बनाता रहा। शाम को वही औरत आई। इस बार भैरू डरा नहीं। बोला – कौन हो तुम? औरत ने परदा उठाया। फिर वही चेहरा। उसकी माँ। बोली – मैं तेरी माँ हूँ बेटा। भैरू चिल्लाया – झूठ। मेरी माँ मर चुकी है। औरत हँसी। उसकी हँसी में कोई आवाज़ नहीं थी। सिर्फ उसका मुँह खुलता और बंद होता था। फिर वो बोली – मरने का क्या मतलब है बेटा? मिट्टी में मिलना। बस इतना ही तो है। भैरू ने पूछा – तुम मिट्टी हो? औरत बोली – हाँ। और तू भी होगा। जल्द ही। भैरू के पैर ज़मीन पर जम गए। उसने नीचे देखा। उसके पैरों के नीचे की मिट्टी हिल रही थी। जैसे कोई अंदर से उठा रहा हो। वो चिल्लाया। पर आवाज़ नहीं निकली। औरत गायब हो गई। भैरू भागा। झोपड़ी में घुसा। अपने पैर देखे। नॉर्मल थे। मिट्टी नहीं थी। उसने रात भर जागकर बिताई।
सुबह उसने फैसला किया – वापस चौराहे पर ठेला लगाऊँगा। काली मिट्टी पर नहीं जाऊँगा।
उसने ठेला उठाया। चौराहे पर लगाया। केतली रखी। चाय बनाने लगा। लोग आए। चाय पी। बातें की। भैरू को अच्छा लगा। सब नॉर्मल था। शाम को उसने ठेला बंद किया। अपनी झोपड़ी गया। दरवाजा खोला तो उसकी साँस रुक गई। झोपड़ी के अंदर काली मिट्टी बिछी थी। सारा फर्श काला था। और बीच में एक पगडंडी थी। जैसे कोई चलकर अंदर गया हो। भैरू ने देखा। पगडंडी उसके बिस्तर तक जाती थी। बिस्तर पर काली मिट्टी से बनी एक मूर्ति थी। ठीक भैरू की तरह। वही कद। वही चेहरा। बस आँखें बंद थीं। भैरू चिल्लाया। पीछे हटा। बाहर भागा। सीधा गाँव के मुखिया के पास पहुँचा। सब कुछ बता दिया। मुखिया चुप रहा। फिर बोला – हमने कहा था ना। काली मिट्टी पर मत जाओ। भैरू ने कहा – अब क्या होगा? मुखिया बोला – अब कुछ नहीं हो सकता। जो तूने देखा वो तेरी ही नकल है। जो तेरी जगह लेगी। भैरू बोला – मेरी जगह? मुखिया ने आँखें बंद कर लीं। बोला – कल सुबह तक तू मिट्टी हो जाएगा। और वो मूर्ति जिंदा हो जाएगी। फिर वही तेरी जगह ठेला लगाएगी। चाय बनाएगी। लोगों को देगी। और कोई अंतर नहीं बता पाएगा।
भैरू रोने लगा। मुखिया के पैर पकड़ लिए। बोला – बचा लो मुझे। मुखिया ने कहा – एक रास्ता है। वापस जा। उस मूर्ति को तोड़ डाल। उसके टुकड़े कर डाल। फिर काली मिट्टी पर जला देना। भैरू दौड़ा। झोपड़ी में घुसा। मूर्ति को उठाया। वो भारी थी। मिट्टी की ही थी। उसने फर्श पर पटका। मूर्ति टूट गई। तीन टुकड़ों में। भैरू ने वो टुकड़े उठाए। काली मिट्टी पर ले गया। आग जलाई। टुकड़े जलाने लगा। जैसे ही आखिरी टुकड़ा जला, उसे अपने हाथ में जलन महसूस हुई। उसने देखा – उसके हाथ की उँगलियाँ पिघल रही थीं। मिट्टी बन रही थीं। वो चिल्लाया। पर इस बार आवाज़ निकली। बहुत तेज़। गाँव वाले जाग गए। दौड़ते हुए आए। भैरू को ज़मीन पर गिरा देखा। वो आधा मिट्टी बन चुका था। उसका एक पैर गायब था। एक हाथ गायब था। चेहरा पिघल रहा था। उसने आख़िरी बार कहा – उस मूर्ति को जलाया था मैंने। फिर मैं क्यों पिघल रहा हूँ।
गाँव वाले चुप थे।
फिर मुखिया आया। बोला – क्योंकि वो मूर्ति तू था ही नहीं। वो तो काली मिट्टी का जाल था। असली मूर्ति तो तू बन चुका था। जब तूने टुकड़े जलाए, तूने खुद को जला डाला।
भैरू की आँखें खुली रह गईं। फिर वो पूरी तरह मिट्टी बन गया।
सुबह गाँव वालों ने देखा – भैरू का ठेला चौराहे पर लगा था। केतली गरम थी। चाय बन रही थी। और ठेले पर खड़ा था एक आदमी। बिल्कुल भैरू जैसा। वही कद। वही चेहरा। वही आवाज़। मुस्कुराते हुए बोला – चाय पी लो। इलायची वाली। कोई उसके सामने नहीं आया। कोई चाय पीने के लिए नहीं रुका। पर कोई उसे खदेड़ने भी नहीं आया। क्योंकि किसी को पता नहीं था – असली भैरू कौन था। और काली मिट्टी का बना भैरू कौन है।
कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने देखा – नया भैरू बिल्कुल पुराने जैसा था। चाय बनाता था। पान बेचता था। हँसता था। लोग धीरे-धीरे उसके पास जाने लगे। चाय पीने लगे। और जल्द ही सब भूल गए कि कभी कोई असली भैरू हुआ करता था।
सिर्फ मुखिया को याद था। वो अक्सर रात को उठकर भैरू की झोपड़ी की तरफ देखता था। झोपड़ी के अंदर अंधेरा रहता था। कभी कोई आवाज़ नहीं आती थी। पर एक रात उसने देखा – झोपड़ी के दरवाजे पर काली मिट्टी से लिखा था – “अगला कौन?”
मुखिया ने अगली सुबह गाँव में ऐलान कर दिया – काली मिट्टी के पास कोई न जाए। न ठेला लगाए। न चाय पीए। न पान खाए। पर गाँव वाले सुनते ही क्या करते हैं। वो तो भूल गए थे। अब चाय तो नया भैरू ही बनाता है। उसकी चाय में भी इलायची डालता है। बस एक फर्क है। पुराना भैरू चाय बनाते समय गुनगुनाता था। नया भैरू बिल्कुल चुप रहता है। और कभी-कभी उसके हाथों पर काली मिट्टी के छींटे दिख जाते हैं। जो पानी से नहीं धुलते।