खोंटा सिक्का Alok Mishra द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

खोंटा सिक्का

शाम हो रही थी। ठंड़ी हवाऐं बहुत तेज बह रहीं थी। ऐसे में अशोक लाज का कमरा छोड़ कर सिगरेट की तलब में नीचे चौराहे पर गुमटी तक आया। एक सिगरेट जला कर खुद को हलका और गर्म महसूस करने लगा। गुमटी से लगी दुकान बंद थी। वहीं सीढ़ियों पर एक महिला और उसकी लगभग पांच साल की बच्ची बैठी थी । दोनों ठंड से कांप रहे थे। महिला सभ्य परिवार की लग रही थी उसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट दिख रही थी। अशोक का ध्यान उस ओर चला गया। सिगरेट खत्म करके अशोक ने आखिर उस महिला  की ओर मुखतिब होकर युंही कह दिया आज     " ठंड़ बहुत । "  महिला ने भी बिना झिझक बात शुरू की " हां  यहां कुछ अधिक ही है। "  अशोक ने पूछ ही लिया " क्या हुआ ,कोई परेशानी है क्या? " महिला शायद किसी से सहायता की उम्मीद में ही थी , बोली "  हम तो यहां फंस गए है बस.... । " अशोक को उसकी बात में सच्चाई ही लगी उसने पूछ " क्या हुआ है? " महिला ने विस्तार से बताना प्रारंभ किया " मै एक परीक्षा देने यहां आई थी। परीक्षा के समय बच्ची को दूसरी पाली में परीक्षा देनें वाली साथी के साथ रखा। खैर..... यहां पास ही कोई ट्रेन हादसा हो गया जिसके कारण ट्रेन का मार्ग बंद है। बसों की हड़ताल है आज।  अब हम वापस जाऐं तो कैसे?

अशोक एक सभ्य व्यक्ति है। समान्यत: वो लोगों पर विश्वास करता है और उनकी हर मदद को तैयार रहता है। अक्सर ही ऐसे लोग समाज में धोखा खाते है। उसने भी बहुत धोखे खाए है लेकिन वो अपने स्वभाव को बदल नहीं सकता। वो शनिवार को आया था, कंपनी की मीटिंग थी। फिर उसे कंपनी से आदेश मिला कि सोमवार को कोई अधिकारी आ रहें उनसे मिलना है। बस वो यहीं रूक गया। आज दिन भर खाली था तो लाज में सोया रहा।    अशोक को ट्रेन हादसे और बसों की हड़ताल के विषय में ज्ञात था। अशोक बोला  " तो टैक्सी कर लीजिए । " महिला बोली " हर कोई इतना पैसा खर्च नहीं कर सकता। " अशोक बोला " क्या मै आपकी कुछ मदद कर सकता हुं ? " अशोक को लगा वो उससे कुछ रूपय मांग सकती है। वो बोली  " आप क्या मदद कर सकते है ? ठंड़ बहुत है । कल सुबह कोई साधन मिल ही जाएगा, जाने के लिए लेकिन यहां रात कैसे कटेगी ? " अशोक समझ गया उसे रूकने का ठिकाना चाहिए। अशोक बोला " फिलहाल मेरा रूम है, लाज में, आप दोनों वहां जा सकते हो। मै तब तक कोई कुछ और सोचता हुंं, विश्वास रखिए मै यहीं हुं । " चाभी महिला की ओर बढ़ाते हुए बोला " ये रही रूम की चाभी। " महिला बहुत ही कृतज्ञ भाव से अशोक को देखने लगी, फिर धीरे से बोली "आप एक नेक आदमी लगते है , हम आपके साथ भी रह सकते है। " अशोक को इसकी उम्मीद नहीं थी।" अशोक परिस्थितियों का आकलन करने लगा। ये महिला कहीं उसे फसा तो नहीं रही है?  वो कहीं मदद के बहाने उसे ठगने वाली तो नहीं  ? सब सोचने के बाद भी उसे उस महिला के चेहरे पर सच्चाई और मदद की आवश्यकता ही महसूस हुई।    उसने निर्णय लिया कि मदद करनी चाहिए। महिला से उसका नाम पूछा। उसने अपना नाम उमा बताया। उसने बच्ची को गोद में उठा लिया और बोला "चलिए।" होटल की औपचारिकताओं के बाद वे कमरे में थे। बच्ची को कम्बल उढ़ा दिया। उमा बोली " मै बाथरूम इस्तमाल कर सकती हुं ना? " अशोक हां कहता उसके पहले ही वो बाथरूम मे चली गई शायद उसे इसकी आवश्यकता थी। अशोक आराम से पास लगे सोफे पर बैठा रहा।         उमा बाहर आई तो बड़बड़ाए जा रही थी " मेरी तो जान ही निकल रही थी।..... अब अच्छा लगा। ..... महिलाऐं भी कहीं भी नहीं जा सकती .. .. ।" वो बस बोले जा रही थी। अशोक बस  सोफे पर बैठा सुन रहा था। उमा पास ही एक कुर्सी पर बैठ गई और कृतज्ञ भाव से अशोक को देखते हुए बोली " आज कल आप जैसे मदद करने वाले लोग बहुत कम है । आप मिल गए, नहीं तो न जाने हमारा क्या होता। " अशोक क्या बोलता ,बस वो चुपचाप सुनता रहा। खाने का समय होने लगा था। अशोक ने पूछा " खाना मंगवा लें क्या? वो बोली "  हां भूख तो जोर की लगी है। " अशोक ने खाने का आर्डर किया, जो जल्दी ही आ भी गया। तीनों ने खाना खाया और फिर थोड़ी देर मे बच्ची सो गई। अशोक ने कहा " आप पलंग पर सो जाऐं, मै इस सोफे पर सो जाऊंगा । " उमा बोली "नहीं आप भी यहीं आ जाऐं पलंग तो बड़ा है।" अशोक पूरे संकोच के साथ बच्ची के दूसरी ओर लेट गया।    अशोक को शायद झपकी ही लगी होगी। उसने अपने साथ किसी का लेटा होना महसुस किया। उमा अब इस तरफ आ गई थी। वो लगभग अशोक से चिपक कर लेटी थी। अशोक अचानक उठ बैठा " अरे आप यहां कैसे आ गई? " उमा कुछ नहीं बोली बस अशोक का हाथ खींच कर फिर अपने ऊपर गिरा लिया। अशोक अखिर था तो पुरूष ही । फिर भी बोला " क्या यह उचित है। " उमा उससे पूरी तरह से चिपक गई  । उमा का हाथ अशोक के शरीर पर फिसल रहा था। अशोक अपने आप पर नियंत्रण रखने का विफल प्रयास कर रहा था। आखिर उसके हाथों नें भी सक्रियता दिखानी आरंभ कर दी। बहुत देर नहीं लगी दोनों को वस्रों के आवरण से मुक्त होनें में। अब दोनों दोनों बस एक दूसरे मे समा जाना चाहते थे। उमा  फुसफुसा कर   बोली " बच्ची न जाग जाए...... नीचें जमीन पर चलें। ‌" अशोक ने उसे गोद में उठा लिया, उसने भी गले में बाहें डाल कर जकड़ लिया। दोनों निवस्त्र अवस्था में जमीन  पर आ गए। उमा की एक घुटी हुई सी चीख निकली और फिर कमरें में आहों और कराहों का सैलाब सा आ गया। उमा को शायद इस सुखद एहसास की प्रतिक्षा थी ;  इस बात का पता उसकी सित्कारियां दे रहीं थी। शायद समय रूक गया था , बस वे दोनों ही थे एक जो उठती गिरती लहरों की तरह एक दूसरे का साथ दे रहे थे ।  दोनों के लिए आनंद का यह पल था जिसे वे पूरा जी लेना चाहते थे।        तूफान का वह दौर गुजर गया। दोनों के लिए अब एक दूसरे के सामने निवस्त्र अवस्था में रहना संकोच नहीं पैदा कर रहा था। दोनों वैसे ही बैठे रहे और बात करने लगे। उमा बोली " तुम सही बहुत अच्छे हो । मुझे इतना सुख कभी नहीं मिला। " अशोक भी अब संकोच और सभ्यता के दायरे से बाहर आ चुका था। बोला "  आज रात ये सुख तुम जब तक चाहो मिल सकता है और चाहो तो बाद में भी। " उमा बोली आज की रात का सुख तो हम भोगेंगे ही ,लेकिन ...... ।  "      दोनों रात भर आनंद के सागर में गोते लगाते रहे। एक घंटे ही सोए थे कि सुबह हो गई।  उमा तैयार होने लगी जाने की जल्दी थी। अशोक ,उमा से बोला " अपना मोबाइल नंबर दे दो, कभी हम बात कर सकते। " उमा बोली "नहीं ...... बस हमारी मुलाकात यहीं तक है। अब हम नहीं मिलेंगे। मैने तो आपका नाम भी नहीं पूछा। देखिए ........आप हम पर ऐसे ही ऐहसान करके चले जाते। मै आपको क्या दे सकती थी जो दे सकती थी दे दिया। अब आपका मुझ पर कोई एहसान नहीं है।  हालांकि आप सही में एक ऐसे व्यक्ति है जिससे दोस्ती अवश्य होनी चाहिए लेकिन हमारी ऐसी किस्मत कहां। "   अशोक बोला " एक बार मिलने का वादा तो कर ही सकती हो। " उमा बोली " कोई वादा नहीं ; हो सकता है किस्मत हमें फिर किसी मोड़ पर मिला दे, लेकिन वादा नहीं। आपने हमारा ख्याल रखा ; हमने आपका, बात यहीं खत्म होती है। " अशोक उसे बच्ची के साथ दूर जाता हुआ देखता रहा। अशोक उसे भूल तो नहीं सकता था लेकिन उसका मदद के बदले में समर्पण उसे बुरा बहुत बुरा लगा। उसे लगा कि उसके द्वारा की गई सहायता के बदले में कोई खोटा सिक्का दे गया हो और कह रहा हो अब आपका कोई एहसान नहीं बचा। अशोक ने तो वह भी नहीं मांगा था।                    आलोक मिश्रा "मनमौजी"