Honted Jobplace - 14 Sonam Brijwasi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Honted Jobplace - 14

कमरा — हल्की-सी अंधेरी रोशनी…श्राव्या बेहोश कृषांत की बाँहों में…और सामने हवा में तैरती प्रिशा…कृषांत धीरे से श्राव्या को सोफे पर लिटाता है…फिर उठकर प्रिशा की तरफ बढ़ता है…।

कृषांत (तेज, गुस्से में) बोला - 
तुम क्या सोचती हो प्रिशा…ये जो तुम कर रही हो… बहुत बड़ा भला काम है?

प्रिशा की आँखें और चमकने लगती हैं…

कृषांत (कड़वे शब्दों में) बोला - 
शर्म आती है मुझे… तुम्हें अपनी assistant बोलने में भी…
कितनी घटिया लड़की हो तुम!

प्रिशा का चेहरा दर्द और गुस्से से भर जाता है…।

प्रिशा (चीखते हुए) बोली - 
मैं घटिया नहीं हूँ!!!

कमरे में तेज़ हवा चलने लगती है…कृषांत बिना डरे उसकी आँखों में देखता है…।

कृषांत (ठंडे, सख्त लहजे में) बोला - 
अच्छा?
तो ये जो हरकतें हैं तुम्हारी… इन्हें किस category में रखूँ मैं?

वो एक-एक शब्द जोर देकर बोलता है…।

कृषांत बोला - 
मतलब… तुम और संतोष एक नहीं हो पाए…
तो अब किसी और को भी नहीं होने दोगी?

जैसे ही संतोष का नाम आता है…प्रिशा का चेहरा बदल जाता है…उसकी आँखों में गुस्से की जगह… दर्द झलकता है…।

कृषांत (धीरे, लेकिन गहराई से) बोला - 
सोचा है कभी…संतोष ये सब देख रहा होगा…

कुछ पल का सन्नाटा…

कृषांत बोला - 
मरने के बाद… उसे कैसा लग रहा होगा?

प्रिशा के चेहरे पर आँसू जैसी चमक…उसकी आवाज़ कांपने लगती है…।

प्रिशा (धीमे, दर्द में) बोली - 
मैं… बस… उसके साथ रहना चाहती थी…

कमरे की हवा धीरे-धीरे शांत होने लगती है…फ्लैशबैक जैसी झलक — प्रिशा और संतोष…अधूरी मोहब्बत… टूटे सपने…

प्रिशा (रोते हुए) बोली - 
हम एक नहीं हो पाए…और सब खत्म हो गया…।

कृषांत अब थोड़ा नरम पड़ता है… लेकिन आवाज़ अब भी मजबूत है…।

कृषांत बोला - 
तुम्हारा दर्द समझता हूँ…लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम किसी और की जिंदगी बर्बाद कर दो…।

वो श्राव्या की तरफ इशारा करता है…

कृषांत बोला - 
ये मासूम है… इसका क्या कसूर है?

प्रिशा अब चुप है…उसके अंदर पहली बार गुस्से की जगह सोच दिखती है…कमरे में एक अजीब-सी खामोशी छा जाती है…।कभी-कभी… सबसे बड़ा भूत दर्द होता है…जो इंसान को राक्षस बना देता है…।

कमरा — अचानक फिर से हवा तेज़ हो जाती है…लाइट्स झपकने लगती हैं…प्रिशा का चेहरा फिर से बदलता है…आँखों में दर्द की जगह अब फिर से आग है…।

प्रिशा (गरजते हुए) बोली - 
नहीं!!!
कोई खुश नहीं रहेगा!!!
मैं सब खत्म कर दूँगी!!!

वो अचानक तेज़ी से कृषांत की तरफ बढ़ती है…हवा में उछलती चीज़ें उसकी तरफ फेंकने लगती हैं…कुर्सी, फाइल्स… सब हवा में उड़ रहे हैं…कृषांत श्राव्या को पीछे करता है और खुद सामने खड़ा हो जाता है…।

कृषांत (चिल्लाकर) बोला - 
बस प्रिशा!!!

प्रिशा अब सीधे कृषांत के सामने है…उसका हाथ उसकी तरफ बढ़ता है… जैसे उसकी जान खींच लेगी…

प्रिशा (खतरनाक आवाज़ में) बोली - 
सबसे पहले… तुम्हें खत्म करूँगी…

जैसे ही वो हमला करने वाली होती है…अचानक — उसका हाथ हवा में रुक जाता है…उसके चेहरे पर हैरानी…।

प्रिशा बोली - 
ये… क्या…?

पीछे से एक हल्की सफेद रोशनी फैलती है…और एक शांत, मजबूत आवाज़ गूंजती है…

संतोष बोला - 
बस प्रिशा… बहुत हो गया…

प्रिशा धीरे-धीरे पीछे मुड़ती है…उसकी आँखों में यकीन नहीं…।
सामने — संतोष की आत्मा खड़ी है…शांत… लेकिन दृढ़…प्रिशा की आँखों से आँसू बहने लगते हैं…।

प्रिशा (टूटते हुए) बोली - 
संतोष…?

संतोष उसके पास आता है…धीरे से उसका हाथ पकड़ता है…।

संतोष (नरम आवाज़ में) बोला - 
ये तुम क्या बन गई हो प्रिशा…ये तुम नहीं हो…।

तभी — एक और हल्की रोशनी…स्मिता की आत्मा भी सामने आ जाती है…कमरा अब डरावना नहीं… बल्कि शांत होने लगता है…।

स्मिता (धीरे) बोली - 
नफरत छोड़ दो प्रिशा…ये रास्ता गलत है…

प्रिशा अब दोनों को देख रही है…उसका गुस्सा धीरे-धीरे टूट रहा है…वो घुटनों के बल बैठ जाती है…

प्रिशा (रोते हुए) बोली - 
मैं बस… तुम्हारे साथ रहना चाहती थी…

संतोष उसके सामने बैठता है…उसके आँसू पोंछने की कोशिश करता है…

संतोष बोला - 
प्यार किसी को रोकना नहीं सिखाता…छोड़ना सिखाता है…।

कमरे की सारी हलचल बंद हो जाती है…हवा थम जाती है…
कृषांत श्राव्या को संभाले खड़ा है…वो ये सब देख रहा है…।

अधूरी मोहब्बत… अगर नफरत बन जाए…तो आत्मा भी भटक जाती है…।

कमरा — अब शांत…प्रिशा, संतोष और स्मिता की आत्माएँ धीरे-धीरे स्थिर खड़ी हैं…कृषांत श्राव्या को संभाले हुए… उसकी नजर अब प्रिशा पर है…

कृषांत (गंभीर होकर) बोला - 
ये सब… ऐसे ही खत्म नहीं होगा…

संतोष की आत्मा धीरे-धीरे आगे बढ़ती है…उसकी आँखों में एक अधूरा सच है…

संतोष बोला - 
कृषांत… हमारी मौत… हादसा नहीं थी…

कृषांत चौंक जाता है…

कृषांत बोला - 
क्या मतलब?

कमरे में अचानक हल्का अंधेरा छा जाता है…फ्लैशबैक जैसा दृश्य बनता है…तीन नकाबपोश लोग… ऑफिस के उसी 9th फ्लोर पर…प्रिशा, संतोष को घेरते हुए।

संतोष (आवाज़ गूंजती है) -
वो… हमारे ही ऑफिस के seniors थे…

फ्लैशबैक में — धक्का, चीखें… संघर्ष…

संतोष बोला - 
मरते वक्त… मैंने उनका चेहरा देख लिया था…

कृषांत की आँखों में गुस्सा भर जाता है…उसकी मुट्ठियाँ कस जाती हैं…।

कृषांत (दाँत भींचकर) बोला - 
कौन थे वो…?

कमरे में ठंडी हवा चलती है…संतोष धीरे-धीरे उनके नाम बताता है…जैसे ही नाम सामने आते हैं…कृषांत का चेहरा सख्त हो जाता है…।

कृषांत (गुस्से में) बोला - 
तो… वो आज भी इस ऑफिस में हैं…

प्रिशा की आँखों में फिर से आग जल उठती है…

प्रिशा बोला - 
हाँ!!
उन्हीं की वजह से हम मरे!!
उन्हें मैं नहीं छोड़ूँगी!!!

संतोष तुरंत उसका हाथ पकड़ता है…

संतोष (सख्ती से) बोला - 
नहीं प्रिशा!

वो उसकी आँखों में देखता है…

संतोष बोला - 
अब बदला नहीं…इंसाफ होगा…

कृषांत धीरे-धीरे आगे बढ़ता है…उसकी आँखों में अब सिर्फ एक लक्ष्य है…।

कृषांत (दृढ़ आवाज़ में) बोला - 
मैं… उन्हें सजा दिलाऊँगा…

वो श्राव्या की तरफ देखता है…जो अब धीरे-धीरे होश में आ रही है…।

कृषांत बोला - 
कानून के जरिए…ताकि तुम्हारी आत्माओं को सच्चा सुकून मिले…

अचानक — कमरे की स्क्रीन अपने आप ऑन होती है…CCTV फुटेज चलने लगती है… 😨उसी रात का वीडियो…जहाँ साफ दिख रहे हैं — वो seniors… उनके चेहरे… उनका अपराध…।
कृषांत स्क्रीन को देखता है…उसकी आँखों में एक हल्की जीत की चमक…।

कृषांत बोला - 
अब… कोई नहीं बचेगा…

जब सच खुद सामने आ जाए…तो न्याय को कोई नहीं रोक सकता…।