Honted Jobplace - 10 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

Honted Jobplace - 10

8th फ्लोर — अंदर श्राव्या डरी हुई कोने में सिमटी है। बाहर से ज़ोर-ज़ोर की आवाज़ें आ रही हैं।

कृषांत (बाहर से, गुस्से में) बोला - 
श्राव्या!! पीछे हटो!!

अचानक — एक ज़ोरदार किक…धड़ाम!!!
दरवाज़ा टूटकर खुल जाता है। कृषांत तेज़ी से अंदर आता है।श्राव्या उसे देखते ही दौड़कर उसके सीने से लग जाती है। वो बुरी तरह रो रही है, पूरा शरीर कांप रहा है।

श्राव्या (रोते हुए) बोली - 
Sir… मुझे बहुत डर लग रहा था… वो… वो यहीं थी…।

कृषांत उसे कसकर पकड़ लेता है, उसे शांत करने की कोशिश करता है।

कृषांत (धीरे, उसे सहलाते हुए) बोला - 
शांत हो जाओ… मैं आ गया हूँ… अब कुछ नहीं होगा…।

श्राव्या अभी भी रो रही है… उसके हाथ काँप रहे हैं। श्राव्या अचानक डर के मारे पीछे देखती है…और काँपते हुए दीवार की तरफ इशारा करती है।

श्राव्या (डरी हुई आवाज़ में) बोली - 
वो… वो वहाँ थी… दीवार पर… वही हरी परछाई…!

कृषांत धीरे-धीरे उस दिशा में देखता है…लेकिन… वहाँ कुछ भी नहीं है। सिर्फ खाली, टूटी हुई दीवार। सन्नाटा…।

कृषांत (थोड़ा गंभीर होकर) बोला - 
श्राव्या… वहाँ कुछ भी नहीं है…

श्राव्या हैरान रह जाती है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।

श्राव्या (हकलाते हुए) बोली - 
न… नहीं Sir… मैं झूठ नहीं बोल रही…वो यहीं थी… उसने मुझसे बात की… उसने कहा…।

वो रुक जाती है… डर के मारे आँखें बंद कर लेती है।

कृषांत (धीरे से) बोला -
क्या कहा उसने?

श्राव्या (धीरे, काँपती आवाज़ में) बोली - 
कि… अगर वो अपने प्यार को नहीं पा सकी…तो मुझे भी नहीं पाने देगी…।

कृषांत का चेहरा सख्त हो जाता है।अब उसे बात की गंभीरता समझ आ रही है। कृषांत श्राव्या को पकड़कर बाहर ले जाने लगता है। और ले जाता है। धीरे-धीरे… वहाँ एक हल्की लाल उँगलियों के निशान उभरते हैं…। और फिर… एक हल्की हँसी गूंजती है…।

प्रिशा (फुसफुसाते हुए) बोली - 
अब तुम दोनों… कहीं नहीं जाओगे…।

जो दिखता नहीं… वही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है…।

ऑफिस — रात का समय। कृषांत, श्राव्या को उसके घर छोड़ चुका है। श्राव्या अपने कमरे में अकेली बैठी है। कमरा हल्की रोशनी में डूबा हुआ है। वो अभी भी डरी हुई है… बार-बार पीछे मुड़कर देखती है।

श्राव्या (धीरे, खुद से) बोली - 
वो… सच में थी… मैंने देखा था…

अचानक — खिड़की अपने आप हल्की सी खुलती है…चूँssss…
ठंडी हवा अंदर आती है। कमरे का पर्दा हिलने लगता है। श्राव्या डरकर खड़ी हो जाती है।

श्राव्या बोली - 
क… कौन है?

कोई जवाब नहीं…। श्राव्या धीरे-धीरे आईने के पास जाती है…।
वो खुद को देखती है… पर अचानक…आईने में उसके पीछे एक और परछाई दिखती है…। वही — प्रिशा 😨
श्राव्या झटके से पीछे मुड़ती है…लेकिन वहाँ कोई नहीं है।
अचानक — श्राव्या का सिर तेज़ दर्द से झुक जाता है।

श्राव्या (चीखते हुए) बोली - 
आह्ह!! ये… ये क्या हो रहा है…!

उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं… हाथ काँपने लगते हैं…। आईने में — उसका चेहरा बदलने लगता है…आँखें गहरी और खौफनाक दिखने लगती हैं…। श्राव्या के मुँह से… लेकिन आवाज़ उसकी नहीं…।

प्रिशा (उसके अंदर से, भारी आवाज़ में) बोली - 
अब… तुम मुझसे बच नहीं सकती…

श्राव्या अपने सिर को पकड़कर नीचे बैठ जाती है।

श्राव्या (रोते हुए) बोली - 
नहीं! मुझे छोड़ दो! प्लीज़!

प्रिशा बोली - 
तुमने मुझे आज़ाद किया है…अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगी…।

धीरे-धीरे — श्राव्या का शरीर सीधा खड़ा हो जाता है…जैसे कोई और उसे कंट्रोल कर रहा हो…। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ जाती है…। वो आईने में खुद को देखती है…।

प्रिशा (श्राव्या के शरीर में) बोली - 
अब… मैं फिर से ज़िंदा हूँ…

श्राव्या का फोन अचानक बजता है —स्क्रीन पर नाम आता है: "Krishant Calling"
वो फोन उठाती है…

कृषांत (फोन पर, चिंतित होके) बोला - 
श्राव्या… तुम ठीक हो ना?

कुछ सेकंड सन्नाटा…फिर — श्राव्या के होंठ धीरे-धीरे खुलते हैं…।

प्रिशा (हल्की खतरनाक मुस्कान के साथ) बोली - 
अब… सब ठीक होगा, कृषांत…

जब आत्मा शरीर पर कब्ज़ा कर ले…तो इंसान नहीं, सिर्फ साया बचता है…।

अगली सुबह — ऑफिस। सब लोग धीरे-धीरे आ रहे हैं, लेकिन माहौल अजीब सा भारी है। दरवाज़ा खुलता है…श्राव्या अंदर आती है — लेकिन कुछ अलग है…उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान… आँखें गहरी… चाल धीमी और अजीब। साक्षी उसे देखती है और पास आती है।

साक्षी (चिंतित सी) बोली - 
श्राव्या… तुम ठीक हो ना? कल के बाद तुम—

श्राव्या धीरे-धीरे उसकी तरफ देखती है… मुस्कुराती है।

श्राव्या (लेकिन आवाज़ ठंडी) बोली - 
मैं… बिल्कुल ठीक हूँ…

साक्षी को उसकी आवाज़ अजीब लगती है। श्राव्या धीरे-धीरे ऑफिस के कोने की तरफ बढ़ती है…जहाँ से 8th फ्लोर की सीढ़ियाँ जाती हैं। वो रुकती है… दीवार को छूती है…अचानक — ऑफिस की लाइट्स हल्की-हल्की झिलमिलाने लगती हैं।
विवेक अपने सिस्टम पर काम कर रहा है…अचानक उसका कंप्यूटर अपने आप ऑन-ऑफ होने लगता है।

विवेक (घबराकर) बोला - 
ये… ये क्या हो रहा है?

स्क्रीन पर अपने आप टाइप होने लगता है —
👉 “WELCOME BACK…”
विवेक की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं 😨
श्राव्या धीरे-धीरे पीछे मुड़ती है…उसकी आँखें अब हल्की हरी चमक रही हैं।

प्रिशा (अंदर से, धीमे हँसते हुए) बोली - 
डर… अब शुरू हुआ है…।

वो सीधे उन सीनियर्स के केबिन की तरफ बढ़ती है…जिन्होंने उसे 8th फ्लोर में बंद किया था। दरवाज़ा अपने आप बंद हो जाता है — ठक! अंदर — तीनों सीनियर्स डर के मारे खड़े हैं।

सीनियर 1 बोला - 
ये… ये दरवाज़ा किसने बंद किया?!

श्राव्या धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ती है…

श्राव्या (भयानक मुस्कान के साथ) बोली - 
याद है… कल तुमने क्या किया था?

तीनों के चेहरे पर डर साफ दिख रहा है। अचानक — कमरे की लाइट बंद हो जाती है…पूरा कमरा अंधेरे में डूब जाता है।
अंदर से चीखें सुनाई देती हैं…
"आआआआ!!!" 😱

बाहर — बाकी कर्मचारी डर के मारे दरवाज़े की तरफ देखते हैं…
लेकिन दरवाज़ा खुलता ही नहीं…। कृषांत ऑफिस में एंट्री करता है। सबका डरा हुआ चेहरा देखकर रुक जाता है।

कृषांत (गंभीर होकर) बोला - 
यहाँ क्या हो रहा है?

तभी — सीनियर्स के केबिन का दरवाज़ा अपने आप खुलता है…।
अंदर — तीनों जमीन पर पड़े हैं, बेहोश…।और बीच में — श्राव्या खड़ी है…धीरे-धीरे मुस्कुरा रही है…। कृषांत उसकी तरफ बढ़ता है…।

कृषांत (धीरे, शक भरी नज़र से):
"श्राव्या…?"

श्राव्या उसकी तरफ देखती है…कुछ सेकंड — सन्नाटा…फिर — वही खतरनाक मुस्कान…।

प्रिशा (श्राव्या के शरीर से) बोली - 
अब खेल शुरू हुआ है, कृषांत…

जब बदला लेने वाली आत्मा लौटती है…तो वो सिर्फ डर नहीं, तबाही लाती है…।।