Honted Jobplace - 9 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Honted Jobplace - 9

कुछ दिन बाद — ऑफिस।
श्राव्या वापस आ चुकी है, लेकिन पहले जैसी नहीं है। वो हर छोटी आवाज़ पर चौंक जाती है। कभी अचानक पीछे मुड़कर देखती है, कभी खाली कुर्सियों को घूरती रहती है। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर कांप रही हैं।

श्राव्या (धीरे से, खुद से) बोली - 
वो... अब भी यहीं है... मुझे महसूस होता है...

अचानक पीछे से कोई फाइल गिरती है — श्राव्या घबरा जाती है और कुर्सी से उठ जाती है। तभी कृषांत वहाँ आता है। वो तुरंत श्राव्या के पास जाता है।

कृषांत (नरमी से) बोला - 
श्राव्या… रिलैक्स… कुछ नहीं है यहाँ।

श्राव्या डर के मारे सीधे उसके पास आ जाती है, जैसे खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हो।

श्राव्या (काँपती आवाज़ में) बोली - 
Sir… मुझे लगता है वो मुझे छोड़ नहीं रही…
हर वक्त ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे देख रहा है…

कृषांत धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखता है।

कृषांत (आँखों में भरोसा देकर) बोला - 
जब तक मैं हूँ… तुम्हें कुछ नहीं होगा।

श्राव्या उसकी आँखों में देखती है — पहली बार उसे सुकून महसूस होता है।

कई दिन गुजरते हैं
कृषांत रोज़ उसे घर तक छोड़ने जाता है श्राव्या काम करते वक्त बार-बार उसकी तरफ देखती है जब भी वो डरती है, कृषांत उसका हाथ पकड़ लेता है । दोनों के बीच छोटी-छोटी बातें, हल्की मुस्कानें
धीरे-धीरे डर के बीच एक रिश्ता बनता जा रहा है।

एक शाम — ऑफिस लगभग खाली है। श्राव्या खिड़की के पास खड़ी है। बाहर हल्की बारिश हो रही है। कृषांत उसके पास आता है।

कृषांत (धीरे से) बोला - 
अब भी डर लग रहा है?

श्राव्या हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखती है।

श्राव्या बोली - 
डर तो लगता है…पर जब आप पास होते हैं ना…तो थोड़ा कम हो जाता है…।

दोनों की नज़रें मिलती हैं।कुछ पल के लिए सन्नाटा… सिर्फ बारिश की आवाज़। कृषांत धीरे से उसके और करीब आता है।

कृषांत (धीरे से) बोला - 
तो फिर… मैं हमेशा पास रहूँगा।

श्राव्या की आँखों में हल्की चमक — वो नजरें झुका लेती है।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है। पर केबिन के बाहर, काँच पर एक हल्की हरी परछाई खड़ी है…जो दोनों को देख रही है।
वही धीमी डरावनी हँसी गूंजती है…।

आवाज़ (फुसफुसाते हुए) बोली - 
प्यार…? अब ये और दर्द देगा…।

कभी-कभी डर के साये में उगने वाला प्यार… सबसे खतरनाक हो जाता है…।

रात — ऑफिस का वही केबिन। श्राव्या और कृषांत साथ खड़े हैं।
दोनों के बीच हल्की मुस्कान, सुकून का पल। और काँच के पार — एक हरी परछाई खड़ी है… अब साफ़ दिखती है — वही प्रिशा।
उसकी आँखों में गुस्सा… दर्द… और जलन।

प्रिशा (धीरे, भारी आवाज़ में) बोली - 
प्यार…?
तुम दोनों… एक हो जाओगे…?

उसकी आँखों में आँसू की जगह काला साया भर जाता है।

प्रिशा (गुस्से में) बोली - 
नहीं… ये नहीं हो सकता…

फ्लैशबैक — हल्की धुंध, पुराना ऑफिस।
प्रिशा और संतोष साथ खड़े हैं। दोनों एक-दूसरे को देख रहे हैं — प्यार साफ़ झलक रहा है।

संतोष (धीरे से) बोला - 
प्रिशा… एक दिन हम हमेशा के लिए साथ होंगे…

अचानक माहौल बदलता है —चीख… गिरने की आवाज़… अंधेरा…। फ्लैशबैक टूटता है।
वापस वर्तमान — प्रिशा की आत्मा गुस्से में काँप रही है।

प्रिशा (चीखते हुए, गूंजती आवाज़ में) बोली - 
हम एक नहीं हो पाए…तो कोई और भी नहीं होगा…!

उसकी परछाई तेज़ हो जाती है…कमरे की लाइट्स झिलमिलाने लगती हैं। अचानक — श्राव्या का चेहरा बदलता है। वो अपना सिर पकड़ लेती है।

श्राव्या (दर्द में) बोली - 
आह…! ये… ये क्या हो रहा है…?

कृषांत घबरा जाता है और उसे संभालता है।

कृषांत बोला - 
श्राव्या! क्या हुआ तुम्हें?

श्राव्या की आँखें कुछ पल के लिए हरी चमकने लगती हैं…।

प्रिशा की आवाज़ (श्राव्या के अंदर से) बोली - 
उसे छोड़ दो… वो मेरा है…

कृषांत पीछे हट जाता है — हैरान और डरा हुआ। श्राव्या अचानक शांत हो जाती है… फिर बेहोश होकर कृषांत की बाहों में गिर जाती है । कृषांत उसे कसकर पकड़ता है, उसकी आँखों में डर और गुस्सा दोनों है।

कृषांत (धीरे, दृढ़ आवाज़ में) बोला - 
जो भी हो तुम…मैं श्राव्या को कुछ नहीं होने दूँगा…।

छत के कोने में प्रिशा की परछाई उल्टी लटकी हुई है…वो मुस्कुरा रही है… बेहद खतरनाक मुस्कान…।

प्रिशा (धीरे, डरावनी फुसफुसाहट में) बोली - 
अब खेल शुरू हुआ है…

अधूरी मोहब्बत… जब जलती है, तो किसी और की खुशी को भी राख कर देती है…।

ऑफिस — शाम का समय।
कृषांत किसी ज़रूरी काम से बाहर गया हुआ है। ऑफिस में कुछ सीनियर्स आपस में धीरे-धीरे बात कर रहे हैं।

सीनियर 1 (धीरे, चालाकी से) बोला - 
बहुत बहादुर बनती है ना श्राव्या…आज देखते हैं कितना दम है इसमें…।

दो-तीन लोग श्राव्या के पास आते हैं।

श्राव्या (चौंककर) बोली - 
अरे… क्या हुआ?

वो कुछ समझ पाती, उससे पहले  वो लोग उसे जबरदस्ती पकड़ लेते हैं।

श्राव्या (घबराकर) बोली - 
अरे! क्या कर रहे हो तुम लोग?! छोड़ो मुझे!

वो उसे खींचते हुए सीढ़ियों की तरफ ले जाते हैं…। 8th फ्लोर — वही सुनसान, अंधेरा, डरावना माहौल। दरवाज़ा खुलता है — वो लोग श्राव्या को अंदर धक्का देते हैं।

श्राव्या (रोते हुए) बोली - 
नहीं! प्लीज़… मुझे यहाँ मत छोड़ो!

दरवाज़ा ज़ोर से बंद होता है — ठक! और बाहर से लॉक कर दिया जाता है। उनके कदमों की आवाज़ दूर होती जाती है… और फिर — सन्नाटा…। अंदर — हल्की टिमटिमाती लाइट। श्राव्या दरवाज़े के पास भागती है और जोर-जोर से पीटने लगती है।

श्राव्या (चीखते हुए, रोते हुए) बोली - 
कोई है?! प्लीज़ दरवाज़ा खोल दो!!
मुझे यहाँ मत छोड़ो… प्लीज़!!

उसकी आवाज़ खाली फ्लोर में गूंजती है… पर कोई जवाब नहीं आता। वो धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ जाती है, रोने लगती है।

श्राव्या (सिसकते हुए) बोली - 
Sir… कृषांत sir… प्लीज़ आ जाओ…।

अचानक — पीछे से एक हल्की हवा चलती है। कोने में पड़ी फाइल अपने आप गिरती है। श्राव्या डर के मारे जम जाती है।
धीरे-धीरे पीछे मुड़ती है…दीवार पर — एक हरी परछाई उभरती है… धीरे-धीरे आकार लेती हुई…।
वही… प्रिशा।
प्रिशा अब उसके सामने खड़ी है  चेहरा दर्द और गुस्से से भरा हुआ।

प्रिशा (धीरे, भारी आवाज़ में) बोली - 
तुम फिर आ गई…

श्राव्या पीछे हटती है, दीवार से टकरा जाती है।

श्राव्या (डर के मारे काँपते हुए) बोली - 
प्लीज़… मुझे छोड़ दो… मैंने कुछ नहीं किया…।

प्रिशा धीरे-धीरे उसके करीब आती है…।

प्रिशा (गुस्से में) बोली - 
प्यार करती हो उससे…?

श्राव्या चौंक जाती है… आँसू भरी आँखों से देखती है।

प्रिशा (चीखते हुए) बोली - 
मैं और संतोष एक नहीं हो पाए…तो तुम भी नहीं हो पाओगे!!

अचानक लाइट्स तेज़ी से झिलमिलाने लगती हैं…दरवाज़ा अपने आप हिलने लगता है…। श्राव्या आँखें बंद कर लेती है, जोर-जोर से रोती है।

श्राव्या बोली - 
नहीं!!! प्लीज़… मुझे मत मारो…!

अचानक — एक तेज़ आवाज़ गूंजती है…जैसे किसी ने दरवाज़े पर जोर से चोट मारी हो…।
ठक!!! ठक!!!
श्राव्या की आँखें खुलती हैं…

आवाज़ (बाहर से, गुस्से में) बोली - 
दरवाज़ा खोलो!!!

ये आवाज़… कृषांत की है… 😨🔥

जब डर अपने चरम पर हो…तभी कोई उम्मीद दरवाज़ा खटखटाती है…।