ऑफिस का मेन गेट। रात के 11:15 बज चुके हैं। बाहर तेज़ हवा चल रही है, बिजली चमक रही है। कृषांत अपनी गाड़ी से उतरता है, मोबाइल कान से लगाए हुए।
कृषांत (फोन पर, गुस्से में) बोला -
क्या? तुम लोगों ने उसे ऊपर भेज दिया?!
तुम सबको दिमाग नहीं है क्या!
वो तेजी से अंदर जाता है। कैमरा उसके पीछे चलता है।
ब्रेक रूम का दरवाज़ा खुलता है — अंदर सन्नाटा छा जाता है।
श्रव्या के दोस्त — साक्षी, विवेक, अनुज, और कामिनी — सबका चेहरा पीला पड़ा हुआ है।
कृषांत (कठोर स्वर में) बोला -
कहाँ है श्रव्या?
कोई जवाब नहीं देता। साक्षी के हाथ काँप रहे हैं।
साक्षी (धीरे से) बोली -
सर... वो ऊपर गई थी डेयर के लिए...
अब तक वापस नहीं आई...
कृषांत की आँखों में गुस्सा और डर दोनों भर जाते हैं।
कृषांत (धमकते हुए) बोला -
तुम सबको मज़ाक सूझता है?
ऊपर कौन भेजता है किसी को उस जगह!
वो दाँत पीसते हुए कहता है —
अब अगर कुछ हुआ ना...तो मैं देख लूँगा तुम सबको!
वो तेजी से बाहर निकलता है। बाकी लोग सहमे हुए एक-दूसरे को देखने लगते हैं।
9th फ्लोर की तलाश
कृषांत लिफ्ट की बजाय सीढ़ियाँ लेता है। उसके कदमों की आवाज़ सुनसान इमारत में गूँजती है। हर फ्लोर पर एक-एक बल्ब टिमटिमा रहा है। वो 9th फ्लोर पर पहुँचता है। वहाँ सब बिखरा हुआ है — कैमरा ज़मीन पर पड़ा है, वीडियो रिकॉर्डिंग चालू है।
रिकॉर्डिंग में श्रव्या की आवाज़ गूँजती है —
कौन है वहाँ?
और फिर — एक हल्की सी हँसी...कृषांत का चेहरा सख्त हो जाता है।
कृषांत (धीरे से) बोला -
श्रव्या...?
कोई जवाब नहीं। वो आगे बढ़ता है — और ऊपर की सीढ़ियों से कदमों की आवाज़ आती है। छत पर हवा ज़ोरों से चल रही है।
कृषांत ऊपर आता है — और उसकी नज़र ठिठक जाती है।
श्रव्या सीधी खड़ी है... उसके बाल उड़ रहे हैं... वो धीरे-धीरे छत की रेलिंग की ओर बढ़ रही है — जैसे कोई नींद में चल रहा हो।
कृषांत (चिल्लाकर) बोला -
श्रव्या! रुक जाओ!
कोई जवाब नहीं। वो बढ़ती जाती है...धीरे-धीरे रेलिंग पर चढ़ जाती है।
कृषांत (तेज़ आवाज़ में) बोला -
श्रव्या!!! सुनो मेरी बात!!
वो अब रेलिंग के ऊपर संतुलन बना रही है... नीचे काली गहराई...
कृषांत भागता है — और ठीक उसी पल जब वो छलाँग लगाने वाली होती है, वो दौड़कर उसके हाथ पकड़ लेता है।
कृषांत (घबराकर) बोला -
क्या कर रही हो तुम!!
वो उसे ज़ोर से खींचता है, श्रव्या उसकी बाँहों में गिर जाती है।
वो बेहोश सी लग रही है। कृषांत उसे झकझोरता है।
कृषांत (घबराकर) बोला -
श्रव्या! होश में आओ!
वो धीरे-धीरे आँखें खोलती है चेहरा फीका, आवाज़ कांपती हुई ।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
मैं... मैं यहाँ कैसे आई...?
मैं तो... 9th फ्लोर पर थी...
अचानक उसकी आँखें उलटने लगती हैं, सिर झुक जाता है,
और वो बेहोश होकर कृषांत की बाँहों में गिर जाती है। कृषांत उसे अपनी बाँहों में उठाता है। तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है।
सीढ़ियों पर उसका चेहरा गुस्से से लाल है, पर आँखों में डर साफ़ झलकता है।
कृषांत (बड़बड़ाते हुए) बोला -
कितनी बार मना किया था...ऊपर उस जगह मत जाना...अब क्या हो गया उसे...।
वो ब्रेक रूम में पहुँचता है। सब श्रव्या को देखकर घबरा जाते हैं।
साक्षी (रोते हुए) बोली -
Sir.. क्या हुआ उसे?
कृषांत (कठोर लहज़े में) बोला -
कुछ नहीं। अब सब लोग निकलो यहाँ से!
सब धीरे-धीरे बाहर चले जाते हैं। कामिनी की नज़र आख़िरी बार
श्रव्या पर जाती है उसकी आँखें आधी खुली हैं... और होंठों पर हल्की मुस्कान... जैसे किसी और की मौजूदगी हो उसके अंदर...।
लाइट झिलमिलाती है — और पृष्ठभूमि में वही भूतिया आवाज़ गूँजती है —
तुम फिर आ गई...
स्क्रीन ब्लैक हो जाती है।
कभी-कभी बचा लिया हुआ शरीर... आत्मा को नहीं बचा पाता...
अगले दिन का ऑफिस
सुबह के 10:00 बजे। ऑफिस में माहौल भारी है। कर्मचारी धीमे-धीमे काम कर रहे हैं, पर सबकी निगाहें बार-बार कृषांत के केबिन की ओर जा रही हैं। कृषांत के केबिन में — श्रव्या, कामिनी, विवेक, अनुज और साक्षी चुपचाप खड़े हैं।।कृषांत अपनी टेबल के पीछे खड़ा है, चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ।
कृषांत (तेज़ आवाज़ में) बोला -
क्या मज़ाक समझ रखा है तुम लोगों ने ये ऑफिस?!
ये कोई गेम ज़ोन है क्या?!
सन्नाटा। सबके सिर झुके हुए।
कृषांत (ग़ुस्से में) बोला -
मैंने साफ़ मना किया था कि कोई भी 8th या 9th फ्लोर पर नहीं जाएगा! फिर भी तुम लोगों ने डेयर के नाम पर श्रव्या को वहाँ भेज दिया?
वो टेबल पर हाथ पटकता है — फाइलें गिर जाती हैं।
कृषांत (तेज़ आवाज़ में) बोला -
तुम जानते भी हो... कल क्या हो सकता था?!
अगर मैं सही वक्त पर नहीं पहुँचता...तो आज तुम सबकी पुलिस पूछताछ चल रही होती!
सब चुप हैं। साक्षी की आँखों में आँसू हैं।
विवेक कुछ कहने की कोशिश करता है —
सर... वो बस मज़ाक था... हम नहीं जानते थे...
कृषांत (गुस्से से बीच में काटते हुए) बोला -
मज़ाक?
भूतों वाली मंज़िल पर किसी को भेजना मज़ाक है तुम्हारे लिए?!
वो एक पल के लिए रुकता है, फिर श्रव्या की तरफ़ मुड़ता है। वो खामोश खड़ी है। उसकी आँखें थकी हुई हैं, चेहरा पीला। वो कुछ कहना चाहती है, मगर आवाज़ नहीं निकलती।
कृषांत (थोड़ा शांत स्वर में) बोला -
और तुम, श्रव्या...तुमसे तो मुझे ये उम्मीद नहीं थी।
तुम जानती हो ना, वहाँ क्या हुआ था?
फिर भी क्यों गई?
श्रव्या सिर झुका लेती है।
वो धीरे से फुसफुसाती है —)
मुझे नहीं पता...किसी ने जैसे अंदर से कहा हो — 'जाओ'...
बाकी सब एक-दूसरे को देखने लगते हैं। कृषांत की भौंहें सिकुड़ जाती हैं।
कृषांत (गंभीर लहज़े में) बोला -
किसी ने कहा?
कौन?
श्रव्या धीरे से सिर हिलाती है — जैसे उसे खुद याद न हो।
श्रव्या (काँपती आवाज़ में) बोली -
मुझे बस एक हरी परछाई दिखी थी...उसने मुस्कुराकर कहा — 'आओ'...।
कमरे में सन्नाटा। कामिनी के चेहरे का रंग उड़ जाता है।
कामिनी (घबराकर) बोली -
सर... ये... ये वही प्रिशा का भूत तो नहीं?"
कृषांत उसकी तरफ़ देखता है — बेहद ठंडी निगाहों से।
कृषांत (धीरे से, पर सख्त लहज़े में) बोला -
बस... बहुत हो गया।
अब कोई भी उस फ्लोर की तरफ़ नहीं जाएगा।
जो भी नियम तोड़ेगा — सीधा ऑफिस से बाहर।
समझे सब?
सब एक साथ “हाँ सर” कहते हैं। सब बाहर निकलने लगते हैं।
केबिन में अब सिर्फ श्रव्या रह जाती है।नवो धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ती है, पर अचानक उसका ध्यान टेबल के शीशे पर जाता है । जहाँ कुछ हल्की उँगलियों के निशान बने हैं। वो उन्हें ध्यान से देखती है...
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बुदबुदाती है —)
प्रिशा...
शीशे पर हल्की हवा चलती है...और उँगलियों के निशान खुद-ब-खुद मिट जाते हैं। कृषांत बाहर से शीशे के पार उसे देख रहा है। उसके चेहरे पर चिंता साफ़ है — जैसे उसे अब भी यकीन न हो कि सब ख़त्म हुआ है...।
कभी-कभी गलती से खुले दरवाज़े... फिर कभी बंद नहीं होते...।