ज़ख्मों की शादी - 23 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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ज़ख्मों की शादी - 23

सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी। सृष्टि अभी भी थोड़ी झिझकी हुई थी। वो उठकर बैठ गई। बाल बिखरे हुए। चेहरे पर हल्की थकान। कबीर भी उठकर बैठ गया, पर उसने दूरी बनाए रखी। कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर सृष्टि ने धीरे से कहा—
कल रात… अगर आप नहीं होते…

उसकी आवाज़ रुक गई। कबीर ने बीच में नहीं टोका। बस सुनता रहा।

वो बोली - 
मुझे लगा था मैं फिर से… सब कुछ खो दूँगी।

कबीर ने गहरी साँस ली।

कबीर ने ने शांत स्वर में कहा -
मैंने बहुत गलतियाँ की हैं,
पर अब मैं तुम्हारी ढाल बनना चाहता हूँ… डर नहीं।

सृष्टि ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पहली बार सिर्फ पछतावा नहीं स्थिरता दिखी।

नीचे से गार्ड की आवाज़ आई।
Sir, पुलिस आई है।

कबीर और सृष्टि ने एक-दूसरे को देखा। रात की घटना अब आधिकारिक बन चुकी थी। पुलिस ने घर का मुआयना किया।
सीसीटीवी फुटेज लिया। इस बार मामला गंभीर था, घर में घुसपैठ, हमला। अब वे इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे। सृष्टि ने बयान देने की इच्छा जताई। कबीर ने उसकी तरफ देखा, पूछती हुई नज़र से। सृष्टि ने हल्का सा सिर हिलाया।

सृष्टि बोली - 
मैं तैयार हूँ।

उसकी आवाज़ अभी भी नरम थी, पर उसमें भागने की कोशिश नहीं थी।

शाम को सृष्टि बालकनी में खड़ी थी। हवा ठंडी थी। कबीर कुछ कदम पीछे खड़ा था।

उसने पूछा - 
डर लग रहा है?

सृष्टि ने सच कहा -
हाँ, पर इस बार… मैं भाग नहीं रही।

कबीर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।

कबीर बोला - 
मैं भी नहीं।

उनके बीच अभी भी अधूरी बातें थीं। घाव थे। अनकहे डर थे।
पर अब दोनों एक ही दिशा में खड़े थे। सवाल अब सिर्फ यह नहीं था कि वे एक-दूसरे को बचा पाएँगे या नहीं—
सवाल यह था कि क्या वे मिलकर अपने अतीत को हराने की ताकत जुटा पाएँगे?
और कहीं दूर, विशम्बर नाथ अभी भी हार मानने वालों में से नहीं था।

दो दिन बाद

सीसीटीवी फुटेज से एक चेहरा साफ़ दिख गया। पुलिस ने पहचान की पुष्टि की। वो आदमी विशम्बर नाथ के पुराने कर्मचारियों में से था। अब शक नहीं रहा। धागा सीधा उसी तक जाता था।

उधर — विशम्बर नाथ के दफ्तर में 

विशम्बर ने गुस्से से पूछा - 
पुलिस पहुँची थी घर तक?

सामने खड़ा आदमी घबराया हुआ था।

वो आदमी बोला - 
जी… साहब। अलार्म बज गया था।

विशम्बर की आँखें सिकुड़ गईं।

विशम्बर बोला - 
मैंने कहा था— डराना है।
पकड़े नहीं जाना है।

उसने मेज़ पर मुट्ठी मारी।

वो बोला - 
अब खेल खुलकर होगा।

इधर — घर पर

कबीर ने कानूनी सलाहकार से मुलाकात की। अब मामला सिर्फ धमकी का नहीं था, आपराधिक घुसपैठ और साजिश का था।

वकील ने कहा - 
हमें प्रोटेक्शन ऑर्डर के लिए आवेदन करना चाहिए।

सृष्टि भी वहीं बैठी थी। पहले वो ऐसी बैठकों से दूर रहती थी। आज वो खुद नोट्स ले रही थी। कबीर ने उसे देखा, उसमें अब डर के साथ साहस भी था।

रात

सृष्टि ने कबीर से कहा—
मैं भागते-भागते थक गई हूँ।
पहले आपसे…फिर अपने डर से…अब हालात से।

कबीर चुप रहा।

वो बोली - 
अगर लड़ना है—
तो इस बार कानूनी और खुले तौर पर लड़ेंगे।

उसने दृढ़ स्वर में कहा। कबीर ने सिर हिलाया।

कबीर बोला - 
मैं गुस्से से नहीं…रणनीति से जवाब दूँगा।

यह वही आदमी था, पर अब सोच बदल चुकी थी।

अगले हफ्ते कोर्ट में रेस्ट्रेनिंग ऑर्डर के लिए सुनवाई तय हो गई।
विशम्बर को नोटिस भेजा गया। अब मामला निजी बदले से निकलकर कानून की चौखट पर आ गया था।
सृष्टि ने आईने में खुद को देखा। वो वही लड़की नहीं थी जो किसी के फैसले की मोहताज थी।

उसने धीरे से कहा—
अब डर खत्म नहीं हुआ है…पर अब वो मुझे रोक नहीं सकता।

कोर्ट की तारीख़
सुबह का माहौल भारी था। सृष्टि ने हल्की साड़ी पहनी।
हाथ ठंडे थे, पर इस बार वो छुप नहीं रही थी। कबीर उसके साथ था। साथ…पर आगे नहीं। कोर्ट रूम में हलचल थी। वकील, फाइलें, फुसफुसाहट।
और फिर, दरवाज़ा खुला। विशम्बर नाथ अंदर आया। साफ़ सूट में। चेहरे पर वही अहंकार। उसकी नज़र सीधे सृष्टि पर पड़ी। एक हल्की सी तिरछी मुस्कान। सृष्टि के अंदर एक पल को पुराना डर जागा। पर इस बार, उसने नज़रें नहीं झुकाईं।

सुनवाई शुरू हुई
कबीर के वकील ने सबूत रखे—
सीसीटीवी फुटेज।
धमकी वाला पत्र।
कॉल रिकॉर्ड।

विशम्बर के वकील ने कहा—
मेरे मुवक्किल का इन लोगों से कोई संबंध नहीं।
ये सब साज़िश है।

सृष्टि की उंगलियाँ आपस में उलझ गईं।

जज ने उसकी ओर देखा और कहा —
क्या आप कुछ कहना चाहेंगी?

पूरा कमरा शांत हो गया। कबीर ने उसकी तरफ देखा, बिना दबाव के। सृष्टि खड़ी हुई। आवाज़ पहले हल्की थी, पर धीरे-धीरे स्थिर हो गई।

सृष्टि बोली - 
इस आदमी ने सबसे पहले मेरे पति को धमकी दी, कि अगर उन्होंने मेरे बच्चे को खत्म नहीं किया तो वो मुझे मार देंगे।
इसने हम पर हमला भी करवाया। फिर उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ तो इस आदमी ने हमे haighway पर अकेले देखकर अपने गुंडों को भेजा और हमपर फिर से हमला करवाया। 
मेरे पति को बहुत मारा गया। और उसी लड़ाई के दौरान इनके गुंडों ने मेरे बच्चे को पैदा होने से पहले ही मार दिया।
तब भी इसका मन नहीं भरा तो  इस आदमी ने मुझे ज़बरदस्ती शादी के लिए मजबूर किया। मुझे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। और जब मैं वहाँ से निकल आई—
तो अब मुझे डराने की कोशिश कर रहा है।

विशम्बर की मुस्कान गायब हो गई।

सृष्टि ने आगे कहा—
मैं अब नहीं डरती।
और न ही चुप रहूँगी।

उसकी आँखें नम थीं, पर आवाज़ मजबूत।

कुछ देर की बहस के बाद
जज ने अंतरिम सुरक्षा आदेश (restraining order) जारी किया। विशम्बर नाथ को सृष्टि और कबीर से किसी भी तरह संपर्क या नज़दीकी से रोका गया। जाँच जारी रखने का आदेश भी दिया गया।

कोर्ट से बाहर निकलते समय सृष्टि ने गहरी साँस ली।

सृष्टि बोली - 
ये अंत नहीं है।

कबीर ने जवाब दिया—
पर ये शुरुआत है।

दूर खड़ा विशम्बर उन्हें जाते हुए देख रहा था। उसकी आँखों में अब खुला गुस्सा था। वो हार मानने वाला आदमी नहीं था।

उसने फोन निकाला—
प्लान बी शुरू करो।

कानून ने एक दीवार खड़ी कर दी थी। पर क्या वो दीवार काफी होगी?
या विशम्बर आखिरी चाल चलेगा जो सब कुछ फिर हिला देगी?

Aapko kya lagta hai -
Vishmbar ab kya kaand karne vala tha?
Kya kabir or sristi lad payenge?

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