पर कहानी यहीं शांत नहीं हुई। अतीत कभी-कभी दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता, सीधे तोड़कर अंदर घुसता है। जिस जगह से कबीर सृष्टि को निकालकर लाया था…वहाँ एक और कहानी अधूरी रह गई थी।
एक नाम—विशम्बर नाथ।
चालीस साल का। अहंकारी। पैसे और ताकत के दम पर रिश्ते खरीदने वाला।
वही आदमी जिससे सृष्टि से ज़बरदस्ती शादी करने वाला था।
वही आदमी जिसके दबाव, डर और हिंसा के बीच सृष्टि का गर्भ गिर गया था।
उस दिन जब कबीर उसे वहाँ से लेकर गया, सबके सामने—विशम्बर नाथ की इज़्ज़त को ठेस पहुँची थी।
और कुछ लोगों के लिए औरत से ज़्यादा अहम उनकी “इज़्ज़त” होती है।
दूसरी तरफ…
विशम्बर नाथ अपने ऑफिस में बैठा था। हाथ में शराब का गिलास।
वो बोला -
उसे लगा वो मुझे चुनौती देकर चला जाएगा?
उसकी आँखों में क्रोध था।
बिसंवर बोला -
वो लड़की मेरी होने वाली थी।
और उस लड़के ने…
उसने मेज़ पर गिलास पटक दिया।
वो बोला -
मुझे सबके सामने छोटा कर दिया।
उसके दिमाग में बदले की आग थी। उसे सृष्टि से नहीं, अपनी हार से समस्या थी।
इधर…सृष्टि ने सोचना शुरू किया था कि शायद अतीत पीछे छूट गया है। पर एक शाम घर के बाहर एक काली गाड़ी कुछ देर खड़ी रही। कबीर ने खिड़की से देखा। नंबर प्लेट पहचान में आई।
उसका चेहरा सख्त हो गया। वो जानता था, यह संयोग नहीं है।
उस रात कबीर ने सृष्टि से कुछ नहीं कहा। वो उसे फिर डर में नहीं धकेलना चाहता था। पर उसने सुरक्षा बढ़ा दी। गेट पर कैमरे।
गार्ड। इस बार वो सिर्फ अपने अपराध से नहीं लड़ रहा था—
वो उसके अतीत की परछाइयों से भी लड़ रहा था।
कुछ दिन बाद
सब कुछ ऊपर-ऊपर से सामान्य दिख रहा था। पर कबीर अब हर आवाज़ पर चौकन्ना हो जाता।
एक दोपहर सृष्टि के फोन पर अनजान नंबर से कॉल आया।
वो रसोई में थी। कबीर स्टडी में।
सृष्टि ने कॉल उठाया—
हेलो?
कुछ सेकंड चुप्पी।
फिर एक भारी, परिचित आवाज़—
बहुत खुश लग रही हो… सृष्टि।
उसका हाथ काँप गया। साँस अटक गई। वो आवाज़ वह कभी भूल नहीं सकती थी।
वो बोला -
मुझे पहचान लिया?
सृष्टि का गला सूख गया—
वि विशम्बर…
फोन हाथ से लगभग गिर गया। कबीर दौड़कर आया। उसने सृष्टि के चेहरे का रंग उड़ता देखा।
कबीर बोला -
क्या हुआ?
सृष्टि ने फोन उसकी ओर बढ़ा दिया। लाइन कट चुकी थी। उसकी साँसें तेज़ थीं। पुराना डर अचानक ज़िंदा हो उठा।
वो बोली -
वो… वापस आ गया है…
शाम को
घर के गेट पर एक लिफ़ाफ़ा मिला। अंदर सिर्फ एक फोटो। पुरानी।
सृष्टि की। उसी घर की जहाँ से उसे लाया गया था।
पीछे लिखा था—
अधूरी चीज़ें मुझे पसंद नहीं।
सृष्टि के हाथ ठंडे पड़ गए। वो सोफ़े पर बैठ गई।
वो बोली -
मैं फिर से वहाँ नहीं जाऊँगी…मैं नहीं…
उसकी आवाज़ टूट रही थी। कबीर उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया, पर दूरी बनाए रखी।
कबीर बोला -
तुम कहीं नहीं जाओगी।
इस बार कोई तुम्हें छुएगा भी नहीं।
उसकी आवाज़ में गुस्सा था, पर इस बार नियंत्रण भी था।
अगले दिन
कबीर सीधे पुलिस स्टेशन गया। सबूत दिए। कॉल डिटेल्स। धमकी वाला पत्र। उसने फैसला कर लिया था, अब ये लड़ाई चुपचाप नहीं लड़ी जाएगी।
घर लौटकर उसने सृष्टि से कहा—
अब हम डरकर नहीं छिपेंगे।
कानूनी रास्ता अपनाएँगे।
सृष्टि ने पहली बार डर के बीच दृढ़ता महसूस की।
वो बोली -
मैं भी चलूँगी।
अगर बयान देना होगा…तो दूँगी।
उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो पीछे नहीं हट रही थी।
अतीत वापस आया था। पर इस बार सृष्टि अकेली नहीं थी।
और सबसे बड़ी बात—
इस बार वो सिर्फ बचाई जाने वाली लड़की नहीं थी। वो अपनी आवाज़ बनने को तैयार थी।
पुलिस स्टेशन से लौटते वक्त कबीर की मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं।
वो बोला -
उन्हें सबूत चाहिए…उन्हें वारंट चाहिए… उन्हें ‘सीधा हमला’ चाहिए…जब तक कुछ बड़ा न हो, वो कुछ नहीं करेंगे!
उसकी आवाज़ गाड़ी के अंदर गूंज रही थी। सृष्टि चुप बैठी थी।
वो जानती थी , ये गुस्सा सिर्फ पुलिस पर नहीं था। ये उसकी बेबसी थी।
घर पहुँचते ही कबीर ने फाइल टेबल पर पटक दी।
वो बोला -
अगर सिस्टम साथ नहीं देगा तो मैं खुद निपटूँगा उससे!
उसकी आँखों में वही पुरानी आग चमकी, जो सृष्टि को डराती थी।
सृष्टि का दिल बैठ गया। वो उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
वो बोली -
कबीर जी… प्लीज़…
वो झल्ला उठा -
तुम समझती क्यों नहीं?
वो आदमी फिर से तुम्हें डराएगा!
सृष्टि की आवाज़ काँपी—
और अगर आप ऐसे ही गुस्से में रहोगे तो आप भी मुझे डराओगे…
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। ये शब्द सीधे उसके सीने में लगे। कबीर ने पहली बार महसूस किया, वो फिर उसी रास्ते पर खड़ा है। जहाँ गुस्सा उसे अंधा कर देता है। उसने गहरी साँस ली।
पर बेचैनी जा नहीं रही थी। छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना।
स्टाफ पर चिल्ला देना। फोन ज़ोर से पटक देना। सृष्टि हर बार उसे शांत करने की कोशिश करती।
वो बोलती -
पानी पी लीजिए…बैठिए…साँस लीजिए…
पर अंदर की आग बुझ नहीं रही थी।
एक रात कबीर बालकनी में खड़ा था। बारिश हो रही थी। सृष्टि धीरे से पास आई, पर दूरी बनाए रखी।
वो बोली -
तुम फिर से खो रहे हो खुद को…
कबीर की आवाज़ भारी थी—
मैं बस तुम्हें सुरक्षित रखना चाहता हूँ।
सृष्टि ने कहा -
मुझे पता है, पर मुझे तुम्हारा गुस्सा नहीं चाहिए।
मुझे तुम्हारा साथ चाहिए।
कबीर चुप हो गया।
उसे एहसास हुआ, अगर वो अपने गुस्से को काबू नहीं करेगा
तो विशम्बर से पहले वो खुद इस रिश्ते को नुकसान पहुँचा देगा।
अगली सुबह
कबीर ने अपने थेरेपिस्ट को कॉल किया।
कबीर बोला -
मुझे इमरजेंसी सेशन चाहिए।
मैं फिर से ट्रिगर हो रहा हूँ।
ये मान लेना उसके लिए जीत से कम नहीं था।
बाहर खतरा था। अंदर गुस्सा। पर अब फर्क ये था, दोनों लड़ रहे थे। एक-दूसरे से नहीं…हालात से।
रात गहरी थी। घर के बाकी हिस्सों में सन्नाटा पसरा हुआ था। सृष्टि अपने कमरे में सो रही थी। नींद अभी हल्की ही थी कि उसे खिड़की की हल्की सी आवाज़ सुनाई दी। पहले उसे लगा शायद हवा होगी।
पर फिर काँच की चरमराहट। कदमों की दबे पाँव आहट। उसकी आँखें खुल गईं। कमरे के कोने में दो परछाइयाँ हिल रही थीं।
उसका गला सूख गया। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था जैसे सीना तोड़कर बाहर आ जाएगा।
एक भारी आवाज़ फुसफुसाई—
चुपचाप चलो… वरना…
सृष्टि के हाथ ठंडे पड़ गए। अचानक उसके अंदर से सारी थेरेपी,
सारी कोशिशें एक चीख बनकर बाहर निकली—
कबीर जी!
वो बिस्तर से कूदकर भागी। दरवाज़ा खोला। सीधे बाहर। और अगले ही पल वो कबीर के room में जाकर कबीर की बाँहों में सिमट गई। उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
वो बोली -
कबीर जी! कमरे में… कोई है…
कबीर पहले तो कुछ समझ नहीं पाया। नींद से उठा था। पर जैसे ही उसने कमरे के अंदर हलचल देखी उसकी आँखें सख्त हो गईं।
दो आदमी। चेहरे ढके हुए।
एक ने गाली दी—
साला जल्दी पकड़!
कबीर ने सृष्टि को पीछे किया।
कबीर बोला -
अंदर जाओ। दरवाज़ा लॉक करो।
सृष्टि बोली -
नहीं—
कबीर सख्ती से बोला -
जाओ!
उसकी आवाज़ में इस बार गुस्सा नहीं खतरे की चेतावनी थी।
कबीर ने तुरंत सिक्योरिटी अलार्म दबाया। घर में तेज़ सायरन बज उठा। गुंडे घबरा गए। एक ने हमला करने की कोशिश की, पर कबीर तैयार था। वो अब पहले वाला बेकाबू आदमी नहीं था—
पर ज़रूरत पड़ने पर वो कमजोर भी नहीं था।
धक्का…कुर्सी गिरने की आवाज़…एक मुक्का…गार्ड दौड़ते हुए अंदर आए।
एक गार्ड बोला -
क्या हुआ sir?
कबीर बोला -
कुछ गुंडे घर में घुस आए हैं, पकड़ों उन्हें जाकर।
दोनों गुंडे भागने लगे। एक खिड़की से कूद गया। दूसरा गार्ड के हाथ लगते-लगते छूट गया।
पर जाते-जाते वो एक बात कह गया—
ये तो बस शुरुआत है!
सृष्टि दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी। उसकी साँसें टूट रही थीं। कबीर अंदर आया। इस बार उसने बिना सोचे उसे कसकर पकड़ लिया। सृष्टि एक पल को जड़ हो गई। फिर धीरे-धीरे…उसने खुद भी उसे पकड़ लिया। डर अभी था। पर इस बार वो अकेली नहीं थी।
कबीर की आँखों में आग थी। अब ये सिर्फ धमकी नहीं थी। सीधा हमला था। और उसे पूरा यकीन था, इसके पीछे वही है। विशम्बर नाथ।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी। अलार्म बंद हो चुका था। गार्ड बाहर तैनात थे। पर सृष्टि के भीतर का शोर अब भी थमा नहीं था। उसके हाथ काँप रहे थे। साँसें तेज़। आँखें डरी हुई।
कबीर ने धीरे से कहा—
तुम अपने कमरे में जाओ… मैं यहीं हूँ।
सृष्टि ने तुरंत सिर हिला दिया।
वो बोली -
नहीं… नहीं…मैं नहीं जाऊंगी....।
उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई थी। वो पीछे हट गई, जैसे उस कमरे का नाम ही उसे फिर अंधेरे में धकेल देगा। अगले ही पल
वो कबीर के पास आई। उसके बिस्तर पर बैठी। और फिर…धीरे से उसके कंबल में सिमट गई। उसने खुद को कबीर के सीने से लगा लिया। पूरा शरीर काँप रहा था। कबीर एक पल को ठहर गया।
वो जानता था यह डर है। सुरक्षा की तलाश है। न कि कोई और भावना। उसने बहुत धीरे से अपनी बाँहें उसके चारों तरफ रख दीं।
कसकर नहीं पर मजबूती से।
उसने फुसफुसाया -
मैं हूँ…कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।
सृष्टि ने उसकी शर्ट को कसकर पकड़ लिया। जैसे छोड़ देगी तो सब फिर टूट जाएगा।
वो बोली -
वो… वो वापस आ जाएगा…
उसकी आवाज़ काँप रही थी। कबीर ने उसकी पीठ पर हल्के-हल्के हाथ फेरा। धीरे-धीरे। सांत्वना की तरह।
कबीर बोला -
इस बार नहीं।
अब तुम अकेली नहीं हो।
कुछ मिनटों तक सिर्फ उसकी सिसकियाँ सुनाई देती रहीं। फिर उसकी साँसें थोड़ा धीमी हुईं। कबीर को महसूस हुआ वो अब भी काँप रही है। उसने उसे थोड़ा और करीब खींच लिया। पर ध्यान रखा कि उसकी पकड़ सुरक्षा बने दबाव नहीं।
सृष्टि ने पहली बार खुद से उसे कसकर पकड़ा। यह डर से जन्मी निकटता थी, पर उसमें विश्वास की हल्की लौ भी थी।
रात लंबी थी। नींद दोनों को नहीं आई। पर उस अंधेरी रात में
एक सच साफ़ था, खतरा बाहर था। पर अंदर दो लोग एक-दूसरे को थामे खड़े थे। और कभी-कभी सबसे मजबूत दीवार ईंटों से नहीं, विश्वास से बनती है।
रात गहरी थी। घड़ी शायद तीन बजा रही थी। कमरे में हल्की रोशनी थी। सृष्टि आधी नींद में थी , पर उसका शरीर अब भी डर के असर में था। नींद में ही वो और करीब खिसक आई। उसका हाथ अनजाने में कबीर के सीने पर आ गया।
जैसे वो यकीन करना चाहती हो, कि कोई है। धड़कन है। सुरक्षा है।
वो सच में सो नहीं रही थी, वो बस डर और थकान के बीच सहारा ढूँढ रही थी। कबीर की साँसें तेज़ हो गईं। उसके लिए यह सब नया था। पहले सृष्टि उसकी छुअन से सिमट जाती थी। आज वो खुद
उसके सीने से लगी थी। पर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसने खुद को याद दिलाया—
ये भरोसा है…इसका सम्मान करना है।
उसने बहुत हल्के से अपनी हथेली उसकी पीठ पर रखी। बस इतना कि उसे लगे वो सुरक्षित है। उससे ज़्यादा नहीं।
सृष्टि ने नींद में धीमे से कहा—
मत जाना…please...
उसकी आवाज़ टूटती हुई थी। कबीर का दिल कस गया।
उसने बहुत धीमे फुसफुसाया -
कहीं नहीं जा रहा,
वो पूरी रात वैसे ही लेटा रहा। अपनी साँसों को शांत रखने की कोशिश करता हुआ। अपने मन को समझाता हुआ। यह वासना का पल नहीं था। यह जिम्मेदारी का था।
सुबह की पहली किरण कमरे में आई। सृष्टि की आँख खुली।
उसे एहसास हुआ वो कबीर के बहुत करीब है। उसका हाथ अब भी उसके सीने पर था। वो तुरंत थोड़ा पीछे हुई। चेहरे पर हल्की झिझक।
वो बोली -
स सॉरी…
कबीर ने सिर हिलाया।
कबीर बोला -
सॉरी की जरूरत नहीं।
तुम डरी हुई थीं।
उनकी आँखें मिलीं। पहली बार इस निकटता में डर कम था।
शर्म थी। संकोच था। पर भरोसे की शुरुआत भी थी। रात ने उन्हें करीब लाया था, मजबूरी में।
पर अब सवाल ये है—
क्या ये करीबियाँ सिर्फ डर तक सीमित रहेंगी?
या दिल भी धीरे-धीरे खुलने लगेंगे?
Aapko kya lagta hai -
Hero sahi hai ya galat? A ya B likh kar jao.”
“shristi ko Maaf karna chahiye ya nahi?
Agar aap regular reader ho to follow button dabana mat bhoolna ❤️
Kyunki main daily update karti hoon.
Or Jo log yahan tak padh chuke hain aur chup ho… ek ❤️ drop karke jao. Main dekhna chahti hoon kitne silent readers hain.