ज़ख्मों की शादी - 7 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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ज़ख्मों की शादी - 7

Present Time – Late Night

कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया था। Kabir कुछ नहीं बोला। उसने Shristi की तरफ़ पीठ करके लेटने का नाटक किया, जैसे उसे मजबूर न करना चाहता हो। Kabir जानता था—अगर आज भी उसने ज़ोर डाला, तो Shristi पूरी तरह टूट जाएगी। काफी देर तक सिर्फ़ घड़ी की टिक–टिक और Shristi की सिसकियों की दबी आवाज़ सुनाई देती रही। Shristi ने करवट बदली। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। दिल और दिमाग़ दोनों थक चुके थे।

Shristi (टूटती आवाज़ में, खुद से) बोली - 
मैं मजबूत नहीं हूँ… जितना दिखाती हूँ उतना बिल्कुल नहीं…।

Kabir ने ये शब्द सुन लिए। उसका दिल जैसे कस गया। वो धीरे से पलटा, बिना छुए, बस पास आकर लेट गया।

Kabir (बहुत धीमे, कांपती आवाज़ में) बोला - 
मैं जानता हूँ…और मैं ये भी जानता हूँ कि मैं तुम्हारे हर आँसू का गुनहगार हूँ।

Shristi चुप रही। लेकिन उसका कंधा हल्का सा काँपा।

Kabir बोला - 
आज अगर तुम नहीं आना चाहती… तो मत आओ।
मैं बस इतना चाहता हूँ कि तुम्हें ये यक़ीन हो जाए—
अब मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा… चाहे तुम मुझे अपना मानो या नहीं।

ये सुनते ही Shristi का संयम टूट गया। वो धीरे–धीरे सरकते हुए Kabir के पास आई, लेकिन सीने से नहीं लगी। बस उसकी बाँह को हल्के से पकड़ लिया।।ये कोई मिलन नहीं था… ये भरोसे की पहली साँस थी। Kabir हिला नहीं। उसने Shristi को खींचा नहीं। बस अपना कंधा थोड़ा सा आगे कर दिया। Shristi ने माथा उसके कंधे से टिका दिया।

Shristi (रोते हुए) बोली - 
मुझे डर लगता है कबीर जी…कि कहीं फिर से… वही सब…

Kabir (आँखें बंद करके) बोला - 
अगर ऐसा हुआ…तो सबसे पहले खुद को सज़ा दूँगा।

Shristi ने पहली बार उस रात चैन की साँस ली। वो धीरे–धीरे Kabir की बाँह के सहारे सो गई। आज Shristi ने Kabir को माफ़ नहीं किया था…पर उसने उसे एक मौका ज़रूर दिया था।Kabir पूरी रात यूँ ही बैठा रहा। उसे डर था—अगर हिला, तो ये नाज़ुक भरोसा टूट जाएगा।

हल्की धूप कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। परदे हवा से हिल रहे थे। Shristi की आँख धीरे-धीरे खुली। सिर भारी था, लेकिन सीने में वो तेज़ दर्द नहीं था। कई दिनों बाद Shristi ने बिना दर्द के आँखें खोली थीं। उसे एहसास हुआ—वो Kabir की बाँह के सहारे सोई थी। पूरी तरह नहीं, बस उतना कि गिर न जाए।
वो तुरंत सीधी हुई, घबरा गई।

Shristi (धीमे, खुद से) बोली - 
मैं… यहाँ कैसे…

Kabir वहीं उसकी side में लेटा था। उसकी आँखें लाल थीं—पूरी रात जागा था।

Kabir (शांत, बिना उसे डराए) बोला - 
घबराओ मत…तुम रात में यहीं सो गई थीं।
मैंने तुम्हें छुआ तक नहीं… बस… यहीं लेटा रहा।

Shristi ने उसकी तरफ देखा। पहली बार उसकी आँखों में डर नहीं, थकान और सच्चाई थी। आज Kabir वही नहीं था—जो गुस्से से भरा रहता था। Shristi ने चादर को कसकर पकड़ा।

Shristi बोली - 
आप पूरी रात…?

Kabir (हल्की मुस्कान के साथ) बोला - 
हाँ। डर लग रहा था—अगर हिला, तो तुम फिर दूर चली जाओगी।

Shristi चुप रही। लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं। Kabir उठकर थोड़ा दूर हो गया, जैसे उसे space दे रहा हो।

Kabir बोला - 
मैं नाश्ता बनवाता हूँ।
तुम्हारी दवाइयाँ भी टाइम पर देनी हैं।

वो मुड़ा, लेकिन Shristi की आवाज़ ने उसे रोक लिया।

Shristi (बहुत धीमे) बोली - 
Kabir ji…

Kabir रुक गया।

Shristi बोली - 
मैंने आपको माफ़ नहीं किया है।

Kabir (बिना पलटे) बोला - 
मुझे पता है।

Shristi (आँखों में आँसू लिए) बोली - 
पर…आज मैं उतनी नफरत भी नहीं कर पा रही।

Kabir की आँखें बंद हो गईं। ये उसके लिए बहुत था।
ये प्यार नहीं था…पर नफरत की दीवार में पहली दरार ज़रूर थी।

Past Time – शादी के अगले दिन 

Shristi की आँख खुली तो वह Kabir की बाँहों में थी। एक पल को उसे लगा—शायद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन Kabir की आँख खुलते ही उसका चेहरा सख़्त हो गया। उसने Shristi को झटके से खुद से अलग कर दिया।

Kabir (ठंडी आवाज़ में) बोला - 
हटो।

Shristi कुछ समझ पाती, उससे पहले ही Kabir उठकर washroom में चला गया। जिस बाँह में उसे रात भर सुकून मिला था, वही बाँह सुबह ज़हर बन गई। Shristi बिस्तर पर बैठी रह गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। कुछ देर बाद Kabir बाहर आया। तैयार था। चेहरे पर वही पुरानी सख़्ती।

Kabir बोला - 
दस बजे hall में मिलना।

इतना कहकर वह चला गया।

Shristi तय समय पर hall में पहुँची। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। Kabir सोफ़े पर बैठा था। हाथ में फ़ाइल, जैसे ये कोई business meeting हो। उसने ऊपर से नीचे तक Shristi को देखा और....

ताना मारते हुए बोला—
ओह… आ गईं तुम।

Shristi ने नज़रें झुका लीं।

Kabir (कठोर और आदेशात्मक लहजे में) बोला - 
अब ध्यान से सुनो।
इस घर में रहना है, तो मेरे rules पर रहना होगा।

वह खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ भारी थी।

Kabir बोला - 
तुम यहाँ अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं करोगी।
मैं जो कहूँगा—वही होगा।
मैं बुलाऊँगा, तो आओगी।
मैं कहूँगा, तो चली जाओगी।

Shristi का शरीर काँप गया।

Kabir बोला - 
तुम्हारी पसंद, तुम्हारी सोच, तुम्हारे फ़ैसले—
सब अब मेरे हाथ में हैं। 
अभी से तुम सिर्फ मेरी हो सिर्फ मेरी।
और मैं तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकता हूं। 

उसने एक पल रुककर Shristi की आँखों में देखा।

Kabir (धीमे लेकिन डरावने लहजे में) बोला - 
और अगर तुमने मेरे rules तोड़े…तो अंजाम तुम्हें खुद ही झेलना पड़ेगा।

Shristi सहम गई थी। आवाज़ गले में अटक गई थी। वह संस्कारी थी—लड़ना नहीं सिखाया गया था उसे। बस सहना सिखाया गया था। वह कुछ बोली नहीं। बस सिर झुका लिया। और Kabir ने उसकी इस चुप्पी को उसकी कमज़ोरी समझ लिया।

To Be Continued…

Kabir इतना निर्दयी क्यों बन गया था?
Shristi ने उस वक़्त विरोध क्यों नहीं किया—डर, संस्कार या मजबूरी?
क्या Kabir को सच में लगा कि वह धोखा खा गया है?
ये rules Shristi की ज़िंदगी को किस हद तक तोड़ेंगे?
क्या कभी Kabir को अपनी इस क्रूरता का एहसास होगा?

Aapko kya lagta - 
Kabir ne aisa kyu Kiya hoga ?
Aapko kya lagta hai shristi kabir ki shart maan leni chahiye ya nahin?

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