Past Time – एक रात
इतनी-सी गलतियों से कोई औरत अपने ही पति से नफ़रत नहीं करती…सृष्टि के साथ जो हुआ था, वो ‘गलती’ नहीं था—
वो उसकी रूह पर लगा ज़ख्म था। सृष्टि गहरी नींद में थी। शरीर थका हुआ, दिल बोझिल। अचानक उसे अपने सीने पर अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। पेट में तेज़ ऐंठन उठी। दर्द ने उसे जगा दिया। उसकी आँखें खुलीं…और सामने—उसी इंसान का चेहरा था, जिसे वो अपना पति कहती थी।
उस पल सृष्टि की जान जैसे हलक़ तक आ गई। उसकी सांसें रुकने लगीं। शरीर सुन्न पड़ गया। वो बोल नहीं पाई। हिल नहीं पाई। उस रात…जो Kabir ने किया…उसने सृष्टि को अंदर से तोड़ दिया। उसके बाद—कुछ भी वैसा नहीं रहा।
ना वो सृष्टि रही…ना वो रिश्ता।
अगली सुबह
सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैली हुई थी। सृष्टि की आँख खुली। पूरा शरीर टूट रहा था, दर्द कर रहा था ऐसा लग रहा था जैसे रात भर उसे डंडों से मारा गया हो। उसने खुद को चादर से ढक रखा था। उसका मन डर से भरा हुआ था। वो बिस्तर पर जमी हुई थी—हिलने की हिम्मत नहीं। उसकी नज़र बगल में गई। Kabir गहरी नींद में सो रहा था।
जागते हुए तो वो उससे डरती ही थी…पर उस सुबह—वो उसे सोते हुए देखकर भी काँप रही थी। सृष्टि ने खुद को समेट लिया। आँखों से आँसू बिना आवाज़ के बह रहे थे।
Shristi (मन ही मन) बोली -
अब… कुछ भी मेरा नहीं रहा…।
उस सुबह सृष्टि सिर्फ़ दर्द में नहीं थी…वो भरोसे से खाली हो चुकी थी।
बिस्तर पर हल्की-सी हलचल हुई। Kabir की नींद टूटी। Shristi बुरी तरह सिहर गई। उस एक हरकत ने सृष्टि के अंदर फिर से वही रात जगा दी। उसने झट से चादर खींच ली और खुद को पूरी तरह उसमें लपेट लिया। जैसे चादर नहीं—कोई ढाल हो। लेकिन फिर भी उसका शरीर काँप रहा था। आँखों से मोटे-मोटे आँसू बह निकले।
Shristi (मन ही मन, टूटी हुई) बोली -
मत देखिए…बस मत देखिए…मुझे इस हालत में।
Kabir ने उसकी तरफ देखा। वो कुछ नहीं बोला। चुपचाप उठा… और washroom में चला गया। Kabir की खामोशी उस वक़्त सुकून नहीं थी…वो सृष्टि के लिए और डर बन गई। Washroom का दरवाज़ा बंद हुआ। पर सृष्टि तब भी नहीं हिली। दर्द इतना ज़्यादा था कि उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी।।पैर ज़मीन पर रखने का ख़याल ही रुला देने वाला था। शरीर दर्द में था…और मन—हिम्मत से ख़ाली।
वो जानती थी—उठना तो पड़ेगा। जितना भी दर्द हो…क्योंकि इस घर में उसका दर्द देखने वाला कोई नहीं था। उसने दाँत भींचे।
चादर कसकर पकड़ी। धीरे-धीरे उठने की कोशिश की—
और दर्द से कराह गई।
उस सुबह सृष्टि सिर्फ़ टूटी नहीं थी…वो खुद को ज़बरदस्ती ज़िंदा रख रही थी। Washroom से पानी की आवाज़ आ रही थी।
और सृष्टि बिस्तर के किनारे बैठी—डर और दर्द दोनों से लड़ रही थी।
Shristi किसी तरह खुद को संभालते हुए bathroom में पहुँची। दरवाज़ा बंद किया… और वहीं फर्श पर बैठ गई।।Shower चालू किया। पानी की धार उसके सिर से होकर गिरने लगी…। पानी बह रहा था… पर सृष्टि के अंदर जो टूट चुका था—
वो किसी धारा से नहीं धुल सकता था।
वो अपने घुटनों को सीने से लगाए बैठी थी। पूरा शरीर काँप रहा था। सिसकियाँ अब दब नहीं रही थीं।
Shristi (फूटते हुए, खुद से) बोली -
मैंने क्या किया था…कि मेरी ये सज़ा है…?
दर्द शरीर में था…पर मजबूरी उससे भी बड़ी थी।
कुछ देर बाद—
वो आईने के सामने खड़ी हुई। चेहरा पीला था। खुद को पहचानना मुश्किल था। Shristi ने घूंघट लिया। कदम लड़खड़ा रहे थे। वो छुपते–छुपाते medical store पहुँची। उसने कुछ नहीं कहा।
बस काँपते हाथों से एक पर्ची आगे बढ़ा दी। Medical store वाला एक पल उसे देखता रहा…फिर बिना सवाल किए—
काउंटर के नीचे से एक pregnancy kit निकालकर उसकी तरफ बढ़ा दी। उस छोटे से डिब्बे का वज़न पर सृष्टि की पूरी ज़िंदगी से भारी था।
Shristi ने पैसे रखे। नज़रें उठाए बिना तेज़ क़दमों से वहाँ से निकल गई। घर की ओर लौटते हुए उसका हर क़दम डर से भरा था। हाथ में पकड़ी kit उसके लिए सिर्फ़ एक चीज़ नहीं थी।
वो एक सवाल थी…एक सज़ा…और शायद—एक और ज़ख्म।
उस दिन सृष्टि रोई नहीं थी…चिल्लाई नहीं थी…बस…वो अंदर से मर गई थी।
To Be Continued…
Pregnancy kit का नतीजा क्या होगा?
सृष्टि इस सच्चाई के साथ कैसे जिएगी?
Kabir को इस दिन का सच कब पता चलेगा?
क्या ये वही मोड़ है जहाँ सृष्टि ने जीना छोड़ दिया—बस साँस लेना रह गया?
Present Time में Kabir का guilt इतना असहनीय क्यों है—अब पूरी तस्वीर कैसे जुड़ेगी?
Aapko Kya lagta hai -
Kabir ne ye kyu Kiya hoga?
Aapko kya lagta Hai sristi pregnent hogi ya nahin?
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