ज़ख्मों की शादी - 9 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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ज़ख्मों की शादी - 9

Past Time – 

उस दिन के बाद सृष्टि बदल गई थी…या यूँ कहें—वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा टूटने लगी थी। सृष्टि रसोई में खड़ी थी। हाथों में कढ़छी थी, लेकिन उंगलियाँ काँप रही थीं। नमक डालते वक्त भी उसका दिल धड़कता—कहीं ज़्यादा न हो जाए… कहीं कम न पड़ जाए।खाना बनाते वक्त भी वो डरती थी।।डरती थी कि कहीं कोई कमी न निकल आए…क्योंकि कमी का मतलब था—कबीर की खामोश, खतरनाक निगाहें।

Kabir दरवाज़े के पास खड़ा था। बिना कुछ बोले उसे देख रहा था। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं—उससे भी ज़्यादा खतरनाक कुछ था… ठंडापन। जब Kabir सामने होता— सृष्टि का खून जैसे जम जाता था। सांस लेना भी भारी लगने लगता था। वो नज़रें झुकाकर खड़ी रहती। कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती।

ऑफिस में भी सृष्टि को चैन नहीं था।।बाकी स्टाफ के बीच बैठने की बजाय उसे Kabir के cabin में ही बैठना पड़ता था। वो फाइलें देखती, कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखती—बस ताकि Kabir की तरफ न देखना पड़े। ऑफिस में लोग उसे Kabir की wife समझते थे…पर हकीकत में वो वहाँ भी डर की क़ैद में थी।

Kabir बिना देखे आदेश देता—
ये फाइल ठीक करो।
कॉफी रखो।
यहाँ बैठी रहो।

हर शब्द हुक्म था।

रात को, अकेले में सृष्टि वॉशरूम में बंद होकर फूट-फूटकर रोती।

Shristi (खुद से, सिसकते हुए) बोली - 
मैं क्या गलत हूँ…?
मैंने क्या किया था…?

उसके हाथों में दवाइयों की स्ट्रिप थी—depression की गोलियाँ। वो गोलियाँ दर्द खत्म नहीं करती थीं…बस उसे ज़िंदा रहने लायक बना देती थीं।

वो रोज़ खुद को समझाती—
बस थोड़ा और सह लो… सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन हर दिन के साथ सृष्टि का डर बढ़ता गया…और Kabir को ये एहसास तक नहीं था, कि जिस औरत को वो सज़ा दे रहा है,
वो पहले से ही टूट चुकी है।

दिन सृष्टि के लिए डर था…और रात, अजीब तरह से—उसका सहारा। दिन भर की चुप्पी, तानों और खामोश आदेशों के बाद—
रात को सृष्टि का मन और टूट जाता था। जब depression ज़्यादा बढ़ जाता… जब दिल बहुत भारी हो जाता… वो धीरे-धीरे बिस्तर के उस कोने में  और बिना कुछ बोले Kabir की बाँहों में जाकर छुप जाती थी।

वो कुछ नहीं कहती थी। बस जाकर उसकी छाती से सिर टिका देती थी, जैसे वहाँ जाकर ही उसकी सांसें सामान्य होती हों। Kabir भी कुछ नहीं बोलता था। न कोई ताना… न कोई हुक्म…।
वो बस सृष्टि को और कसकर पकड़ लेता था। ऐसे जैसे—
उसके अंदर की किसी अनकही जिम्मेदारी को निभा रहा हो।

Shristi (धीमी सांसों में, फुसफुसाहट जैसी आवाज में) बोली - 
यहाँ… दर्द कम लगता है…

Kabir की पकड़ और मजबूत हो जाती। बस वही वक़्त था…जब सृष्टि Kabir से नहीं डरती थी। वो रात भर उसकी बाँहों में सिमटी रहती। उसका कांपता शरीर धीरे-धीरे शांत हो जाता।।Kabir की सांसों की लय… उसकी गर्माहट…उसे वो सुकून देती—जो दुनिया कहीं और नहीं दे पाती थी।

जिस इंसान से वो पूरे दिन काँपती थी…उसी इंसान की बाँहों में उसे रात भर चैन मिलता था।Kabir कई बार जागता रहता। वो सृष्टि के चेहरे को देखता—नींद में भी डरा हुआ। पर फिर भी—उसमें कुछ नहीं बदलता। दिन में Kabir का दिल पत्थर था…और रात में—अनजाने में—उसका सहारा। और शायद यही विरोधाभास—उन दोनों के रिश्ते को सबसे ज़्यादा तोड़ भी रहा था…और सबसे गहराई से बाँध भी रहा था।

Present Time – Late Night

कमरा अंधेरे में डूबा था। Shristi सो रही थी—या शायद बस आँखें बंद किए पड़ी थी। Kabir सोफ़े पर बैठा था। हाथों में सिर दबाए। Kabir की नींद कब की उड़ चुकी थी…अब उसकी आँखों में नींद नहीं—सिर्फ़ सच्चाई थी।

उसके दिमाग़ में scenes टकरा रहे थे—
—रसोई में काँपती Shristi
—ऑफिस के cabin में सहमी हुई नज़रें
—डिप्रेशन की गोलियाँ
—और रात को उसी की बाँहों में छुपी हुई वही लड़की

Kabir (खुद से, टूटी आवाज़ में) बोला - 
जिससे वो दिन में डरती थी…रात को उसी के पास आकर ज़िंदा रहती थी…।

उसकी उंगलियाँ काँपने लगीं।

Kabir बोला - 
और वो इंसान… मैं था।

वो धीरे से उठा और बेड के पास आकर रुक गया। Shristi की तरफ देखा—नींद में भी उसका माथा सिकुड़ा हुआ था। Kabir को पहली बार एहसास हुआ, ये डर किसी और ने नहीं दिया था।
ये ज़ख्म… उसी के हाथों से लगे थे। उसने Shristi के तकिये के पास रखी दवाइयों की strip देखी।उसका दिल जैसे बैठ गया।

Kabir (फुसफुसाते हुए) बोला - 
ये… मेरी वजह से है…

उसकी आँखों से आँसू गिरा। बिना आवाज़ के। ये आँसू guilt के थे…उस मर्द के, जो खुद को मज़बूत समझता था और ये भूल गया था, कि ताक़त का मतलब डर देना नहीं होता। Kabir फर्श पर बैठ गया।

Kabir बोला - 
मैंने सोचा था…मैं सज़ा दे रहा हूँ…पर असल में मैं उसे मार रहा था… हर दिन… धीरे-धीरे…।

वो पहली बार अपने अतीत से भागा नहीं। वो जान गया—
Shristi की ज़िंदगी का सबसे बड़ा ज़ख्म कोई और नहीं…
Kabir Pratap Singh ख़ुद था।
वो उठकर Shristi के पास आया—लेकिन छुआ नहीं।
बस हाथ जोड़ लिए।

Kabir (कांपती आवाज़ में) बोला - 
मुझे माफ़ मत करना…बस एक मौका दे देना…कि मैं वो इंसान बन सकूँ जिससे तुम डरना छोड़ सको।

Shristi की पलकों पर हल्की हरकत हुई। शायद उसने सुना… शायद नहीं। पर Kabir के अंदर कुछ टूट चुका था…और उसी टूटन से एक बेहतर इंसान जन्म लेने वाला था।

To be continued.....

क्या Kabir सच में बदलेगा या ये सिर्फ़ guilt का पल है?
Shristi क्या उस इंसान पर भरोसा कर पाएगी जिसने उसे तोड़ा?
क्या माफ़ी बिना भूले मिल सकती है?
Kabir अपने किए हुए नुकसान को कैसे सुधारेगा?
क्या प्यार ज़ख्मों से बड़ा हो सकता है।

Aapko kya lagta hai -
Kabir itna gusaa kyu karta hoga ?
Kabir itna controling kyu hoga?

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