सुबह का समय था। घर में अजीब सी चुप्पी थी।
कबीर ने बिना बहस किए धीरे से कहा,
सृष्टि… हमें डॉक्टर के पास चलना चाहिए।
सृष्टि ने विरोध नहीं किया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं। वो थकी हुई लग रही थी। जैसे रात भर लड़ती रही हो…अपने ही डर से। कबीर उसे एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) के क्लिनिक में ले गया।
रिसेप्शन पर औपचारिकताएँ पूरी हुईं। फिर नर्स ने सृष्टि को अंदर बुलाया।
डॉक्टर ने कबीर की ओर देखा और बोली—
आप बाहर प्रतीक्षा कीजिए।
मुझे सृष्टि से अकेले में बात करनी होगी।
कबीर चुपचाप बाहर चला गया। पहली बार उसने बिना सवाल किए पीछे हटना सीखा। डॉक्टर के कमरे के अंदर कमरा शांत था।
हल्की रोशनी। सामने कुर्सी पर डॉक्टर बैठी थीं। आवाज़ बेहद नरम।
Doctor बोली -
सृष्टि…क्या आपको रात में बुरे सपने आते हैं?
सृष्टि ने धीमे से सिर हिलाया—
हाँ…
Doctor बोली -
क्या आप अपने पति से डरती हैं?
यह सवाल सुनते ही सृष्टि की आँखें भर आईं। उसने होंठ भींच लिए। पर आँसू रुक नहीं पाए।
डॉक्टर ने धीरे से पूछा—
क्या कभी आपकी इच्छा के खिलाफ़ आपको छुआ गया?
यह सुनते ही सृष्टि का चेहरा सफेद पड़ गया। उसकी उंगलियाँ कस गईं। आँसू बहने लगे। वो रो पड़ी।
सृष्टि बोली -
मैं…मैंने कई बार मना किया था…।
उसकी आवाज़ टूट गई।
सृष्टि बोली -
मुझे दर्द होता था…बहुत दर्द.....वो सुनते ही नहीं थे...।
मैं सो नहीं पाती थी…।
कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा। डॉक्टर ने उसे पानी दिया।
Doctor बोली -
सृष्टि, जो आप महसूस कर रही हैं वो डर और आघात (trauma) है। आपकी प्रतिक्रिया असामान्य नहीं है।
सृष्टि ने पहली बार सुना, कि उसका डर “पागलपन” नहीं है। वो एक घाव है।
बाहर कबीर कुर्सी पर बैठा था। उसके हाथ आपस में कसकर जुड़े हुए थे। उसे नहीं पता था अंदर क्या सवाल पूछे जा रहे हैं। पर उसे अंदाज़ा था, जवाब आसान नहीं होंगे। आज पहली बार वो इंतज़ार कर रहा था, सज़ा का नहीं, सच का। करीब आधे घंटे बाद डॉक्टर ने दरवाज़ा खोला।
Doctor बोली -
मिस्टर कबीर… आप अंदर आइए।
कबीर का गला सूख गया। वो धीरे-धीरे अंदर गया। सृष्टि एक तरफ कुर्सी पर बैठी थी। आँखें लाल। चेहरा झुका हुआ। कबीर ने उसकी तरफ देखा, पर इस बार नज़रों में अधिकार नहीं था…ग्लानि थी।
डॉक्टर ने सीधा सवाल किया—
क्या आपको पता है कि आपकी पत्नी आपसे डरती हैं?
कबीर चुप।
Doctor बोली -
क्या आपने कभी उनकी इच्छा के खिलाफ़ उन्हें मजबूर किया?
कमरे में सन्नाटा छा गया। कबीर की उँगलियाँ काँप गईं।
उसने पहली बार बिना बहाना बनाए कहा—
…हाँ।
सृष्टि ने सिर और झुका लिया। डॉक्टर की आवाज़ सख्त हो गई।
Doctor बोली -
आप समझते हैं इसका असर क्या होता है?
शादी किसी को अधिकार नहीं देती कि आप उसकी सहमति के बिना उसे छुएँ। ये भावनात्मक और मानसिक आघात है।
कबीर की आँखों में नमी आ गई।
वो बोला -
मैं… मैं गुस्से में था…मुझे लगा… वो मेरी पत्नी है…।
डॉक्टर ने बीच में रोका—
पत्नी होना ‘हक़’ नहीं है।
हर रिश्ते में सहमति ज़रूरी है।
अभी आपकी पत्नी पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस के लक्षण दिखा रही हैं—
डर, बुरे सपने, शरीर को ढकना, घबराहट।
कबीर का दिल बैठ गया।
वो बोला -
क्या… ये ठीक हो जाएगी?
डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा—
अगर आप सच में बदलने को तैयार हैं।
उन्हें समय, सुरक्षित माहौल और थेरेपी की ज़रूरत है।
और आपको भी काउंसलिंग की ज़रूरत है।
कबीर ने सिर झुका लिया।
कबीर बोला -
आप जो कहेंगी… करूँगा।
सृष्टि ने पहली बार हल्की सी नज़र उठाई। उसने देखा, कबीर के चेहरे पर आज गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ डर…उसे खो देने का डर।
डॉक्टर ने फाइल बंद की। फिर दोनों की ओर देखा।
Doctor बोली -
सिर्फ सृष्टि ही नहीं…कबीर, आपको भी थेरेपी की ज़रूरत है।
कबीर ने चौंककर देखा—
मुझे?
डॉक्टर ने शांत स्वर में कहा—
पिछले कुछ सालों में आपके साथ क्या हुआ?
कबीर की आँखें एक पल को खाली हो गईं। ।जैसे यादें अचानक सामने खड़ी हो गई हों।
धीरे से बोला—
दो साल पहले…मम्मी-पापा का एक्सीडेंट में देहांत हो गया।
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
वो बोला -
सब कुछ अचानक हुआ।
घर… office… ज़िम्मेदारियाँ…सब मेरे ऊपर आ गया।
सृष्टि ने पहली बार उसकी तरफ देखा। वो ये सब जानती थी…
पर कभी महसूस नहीं किया था कि उस दर्द ने उसे अंदर से कितना तोड़ा होगा।
कबीर आगे बोला—
उसके कुछ सालों बाद परिवार ने शादी की बात कर दी।
मैं… तैयार नहीं था। पर अकेलापन…बहुत डरावना था।
उसने हल्की सी कड़वी हँसी हँसी।
वो बोला -
मुझे लगा शादी से सब ठीक हो जाएगा।
पर मैं खुद ठीक नहीं था…
डॉक्टर ने समझाया—
अचानक माता-पिता को खो देनाबगहरा शोक (grief) और अधूरा दुख छोड़ जाता है। अगर उस दर्द को समय और सहारा न मिले
तो वो गुस्से या नियंत्रण की चाह में बदल सकता है।
कबीर चुप था। जैसे किसी ने उसके अंदर का सच पढ़ लिया हो।
Doctor बोली -
आपने अपने दर्द को स्वीकार नहीं किया।
आपने उसे दबाया। और जब भावनाएँ बाहर आने लगीं—
तो वो गुस्से और हक़ के रूप में निकलीं।
कमरे में भारी सन्नाटा था। सृष्टि ने पहली बार महसूस किया कबीर राक्षस बनकर पैदा नहीं हुआ था। वो टूटा हुआ था। पर टूटना
किसी को तोड़ने की इजाज़त नहीं देता।
डॉक्टर ने अंतिम बात कही—
आप दोनों को अलग-अलग थेरेपी की ज़रूरत है।
और अगर भविष्य साथ चाहिए तो कपल थेरेपी भी।
लेकिन सबसे पहले सुरक्षित दूरी और विश्वास की पुनः शुरुआत।
कबीर ने धीरे से कहा—
मैं कोशिश करूँगा…
सृष्टि ने कुछ नहीं कहा। पर इस बार उसकी आँखों में सिर्फ डर नहीं था थोड़ी समझ भी थी। शायद पहली बार दोनों अपने-अपने घावों को देख पा रहे थे।
क्लिनिक से बाहर निकलते ही धूप आँखों पर पड़ी। पर दोनों की नज़रें ज़मीन पर थीं। कार तक का रास्ता बहुत लंबा लगा। कबीर ने दरवाज़ा खोला। पर इस बार उसने सृष्टि की ओर हाथ नहीं बढ़ाया।
सिर्फ पूछा -
बैठ जाओगी…?
सृष्टि ने हल्का सा सिर हिलाया। यह छोटी सी दूरी शायद पहली सही शुरुआत थी। घर पहुँचने के बाद घर वही था। दीवारें वही।
कमरे वही। पर हवा बदल चुकी थी। सृष्टि अपने कमरे में चली गई।
कबीर दरवाज़े पर खड़ा रहा, पर अंदर नहीं गया।
कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा -
मैं… गेस्ट रूम में रहूँगा।
जब तक तुम comfortable महसूस न करो।
सृष्टि ने चौंककर उसकी तरफ देखा। यह वही कबीर था जो पहले उसकी चुप्पी को भी चुनौती समझता था। आज वो खुद पीछे हट रहा था। उसकी आँखें फिर भर आईं, डर से नहीं…थकान से।
उस रात कोई चीख नहीं थी। कोई ज़बरदस्ती नहीं। कोई काँपती हुई सिसकी नहीं। सृष्टि ने बिस्तर पर लेटकर पहली बार बिना डर के आँखें बंद कीं। नींद तुरंत नहीं आई। पर डर भी उतना तेज़ नहीं था।
दूसरी तरफ गेस्ट रूम में बैठा कबीर अपने हाथों को देख रहा था।
उन्हीं हाथों से उसने कभी प्यार करना चाहा था…और उन्हीं से
दर्द दे दिया। उसने फोन उठाया। डॉक्टर का नंबर खोला।
Kabir बोला -
मैं… थेरेपी शुरू करना चाहता हूँ।
जितनी जल्दी हो सके।
आवाज़ में पहली बार अहंकार नहीं था। स्वीकार था। शायद बदलाव चिल्लाकर नहीं आता। वो धीरे-धीरे चुपचाप दूरी बनाकर आता है। और उस दूरी में दो लोग खुद को पहचानना शुरू करते हैं।
कुछ हफ्ते बाद घर में अब शोर नहीं था। पर सन्नाटा भी पहले जैसा भारी नहीं था। सृष्टि अपनी थेरेपी पर जाने लगी। हर हफ्ते।धीरे-धीरे।
वो सीख रही थी —
कि उसका डर उसकी गलती नहीं था। कि “ना” कहना गलत नहीं होता। कि शादी में भी सहमति ज़रूरी होती है।
पहले से कम बुरे सपने आने लगे। हालाँकि कभी-कभी अचानक कोई आवाज़ या पास आती आहट उसे चौंका देती। पर अब वो साँस लेना जानती थी।
डॉक्टर ने सिखाया था —
जब डर आए, खुद को याद दिलाओ —
तुम सुरक्षित हो।
कबीर भी बदल रहा था उसकी थेरेपी आसान नहीं थी। उसे अपने बचपन की बातें याद करनी पड़ीं। पापा का सख्त स्वभाव।
जब पापा बोलते थे -
मर्द को दर्द नहीं होता।
मर्द रोते नहीं हैं।
जैसी सीखें। माँ का अचानक जाना। वो अधूरा अलविदा। कबीर ने पहली बार खुलकर रोया। सालों बाद।
थेरेपिस्ट ने उससे कहा —
तुम्हारा दर्द सच है।
पर किसी और को चोट पहुँचाकर वो कम नहीं होता।
ये बात उसे अंदर तक लगी।
एक शाम सृष्टि बालकनी में खड़ी थी। हवा हल्की थी। कबीर दूर खड़ा रहा। कुछ कदम की दूरी पर।
उसने धीरे से पूछा -
क्या… मैं यहाँ खड़ा रह सकता हूँ?
सृष्टि ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में अब वो पुराना डर कम था। पर पूरी तरह गया भी नहीं था।
सृष्टि बोली -
हाँ… पर पास मत आना।
कबीर ने सिर हिलाया। दोनों चुप रहे। पर यह चुप्पी पहली बार भारी नहीं थी।
कुछ मिनट बाद सृष्टि ने धीरे से कहा —
आपको पता है…मुझे अब भी डर लगता है।”
कबीर की आवाज़ धीमी थी —
मुझे पता है।
और मैं… इंतज़ार करूँगा।
वो कोई वादा नहीं कर रहा था कि सब ठीक हो जाएगा। वो सिर्फ इतना कह रहा था , कि वो मजबूर नहीं करेगा।
रिश्ते कभी एक दिन में नहीं टूटते। और एक दिन में जुड़ते भी नहीं।
विश्वास धीरे-धीरे बूंद-बूंद लौटता है। और कभी-कभी सबसे बड़ा प्यार पास आना नहीं , दूरी बनाए रखना होता है।
तीन महीने बाद
समय ने घाव भरे नहीं थे, पर उन्हें खुला छोड़ दिया था ताकि हवा लग सके। सृष्टि अब पहले से स्थिर थी। उसकी आँखों के नीचे के काले घेरे हल्के पड़ गए थे। वो फिर से किताबें पढ़ने लगी थी।
कभी-कभी मुस्कुरा भी देती थी।
कबीर ने एक नियम बना लिया था, बिना पूछे पास नहीं जाना।
बिना इजाज़त छूना नहीं। बिना सुने बोलना नहीं।
एक दिन थेरेपी के बाद सृष्टि घर लौटी तो शांत थी।
कबीर ने सिर्फ पूछा—
कैसा रहा?
सृष्टि कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
डॉक्टर ने पूछा…अगर मैं चाहूँ तो कुछ समय के लिए अलग रह सकती हूँ।
कमरे में सन्नाटा छा गया। कबीर ने उसकी तरफ देखा। दिल धड़क रहा था। पर इस बार उसने डर को आदेश नहीं बनने दिया।
कबीर बोला -
अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हें जगह चाहिए…तो मैं मना नहीं करूँगा।
यह कहना उसके लिए आसान नहीं था। पर उसने कहा। सृष्टि ने पहली बार उसकी आँखों में देखा, गुस्सा नहीं था। दबाव नहीं था।
बस डर…और सच्ची कोशिश।
उसने धीरे से कहा -
मैं भागना नहीं चाहती,पर मुझे समय चाहिए।
आपके साथ रहते हुए खुद को फिर से सुरक्षित महसूस करने का समय।
कबीर ने सिर हिलाया।
कबीर बोला -
मैं यहीं हूँ।
पर अब तुम्हारे ऊपर नहीं…तुम्हारे साथ।
उस रात दोनों ने पहली बार एक ही सोफ़े पर बैठकर चाय पी।
बीच में दूरी थी। पर बात हो रही थी।
सृष्टि ने अचानक पूछा—
अगर मैं कभी…आपको माफ़ न कर पाऊँ तो?
कबीर ने आँखें झुका लीं।
वो बोला -
तो भी…मैं समझूँगा।
क्योंकि माफ़ी माँगना मेरा हक़ नहीं है।
देना तुम्हारा है।
सृष्टि की आँखें भर आईं। शायद भरोसा वापस आना शुरू हो चुका था। पूरी तरह नहीं, पर बीज बोया जा चुका था।
रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं होते। पर कभी-कभी वे पहले से बेहतर बन सकते हैं, अगर दोनों अपनी-अपनी सच्चाई स्वीकार करें।
अब फैसला जल्दबाज़ी में नहीं होगा। न दर्द से। न डर से।
बल्कि समझ से।
क्या उनकी थेरेपी सक्सेसफुल होगी ?
या कोई नई मुसीबत उनका इंतजार कर रही है?
To be continued.....
Aapko kya lagta Hai -
Ye space sahi Hai ya galat?
Ab sristi ko kabir ko maf karna chahiye ya nahin?
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Kyunki main daily update karti hoon.
Or Jo log yahan tak padh chuke hain aur chup ho… ek ❤️ drop karke jao. Main dekhna chahti hoon kitne silent readers hain.