ज़ख्मों की शादी - 20 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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ज़ख्मों की शादी - 20

कबीर कुछ बोलने ही वाला था। उसके होंठ खुले…शब्द जैसे बाहर आने को तैयार थे।

तभी सृष्टि की धीमी लेकिन ठहरी हुई आवाज़ आई—
मुझे कोई बात नहीं सुननी…Please… मुझे सोने दीजिए।
Disturb मत कीजिए।

उसकी आवाज़ थकी हुई थी। टूटी हुई। पर साफ़। कबीर जड़ हो गया। सृष्टि ने आँखें बंद रखीं, पर उसकी पलकों के कोनों से आँसू चुपचाप निकल आए।

वो फिर बोली - 
वैसे भी…बहुत महीनों से आपने मुझे रातों को सोने नहीं दिया…
बस दिया तो दर्द ही दिया…अपनी हैवानियत दी…ज़ख्म दिए…।

हर शब्द जैसे कमरे की हवा को काट रहा था। कबीर की साँस रुक गई। सृष्टि ने करवट बदली। उसकी पीठ फिर से कबीर की तरफ थी।

सृष्टि बोली - 
अब बस…मुझे सोना है।
कृपया… मुझे अकेला छोड़ दीजिए।

कमरे में भारी सन्नाटा छा गया। कबीर ने पहली बार महसूस किया। उसका गुस्सा, उसका अधिकार, उसकी जिद…सबने मिलकर
सृष्टि की नींद, उसका सुकून, उसकी हँसी छीन ली थी।
वो कुछ पल वहीं बैठा रहा। फिर धीरे से उठ गया। इस बार उसने न तो उसे छूने की कोशिश की, न ही अपने “हक़” की बात दोहराई।
वो चुपचाप कमरे से बाहर चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ।

अंदर सृष्टि ने खुद को कसकर पकड़ लिया। आँसू अब खुलकर बह रहे थे।
बाहर कबीर दीवार से टिककर खड़ा था। उसकी आँखों में भी नमी थी।
पहली बार उसे समझ आ रहा था प्यार ज़बरदस्ती नहीं होता।
और “हक़” कभी भी किसी की नींद, सुकून या सम्मान छीनने का नाम नहीं होता।

रात लंबी थी। बहुत लंबी। दोनों जाग रहे थे एक अपने जख्मों के साथ…दूसरा अपने अपराधबोध के साथ। कबीर हॉल के सोफे पर लेटा था। छत को घूरते-घूरते उसकी आँखें भारी हो गई थीं।
दिल में बस एक ही चीज़ थी—पछतावा। आज पहली बार
उसे अपनी हरकतों पर सच में शर्म आ रही थी। वो “हक़” जो वह समझता था उसका अधिकार है…दरअसल वह किसी की नींद, किसी का भरोसा, किसी का सम्मान छीनने का जरिया बन गया था।

उसने अपना हाथ माथे पर रख लिया। आँखें बंद कीं। पता ही नहीं चला कब नींद आ गई, वो नींद जो थकान से आती है, सुकून से नहीं।
उधर कमरे में—
सृष्टि करवट लेकर लेटी थी। उसने खुद को चादर में लपेट रखा था।
अचानक उसकी सिसकियाँ तेज़ हो गईं। उसकी सांसें टूटने लगीं।
जैसे कोई बुरा सपना उसे फिर से उसी अँधेरे में खींच रहा हो।

वो नींद में ही बुदबुदाई—
नहीं… छोड़ दीजिए… मत कीजिए…दर्द हो रहा है मुझे...।

उसके हाथ हवा में जैसे किसी को पीछे धकेल रहे थे। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शरीर कांपने लगा। हॉल में सोया कबीर
हल्की सी आवाज़ से चौंक गया। पहले उसे लगा वह सपना देख रहा है। फिर सिसकियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दी। वो झटके से उठ बैठा। कुछ पल वह वहीं खड़ा रहा दुविधा में।
क्या अंदर जाए? या उसे अकेला छोड़ दे, जैसा उसने कहा था?

लेकिन सृष्टि की आवाज़ इस बार और टूटी हुई थी।कबीर का दिल जोर से धड़का। वह धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ा। दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने हल्के से दस्तक दी—

वो बोला - 
सृष्टि…?

अंदर से कोई जवाब नहीं। बस सिसकियाँ। उसका हाथ दरवाज़े के हैंडल पर गया। पहली बार वह गुस्से में नहीं डर में था। डर इस बात का कि कहीं उसने सृष्टि को इतना तोड़ तो नहीं दिया कि अब वह खुद से भी लड़ रही है। रात अभी खत्म नहीं हुई थी। लेकिन शायद
ये वही रात थी जो दोनों की ज़िंदगी बदल सकती थी।

कबीर ने धीरे से दरवाज़ा खोला। कमरे की हल्की रोशनी में सृष्टि बिस्तर पर तड़प रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, पर आँसू लगातार बह रहे थे।

वो नींद में ही बुदबुदा रही थी—
नहीं… मत कीजिए… प्लीज़…

उसके हाथ हवा में किसी को दूर धकेल रहे थे। साँसें बेकाबू थीं।
कबीर का दिल कस गया। पहली बार वो उसके पास गुस्से में नहीं,
हक़ जताने नहीं, बल्कि संभालने आया था। वो बिस्तर से थोड़ी दूरी पर बैठ गया। उसने उसे छुआ नहीं।

बस धीमी आवाज़ में बोला—
सृष्टि… मैं यहाँ हूँ…कोई तुम्हें छू नहीं रहा…तुम सुरक्षित हो…।

उसकी आवाज़ बहुत नरम थी। जैसे कहीं भी ज़ोर देने से वो और टूट न जाए। सृष्टि की सिसकियाँ कुछ पल और तेज़ रहीं। फिर धीरे-धीरे उसकी सांसें थोड़ी सामान्य होने लगीं। कबीर ने पास रखी पानी की बोतल उठाई। पर वह तब तक इंतज़ार करता रहा जब तक सृष्टि खुद थोड़ा संभल न गई।
कुछ देर बाद सृष्टि ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। पहली नज़र कबीर पर पड़ी। वो सहम गई। तुरंत खुद को पीछे खींच लिया।

कबीर ने हाथ उठाकर इशारा किया—
मैं… मैं पास नहीं आऊँगा।
डरो मत।

उसकी आवाज़ में सच्चा पछतावा था।

वो बोला - 
तुम्हें बुरा सपना आया था…बस… मैं यहीं बैठा हूँ।
अगर पानी चाहिए तो रख दिया है।

सृष्टि उसे देखती रही। उसकी आँखों में अभी भी डर था—
पर आज पहली बार उसे कबीर की आँखों में गुस्सा नहीं दिखा।
सिर्फ़ ग्लानि।

कबीर धीरे से बोला—
मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया है…ये सच है। 
लेकिन आज के बाद…मैं तुम्हारी इजाज़त के बिना कभी पास भी नहीं आऊँगा।

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। सृष्टि ने कुछ नहीं कहा। पर उसकी साँसें अब उतनी बिखरी हुई नहीं थीं। कबीर वहीं फर्श पर टेक लगाकर बैठ गया। बिस्तर से दूरी बनाकर। आज पहली बार
वो पहरेदार की तरह बैठा था, किसी अधिकार के साथ नहीं,
बल्कि जिम्मेदारी के साथ।
रात लंबी थी। पर शायद ये पहली रात थी जब सृष्टि थोड़ी सुरक्षित महसूस कर सकती थी।

सृष्टि कुछ देर बाद फिर सो गई। पर वह सुकून वाली नींद नहीं थी।
उसकी भौंहें सिकुड़ी हुई थीं। साँसें तेज़। चेहरे पर डर साफ़ दिख रहा था। अचानक उसने करवट बदली, और अपने दोनों हाथों से
अपने शरीर को ढकने लगी। जैसे उसके तन पर कपड़े ही न हों।
जैसे कोई उसे देख रहा हो…छूने वाला हो…वो नींद में ही घबरा रही थी।

वो बोली - 
नहीं… नहीं…

उसके होंठ काँपे। उसकी उँगलियाँ काँपते हुए अपनी बाँहों, कंधों को ढक रही थीं। जैसे खुद को बचाने की कोशिश कर रही हो।
कबीर फर्श पर बैठा सब देख रहा था। उसका दिल बैठ गया।
वो समझ नहीं पा रहा था, वो तो कपड़े पहने हुए थी…।फिर भी ऐसे क्यों खुद को ढक रही है?

तभी उसे एहसास हुआ—
ये शरीर का नहीं…यादों का डर है। सृष्टि की आँखों से मोटे-मोटे आँसू निकल रहे थे। नींद में ही रो रही थी वो।
कबीर की साँस भारी हो गई। उसने पहली बार महसूस किया—
उसने सिर्फ़ उसके शरीर को नहीं,उसके मन को भी असुरक्षित कर दिया था।

वो धीरे से उठा। बहुत सावधानी से जैसे कोई काँच के पास चलता है। बिस्तर के पास आकर उसने दूरी बनाए रखी।

कबूर धीरे से बोला—
सृष्टि…तुम सुरक्षित हो…मैं यहाँ हूँ…कोई तुम्हें छू नहीं रहा…।

उसकी आवाज़ काँप रही थी। सृष्टि फिर भी नींद में रोती रही। अपने आप को ढकती रही। कबीर की आँखें भर आईं।
उसे याद आया—कैसे उसने कभी उसकी “ना” को डर समझने की कोशिश ही नहीं की। आज पहली बार उसे एहसास हुआ—
वो उससे सिर्फ़ नाराज़ नहीं है…वो उससे डरती है। और ये एहसास
किसी भी थप्पड़ से ज़्यादा जोर से लगा। कबीर वहीं बैठ गया।
सिर झुका लिया।
रात के सन्नाटे में सिर्फ़ उसकी सिसकियाँ गूँज रही थीं। और एक आदमी अपनी ही परछाई से डर रहा था।

जब सृष्टि की बेचैनी बहुत बढ़ गई—
उसकी साँसें बेकाबू हो गईं, शरीर काँपने लगा— तब कबीर ने हिम्मत करके उसे जगा दिया।

कबीर बोला - 
सृष्टि… उठो… देखो मेरी तरफ…

उसने बहुत हल्के से उसका नाम लिया। कंधे को बस उँगलियों से छुआ, जोर नहीं लगाया। सृष्टि की आँखें झटके से खुलीं।
पहली चीज़ जो उसने देखी—कबीर का चेहरा।
वही चेहरा जो अभी उसके सपने में उसे दर्द दे रहा था। उसका दिमाग़ पूरी तरह होश में नहीं था। वो सपना और हकीकत में फर्क नहीं कर पा रही थी। वो तुरंत पीछे हट गई। घबराकर।
हालाँकि उसने साड़ी पहन रखी थी फिर भी उसने अपने दोनों हाथों से खुद को कसकर ढक लिया। जैसे कपड़े नहीं हों। जैसे वह फिर से असुरक्षित हो।

उसकी आवाज़ काँप रही थी—
Please…मुझे कुछ मत करना…बहुत दर्द होता है…।
नहीं… मेरे पास मत आना…प्लीज़… आज नहीं…।

हर शब्द कबीर के सीने में तीर की तरह लगा। वो कुछ कदम पीछे हट गया। दोनों हाथ ऊपर कर दिए, जैसे साबित करना चाहता हो कि वह छूने नहीं वाला।

कबीर बोला - 
सृष्टि… देखो…मैं कुछ नहीं कर रहा…तुम सुरक्षित हो…।

पर सृष्टि अभी भी डर में थी। उसकी आँखें फैल चुकी थीं। आँसू लगातार गिर रहे थे। वो दीवार से टिक गई। खुद को समेटते हुए।
कबीर ने पहली बार अपनी आँखों के सामने अपने ही किए का परिणाम देखा। वो औरत जो कभी उसकी बाहों में सुकून ढूँढती थी
आज उसी से बचने के लिए खुद को ढक रही थी। उसका गला भर आया।

वो बोला - 
मैं… मैं तुम्हें हाथ नहीं लगाऊँगा…कसम से…।
बस… शांत हो जाओ…।

उसकी आवाज़ टूट रही थी। सृष्टि धीरे-धीरे हकीकत में लौटी। कमरे को देखा। खुद को देखा। उसे एहसास हुआ वो सपना था।
पर डर असली था। उसने धीरे से हाथ नीचे किए पर शरीर अब भी काँप रहा था। कबीर दूर खड़ा रहा। उसने दूरी बनाए रखी।
आज पहली बार वो उसे छूना नहीं चाहता था वो चाहता था कि
वो उससे न डरे।

रात फिर से खामोश हो गई। पर उस खामोशी में एक सच्चाई साफ़ थी, डर जब रिश्ते में बस जाए, तो प्यार को बहुत लंबा सफर तय करना पड़ता है वापस आने के लिए। सृष्टि अब भी सिसक रही थी।
उसकी आँखें डरी हुई थीं, ऐसी नज़र… जैसे सामने खड़ा इंसान
उसे निगल जाएगा।
वो कबीर को देख रही थी, पर उस नज़र में भरोसा नहीं था, सिर्फ़ भय था।

उसके होंठ काँप रहे थे—
पास मत आना…बहुत दर्द होता है…प्लीज़…।

उसकी आवाज़ इतनी कमजोर थी कि जैसे हर शब्द बोलने में भी उसे ताकत लग रही हो। कबीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वो कुछ सेकंड उसे देखता रहा, और फिर धीरे से पीछे हट गया।
इस बार बिना कुछ कहे। बिना समझाने की कोशिश किए।
वो कमरे से बाहर चला गया। हॉल में आकर दीवार से टिक गया।
उसने अपने बालों में हाथ फेर लिया।

उसके मन में एक ही बात गूंज रही थी—
ये मैंने क्या कर दिया…।

उसे महसूस हुआ, उसकी वजह से उसकी अपनी पत्नी उससे इस कदर डर रही है कि हकीकत और सपना अलग नहीं कर पा रही।

वो खुद से बुदबुदाया—
अगर इसे डॉक्टर को नहीं दिखाया…तो ये डर इसके दिमाग़ पर और गहरा असर कर देगा…।

उसके दिल में पहली बार सिर्फ़ पछतावा नहीं, ज़िम्मेदारी भी जागी।
वो जानता था ये सिर्फ़ नाराज़गी नहीं है। ये गहरा मानसिक घाव है।
कमरे के अंदर सृष्टि अब भी धीरे-धीरे सिसक रही थी। खुद को समेटे हुए।
और बाहर कबीर पहली बार सच में अपनी गलती की गहराई समझ रहा था। रात ने दोनों को आईना दिखा दिया था। एक को उसका डर। दूसरे को उसका अपराध।

Doctor सृष्टि को देखकर क्या बोलेगी?
क्या सृष्टि को कोई दिमागी बीमारी हो गई है ?
क्या सृष्टि हमेशा सृष्टि से डरेगी। 

To be continued....

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Kya shristi ko use ab maaf kar dena chahiye?
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