सिमटती दुनिया, बढ़ते दायरे Vishram Goswami द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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सिमटती दुनिया, बढ़ते दायरे

             मई के महीने में बहुत गर्मी हो गई थी, विद्यालयों का सत्रांत होने में कुछ ही दिन बचे थे। तृष्णा चिलचिलाती धूप में बस से उतरी, मुंह पर स्कार्फ बांधे, पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । सड़क बिल्कुल सुनसान पड़ी थी, मानो सब लोग प्रचंड आग से बचने के लिए अपने घरों में दुबके बैठे थे, बीच-बीच में स्कार्फ से गर्दन के पसीने पोंछ लेती थी, सड़क पर दो-चार दुकान खुली नजर आती थी, लेकिन उनका भी मुंह मानो प्लास्टिक के पर्दों या बांस और सरकंडे की चिको से बंद था । दुकानदार अंदर पड़े- पड़े सुस्ता रहे होंगे या मोबाइल पर इंटरनेट की दुनिया में समय पास कर रहे होंगे । सड़क पर बिछा चारकोल मानो पिघल रहा था और तृष्णा की चप्पलों से चिपक कर गति को बाधित कर रहा था । घर पहुंचना बहुत दूभर लग रहा था, लेकिन रोज का काम था कोई ऑटो- रिक्शा करती भी तो कहां तक, घर तक पहुंचाने के ₹50 मांगता था, जैसे उन्होंने भी धूप को देखकर कुछ दाम बढ़ा दिए थे, वैसे पहले भी पैदल ही आया- जाया करती थी । शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक विद्यालय में अध्यापिका थी । रोज प्रातः घर से टिफिन तैयार कर निकलती थी, प्रातः जब कभी भावेश का दुकान जाने का भी समय होता था तो वह स्कूटी से बस स्टॉप तक छोड़ देता था, अन्यथा अपने दो पैरों की साइकिल पर ही सवारी करती थी ।                                                                                                                                                     घर में बहुत ज्यादा आर्थिक फुसलात भी तो नहीं थी, लौटते समय तृष्णा को घर पहुंचना पहाड़ पर चढ़ने जैसा लगता था, उम्र के साथ शरीर भी तो जवाब दे रहा था, पूरे 48 वर्ष की हो गई थी, ऊपर से जिंदगी की चक्की में पिसते- पिसते कुछ थकी, बीमार सी रहने लगी थी और उम्र से कहीं अधिक बड़ी लगती थी । वैसे तो इस समय बेटा- बेटी घर पर ही थे, उनके कॉलेज में ग्रीष्म अवकाश शुरू हो गया था, दोनों के दूसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं भी हो चुकी थी, बेटा यश उदयपुर के किसी प्राइवेट कॉलेज से एमबीबीएस कर रहा था और बेटी कीर्ति एन आई टी इलाहाबाद से बीटेक कर रही थी । इस बात का थोड़ा शकून था कि दोनों बच्चे कामयाब होने जा रहे थे, लेकिन उनमें से भी किसी की मां को लाने की हिम्मत नहीं होती थी, इतनी धूप बर्दाश्त करने की क्षमता कहां थी, ऊपर से व्यस्त रहते थे, मोबाइल पर या लैपटॉप पर, शायद कुछ आवश्यक कार्य ही करते होंगे, किंतु घर पहुंचने पर भी उनमें से कोई एक गिलास ठंडा पानी मम्मी को पिलाने तक के लिए भी कक्ष से बाहर नहीं आता था बल्कि इंतजार कर रहे होते थे कि कब मम्मी आएगी और चाय बनाएगी।                                                                                                        घर पहुंचते ही तृष्णा ने अपना बैग पटका और धम्म से सोफे पर गिर पड़ी । कुछ देर सुस्ताने के बाद खड़ी हुई, हाथ- मुंह धोए, पानी पिया और चाय बनाने लगी तो यश ने बर्तनों की आवाज ताड़कर कहा,- "मम्मा, मेरी भी चाय बना लेना।"                                                                                                                                                                   कीर्ति के कमरे से भी आवाज आई,- " मम्मा, आधा- कप मेरी भी।"                                                                                                                                           तृष्णा को मन में थोड़ा दुख हुआ, लेकिन अल्फाजो में व्यक्त नहीं किया । समझाते से बोली,- "कीर्ति, कभी तुम भी चाय बना लिया करो, चाय तो बना ही सकती हो, सारे काम सीखने चाहिए ।"                                                                                                                                                                                                                 " क्या मामा, मुझे जीवन में चाय ही बनानी है क्या? और तुम यश को क्यों नहीं कहती ?"                                                                                                                      उम्र में यश से डेढ़ साल छोटी थी, लेकिन ज्यादातर नाम से ही पुकारती थी, वैसे भी आजकल यह रिवाज सा बन गया है ।                                                                                 "तुम हर बात में यश को क्यों घसीट लाती हो ?"                                                                                                                                                              "क्योंकि आप लोग अभी भी पुराने जमाने में जी रहे हो , आज लड़का- लड़की की सभी काम के बराबर हिस्सेदारी हैं।"                                                                                    तृष्णा और ज्यादा बहस कर खुद का मूड खराब नहीं करना चाहती थी, चुपचाप चाय बना कर दोनों को कमरे में पकड़ा आई और लॉबी में सोफे पर बैठकर चाय पीने लगी । सोच रही थी सच में आज जमाना कितना बदल गया है, जब वह छोटी थी तो छ: भाई बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण छोटों का कितना ध्यान रखती थी, छोटे भाई को भी" भैया" कह कर बुलाती थी, एक- साथ सोते समय जब तक कुछ गपशप नहीं कर लेते थे, खाना हजम नहीं होता था । आजकल के युवाओं को तो जैसे किसी की जरूरत ही नहीं है , फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम पर सैकड़ो की संख्या में मित्र बना रखे हैं, उनके अलग-अलग संदेश पढ़ने और उनका जवाब देने से ही फुर्सत नहीं है, अन्य किसी की तो जैसे आवश्यकता ही महसूस नहीं होती. कईयों में तो इस बात की भी होड़ मची रहती है कि फेसबुक पर उसके अधिक मित्र हैं, ट्विटर पर उसके इतने फॉलोअर्स है, लगता है जैसे सभी ने अपने आप को, बिना काम के, अति व्यस्त बना लिया है, शायद उनसे स्वतंत्र होकर दिल की सारी बातें कर लेते होंगे, तो परिवार के या आसपास के लोगों से बात करने को, कुछ बचता ही नहीं होगा या आदमी इतना तन्हा हो गया है कि उसके बात सुनने व उसकी संवेदनाओं को समझने के लिए कोई तैयार ही नहीं है, तो अपने दिल का गुब्बार इंटरनेट की दुनिया पर निकलता है और फिर स्वयं उसमें इतना व्यस्त हो जाता है कि वह स्वयं औरों की संवेदनाओं को महसूस करना बंद कर देता है और अपने आसपास के लोगों के लिए अजनबी बन जाता है। मकड़ी की तरह इंटरनेट की दुनिया का जाल बुनता रहता है और फिर उसमें ही उलझता रहता है ।   सच में दुनिया कितनी बदल गई है, आज ऑटो -रिक्शा वाला भी व्हाट्सएप चलाता है और फेसबुक पर चेहरे ढूंढता है, हर बच्चा, युवा देश- दुनिया के शख्सो की शक्लें पहचानता है, लेकिन अपने परिवार के सदस्यों को पहचाना, उनकी भावनाएं जानना भूल गया है।                                                                                                                                                             तृष्णा का मन करता था कि बच्चे उसके पास बैठे, आपस में गपशप करें, उसके काम में हाथ बटाएं। अब तक तो उसने ही बच्चों को कोई कामकाज नहीं करने दिया था, पूरा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर रखना था, कोटा कोचिंग के लिए जाने से पहले तो उनके अंत:-वस्त्र तक खुद ही धो दिया करती थी, ताकि उनका समय बर्बाद ना हो। दोनों की उम्र में ज्यादा फर्क नहीं था, एक ही कक्षा का अंतर था तो साथ ही दोनों को कोटा भेज दिया । अपना तन- मन- धन सब कुछ उनके कैरियर के लिए समर्पित कर दिया था। बीच-बीच में हफ्ता-दस दिन की छुट्टी लेकर उनके पास रहती थी। भावेश तो जा ही कैसे सकता था, दुकान जो चलता था, मोबाइल रिपेयरिंग की और कुछ नए मोबाइल भी बेच लेता था । यश के द्वारा तीन बार नीट की परीक्षा देने पर भी किसी राजकीय मेडिकल कॉलेज में दाखिला न मिला, बस दुर्भाग्य से दो-चार अंकों से रह जाता था, तो मेरिट से ही उसको प्राइवेट कॉलेज में दाखिला करवाना पड़ा जिसकी फीस थोड़ी ज्यादा, 7 लाख रुपए वार्षिक थी, वह भी उसको मेरिट के आधार पर मिला, वरना तो प्राइवेट कॉलेज में फीस 20 लाख रुपए तक थी। ऊपर से कीर्ति की पढ़ाई का खर्चा भी तो था, यह सुकून की बात थी कि उसको दूसरे ही प्रयास में एन आई टी इलाहाबाद में अच्छी ब्रांच मिल गई थी ।                                                                                                                                                भावेश कई दिनों तक बैंकों के चक्कर काटता रहा, कोई उसे उसकी छोटी सी दुकान के व्यवसाय के आधार पर 20-30 लख रुपए का लोन देने के लिए तैयार न था। तृष्णा के सरकारी कर्मचारी होने के नाते उसके नाम पर तो मिल सकता था किंतु उसके नाम पर पहले से ही फ्लैट का ऋण ले रखा था, जो उन्होंने चार-पांच वर्ष पहले ही तो लिया था, तीन बेडरूम -लॉबी- किचन वाला। भावेश रात्रि में सोते समय तृष्णा से बोला,- "तृष्णा थक गया हूं मैं, बैंकों में जाकर गिड़गिड़ाते,कोई इतना ऋण देने को तैयार नहीं होता है,हम यश को 1 वर्ष और तैयारी करवाते हैं।"               "नहीं, नहीं, वह पहले ही तीन बार परीक्षाएं दे चुका है, अब नहीं, बहुत मानसिक तनाव हो जाएगा, फिर अभी जो अवसर मिल रहा है, उसकी भी क्या गारंटी है?"                                      दूसरे दिन फिर दोनों एक नए बैंक गये और दुकान तथा तृष्णा द्वारा चुकाने की लिखित गारंटी देने पर, स्टडी ऋण पास कर दिया गया, जिसकी कीर्ति को बड़ी चिढ थी कि भैया की पढ़ाई के लिए इतना पैसा खर्च किया जा रहा था । यश को भी अंदर ही अंदर उससे ईर्ष्या महसूस होती थी कि उसको अपने दम पर इतने अच्छे एन आई टी कॉलेज में अच्छी ब्रांच मिली थी और वह अपने आप को ज्यादा बुद्धिमान समझती थी। कुछ नासमझी, कुछ त्याग -समर्पण की भावना का अभाव, दोनों भाई- बहनों में आपसी बातों के नाम पर नोंक-झोंक ही होती थी। तृष्णा आज दोनों बच्चों के कैरियर की तरफ से निश्चित हो गई थी, तो उसे अब लगता था कि बच्चे अब फुर्सत में उससे बातें करें, उसके काम में हाथ बटाएं,                                                                              आज तृष्णा सायं ढले हाथ में चाय का कप पकड़े बालकनी में कुर्सी पर बैठी थी, भास्कर भगवान को शायद लोगों पर तरस आ गया था कि अपनी तपिश कम कर अपने अग्नि-बाण रूपी किरणों को समेट रहा था, क्षितिज लाल- सुनहरा हो चला था, सामने पार्क में बच्चे खेल रहे थे, बालकनी के सामने ही एक जामुन का पेड़ था, जिसमें एक हल्के श्यामवर्ण की सी किसी चिड़िया का घोंसला था। तृष्णा उस चिड़िया के परिवार को बड़ी गौर से देखा करती थी । आज वह चिड़िया अपने नवजात पखेरू के मुंह में अपनी चोंच से दाना दे रही थी और वह चू -चू करके मानो मन से और खिलाने की कह रहा था। चिड़िया कितने प्यार से खिला रही थी और उसकी आंखों में कितना संतोष और सुकून था।                                                                                                 सोच रही थी उसने भी तो चिड़िया की तरह ही कितने प्यार से बच्चों को बड़ा किया था, कितने कष्ट झेले थे, शुरू में तो सास- ससुर, जेठ- जेठानी, सभी साथ रहते थे। रोज जेठानी और सास के ताने- उलाहने सहती थी कि नौकरी पडर जाती है तो क्या? घर का काम तो बराबर करना पड़ेगा। कीर्ति 2 वर्ष की भी नहीं हुई थी कि एक दिन जेठानी बोली,- " मां जी, मैं कोई घर की नौकरानी नहीं हूं क्या? यह तो महारानी बैग उठाकर चल देती है, सुबह से शाम तक घर में मैं ही पिसती रहती हूं, ऊपर से इसके बच्चे भी संभालो, बस का नहीं था तो ऊपर- नीचे के पैदा क्यों किये।" "निशा, थोड़ा सब्र करो , वह भी तो आकर रात्रि का रसोई में पूरा खाना बनाती है।" "उसमें क्या अहसान करती है, सारे दिन तो मैं ही टेल- चाकरी करती हूं ना, दिन में दो तक बज जाते हैं, सुबह का खाना ही नहीं सिमट पाता, मेरे भी बच्चे हैं, उनका ध्यान ही नहीं रखा जाता ।"                                                                                                                                     ससुर और जेठ पुरानी परचूनी की पुस्तैनी दुकान संभालते थे। शुरू में बी टेक करने के बाद भावेश ने किसी कंपनी में नौकरी की थी, तो बाहर रहना पड़ा, लेकिन तनख्वाह ज्यादा अच्छी नहीं थी। इसलिए दोनों बच्चों की देख-रेख का जिम्मा तृष्णा के सिर आन पड़ा था, ऊपर से वेतन पूरा की पूरा सास के हाथ में जाता था । इसीलिए संयुक्त परिवार की गाड़ी हिचकुले खाते चल रही थी । तृष्णा को खर्चे के लिए सीमित पैसे ही मिलते थे, उसको महसूस होता था, जैसे वह कोई मशीन है, जिसमें ईंधन डाल दिया जाता है और उसका काम है, नौकरी कर पैसे लाना, बच्चों का ध्यान रखना, रसोई में खपना आदि आदि । उसकी सभी मानवीय इच्छाएं जैसे प्यासी की प्यासी थी और उसके नाम की सार्थकता को सिद्ध कर रही थी। वह टूट रही थी, इतना सब कुछ करने के बावजूद जेठानी दो पल चैन से नहीं काटने देती थी ।                                                                                                                                                                              भावेश तो सप्ताहंत में दो दिन के लिए ही आता था, जब कभी उससे इस सब के बारे में जिक्र करती थी, तो एक ही जवाब होता था,- " थोड़ा धैर्य रखो तृष्णा, सप्ताह में दो दिन तो चैन से काट लेने दिया करो ।" जैसे उसी ने सबका चैन हराम कर रखा था। शादी से पहले पिताजी ने पैरों पर खड़ा कर दिया था और विवाह के समय ससुराल वालों ने नौकरी करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी, किंतु उसे क्या पता था कि नौकरी करने के बाद भी वह इस तरह पैरों पर खड़ी होगी।                                                                                                                        आखिर रोज-रोज की चिक-चिक से तंग आकर एक दिन उसने दृढ़ निर्णय कर लिया। सप्ताह अंत में जब भावेश आया तो साफ कह दिया कि वह नौकरी छोड़ रही थी या वह घर छोड़ना पड़ेगा। भावेश अंत:-दिल से सारी स्थिति को समझता था, लेकिन फिर भी थोड़ा समझने का प्रयास किया। वह भी जानता था कि उससे कहीं बेहतर उसकी सरकारी नौकरी है और वेतन भी अधिक है । बात नहीं बनी और उनका परिवार अलग हो गया और किराए के मकान में रहने लगा। भावेश को नौकरी छोड़नी पड़ी वरना दोनों छोटे बच्चों का लालन- पालन कैसे होता ? एक दिन बड़ी हिम्मत करके ससुर साहब से भावेश ने मकान दुकान के हिस्से की बात की तो, उसके पापा ने नरम दृष्टिकोण दर्शाते हुए, हिस्से के नाम पर 15 लख रुपए किस्तों में जेठ से दिलाने की बात कही, जो उन्होंने कई साल में चुकता किया और वह सालों तक किराए के मकान में ही रहते रहे।                                                                                                                         भावेश को सारे दिन घर पर रहना अखरने लगा । ऊपर से कई लोग फब्त्तियां भी कसते, - " अरे बीवी कमाने वाली है, क्या चिंता है, आजकल जमाना बदल रहा है भाई, अब औरत कमाएगी और मर्द करेंगे चूल्हा- चौका।"। परेशान होकर आखिर उसने एक मोबाइल रिपेयरिंग की छोटी सी दुकान डाली। वह किसी मोबाइल कंपनी में ही नौकरी करता था। यश को किसी डे- बोर्डिंग स्कूल में छोड़ देते और कीर्ति को तृष्णा अपने साथ ले जाने लगी। प्रधानाचार्य महोदय अनेक बार रोका-टोकी करते, फटकारते भी, -" तुम यहां बच्चे खिलाने आती हो या पढ़ाने ?तुम्हारी तरह सभी मैडम अपने बच्चे लाने लगी तो स्कूल पालनाघर बन जाएगा । तृष्णा यह ठीक नहीं है।" और वह चुपचाप गर्दन नीचे किये डांट सुन लेती। उस समय आज की तरह चाइल्ड केयर लीव भी तो नहीं मिलती थी। छुट्टियां तो उसके पास जुड़नी ही नहीं थी, कभी बच्चों को डॉक्टर के पास भी ले जाना पड़ता था तो बड़ी मिन्नतें कर प्रधानाचार्य से थोड़ी देरी से आने की अनुमति मांगती थी, इसके एवरेज में कई बार तो विद्यालय का अतिरिक्त काम उसको घर पर लाकर करना पड़ता था।                                                                                                                              एक बार यश को निमोनिया हो गया था, कितनी परेशान हो गई थी वह, पूरी- पूरी रात उसको गोद में लिए बैठे-बैठे निकाल देती थी। दो सप्ताह तक विद्यालय नहीं गई थी, खुद बीमार पड़ने पर शायद ही कभी छुट्टी ली होगी। 10- 15 दिन बाद जब वह स्वस्थ हो गया तो दिल को चैन पड़ा । और कीर्ति को तो पता नहीं बचपन में बिस्तर पर ही पेशाब करने की बीमारी या आदत पड़ गई थी। रात में तीन-तीन बार खड़े होकर उसके कपड़े, चद्दर, गद्दे के ऊपर बिछाई गई गदूली, बदलती रहती थी। एक पल उसको गीले में नहीं सोने देती थी।                                                    चिड़िया को देखते हुए बैठी सोच रही थी, कैसा रिश्ता बनाया है भगवान ने मां-बाप का बच्चों से, जो बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी प्रतिकार के, उनके लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर देते हैं और एक अल्प दिमाग चिड़िया भी चाहे खुद भूखी रह जाए, अपनी चोंच का दाना बड़ी सुखद अनुभूति के साथ अपने नन्हें लाडले को खिलाती है, शदियां गुजरी, जमाने बदले, दुनिया परिवर्तित हो गई, लेकिन मां का रिश्ता ईश्वर ने पता नहीं अक्षुण्य धातु से बनाया है, जो वैसा की वैसा है, उसमें कोई जंग नहीं लगी। संतान उसके परवाह करें या ना करें, उसकी परवाह करना जैसे मां के सुख का स्रोत है।                                                                                                                                                                                                     आज विद्यालय में सत्र का आखिरी दिन था, ग्रीष्म- अवकाश शुरू होने से मां को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। घर पहुंची तो देखा यश और कीर्ति दोनों झगड़ रहे थे। कीर्ति कह रही थी,-" तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरा मोबाइल छूने की?" "क्यों तूने भी तो कल मेरा लैपटॉप छेड़ा था?" " और तूने मेरा फेसबुक अकाउंट क्यों छेड़ा बदतमीज कहीं का?" " क्यों तेरा अकाउंट खुला हुआ था मैंने क्या छेड़ा और मम्मी को भी बता दे तेरे अकाउंट में क्या छेड़ा है, क्या राज है तेरे?" " शर्म नहीं आती तुझको, तेरा मोबाइल दे दिखाती हूं क्या राज है?" " अरे चुप भी करो!" " मम्मी कह दो इसको मेरी किसी चीज को हाथ नहीं लगाये और मेरे कमरे में नहीं घुसे!" कीर्ति झनझनाई। "तू भी कान खोलकर सुन ले, आज के बाद मेरे कमरे में घसी और कोई चीज छेड़ी तो अच्छा नहीं होगा ?" यश प्रति उत्तर में उबला।                                                                                                                                                                                     "अरे बस भी करो!" तृष्णा का सिर फटने लगा । वैसे भी उसे कई बार बहुत तेज सिर दर्द होता था। वह बिस्तर पर जाकर पड़ गई और दोनों ने अपने-अपने कक्ष में घुसकर दरवाजे बंद कर लिये। काफी देर तक तृष्णा सिर को स्कार्फ से बांधे यूं ही पड़ी रही, दिल बड़ा उथल-पुथल हो रहा था। आज क्या सभी भाई- बहनों का ऐसा रिश्ता हो गया है, समझ नहीं आ रहा था, उन्होंने जैसे मोबाइल पर अपनी कोई राजदार बड़ी सी दुनिया बना रखी थी, जिसने उनके सतही सोच को बहुत छोटा कर दिया था, कैसा जमाना आ गया है, उनका स्वभाव कैसा हो गया है कि एक- दूसरे की अपने कमरे में परछाई तक नहीं सुहाते और वह थी कि पांच भाई- बहनों के साथ एक ही कक्ष में, एक ही दरी पर सोने में आनंद आता था। दिमाग में दर्द तेज हो चला था, लेकिन किसको कहे, दोनों में से किसी को एक गिलास पानी लाने को कहने की हिम्मत नहीं होती थी, क्योंकि शायद वह जवाब का आकलन करती थी।                                                                                       तृष्णा के सिर का दर्द कम नहीं हुआ, कमरे में ही पड़ी रही, खाने का समय हो चला था, कैसे बनाएं, आखिर कीर्ति को आवाज देकर कहा,- " कीर्ति, मेरे सिर में दर्द हो रहा है आज तुम लोग ही खाने के लिए कुछ बना लो, यश तुम भी कुछ मदद करो।" " मामा, तुम जानती हो सब्जी- रोटी बनाना तो हमको आता ही नहीं, मैगी बनाएंगे तो पापा कैसे खाएंगे।" दोनों बोले। "मैं बाहर से खाने का आर्डर कर देता हूं!" यश बोला । इस बात की गंभीरता के बारे में दोनों ने ही नहीं सोचा था कि मम्मी के सिर में दर्द है और बिना उनके बाहर के खाने का मजा कैसे आएगा। " अरे! बाहर से बना हुआ खाना क्या अच्छा लगेगा, पता नहीं कब का बना होगा, जिसका इतना अधिक चार्ज करते हैं।" मामा बोली,-" तुम लोग मिलकर दाल- चावल बना लो, मैं बताती हूं बस माप कर पानी डालकर, कुकर में सीटी लगवा दो, दर्द कम हो जाएगा तो तड़का मैं बाद में लगा दूंगी।" और मन से नहीं चाहते हुए भी कटोरी से नाप कर पानी डालते हुए चावल में यश ने और दाल में कीर्ति ने कुकर की सीट तो लगवा दी और अपने कक्ष में जाकर व्यस्त हो गए और मां को समय पर दवा लेने, चेक-अप कराने की नसीहत भी दे गये।                                                                    तृष्णा के सिर का दर्द कम नहीं हुआ । अतः भावेश जब दुकान से लौटा तो स्थिति का आकलन करते हुए उसने ही दाल में छौंक लगाया, शेष काम किया। तब सब ने खाना खाया, कुछ तृष्णा को भी जबरदस्ती खिलाया।                                                                                                                                                                                        रात्रि को सोते समय तृष्णा से बोला, -" तुम अपना बिल्कुल ख्याल नहीं रखती हो, कितनी बार तुम्हें दर्द होता है, एक बार जाकर चेकअप तो करवा सकती हो ना !" "अरे डॉक्टरों में भी आजकल नैतिकता कहां बची है, बिना मतलब की 10 जांच लिख देंगे और दो -चार हजार ठंडे हो जाएंगे, सर दर्द ही तो है, हो जाता है, थोड़ी- बहुत चिंता से या गर्मी से, टैबलेट ले लेती हूं, घंटे- 2 घंटे में सही हो जाता है, आज थोड़ा ज्यादा हो गया बस!" "तुम भी ना हमेशा मास्टर बनने से बाज नहीं आती, सबको विद्यार्थी समझने लगते हो !" तृष्णा थोड़ा मुस्कुरा कर बोली, - " अब शिक्षिका हूं, तो बनूंगी नहीं क्या ?" "तृष्णा कभी-कभी इन बच्चों को देखकर लगता है कि यह हमें क्या निहाल करेंगे, बुढ़ापे में कितना सहारा बनेंगे!" " अरे भावेश, क्या फर्क पड़ता है, ये खुद तो बिना किसी सहारे के अपना जीवन बसर करेंगे ना, हमारे लिए इतना काफी है। आजकल की पीढ़ी इस तरह की हो गई है शायद, समय के साथ पारंपरिक सोच के तरीके, जीवन शैली बदल गयी है, जो हमारी प्राथमिकताएं होती थी, वे उनकी नहीं है।"                                                                                                                                                                             अब पूरा दिन घर पर ही रहना था, प्रातः खड़े होकर भावेश का टिफिन तैयार करती फिर दोनों की फरमाइश का नाश्ता बनाती, लेकिन मम्मी के साथ खाने की जहमत कम ही उठाते थे । कभी तृष्णा कीर्ति से कहती, -" बेटी आओ ना कुछ खाना बनाना सिखाती हूं!" " क्या खाना ही बनाना है क्या , यश को भी सिखा दो !" " हां क्यों नहीं, यश तुम भी सीखो जरा, पता नहीं कब जरुरत पड़ जाए, आदमी को सब कुछ आना चाहिए, जिससे आश्रित न रह रहे, अटका नहीं रहे।" ' क्या मामा, नाश्ता खाना बनाना नहीं आने से क्या अटक जाएगा, आज जमाना बदल गया है, एक फोन करो घर खाना आ जाता है ।" इस तरह दोनों मामा को झिड़क देते और वह कई बहानों से उनका साथ तलाशती रहती और वे दोनों अपने कक्ष में अपने काम में इतने व्यस्त रहते थे कि मम्मी के पास बैठने का वक्त ही नहीं मिलता था। अगर दोनों के काम नहीं होते, तो तृष्णा को दिन काटना भी भारी हो जाता। होटल आदि में बाहर खाने कभी महीने में गलती से एक दो बार इसलिए चले गए थे कि बच्चे थे, अन्यथा भावेश और तृष्णा दोनों ही बाहर खाना पसंद नहीं करते थे, थोड़े से खाने के लिए इतना खर्च करना पड़ता था, लेकिन बच्चों की खुशी व साथ पाने के लिए ऐसा किया, जो सही अर्थों में कम ही मिला।                                                                                                                                                                                                     आज सुबह जब तृष्णा खड़ी हुई तो दिमाग कोई राहत सी महसूस कर रहा था, शायद कोई अच्छा सपना देखा होगा, वैसे भी मानसिक रूप से फुर्सत में थी, भावेश का टिफिन तैयार कर दिया था और वह टिफिन लेकर चला गया था। बच्चों को 10:00 बजे से पहले जागने की आदत नहीं थी । हाथ में चाय का प्याला लिए बालकनी में आकर पीने लगी, मौसम सुहाना सा हो चला था, बे मौसम के बादल घिर आए थे, कुछ बूंदाबांदी भी हो रही थी, मानो विधाता गर्मी से राहत देने का दिलासा दे रहा था, दूर आकाश में पानी से बजनी पणिहारियों की तरह छोटी- बड़ी, काली- सफेद, धूसर वर्ण की बदलियां मानो अपना पानी उड़ेल कर बहुत हल्का होने के लिए जगह या परिंडे तलाश रही थी, दूर इंद्रधनुष रूपी वरमाला अपने हाथों में लिए आकाश मानो अपनी नव विवाहिता धरा रूपी योवना के गले में डालने को आतुर था सा दिखाई दे रहा था, तपती जमीन पर गिरी हुई पानी की बूंदों से मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक आ रही थी, जो ठंडी हवा के साथ फुवारो से मिलकर विवाह समारोह में छिड़क गए इतर का एहसास कर रही थी। जामुन के पेड़ पर बने घोंसले के आसपास चिड़िया का परिवार चहचाह रहा था, परिंदों के पर निकल आए थे, चिड़िया उनको एक डाल से दूसरी डाल पर उड़ना सीख रही थी, वह छोटी-छोटी उड़ान भरते और उनको देखकर चिड़िया और उसके पति चिडे का रोम- रोम पुलकित हो उठता था, मन में गर्व महसूस होता था कि उनके नौनिहाल सक्षम हो गए थे, आत्मनिर्भर हो रहे थे, नासमझ परिंदों की आंखें भी खुशी की बूंदों से नम थी। उनको देखकर तृष्णा को भी बहुत संतोष महसूस हो रहा था।                                    भावेश मेरा कॉलेज का साथी था । मैं शहर में पढ़कर एक विद्यालय में व्याख्याता पद पर कार्यरत था। मेरा पदस्थापन मेरे मूल कस्बे में ही था ।आज शहर के हाई कोर्ट में कोई घरेलू मामले में किसी के साथ आया था, सोचा कई वर्षों बाद भावेश से मिलकर आऊंगा, बीती जिंदगी की गपशप करूंगा, कुछ यादें ताजा हो जाएगी, फोन पर ही कभी-कभी बात होती थी, तो सारे काम निपटा कर लगभग रात्रि 8:00 बजे मैं उसके घर पहुंचा। मेरे दिमाग में रात्रि साथ बिताकर प्रातः लौटने का विचार था। तृष्णा मुझे जानती थी। आदर से लॉबी में बिठाकर पानी लाई, चाय बनाने लगी, कुछ ही देर बाद भावेश भी दुकान से आ गया था। मुझे देखकर खुश हो गया और गले से लिपट गया बोला, -" मेरे भाई, कभी तो हमारी शुध ले लिया करो ।" "तभी तो आ गया ना, यार बहुत याद आते हैं, वे दिन, सब 99 के चक्कर में भूल गए।" हम गपशप करते रहे और तृष्णा ने खाना तैयार कर दिया ।                                                                                                 खाना खाने के बाद मैं और भावेश थोड़ा टहलने निकल गए और तृष्णा संभवतः दोनों बेटा- बेटी में से किसी को मेरे सोने के लिए उसका कमरा, एक रात के लिए देने को तैयार करने लगी होगी, जिसके लिए दोनों ने शायद साफ इनकार कर दिया होगा, वापस घर में घुसते हुए मेरे कानों में यश के शब्द पड़े,-" मामा, मैं अपना कमरा शेयर नहीं कर सकता, प्लीज! मुझे रात को प्रोजेक्ट संबंधी काम करना है, कीर्ति आज तुम्हारे कमरे में सो जाएगी!"। " क्यों मैं ही हमेशा क्यों कंप्रोमाइज करूं ? तुम तो अंकल के साथ भी सो सकते हो?" कीर्ति ने जवाब दिया। इतने में हम लॉबी में आ चुके थे और वह सब चुप हो गए । रात के 11:00 बज चुके थे और अब मेरे पास जाने का विकल्प नहीं था। तीन बेडरूम वाला फ्लैट भी शायद चार आदमियों के परिवार के लिए छोटा पड़ता था । कभी वक्त हुआ करता था की दो कमरों का मकान भी 10 आदमियों के परिवार के लिए पर्याप्त हुआ करता था। आज इंटरनेट व ग्लोबलाइजेशन के जमाने में दुनिया सिमटती हुई सी प्रतीत होती है, अमेरिका में बैठा हुआ इंसान भी सामने बैठा हुआ बात करता नजर आता है, किंतु शायद सामाजिक संबंधों में मीलों की दूरी हो गई है, दायरे बहुत बढ़ गए हैं, कोई आसपास नजर नहीं आता है, शायद आदमी बहुत तन्हा हो गया है, उसके सुख-दुख की भावनाओं पर कोई संवेदना व्यक्त करने वाला नहीं है, तभी तो शायद वह फेसबुक, ट्विटर पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करता होगा या उसने खुद को ही एकाकी बना लिया है।                                                                                                                                                                         तृष्णा बोली, - " आप लोग कई वर्ष बाद मिले हो, अपने कक्ष में ही बेड पर गपशप करते रहना, रात काफी हो गई है, वहीं सो जाना और वह शायद बेटा बेटी किसी के कक्ष में हमारे सोने का इंतजार करने के बाद, लॉबी में पड़े सोफे पर सोई थी ।                                                                                                                                                         दिन गुजरते गए बच्चों का अवकाश खत्म हो गया था । दो दिन पहले ही यश चला गया था, आज कीर्ति भी चली गई थी। विद्यालय खुलने में अभी दो-तीन दिन बाकी थे। तृष्णा को घर बहुत सूना-सूना लग रहा था। बच्चे थे, तो उनके लिए कुछ बनाने में ही लगी रहती थी, उनसे ज्यादा बात किए बिना भी घर में चहल-पहल रहती थी, घर भरा-भरा लहलहाता हुआ किसी फसल भरे हरियाली खेत की तरह सुहावना लगता था, आज तो उजाड़ सा लग रहा था। बालकनी में बैठी तृष्णा जामुन के पेड़ पर निहार रही थी, परिंदे बड़े हो गए थे, अब उनको चिड़िया के सहारे की जरूरत नहीं थी, चिड़िया कहीं बाहर अपने पेट का जुगाड़ करने गई होगी, उसका युवा पखेरू अपने लिए अपनी किसी साथी युवा चिड़िया के साथ नया घोंसला बना रहा था, शायद पुराना घोंसला अपर्याप्त हो गया था या अब मां के साथ गुजारा संभव नहीं था । वह इस मां के घोसले में से तिनके निकाल कर अपने घोसले को सजा रहा था और पुराने घोसले में ही कोई सुराख बनाता जाता था, तभी चिड़िया वहां पहुंच गई और अपने युवा पुत्र की करतूत देखने लगी, जो शायद उसकी उपस्थिति से अनजान था, चिड़िया अपने घोंसले से तिनके निकलते हुए देखकर भी चुप थी, कुछ ना कहा, सोचा कि उसका घर बन जाने दो, सुख से रहेगा, वह फिर और तिनके जुटाकर अपने घर की मरम्मत कर लेगी, मां का दिल अंदर जो धड़क रहा था। तृष्णा बैठी- बैठी सोच रही थी कि आज इंसान की दुनिया का असर शायद परिंदों पर भी पड़ने लगा है, कहते हैं ना प्राणी जैसे परिवेश में रहता है, उसके संस्कार, आबो- हवा उस पर असर डालते ही है ,चाहे फिर वह पक्षी ही क्यों ना हो।                            विद्यालय खुल गए थे एक हल्के से विराम के बाद नियमित दिनचर्या की वही गाड़ी फिर चलने लगी। प्रातः भावेश व स्वयं, दोनों का टिफिन तैयार करती, भावेश दुकान और वह विद्यालय चली जाती, रात्रि भावेश आने के बाद खाना खाते, कुछ बातें करते, कुछ टीवी देखते और सो जाते। इस तरह तिनका तिनका जोड़ रहे थे, ताकि यश और कीर्ति का घोंसला सज सके, दिन में एक- दो बार उनसे बातें करने की कोशिश करती, लेकिन उनके पास समय थोड़ा कम ही होता था, फिर रोज वही बात, क्या खाना खाया, समय से खा लेना, सेहत का ध्यान रखना आदि- आदि। दोनों शायद इन सब से उब चुके थे सुनते-सुनते, इसलिए 2 मिनट औपचारिकता सी निभा देते थे। भावेश ने तो वह भी छोड़ दिया था कि अपनी जिंदगी उनको अपने तरीके से जीने दो, जब फुर्सत में होंगे खुद ही बात कर लेंगे और ऐसी गलती वह हफ्ता- 10 दिन में कभी-कभार ही करते थे। लेकिन दोनों के कैरियर की तरफ से थोड़ा सा निश्चित होकर दोनों मां-बाप सुकून महसूस कर लेते थे ।बीच-बीच में अब कई बार तृष्णा के सिर में ज्यादा दर्द होने लगा था और वह सिर बांधकर पड़ जाती थी। सिर दर्द की एक दो टेबलेट खा लेती थी, रात्रि को जब भावेश आता तो कई बार चिड़चिड़ा जाता था, - "तृष्णा तुम दिखाकर नहीं आ सकती हो क्या, एक-दो दिन की छुट्टी ले लो, पूरा चेक-अप करवा लो, वरना कोई बड़ी बीमारी पाल लोगी।" " छुट्टी बची कहां है ,थोड़ी बहुत जुड़ी थी जो बच्चों की कोटा कोचिंग के दौरान काम आ गई।" " तो फिर एक दिन यूं ही मर जाओगी और डॉक्टर - जांचों के पैसे बचाते रहना, फिर एक दिन सारे काम आ जाएंगे ।" "आप भी ना कहीं की बात कहीं जोड़ देते हो" और वह तथ्य के अंदर छुपी सच्चाई को झुठला देती ।                                                                                                                                                       लेकिन एक दिन वही हुआ जिसका डर था। आज प्रातः तृष्ण से खड़ा ही नहीं हुआ गया, तेज सिर दर्द व चक्कर आते थे, पैरों पर खड़े होते ही सारी जमीन घूमती दिखाई देती थी, उल्टी आती थी। भावेश ऑटो- रिक्शा बुलाकर जैसे- तैसे जब तक उसको अस्पताल लेकर पहुंचा बेहोश हो चुकी थी। भावेश के हाथ पैर फूल गए। तुरंत इमरजेंसी में भर्ती कराया, कुछ देर बाद डॉक्टर आकर बोला,- "तृष्णा को हो सकता है कोई ब्रेन हैमरेज हुआ हो या संभव है दिमाग में कोई ट्यूमर हो सकता है, थोड़ा पैशेंस रखो, पूरी बात सारी जांच होने पर ही पता लगेगी।" भावेश के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई, दुनिया दूर जाती हुई सी प्रतीत होने लगी, जैसे सारी की सारी जमीन, जमीन के लोग, किसी तीव्र रफ्तार से उससे दूर जा रहे थे, छोड़ कर अकेला, अनंत शून्य में, जहां सिर्फ खालीपन था। जांचों के बाद, उसको आईसीयू में शिफ्ट कर दिया, वेंटिलेटर पर रख दिया गया। डॉक्टर अपनी कोशिश कर रहे थे ।एक डॉक्टर ने उसको बतलाया, -" मैडम के दिमाग में बड़ा ट्यूमर था जो फट गया है, क्रिटिकल पोजीशन है, कुछ कह नहीं सकते, थोड़ा धैर्य रखो और भगवान पर भरोसा।"                                                                                      रूंधे गले से कीर्ति को भावेश ने सूचना दी, पहले यश को भी फोन किया था, जो कहीं व्यस्तता के कारण उठा नहीं पाया होगा, तो उसको संदेश छोड़ दिया था ।रात भर भावेश वही माथा पकड़े बैठा रहा, बीच-बीच में कुछ याद करके आंखें भीग जाती थी। दूसरे दिन यश, कीर्ति भी आ गए थे । दो दिन तृष्णा इस हालत में पड़ी रही, तीसरे दिन भगवान के घर से बुलावा आ गया, जो उनके घर को वीराने में तब्दील कर गया ।                                                                                                                                                                               भावेश फूट-फूट कर किसी बच्चे की तरह रो रहा था । यश, कीर्ति को आज महसूस हो रहा था कि जैसे किसी भारी तूफानी ओलों की बरसात में किसी ने उनके घोंसला , उनका हौसला, उनका रक्षा कवच, सब छीन लिया था और उन्हें ओलों की मार खाने के लिए छोड़ दिया था । आज दोनों के रुदन की हिचकियां नहीं रुक रही थी।                                                            अंतिम संस्कार के बाद लगभग सभी परिवार-रिश्ते के लोग जा चुके थे। कीर्ति रसोई में कुछ खाना बनाने की कोशिश कर रही थी, आंखों से आंसू बहते जाते थे, मम्मी की बहुत याद आ रही थी, सचमुच मम्मी के बिना सब कुछ कितना सूना- सूना, खाली-खाली था, मम्मी जी जान से उनके लिए पूरी तरह समर्पित थी आज उनकी कही एक-एक बात जैसे दिमाग पर एक-एक चित्र सा खींचती जाती थी, फिर इस चित्र में अपने रंग को देखकर कीर्ति फफक पड़ती थी, वह मां के गले से लिपट कर बहुत रोना चाहती थी, उससे बहुत बातें करना चाहती थी, कई बार अपनों की कमी का एहसास तब होता है, जब वह इस कमी को दूर करने के लिए वापस नहीं आ सकते और फिर जिंदगी भर हमें यह एहसास खलता ही रहता है।                                                                      यश मम्मी की जगह बालकनी में मासूम सा मायूस हुआ चुपचाप बैठा, वही जामुन के पेड़ की तरफ निहार रहा था। चिड़िया कई दिनों से अपने घोंसले में नहीं लौटी थी, एक-दो दिन बाद उसके युवा परिंदे को उसकी कमी खलने लगी थी । वह बार-बार आकर पुराने घोसले में घुसकर देख रहा था, लेकिन मां नहीं थी । बहुत बेचैन हो रहा था, यहां -वहां पास के पेड़ों पर उड़ कर जाता, देखा लेकिन मां का नामोनिशान नहीं था । वह कहीं दूर बहुत दूर निकल गई थी। आज यश को एहसास हो रहा था कि मम्मी के बिना घर, घर कहां है? सूना आंगन, सूनी छत, सूनी लोबी, सुना हर एक कमरा लगता है, उसके बिना तो यह घर एक चुने पत्थर की दीवारों जैसा कोई मकान लगता है ।जहां तक जिंदगी का होश आता है । मां हर पल, हर कदम पर, उनके साथ थी, चाहे स्कूल जाना हो, चाहे विद्यालय में अभिभावकों की शिक्षकों के साथ मीटिंग हो या कोई वार्षिक उत्सव समारोह, कोटा कोचिंग या कॉलेज में दाखिला, हर लम्हा मम्मी थी, बस वह नहीं था , उनके साथ एक पल में भी, जिसमें उसकी उनको सबसे ज्यादा जरूरत थी। ऐसे विचारों व खयालों में डूबे हुए आजकल यश कीर्ति दूर तक निकल जाते हैं मां के निशान ढूंढते हुए, लेकिन मामा को लौटा नहीं पाते हैं ।अब उसका सुखद स्पर्श कहां है, बस यादें हैं, पछतावा है, एक अपूर्ण सी इच्छा है, मामा के साथ जीने की..... ‌‌।