बदलाव Rajeev kumar द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बदलाव


बदलाव

’’ क्या बनेगी मुनिया, किसी की दुल्हन? क्या करेगी मुनिया, किसी के घर का चैका-बरतन? ’’ मुनिया जब भी पढ़ने के लिए बैठती तो उसकी दादी व्यंग्य वाण चलाते हुए कहती। मुनिया अपनी किताब रखकर अपनी दादी की तरफ देखती और पुछने को सोचती कि ’ क्या बोला दादी जी आपने, जरा फिर से तो कहना। ’ लेकिन मुनिया अपनी दादी के मोटे चश्मे के भीतर व्यंग्य वाण को प्रदर्शित कर रही दादी की आँखों को देखकर मौन हो जाती और अपने चेहरे पर ढीठाई का उग्र पदर्शन करती हुई पुछती ’’ कुछ काम करवाना है तो आराम से बोल दो, मैं कर दुंगी, ले आउंगी। ’’
मुन्नी के मुँह से ऐसी बात सुनकर दादी गदगद हो जाती और अपनी एक नई जीत मानकर खुश हो जाती। दरअसल अपनी बात मनवाकर किसे खुशी नहीं मिलती होगी भला ? जहाँ साम-दाम, दंड-भेद धराशायी हो जाते हैं वहीं एक व्यंग्य वाण सफल हो जाती है, लोगों को इस बात की बिल्कूल भी प्रवाह नहीं होती कि सामने वाले पर कैसा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, बस बोलने वाले के प्रयास में सकारात्मक असर होना चाहिए।
दादी ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाकर कहा ’’ जरा एक गिलास पानी तो ले आना और चावल भीगो रखे हैं, उसको ओखल में अच्छे से कुट लेना।’’
अक्सर इच्छा नहीं होते हुए भी आदमी को वो काम करना पड़ता है, जो कि मुन्नी को भी करना पड़ रहा है।
मुन्नी के ध्यान का अस्सी फिसदी हिस्सा पढ़ी गई बात पर ही है। इधर धराधर मुसल चल रहे हैं, ध्यान सिर्फ इतना है कि हाथ में चोट न लगे।
दादी इस कुटे हुए चावल का क्या करेगी, यह तो मुन्नी को नहीं मालूम है, लेकिन दादी ने बोला है तो करना ही करना है, मुन्नी यह भली-भांति जानती है कि वो काम करने में जितना देर लगाएगी, पढ़ायी पुरी करने में उतनी ही देर होगी।
दादी माँ के बनाए अनरसे का रसावदन मुन्नी तो कर रही है मगर उसका ध्यान पुरी तरह से पढ़ाई पर ही लगा हुआ है।
मुन्नी ने भी सुन रखा है कि बदलाव समर्पण मांगती है, सो लग गयी पढ़ायी में।
असफलता का डर या तो किसी को पुरा कमजोर बना देता है या फिर किसी को बहूत मजबूत । यह तो आदमी की सोच पर निर्भर करता है कि वो डर को किस रूप में लेता है। मुन्नी ने असफलता को सफलता के तौर पर अपनाया।
हर क्लास में अव्वल आनेवाली मुन्नी ने जब प्रशासनिक अधिकारी बनने के बारे में अपनी सहेली राधा को बताया तो, कानाफुसी सुनने-करने की आदि उसकी दादी ने कब सुन लिया और व्यंग्यवश मुन्नी से कहा ’’ सुना है मेरी मुन्नी अब कलक्टरनी के दफ्तर में झाड़ू-पोछा लगाएगी।’’
मुन्नी ने अपनी दादी की तरफ देखा ही नहीं लेकिन दादी कुटील मुस्कान लिए हुए थी।
अपनी तैयारी में जुटी मुन्नी कभी खुद को जोड़ती तो कभी खुद को तोड़ती मतलब स्वयं का विश्वास कभी बढ़ता तो कभी अचानक घट जाता।
उधेड़बुंद में जीत आखिर मुन्नी के विश्वास की ही हुई। बदलाव के लिए उठाया गया मुन्नी का कदम सफल बनाकर ही छोड़ा, मगर उसकी दादी ने अब भी व्यग्य वाण चलाना नहीं छोड़ा, व्यंग्य के तीर चलाते हुए मुन्नी की दादी ने कहा ’’ अब तु तो कलक्टरनी बन गयी है, अब मुझको ही झाड़ू-पोछा के लिए रख लो। ’’
मुन्नी की हंसी देखकर दादी हंसी तो थी, मगर कुटील हंसी की मुस्कान से वो बाहर नहीं निकल पायी।
समाप्त