कन्या पद पूजन prabha pareek द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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कन्या पद पूजन

कन्या पद पूजन
आज के कुछ वर्षो पहले कितने समय तक इस घर की कन्याओं को अष्टिमी और नवमीं के कन्या पद पूजन में सिर्फ इस लिये आमंत्रित नहीं किया जाता था कि वह उन गंाव वालों की नज़र अभागी कन्यायें थीं। एक दो बार ऐसा भी हुआ की ब्राह्मण कन्याएँ उपलब्ध न होने के कारण उनको अष्टमी के कन्या जीमन के लिये आमंत्रित कियां।
देवी दुर्गा शक्ति स्वरूपा तीन प्रमुख शक्तियों के रूप में नवरात्रों में पूजी जाती हैं। महाल्क्ष्मी, महाकाली और सरस्वती। शक्ति स्वरूपा देवी के साधक अष्टिमी के दिन पूजा उपसंहार रूप में हवन, पूजन, अनुष्ठान आदि कर देवी स्वरूपा कन्या का पद पूजन कर उनको आदर पूर्वक श्रंगार भोजन आदि करवाने का नवरात्रें की पूजा को पूर्णता देने का विधान माना गया है।
गरीब घर की कन्या के पद पूजन को अपना अपमान समझता धनाठय परिवार, जिसने थाली परोस कर पकडाई और हलवा पूरी के साथ दो रूपै दक्षिणा के देकरे विदा कर दिया था। बिठा कर आदर स्नेह से भेाजन करने में उनका अहः जो आडे़ आ रहा था।ं्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र ।
बिहार का वह छोटा सा गांव, जहाँ सुकन्या अपने परिवार के साथ रहती। परिवार क्या था एक छोटा मोटा कन्याल्य ही था। पुरूष के नाम पर घर में एक बुर्जग दादाजी थे। उम्र के इस पड़ाव पर दादाजी तो परिवार को क्या संभालते पूरा परिवार ही उन्हें संभाल रहा था। यूं तो गंाव में वर्षो से दादाजी की घाक थी। गंाव के छोरे-छपारे घर के सामने से भी अदब से निकलते थे और उस घर की महिलायें भी अदब से रहती थी। यह कहना गलत न होगा कि सूरत और सीरत में उस घर की हरेक महिला विधाता की अदभुत रचना थीं। बोलने पहनने औढ़ने में पूरी मार्यादा थी। घर की छोटी से लेकर बडी सभी महिलायें, कन्याये हूनरमंद थी। गांव में गीत, हो या गाने बजाने का आयोजन हो या भोज आदि का आयोजन, परिवार की किसी न किसी महिला की भागीदारी जरूर होती।
उस घर में दादाजी अपनी पत्नी के साथ वर्षो से परिवार के मुखिया का गरिमामय पद संभाले थे । यह संयोग ही था कि दादाजी की अपनी दो पुत्रियाँ भी अपनी एक एक पुत्री के साथ उनके साथ ही रह रही थीं। एक पुत्री तो पति की मृत्यु के बाद घरवालों ने नहीं रखा और दूसरी ने फुहड़ लोगों से प्रतिदिन अपमानित होने के स्थान पर सम्मान से मा ंबाप की छत्र छाया में जीवन बिताना ज्यादा उचित समझा। हाथ में हूनर हो तो आत्मविश्वास भी बटोरना नहीं पड़ता। मंजिले खुद आगे आतीं है,राहों की भी क्या कमी है । दादाजी की दो पुत्रियों के अलावा उनके दो पुत्र भी थे। विधाता का खेल ही था कि मार्ग अक्समात में दोनों एक साथ ही चल बसे और दोनो की पत्नियाँ अपनी अपनी पुत्रियों के साथ रोती बिलखती सुसर गृह में ही रहीं थीं। जहाॅ दोनो बहुओं का ननदों के व सास ससुर के असीम प्यार ने सारा दुःख दूर कर दिया था। अब परिवार में कुल पांच महिलायें और छः बालिकायें थी। जो अपनी पढाई के साथ सभी कामों में बडी मदद करती। रूपं रंग में सभी महिलायें दूध की धुली कंचन काया सी थी। गांव के हर आयोजन में भजन इसी परिवार की महिलाओं का वर्चस्व का यह सिल सिला घीरे धीरे ही आरंम्भ हुआ था।
बच्चियाँ तो अपने समय ो ही बडी हो रहीं थी पर कहतें है लडकियाँ जल्दी बडी हो जातीं हैं।अब तो उस परिवार में मात्र दो ही लडकिया कन्या पूजन के योग्य रह गई थी। बाकी अब बालिका से किशोरी हो गई थी । इस बार की नवरात्रे की अष्टमी अपनी पूरी सजधज के साथ आई थी। नवरात्री के पहले दिन से ही इस परिवार की दोनों कन्याओं के लिये अष्टमी कन्या पूजन की बुकिंग हो गई थी।
कभी सम्मान से व्यवहार न करने वाला गांव का धनाढय परिवार अष्टमी देवी पूजन के बाद उन्हीं कन्याओं को भोजन करवाने को लालायित था। जहाॅ दादाजी के यह बात समझ नहीं आ रही थी। वहीं भोली कन्याये भी जाने में संकोच कर रही थी। अष्टमी के दिन के अपनी बहनों से सुने अनुभव बहुत ज्यादा तो नहीं पर उनके जहन में थे। जो बहुत सुखद नहीं थे। आगन पार तक आने के लिये तक उस परिवार ने उसकी बहनों केा सख्त मना कर दिया था। पर अब समय कुछ बदल गया था।
अष्टमी के दिन सुबह ही कन्या को घर ले जाने के लिये धनाठय परिवार का पुत्र दरवाजे पर खड़ा था । दादाजी के लिये अपने पूरे जीवन में ऐसा अवसर पहली बार आया था। उस दिन सुबह के समय लापसी का प्रशाद देन आई किशोरी पोती से दादाजी ने एैसे ही पूछ लिया था। छुटकी और मीना आई या नहीं। उनकी पोती ने बताया दादाजी उन्हें तो वहीं से सोनी काका ले गये हैं अपने घर...., अचरज.....।
आज दोनों कन्याओं की अच्छी आवभगत हुई आदर से पद पूजन फिर भोजन सुन्दर कीमती चुनर, चूडी, बिन्दी आर्कषक पैकिट में पैक किया। नारीयल भेंट श्रृगार का सामान। दोनों भेाली कन्याये सामान संभालने का प्रयास कर रही थीं। इतने में ही गृह स्वामिनी ने एक बडा थैला पकड़ाया बेटी सामान इसमें रख लो। अभी तुम्हे छोटै काका के घर भी जाना है। नन्ही चंचल छुटकी ने आॅखें तरेरी.... मुझे नहीं जाना उनके घर ...पर बडी मीना ने इशारा किया चल कुछ नहीं होगा। ं उसे भी आज का व्यवहार नया और अच्छा लग रहा था। घर जाती भोली बालिकायें आपस में बात कर रही थी कि इस बार की अष्टमी कुछ खास है क्या?
घर में गुसते ही मां को थैला पकडाया और खेलने चली गई दादी ने थेैला ध्यान से देख।ा इस बार की भेट, सामान, मेवा मिष्ठान देख कर दादी ने भी यही सवाल किया। आज इतना सब क्यों बडकी वहीं बैठ कर अपना फार्म भर रही थी। बोली दादी याद नहीं है क्या तुम्हारी लाड़ली चुन्नी पुलिस की बडी अफसर हो गई है और मझली का सरकारी महकमें में लोक सेवा के लिये चयन हुआ है। अब तो उन्हे परिवार से काम पड़ने ही वाले है। यही तो है इन ऊँचे लोगों की छोटी सोच।
प्रेषक प्रभा पारीक