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पांडव


पांडव महाभारत के वे पाँच प्रसिद्ध वीर योद्धा थे, जिन्हें महाराज पांडु और कुंती के पुत्रों के रूप में जाना जाता है। महाभारत का अधिकांश घटनाक्रम पांडवों और कौरवों से ही सम्बन्धित है। पांडु द्वारा अज्ञानतावश ऋषि किन्दम तथा उनकी पत्नी की मृत्यु वन में उस समय हो गई, जब वे मृग रूप में प्रणय क्रिया कर रहे थे। अपनी मृत्यु से पूर्व किन्दम ऋषि ने पांडु को यह शाप दिया कि- "यदि काम के वशीभूत होकर उन्होंने अपनी पत्नी के साथ सहवास किया तो वे मृत्यु को प्राप्त होंगे"। पांडु नि:संतान थे। उनकी पत्नी कुंती को महर्षि दुर्वासा ने एक ऐसा मंत्र दिया था, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थी। कुंती ने मंत्र का प्रयोग करके धर्मराज, वायु और इन्द्र देव का आह्वान करके उनसे क्रमश: युधिष्ठिर, भीम तथा अर्जुन जैसे पुत्रों को पाया। कुंती ने यह मंत्र माद्री को भी प्रदान किया, जिससे माद्री ने अश्विनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव जैसे पुत्रों की माता बनी।

एक बार सभी देवगण गंगा में स्नान करने के लिए गये। वहाँ उन्होंने गंगा में बहता एक कमल का फूल देखा। इन्द्र उसका कारण खोजने गंगा के मूलस्थान की ओर बढ़े। गंगोत्री के पास एक सुंदरी रो रही थी। उसका प्रत्येक आंसू गंगा जल में गिरकर स्वर्ण कमल बन जाता था। इन्द्र ने उसके दु:ख का कारण जानना चाहा तो वह इन्द्र को लेकर हिमालय पर्वत के शिखर पर पहुँची। वहाँ एक देव तरुण एक सुंदरी के साथ क्रीड़ारत था। इन्द्र ने उसकी अपमानजनक भर्त्सना की तथा दुराभिमान के साथ बताया कि वह सारा स्थान उसके अधीन है। उस देव पुरुष के दृष्टिपात मात्र से ही इन्द्र चेतनाहीन होकर जड़वत हो गये। देव पुरुष ने इन्द्र को बताया कि वह रुद्र हैं तथा उन्होंने इन्द्र को एक पर्वत हटाकर गुफ़ा का मुंह खोलने का आदेश दिया। ऐसा करने पर इन्द्र ने देखा कि गुफ़ा के अंदर चार अन्य तेजस्वी इन्द्र विद्यमान थे। रुद्र के आदेश पर इन्द्र ने भी वहाँ प्रवेश किया। रुद्र ने कहा- "तुमने दुराभिमान के कारण मेरा अपमान किया है, अत: तुम पांचों पृथ्वी पर मानव-रूप में जन्म लोगे। तुम पांचों का विवाह इस सुंदरी के साथ होगा, जो कि लक्ष्मी है। तुम सब सत्कर्मों का संपादन करके पुन: इन्द्रलोक की प्राप्ति कर पाओगे।" अत: पांचों पांडव तथा द्रौपदी का जन्म हुआ। पंचम इन्द्र ही पांडवों में अर्जुन हुए थे।

एक बार हस्तिनापुर के महाराज पांडु अपनी दोनों पत्नियों- कुन्ती तथा माद्री के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पांडु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। ये मृग और कोई नहीं, अपितु ऋषि किन्दम और उनकी पत्नी थीं। मरते हुये मृग ने पांडु को शाप दिया- "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है, अतः जब कभी भी तू अपनी भार्या के साथ मैथुनरत होगा, तेरी भी मृत्यु हो जायेगी।" इस शाप से पांडु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले- "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग करके इस वन में ही रहूँगा। तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़"। उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा- "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पांडु ने उनके अनुरोध को स्वीकार करके उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

इसी दौरान राजा पांडु ने अमावस्या के दिन बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को भी साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा- "राजन! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता। अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।" ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पांडु अपनी पत्नी से बोले- "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही व्यर्थ हो रहा है, क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता। क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?'

महाराज पांडु की व्यथा जानकर उनकी पत्नी कुन्ती बोली- "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है, जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ। इस पर पांडु ने धर्मराज को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। कुंती के आह्वान पर धर्मराज ने आकर उसे एक पुत्र प्रदान किया, जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पांडु ने कुन्ती को पुनः पुत्र प्राप्ति की इच्छा से दो बार वायु देव तथा इन्द्र देव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पांडु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को भी उस मन्त्र की दीक्षा दी। इस मंत्र की सहायता से माद्री ने अश्विनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पांडु अपनी दूसरी रानी माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पांडु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन में प्रवृत हुये ही थे कि ऋषि किन्दम के शापवश उनकी मृत्यु हो गई। स्वयं को माण्डु की मृत्यु का कारण मानकर माद्री भी उनके साथ सती हो गई, किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

पांचों पांडवों का विशिष्ट चरित्र था–
युधिष्ठिर धर्मात्मा एवं सत्यवादी थे।

भीम अपनी शक्ति तथा भूख के लिए जाने जाते थे।

अर्जुन महान धर्नुधर के रूप में विश्व विख्यात थे।

नकुल निपुण घुड़सवार और पशुओं के विशेषज्ञ थे।

सहदेव निपुण तलवार भांजक थे।

युधि‍ष्‍ठि‍र का वि‍भि‍न्‍न तीर्थों में होते हुए प्रभास क्षेत्र मे पहुँचकर तपस्‍या में प्रवृत्‍त होना और यादवों का पाण्‍डवों से मि‍लना पाण्‍डुपुत्रों द्वारा सत्‍कृत होकर यादवों ने भी उन सबका यथोचि‍त सत्‍कार कि‍या और फि‍र देवता जैसे इन्‍द्र के चारों ओर बैठ जाते है, उसी प्रकार वे धर्मराज युधि‍ष्‍ठि‍र को सब ओर से घेरकर बैठ गये। इसी समय वृष्‍णि‍वंश शि‍रोमणी भगवान श्रीकृष्‍ण और बलराम ने सुना कि‍ महाराज युधि‍ष्‍ठि‍र प्रभास क्षेत्र मे उग्र तपस्‍या कर रहे है; तब वे अपने सैनि‍कों सहि‍त अजमीढकुल भूषण युधि‍ष्‍ठि‍र से मि‍लने के लि‍ये गये। वहाँ जाकर वृष्‍णि‍वंशि‍यों ने देखा, पाण्‍डवलोग पृथ्‍वी पर सो रहे है, उनके सारे अंग धूल से सने हुए है तथा कष्‍ट सहन के अयोग्‍य द्रौपदी भी भारी दुर्दशा भोग रही है यह सब देखकर वे बड़े दुखी हुए और आर्त स्‍वर से रोने लगे। (उस महान संकट में भी) महाराज युधि‍ष्‍ठि‍र ने अपना धैर्य नहीं छोड़ा था।

जिस प्रकार शरीर में पांच प्राण होते हैं, वैसे ही महाराज पांडु के पांच पुत्र हुए। कुन्ती द्वारा धर्म, वायु तथा इन्द्र का आहवान किया गया, जिनके अंश से क्रमश: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन उत्पन्न हुए। पांडु की दूसरी रानी माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के अंश से नकुल और सहदेव हुए। पांडु का इनके बचपन में ही परलोकवास हो गया। माद्री अपने पति के साथ सती हो गयीं। पांचों पुत्रों का लालन-पालन कुन्ती ने किया। ये पांचों भाई जन्म से ही धार्मिक, सत्यवादी, न्यायी थे। ये क्षमवान, सरल दयालु और भगवान के परम भक्त थे।

महाराज पांडु के न रहने पर उनके पुत्रों को राज्य मिलना चाहिये था; किंतु इनके बालक होने से अंधे राजा धृतराष्ट्र सिंहासन पर बैठे। उनके पुत्र स्वभाव से क्रूर और स्वार्थी थे। उनका ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन अकारण ही पांडवों से द्वेष करता था। भीमसेन से तो उसकी पूरी शत्रुता थी। उसने भीमसेन को विष देकर गंगा में मूर्च्छित दशा में फेंक दिया; परन्तु भीम बहते हुए नागलोक पहुँच गये। वहाँ उन्हें सर्पो ने काटा, जिससे खाये विष का प्रभाव दूर हो गया। नागलोक से वे लौट आये। दुर्योधन ने पांडवों को लाक्षागृह बनवाकर उसमें रखा और रात्रि को उसमें अग्नि लगा दी। परन्तु विदुर ने पहले ही इन लोगों को सचेत कर दिया था। ये अग्नि से बचकर चुपचाप वन में निकल गये और गुप्त रूप में यात्रा करने लगे।

भीमसेन शरीर से बहुत विशाल थे। बल में उनकी जोड़ का मिलना कठिन था। वे बड़े-बड़े हाथियों को उठाकर सहज ही फेंक देते थे। वन में माता कुन्ती और सभी भाइयों को कंधों पर बिठाकर मजे से यात्रा करते थे। अनेक राक्षसों को उन्होंने वन में मारा। धनुर्विद्या में अर्जुन अद्वितीय थे। इसी वनवास में पांडव द्रुपद के यहाँ गये और स्वयंवर सभा में अर्जुन ने मत्स्यवेध करके द्रौपदी को प्राप्त किया। कुन्ती के कथन की रक्षा के लिये द्रौपदी पांचों भाइयों की रानी बनीं। धृतराष्ट्र ने समाचार पाकर पांडवों को हस्तिनापुर बुलवा लिया और आधा राज्य दे दिया। युधिष्ठिर के धर्मशासन, अर्जुन तथा भीम के प्रभाव एवं भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से पांडवों का ऐश्वर्य विपुल हो गया। युधिष्ठिर ने दिग्विजय करके राजसूय यज्ञ किया और वे राजराजेश्वर हो गये; परन्तु दुर्योधन से पांडवों का यह वैभव सहा न गया।

धर्मराज युधिष्ठिर को महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा से जुआ खेलना स्वीकार करना पड़ा। जूए में सब कुछ हारकर पांडव बारह वर्ष के लिये वन में चले गये। एक वर्ष उन्होंने अज्ञातवास किया। यह अवधि समाप्त हो जाने पर भी जब दुर्योधन उनका राज्य लौटाने को राजी नहीं हुआ, तब महाभारत का युद्ध हुआ। उस युद्ध में कौरव मारे गये। युधिष्ठिर सम्राट हुए। छत्तीस वर्ष उन्होंने राज्य किया। इसके बाद जब पता लगा कि भगवान श्रीकृष्ण परमधाम पधार गये, तब पांडव भी अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राज्य देकर सब कुछ छोड़कर हिमालय की ओर चल दिये।

पांडव भगवान में मन लगाकर महाप्रस्थान कर गये। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र तो धर्म और भक्ति के साथ हैं। जहाँ धर्म हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं धर्म है। पांडवों में धर्मराज युधिष्ठिर साक्षात धर्मराज थे और भगवान के अनन्य भक्त थे और अर्जुन तो श्रीकृष्ण के प्राणप्रिय सखा ही थे। उन महाराज युधिष्ठिर तथा महावीर धनंजय के चरित पृथक दिये गये हैं। भीमसेन श्यामसुन्दर को बहुत मानते थे। भगवान भी उनके साथ हास-परिहास कर लेते थे; किंतु कभी भी भीमसेन ने श्रीकृष्ण के आदेश पर आसक्ति नहीं की। कोई युधिष्ठिर या श्रीकृष्ण का अपमान करे, यह उन्हें तनिक भी सहन नहीं होता था। जब राजसूय यज्ञ में शिशुपाल श्यामसुन्दर को अपशब्द कहने लगा, तब भीम क्रोध से गदा लेकर उसे मारने को उद्यत हो गये। पांडवों की भक्ति की कोई क्या प्रशंसा करेगा। जिनके प्रेम के वश होकर स्वयं त्रिभुवननाथ द्वारकेश उनके दूत बने, सारथि बने और सब प्रकार से उनकी रक्षा करते रहे, उनके सौभाग्य की क्या सीमा है।

ऐसे ही पांडवों का भ्रातृप्रेम भी अद्वितीय है। धर्मराज युधिष्ठिर अपने चारों भाइयों को प्राण के समान मानते थे और चारों भाई भी अपने बड़े भाई की भक्ति करते थे। युधिष्ठिर ने जुआ खेला, उनके दोष से चारों भाइयों को वनवास हुआ और अनेक प्रकार के कष्ट झेलने पड़े, पर बड़े भाई के प्रति पूज्यभाव उनके मन में ज्यों-का-त्यों बना रहा। क्षोभवश भी अर्जुन आदि ने यदि कभी कोई कड़ी बात कह भी दी तो तत्काल उन्हें अपनी बात का इतना दुःख हुआ कि वे प्राण तक देने को उद्यत हो गये। पांडवों के चरित्र में ध्यान देने योग्य बात है कि उनमें भीमसेन जैसे बली थे, अर्जुन जैसे अस्त्र विद्या में अद्वितीय कुशल शूरवीर थे, नकुल-सहदेव जैसे नीतिपूर्ण एवं व्यवहार की कलाओं में चतुर थे; किंतु ये सब लोग धर्मराज युधिष्ठिर के ही वश में रहकर, उन्हीं के अनुकूल चलते थे। बल, विद्या, शस्त्रज्ञान, कला-कौशल आदि सबकी सफलता धर्म की अधीनता स्वीकार करने में ही है। वे श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार ही चलते थे। भगवान में भक्ति होना, भगवान के प्रति सम्पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देना ही धर्म का लक्ष्य है। यही बात, यही आत्मनिवेदन पांडवों में था और इसी से श्यामसुन्दर उन्हीं के पक्ष थे। पांडवों की विजय इसी धर्म तथा भक्ति से हुई।

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