दो वादे... Sanjay Nayak Shilp द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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दो वादे...

दो वादे.....

ट्रेन अपनी गति से उसके गाँव की ओर बढ़ी चली जा रही थी। रंजना पूरे तेरह साल बाद गाँव जा रही थी। उसके पिताजी अपने अंतिम साँसें ले रहे थे। उसने अपनी आँखें बंद करके सर को बर्थ के पीछे की दीवार से टिका दिया था। तेरह साल पुरानी यादें उसकी आँखों के आगे घूम रही थीं ।
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"ए सरजू….सुन तुझसे एक बहुत जरूरी बात करनी है।" उसने सरजू से कहा।

"बोलो छोटी मालकिन ….हमसे का काम है?"
"सरजू, हम दोनों बचपन के दोस्त हैं, जानता है न तू….सुन मुझे तुझसे प्यार है...मैं तुझसे बहुत प्रेम करती हूँ। मेरे बाबा मेरी शादी किसी और से करना चाहते हैं, पर मैं उससे शादी नहीं करना चाहती। वो आदमी एक नम्बर का अय्याश और बिगड़ैल है।" रंजना ने कहा।

"छोटी मालकिन! बताइये हम आपके लिए का कर सकते हैं, आप के एक कहे पर अपनी जान छिड़क देंगे।" सरजू ने साहस से कहा।

"सरजू….मैंने आज शाम की 5.40 वाली ट्रेन से भागने का सोचा हुआ है। तू मेरे साथ भाग चलना, नहीं तो बाबा मेरी जबरन शादी उस आदमी से करवा देंगे...तू अपनी ऊँट गाड़ी तैयार रखना...मैं ठीक पाँच बजे तुझे ऊँची टेकड़ी के पीछे बरगद के पेड़ के नीचे मिलूंगी।"

"अरे ऐसे कैसे छोटी मालकिन, ऐसे कैसे भाग चलें? हमारी अंटी में एक ठो धेला भी नहीं है, और हम ट्रेन से भाग चले तो, हमारी इस ऊंट गाड़ी का क्या होगा? उ तो स्टेशन पर ही खड़ी रह जायेगी।" सरजू ने चिंता व्यक्त की।

"तू पैसे की चिंता मत कर, वो सब मैं ले आऊंगी। तू अपने दोस्त हरिया को पहले ही स्टेशन पर भेज देना, ताकि वो तेरी ऊँट गाड़ी को वापस ले आए। मेरा कॉलेज का एक दोस्त और आएगा जो हमें ट्रेन में ही मिलेगा, बोल मेरे लिए कर सकता है ये?" रंजना ने उसे समझाया।

"हम तो पहले ही कह चुके हैं, हम आपके खातिर जान भी दे सकते हैं, हम ठीक 5 बजे आपको टेकड़ी के नीचे मिल जाएंगे। आप जाओ और तैयारी करो।" सरजू ने कहा।

"मेरी आखिरी आस तुम ही हो सरजू, बस मुझे उस नरक में जाने से बचा लो।" कहते हुए रंजना की आँखें भीग गईं। रंजना वहाँ से भागते हुए चली गई। सरजू उस पीठ ताकता रहा।

ठीक पाँच बजे सरजू के ऊँट गाड़े में, रंजना अपने बैग सहित बैठ चुकी थी।

"सरजू! डर तो नहीं लग रहा न?" रंजना ने आशंका से पूछा।

"नहीं डर काहे का, जब तक आप साथ हो छोटी मालकिन, हमें किसी का डर नहीं।" सरजू ने कहा।

"और तुम्हारे माई बाबा, और तुम्हारी बहन मुनिया…? उनका क्या होगा?" रंजना ने पूछा।

"हम माई बाबा और मुनिया को कलुवा के साथ अपने ननिहाल भेज दिए हैं। उनका फिक्र नाहीं कीजिये बस जल्दी से स्टेशन पहुंच जाएं... आपके घर पर पता चल गया होगा, आपके चेचेरे भाई और मुखिया जी जरूर स्टेशन की तरफ आएंगे, उससे पहले हमें ट्रेन पकड़नी है।" सरजू ने ऊँट गाड़ी भगाते हुए कहा।

स्टेशन आने ही वाला था, रंजना ने सरजू से कहा," सरजू याद है बचपन में हम दोनों से एक एक वादा किया है, कि जिंदगी में एक बार एक दूसरे से कोई एक चीज़ जरूर मांगेंगे, और सामने वाला मना नहीं करेगा।"

"हाँ छोटी मालकिन! हमें याद है, एक वादा मेरा, एक वादा आपका।" सरजू ने कहा।

"सरजू आज वो दिन आ गया है... मैं अपना वादा मांग रही हूँ। सुनो! मैं तुम्हारे साथ नहीं भाग रही, ट्रेन में मेरा दोस्त आ रहा है ,जो शहर में मेरे साथ पढ़ता था। मैं उससे प्रेम करती हूँ और उसके साथ ही भाग रही हूँ। इसके लिए मुझे माफ़ कर देना... तुम्हें झूठ बोलकर यहाँ लाई। मैं जानती हूँ, मेरे जाने के बाद मेरे घरवाले तुम्हें बहुत तंग करेंगे पर तुम कैसे भी अपने आपको बचा लेना। मैं फिर आऊंगी तुमसे मिलने, तुम अपने दोस्त हरिया के साथ यहां से बचकर भाग निकलना, और एक बात है मैं बचपन में तुमसे प्रेम करती थी, पर अब मैं बड़ी हो गई हूँ, अब मुझे तुममें अपना प्रेमी नजर नहीं आता, मुझे माफ़ कर देना सरजू।" रंजना ने बहुत आत्मग्लानि के साथ कहा।

"लो छोटी मालकिन, स्टेशन आ गया है, 10 मिनीट में ट्रेन आ जायेगी। बस आपको झट से चढ़ा दूँगा। मेरी चिंता मत करना, मेरी मदद के लिए यहाँ हरिया ही नहीं, रामु और चकलु भी आये हैं। पर एक वादा मेरा भी पूरा कर जाइये, वादा ये कि अपना ख्याल रखेंगी, कभी भी खुद को दुखी नहीं करेंगी और गाँव जरूर लौटकर आयेंगी, वादा कीजिये छोटी मालकिन।" सरजू ने कहा।

"वादा करती हूँ सरजू, वादा करती हूँ तुमसे।" रंजना ने भीगी आंखों से कहा।

"छोटी मालकिन ट्रेन आ गई है , जल्दी से दौड़कर ट्रेन में चढ़िये। देखिए गाँव के रस्ते पर धूल का गुबार उठ रहा है, शायद मुखिया जी और आपके चचेरे भाई लोग आ रहे हैं।" सरजू ने रंजना का बैग उठाकर ट्रेन की ओर दौड़ लगाई।

रंजना उसके साथ दौड़कर ट्रेन की बोगी तक पहुँची। बोगी से एक हाथ निकला और उसने रंजना का हाथ थाम लिया। सरजू ने जल्दी से बोगी में बैग फेंका और ट्रेन की ओर हाथ हिलाता रह गया। ट्रेन ने रेंगने के बाद गति पकड़ ली।
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अचानक ट्रेन के पहिये चीखे और रंजना की आँखें खुल गईं। उसके गाँव का स्टेशन आ गया था।

वो ट्रेन से उतरी और स्टेशन से बाहर निकल गई। उसने इधर उधर नजर दौड़ाई, उसे एक दो टैक्सी और एक ऊँट गाड़ी नजर आई। उसने पहचाना...ऊँट गाड़ी पर सरजू बैठा था।

"सरजू गाँव चलोगे।" रंजना ने कहा।

"अरे…..!!!! छोटी मालकिन आप, आइये न बैठिए, मैं तो ये ऊँट गाड़ी इसीलिए यहाँ लिए खड़ा रहता हूँ, गांव की कोई सवारी आये।" सरजू ने आश्चर्य और खुशी से कहा।

"ये तुम्हारी आंख को क्या हुआ सरजू।" रंजना ने आशंकित होते हुए पूछा। रंजना ने देखा सरजू बहुत कमजोर हो गया था, और शायद कम उम्र में ही बुढ़ापे की तरफ जा रहा था।

"ई लंबी कहानी है छोटी मालकिन , फिर कभी बताएंगे। आप गाड़ी में बैठिए, नहीं तो अंधेरा गहरा जाइ।" सरजू ने रंजना का बैग गाड़ी में रखते हुए कहा।

कुछ देर की खामोशी के बाद रंजना ने पूछा, "सरजू मेरे जाने के बाद क्या हुआ था... और तुम हरिया के साथ रामू और चकलु को लेकर क्यों आये थे।"

कुछ देर की खामोशी के बाद सरजू बोला, " छोटी मालकिन, हम हरिया, रामू और चकलु को साथ इसलिए लेकर आये थे क्योंकि हम जानते थे कि आप हमारे साथ नहीं किसी और के साथ भाग रही थीं, और वो तीनों हमारी जान की रक्छा करेंगे।"

"अरे…..तुम्हें मालूम था!!!!!, तुम्हें कैसे पता चला?, और फिर तुमने ये जानते हुये भी की हम किसी और के साथ भाग रहे हैं, अपनी जान को जोखिम में क्यूँ डाली।" रंजना ने चकित होते हुए पुछा।

"जी…..आपने हमको एक लैटर पोस्ट करने के लिए दिया था, वो आपने जल्दबाजी में सही से चिपकाया नहीं था, वो हमने पढ़ लिया था। आप चौंकिये नहीं, मुझे पता है कि आप केवल ये ही जानती थीं कि हम अनपढ़ थे, लेकिन हमारी बहन मुनिया ने हमें पढ़ना सिखा दिया था। पर आपने हमें कहा कि आपको हमारे साथ भागना है तो हम समझ गए थे आप हमसे मदद माँगना चाहती हैं.... और हमने आपको भरम में रहने दिया कि हमें कुछ नहीं पता। रहा आपकी मदद की बात तो आपने कहा था कि आपकी जिंदगी का सवाल है, तो हम आपकी जिंदगी बचाने के लिए ऐसी कई जान कुर्बान कर सकते हैं।" सरजू ने कहा।

"लेकिन मेरे लिए क्यूँ?" रंजना ने आहत होते हुए पूछा।

"क्योंकि हम आपसे प्यार करते थे।" सरजू ने एक गहरी साँस के साथ कहा।

कुछ देर खामोशी छाई रही। वातावरण में मिट्टी और धुंआ का मिला जुला धुंधलका छा रहा था।

"तुम्हारी आँख को क्या हुआ?" रंजना ने काफ़ी देर बाद सवाल किया।

"आपकी ट्रेन चल पड़ी थी। हम हरिया, रामू और चकलु वहाँ से सरपट गाँव की ओर दौड़ लिए थे, क्योंकि जानते थे कि मुखिया जी और तुम्हारे चचेरे भाई अपने लठैतों के मुझे मारने आ रहे हैं। हम जल्दी गाँव पहुंचना चाहते थे ताकि गाँव वाले हमें जान से मार देने से बचा लें, पर हम गाँव से कुछ दूरी पर ही थे कि हमें घेर लिया गया... और लाठियों से हमें मारने लगे। हमें बहुत मारा और एक लाठी मेरी आँख पर पड़ी और मेरी आँख फूट गई। गाँव में ये खबर आग की तरह फैल गई। पूरा गाँव इकट्ठा होकर आ गया और हमारी जान बचाई। गाँव वालों ने तर्क दिया कि छोटी मालकिन खुद किसी और के साथ भागी है ये तो अपना पेट पालने के लिए ऊँट गाड़ी चलाता है, इसमें सरजू का कोई कुसूर नहीं है। आपके घरवाले हमें छोड़कर चले गए। पर मुखिया जी ने पंचायत बुला ली और ये दलील दी कि मैंने उनकी बेटी को भगाने में मदद की है। इससे गाँव की नाक कट गई है। इसलिए मेरे जमीन मुखिया को सुपुर्द कर दी जाए, क्योंकि गाँव की इज्जत का सवाल था और बड़े मालिक से पंचायत डरती थी इसलिए फैसला बड़े मालिक की हक में गया और हमारी जमीन मुखिया जी को दे दी गई, और हम अपने इसी ऊँट गाड़ी से अपना और अपने परिवार का पेट पालने लगे।" सरजू ने सारा किस्सा कह सुनाया।

"ओह सरजू हमें माफ कर दो, इन सब की ज़िम्मेदार मैं हूँ, मुझे दुख है मेरे कारण तुम्हारी आँख और खेत दोनों चले गए।" रंजना ने बहुत दर्द में कहा।

कुछ देर खामोशी रही।

"तुम्हारे बच्चे कितने हैं?" रंजना ने पूछ लिया।

"बच्चे….!!!, छोटी मालकिन …..हमारी आँख फूट गई, जमीन चली गई, तो हमें अपनी बेटी कौन देता? कुछ रिश्ते भी आये….पर बड़े मालिक और आपके चचेरे भाइयों ने उन सबको डराकर भगा दिया कि अगर अपनी बेटी इससे ब्याह दी तो हम अपनी बेटी के भागने का बदला तुम्हारी बेटी से ले लेंगे, और उसके बाद कोई रिश्ता नहीं आया हमरे लिए, और हमरी बहन भी कुंवारी बैठी है उसके लिए भी कोई रिश्ता नहीं आ रहा। सब पूछते हैं बड़ा भाई कुँवारा क्यूँ बैठा है? पर हम अपनी जिंदगी में खुश हैं, हमें कोई मलाल नहीं। छोटी मालकिन आप खुश और सुखी हैं न?" सरजू ने मासूमियत से बताया।

"सरजू मैं अब तक तो खुश थी, पर आज बहुत दुखी हो गई हूँ, मैंने तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर दी है।" रंजना की पलकें भीगीं।

"छोटी मालकिन….गाँव आ गया, पर आपको यहीं उतरना होगा, हम बड़े मालिक के सामने कभी नहीं जाते हैं।" सरजू ने बताया।

"सरजू ….मैं भी पिताजी को बिना बताए आई हूँ, मुझे माँ से सूचना मिली पिताजी अंतिम साँस ले रहे हैं, और मुझे बहुत याद कर रहे हैं….सुनो मैं कुछ कर सकती हूँ तुम्हारे लिए…..!!!!" रंजना ने भावुक होकर कहा।

"छोटी मालकिन, हमरी बहन के लिए कोई रिश्ता हो तो बता दीजिए हमरे कारण वो घर में बिन ब्याही बैठी है। आपका बहुत उपकार होगा।" सरजू ने मन की व्यथा कही।

"मैं ज़रूर उसकी शादी करवा दूँगी सरजू, अब मैं चलती हूँ तुमसे फिर मिलूंगी।" रंजना मरे कदमों से खुद को गुनहगार समझते हुए अपनी हवेली के रास्ते की तरफ मुड़ गई।

सुबह सुबह ही हवेली से बुलावा आया था, सरजू को बड़े मालिक ने याद किया था, सरजू के माता पिता बहुत घबराए हुए थे कि अब क्या मुसीबत आने वाली है। पहले ही क्या कम दुख दिए हैं मुखिया जी ने...सरजू अकेला जाना चाहता था पर हरिया जिद करके उसके साथ हो लिया।

हवेली के दालान में मुखिया जी एक बड़े तख्त पर लेटे हुये थे, मरणासन्न स्थिति में मुखिया बड़े दयनीय लग रहे थे। चाकर उनके आस पास सेवा के लिए तैनात थे, बड़ी मालकिन उन्हें हाथ पँखा झिला रही थी। रंजना मुखिया जी के पायताने बैठी थी।

सरजू मुखिया जी से थोड़ी दूर खड़ा होकर उन्हें प्रणाम करके जमीन पर उकड़ू बैठ गया। मुखिया जी ने इशारे से चाकर को कहा।

चाकर ने एक कुर्सी वहाँ रख दी।
"सरजू, कुर्सी पर बैठो, हम अपने किये के लिए माफी मांगते हैं, तुम्हारे कारण हमारी रंजू की जिंदगी बर्बाद होने से बच गई और वो आज अपनी जिंदगी में खुशहाल है। रंजू के जाने के बाद हमें पता चल गया था कि जिससे रंजू का रिश्ता किया था वो एक नम्बर का अय्याश और बदतमीज आदमी है। अपनी अय्याशी के कारण आज उसका सब कुछ बर्बाद हो गया है। हम तुम्हारे आभारी हैं, हमें माफ़ कर दो।" मुखिया जी ने पश्चाताप के आँसू बहाए।

सरजू ने खड़े होकर मुखिया जी के पाँव पकड़ लिए "नहीं बड़े मालिक आप तो हमारे माई बाप हैं, अन्नदाता हैं, हम तो बस अपनी मित्रता का फर्ज निभाये थे।"

मुखिया जी की आंखों से अश्रुधार बह निकली, उन्हें मन में सरजू को दी गई सजा के लिए बहुत दर्द था।

"सरजू! पिताजी अपने किये को बदल तो नहीं सकते, बीता वक़्त लौटाया नहीं जा सकता, पर उसके परिणामों को वर्तमान में सुधारने का प्रयास किया जा सकता है। पिताजी ने जितनी तुम्हारी जमीन छीनी थी उससे दुगुनी जमीन तुम्हारे नाम कर रहे हैं....और पिताजी ने अपनी मृत्यु के बाद अपनी आँखें दान करने का निर्णय लिया है, वो चाहते हैं कि उनकी आँख तुम्हारी आँख में लगाई जायें इसका सारा इंतजाम मैं कर दूंगी।" रंजना ने अपनी पिता की मृत्यु का सोचते हुए नम आँखों से बताया।

सरजू मुखिया जी के पाँवों से लिपटकर फूट फूटकर रोने लगा। बड़ी मालकिन भी सुबकने लगी, माहौल एक अजीब मुर्दनी में बदल गया। कुछ देर बाद जब वो संयत हुआ तो बोला, "छोटी मालकिन हमें आपसे बात करनी है।" और सरजू उठ कर वहाँ से दूर चला गया।

रंजना उसके पास गई, "बोलो क्या बात है?"

"छोटी मालकिन , जमीन तो ठीक है पर बड़े मालिक की आँख हमें लगवाएँगी ये मुझे बिल्कुल सही नहीं लग रहा।" सरजू ने सकुचाते हुए कहा।

"सरजू….उनकी देह के साथ आँखें भी राख हो जानी हैं, इससे अच्छा है कि उनकी आँख से तुम फिर से सुहाखे हो जाओ। मैं तुम्हारी एक आँख में अपने सखा और दूसरी आँख में पिता की दृष्टि देख पाऊं। सरजू सकुचाओ मत ...मना मत करना। ऐसे करने से मेरे पिता और मेरा दोनों का प्रायश्चित हो जाएगा और हमारे पाप कुछ कम होंगे। मैं चाहती हूँ मेरे पिता न तो कम से कम उनकी आँख तो जिंदा रहें, इसलिए तुम्हारे इनकार पर भी मैं और मेरे पिता मानने वाले नहीं हैं।" कहकर रंजना वहाँ से चली गई।

मुखिया जी को गए हुए सवा महीना हो गया था, सरजू की फूटी आंख में मुखिया जी की आँख आज भी जिंदा थी, आज रंजना वापस शहर लौट रही थी, हालांकि उसके पति और बच्चे ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहे थे पर रंजना ने सरजू के ऊँट गाड़े में ही स्टेशन जाने का बोल दिया था।

स्टेशन पर ट्रेन आने में समय था, सरजू एक तरफ खड़ा था , अचानक न जाने रंजना को क्या सूझा उसने आगे बढ़कर सरजू के पाँव पकड़ लिये, सरजू अचकचाया, "छोटी मालकिन ये क्या कर रही हैं, हमे पाप का भागी न बनाइये उठिए।"

"सरजू! हम अपने सखा और अपने पिता के पाँव छू रहे हैं हमें आशीर्वाद दो कि हम जिंदगी में कभी कोई गलत काम न करें, हमारे सर पर अपना हाथ रख दो।" रंजना की आँखे भीग गईं।

अनायास ही सरजू की दोनों आँखों से दो अश्रुधार बह निकली और सरजू के हाथ रंजना के सर पर आशीर्वाद मुद्रा में जा लगे। सरजू की आँख से बहते आँसूं रंजना के हाथ पर जा गिरे। माहौल बहुत भावुक हो चला था।

रंजना उठ खड़ी हुई। उसने आँख पोंछते हुए अपने पति से कहा, "सरजू की बहन के लिए कोई अच्छा रिश्ता देखना होगा, मैंने इससे वादा किया है।"

"एक नहीं दो रिश्ते देखने होंगे, दोनों भाई बहनों की एक ही मंडप में शादी करवा देंगे।" ये कहते हुए रंजना का पति सरजू के गले लग गया।

ट्रेन स्टेशन छोड़ रही थी और सरजू ट्रेन के आँखों से ओझल होने तक लगातार हाथ हिला रहा था।

संजय नायक"शिल्प"
29-10-2023