सबा - 8 Prabodh Kumar Govil द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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सबा - 8

आज उनकी छुट्टी थी। शायद इसीलिए वो इतनी शांति और आराम से बैठी थीं। वो कोई किताब पढ़ रही थीं। जब उन्होंने देखा कि बिजली रसोई से अपना काम ख़त्म करके जाने के लिए उनके पास अनुमति लेने आई तो वो पल भर के लिए क़िताब अपनी आंखों के सामने से हटा कर उससे बोलीं - बैठ!
बिजली को थोड़ा अचंभा हुआ। उसे यहां काम करते हुए इतने दिन हो गए थे पर पहले तो उन्होंने कभी बिजली को बैठने के लिए नहीं कहा। कहतीं कैसे, वो तो ख़ुद हमेशा जाने की जल्दी या हड़बड़ी में होती थीं, बिजली से काम के अलावा और कोई बात करने का उनके पास समय ही कहां होता था। बिजली भी उनकी व्यस्तता देख कर अपने काम से काम रखती थी।
पर आज जब उन्होंने इतने इत्मीनान से बैठने के लिए कहा तो बिजली बैठ गई।
हां, एक उलझन ज़रूर आई बिजली को। उसे एकाएक ये समझ में नहीं आया कि वह उनके सामने सोफे या कुर्सी पर बैठे या ज़मीन पर!
आम तौर पर बिजली ने यही देखा था कि काम वाली बाइयां अपनी मालकिनों के सामने ज़मीन पर ही बैठती थीं। उनमें एक अघोषित मालिक- सेवक का रिश्ता ही होता था। बिजली ने यही देखा - सुना था।
लेकिन वो अभी नई उमर की युवा लड़की थी। थोड़ी बहुत पढ़ी- लिखी भी। उससे उसकी अपनी समझ यही कहती थी कि ये संबंध कोई मालिक और गुलाम का थोड़े ही है, ये तो काम की ज़रूरत और काम करने वाले के बीच पैसे लेकर सेवा देने का करार है। जैसे ये बड़े लोग भी तो ख़ुद जब दफ्तरों में काम करने जाते हैं तो अपने अधिकारी या मालिकों के सामने कुर्सियों पर बैठते ही हैं। फिर हम क्यों गुलामों की तरह ज़मीन पर बैठें। हां, ये बात ज़रूर है कि अगर हम गंदे - संदे कपड़े पहने हुए हों तो इनके कीमती सामान को ख़राब न करें। बच- सिमट कर नीचे ही बैठें।
बिजली ने एक उड़ती सी नज़र अपने कपड़ों पर डाली और धीरे से एक कुर्सी पर ही बैठ गई। उसने चमकी का एक पुराना सलवार सूट पहना हुआ था जो पुराना ज़रूर था लेकिन मैला नहीं। फटा तो बिलकुल भी नहीं। वो तो चमकी थी ही ऐसी कि न जाने कहां - कहां से नए- नए कपड़े ले आती और फिर अपने पुराने कपड़े बिजली को दे देती। थी ही फांदेबाज़। बिजली को ये कभी समझ में नहीं आता था कि जब वो कुछ काम नहीं करती थी तो उसके पास उड़ाने के लिए पैसे आते कहां से थे।
बिजली ने देखा कि मालकिन ने उसके कुर्सी पर बैठ जाने पर कुछ भी नहीं कहा और न ही कोई आपत्ति जताई।
वह सहज हो गई। उसे लगा, देखो ये पुराने लोगों ने वैसे ही मन में भ्रांतियां बना रखी हैं, खुद ही मन में कोई हीनभावना पाल ले तो कोई क्या करे? मैडम ने तो कोई अप्रिय मुंह नहीं बनाया उसके कुर्सी पर बैठ जाने पर।
हां, ये ठीक है। मालकिन मालकिन क्या करना, इन्हें मैडम ही कहना चाहिए।
अब बिजली की दिलचस्पी ये जानने में थी कि मैडम ने उसे बैठने को क्यों कहा। क्या कहने वाली हैं? क्या उससे कोई गलती हो गई! या फिर उसके काम में कोई नुक्स निकालेंगी? कहीं हटाने वाली तो नहीं काम से!
बिजली चुपचाप उनकी ओर टुकुर - टुकुर ताकने लगी।
मैडम बोलीं - तेरी शादी कब कर रहे हैं तेरे घरवाले?
बिजली शरमा गई। आंखें नीची करके धीरे से बोली - करेंगे जल्दी ही!