युगांतर - भाग 15 Dr Dilbagh Virk द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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युगांतर - भाग 15

शांति आज हार न मानने की ठान कर आई थी, इसलिए उसने नया तर्क दिया, "एक गलती को छुपाने के लिए दूसरी गलती करना तो उचित नहीं।"
उधर यादवेन्द्र भी आसानी से मानने वाला कहाँ था। वह उसके तर्क का भी तोड़ प्रस्तुत करते हुए कहता है, "उचित है, क्योंकि यही संसार का नियम है, एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं, एक गलती को छुपाने के लिए सौ गलतियाँ करनी पड़ती हैं। तुम्हें तो सिर्फ एक गलती और करनी है। तू हाँ कह, सारी व्यवस्था हो जाएगी और किसी को कानो-कान खबर भी नहीं होगी।"
तर्क को फेल होते देख उसने औरत के परंपरागत हथियार आँसू का सहारा लेते हुए कहा, "तो क्या आपको मुझ यर जरा भी तरस नहीं आता।"
"तरस आता है, तभी तो मुफ्त सलाह दे रहा हूँ वरना मुझे क्या। जो तुम्हारे सिर पर पड़ी है, तुम खुद उसका निपटारा करो।" - यादवेंद्र ने आँसुओं से विचलित हुए बिना कहा।
"क्या आपको मुझसे जरा भी प्यार नहीं?" - शांति ने अब इमोशनली ब्लैकमेल करने की सोची।
"है भी और नहीं भी।"
"मतलब।"
"तुझसे प्यार करता हूँ, इसीलिए तेरे बारे में सोच रहा हूँ, वरना हम नेता लोग आम को चूसकर फैंक देते हैं। गुठलियों से मोह करना हमें नहीं आता। प्यार नहीं है, यह इसलिए कहा कि अगर तू ज़िद करेगी तो मुझे तुझको तेरे हाल पर छोड़ना मेरी मजबूरी होगी।"
"इतनी बेरहमी, कुछ तो कद्र करो हमारे रिश्ते की।"
"कद्र ही कर रहा हूँ वरना हमारा रिश्ता महज एक समझौता था। मुझे तेरा जिस्म चाहिए था और तुझे मेरे ज़रिए ताकत-रुतबा। हमने एक हाथ दिया, एक हाथ लिया।" - यादवेंद्र ने बेरुखी दिखाते हुए दो टूक बात की।
"फिर मैं कहा जाऊँ?" - शांति ने निराश होते हुए कहा।
"जाना कहाँ है, मेरी बात मान और अबॉर्शन करवा लें।"
"अब एक तो इसमें खतरा है, दूसरा लोगों को भी अब शक होने लगा है कि मैं गर्भवती हूँ। अब मुझसे शादी कौन करेगा।
"मत कर शादी। वैसे भी तू राजनीति में आ ही गई है और यहां कुँवारे मर्द और औरतें बहुत हैं। ये लोग भी ब्रह्मचारी नहीं, अपितु किसी एक खूँटे पर बंधनें की बजाए खुला चरने में विश्वास रखते हैं।"
"नहीं चरना मुझे खुला। बस आपके घर के किसी कोने में पड़ी रहूँगी, दीदी की नौकर बनकर।"
"जो बात संभव ही नहीं, बार-बार उस पर क्यों आ जाती हो। रमन मुझे घर में रखे हुए है, यही काफी है।" - यादवेंद्र ने सहज होते हुए मजाकिया लहजे में कहा।
"आप ऐसे पत्थर दिल होंगे मैंने कभी सोचा भी न था।" - शांति अभी भी अपनी जीत की आस लगाए हुए यादवेंद्र को त्रिया चरित्र में फँसाने की भरपूर कोशिश कर रही थी।
"इसमें पत्थर दिल होने वाली कौन सी बात है, यह तो व्यवहारिकता है। हाँ, तुम जरूर भावुक हो रही हो, मगर इस समाज में यदि तुम्हें जीना है, तो भावुकता का दामन छोड़कर व्यवहारिक बनना होगा। इसी में तुम्हारी और मेरी भलाई है।"
"आपकी ये बातें मेरी समझ में नहीं आ रही। मैं तो बस इतना जानती हूँ कि आप टालमटोल छोड़कर मेरा समाधान आज ही और अभी करें। ज्यों-ज्यों दिन बीत रहे हैं, त्यों-त्यो बात सबके सामने आने का डर बढ़ रहा है।"
"मैं तो तुम्हारी समस्या का समाधान करने को तैयार हूँ, कहो तो अभी ले चलूँ डाक्टर के पासा।"
"नहीं मुझे नहीं जाना।" - शांति ने इस बार आँसू पोंछते हुए कठोर होकर कहा।
"तो फिर कैसे होगा तुम्हारा समाधान?"
"कितनी बार तो कह चुकी हूँ। आपको मुझसे शादी करनी ही होगी।" - शांति ने इस बार लगभग निर्णय सुनाते हुए कहा।
"शादी!, यदि हम नेता लोग ऐसे ही शादी करने लगे तो हमारी पत्नियों की संख्या मुगल शासको की बेगमों से बढ़ जाएगी।" - यादवेंद्र ने उसकी बात को मजाक में उड़ाते हुए कहा।
"मैं यह कुछ नहीं जानती, आपको मुझसे शादी करनी ही होगी।" - शांति ने गुस्से से कहा।
यादवेन्द्र ने भी कठोर होते हुए कहा, "यह असंभव है।"
शांति भी रौद्र रूप धारण करते हुए बोली, "आपको इसे संभव बनाना ही होगा।"
यादवेन्द्र कुछ नर्म पड़ा और उसे समझाते हुए बोला, "अरे क्यों पागलों जैसी बातें करती हो, मैं शादीशुदा हूँ, तुमसे शादी कैसे कर सकता।
"यह मेरी सिरदर्दी नहीं, आप कैसे भी करें मगर आपको मुझसे शादी करनी ही होगी।" - शांति अपनी बात पर अड़ गए।
यादवेन्द्र ने बेरुखी से जबाब दिया, "मैंने कह दिया न कि यह शादी नहीं होगी, अब तूने क्या करना है वो तेरी मर्जी।"
शांति धमकी पर उतर आई, "तो मैं सबको बता दूँगी"
यादवेन्द्र ने इस प्रहार से बिना विचलित हुए उसी बेरुखी से जबाब दिया, "यह बात छुपी किससे है, जो सबको बता दोगी।"
"आपकी विरोधी पार्टी को।"
"इससे क्या होगा?"
"उन्हें तो सबूत चाहिए तुम्हारे विरुद्ध।"
"तुझे क्या लगता है कि उनके पास पहले कोई सबूत नहीं। यहाँ दूध का धुला कौन है? कौन कैसा है, यह मैं तुमसे बेहतर जानता हूँ। मुझे बदनाम करने की कल्पना जो तुमने की है, वह खोखली है, क्योंकि राजनीति के हमाम में हम सब नंगे है ।" - यादवेंद्र ने उसकी धमकी की परवाह किए बिना कहा। वह एक क्षण रुककर फिर बोला, "हाँ, मैं तुझे एक बात और बता देना चाहता हूँ कि अगर तुम उनके पास गई तो तुम उनका खिलौना बनकर रह जाओगी। जो इज्जत तुम्हें मैंने दिलाई है, वह सब खाक में मिल जाएगी। यह बात मैं तुम्हें धमकाने के लिए नहीं कह रहा, बल्कि तुम्हें सलाह दे रहा हूँ। आगे तुम्हारी मर्जी, जो दिल में आए वही करना है तुम्हारे लिए सब रास्ते खुले हैं।"
यादवेंद्र ने जो कहा शांति उस सच को जानती थी। यादवेंद्र के खिलाफ जाने की कोशिश उसने की भी थी, लेकिन यादवेंद्र के खिलाफ किसी ने उसका हाथ नहीं पकड़ा था। इसके कई कारण थे। सबसे बड़ा तो यही कि उसके सिर पर मंत्री जी का हाथ था। इसके अतिरिक्त यादवेंद्र दबंग था। उसके पास लठैतों की कमी न थी। दरअसल वह इन्हीं लठैतों के बल पर ही राजनीति में था, लेकिन उसने कभी भी अपनी दबंगाई का दुरुपयोग नहीं किया था। लठैतों से काम बूथ कैप्चरिंग के समय ही लिया जाता था। सत्ता में होकर उसने किसी विरोधी पार्टी वाले को तंग नहीं किया, अपितु वह उनके नाजायज कामों को भी तब तक नजरअंदाज करता था, जब तक उनकी पार्टी के वर्कर प्रभावित नहीं होते थे। शांति को जब विरोधियों से जवाब मिला, तभी वह समझ गई थी कि उसकी चाल उल्टी पड़ गई है, इसीलिए उसने शुरूआत में प्यार और रिश्ते की दुहाई दी। धमकी तो उसका ऐसा हथियार था, जो नहीं चलेगा, इसकी संभावना उसे थी। फिर भी उसने इसे आजमाना उचित समझा और जब इसे बेअसर पाया तो उसके कदमों के पास बैठकर उसके घुटनों को पर सिर रखते हुए बोली, "प्लीज मुझे बचा लो, यह पाप मुझसे न होगा, बाकी जो आप कहो, मैं मानने को तैयार हूँ।"
कमजोर हथियारों से लड़ने की बजाए हथियार डाल देना बहुधा काम कर जाता है। शांति के इस प्रकार हथियार डालने ने यादवेन्द्र का दिल एक बार फिर पिघला दिया। उसने शांति को उठाकर बाँहों में भर लिया और उसके आँसू पोंछते हुए प्यार से बोला, "डार्लिंग समझने की कोशिश करो, इसमें खतरा ही क्या है। इसके बिना अपनी बेड़ी पार उतरने वाली नहीं।"
शांति यादवेन्द्र के गले लिपटकर सिसकती हुई बोली, "मुझसे यह पाप न होगा, मैं पत्थर दिल नहीं बन सकती।"
"पत्थर दिल तो बनना ही होगा वरना कुँवारी माँ बनकर कैसे जियोगी?" क्या नाम बताओगी बच्चे के बाप का? और यदि तुमने मेरा नाम बताया भी, तो शादी के बिना जन्मे बच्चे को समाज कैसे स्वीकार करेगा और फिर कौन करेगा तुझसे शादी।"
"मुझे कुछ नहीं पता। बस आप अबॉर्शन के सिवा कुछ भी बता दो, मैं सब मानने को तैयार हूँ।
"हूँ...।" - यादवेंद्र ने चिंतित होते हुए कहा। कुछ देर सोचने के बाद कहा, "मंत्री जी के फॉर्म हाउस में तुम्हें शिफ्ट किया जा सकता है।"
"इससे क्या होगा।" - शांति ने संभलते हुए कहा।
"वहाँ तुम बच्चे को जन्म देना। कुछ समय बाद तुम्हारा डेपुटेशन जिला मुख्यालय में करवा दिया जाएगा। यहाँ जिनको पता है, वे जिला मुख्यालय तो जाने से रहे। वहाँ तुझे कौन जानता है। वहीं किसी से शादी कर लेना।"
"और बच्चा?"
"उसे किसी मजबूर को गोद दे देंगे।"
"नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं बच्चा किसी अनजान को नहीं दे सकती।"
"यह भी नहीं करना और वह भी नहीं। ऐसे कैसे समस्या सुलझेगी।"
"बच्चा तो आप पाल सकते हो?"
"फिर वही पागलपन।"
"ये बात तो आपको माननी ही होगी।"
"पर मैं रमन को क्या कहूँगा?"
"कुछ भी झूठ बोल देना। कह देना कि माँ-बाप एक्सीडेंट में मर गए और मुझे बच्चे पर तरस आ गया।"
"ठीक है, सोचते हैं इस बारे में।" - यादवेंद्र ने भविष्य की न सोचकर वर्तमान में समस्या से पिंड छुड़ाते हुए कहा।
यादवेंद्र ने शांति को मंत्री जी के फॉर्म हाउस भिजवा दिया, लेकिन इस घटना ने उसे प्रभावित न किया हो ऐसा भी नहीं। वह खुद को जाल में फँसे हिरन की तरह पा रहा था, जो जितना निकलने की कोशिश करता है, उतना ही उसमें फँसता जाता है। मंत्री जी ने उसे आगाह भी किया था कि यूज एंड थ्रो की नीति अपनाओ। किसी एक के साथ जुड़ गए तो पछताओगे। परंतु वह नया शिकारी था। शांति उसका पहला ही शिकार थी मगर यह शिकार उसे बड़ा भारी पड़ रहा था। उसे लगता था मानो वह खुद ही शिकार हुआ जा रहा है। कल तक जो उसकी खुशी थी, वही आज उसकी सारी खुशियाँ छीन रही थी।
यादवेन्द्र को इस बात का भी डर सता रहा था कि कहीं यह राज़ रमन के सामने न खुल जाए। चिंता के ये पल उसे चिंतन करने को मजबूर कर रहे थे। वह अपने अतीत में खो जाता है और अनुभव करता है कि उसकी जिन्दगी में उथल-पुथल तभी से शुरू हुई है, जब से उसने राजनीति में प्रवेश किया है। राजनीति की बदौलत ही उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ी, और राजनीति की बदौलत ही वह अमीर बना है। फिर वह सोचता है कि पिछले कुछ वर्षों से तो गम जैसे उसके पीछे ही पड़ गए हैं। माँ-बाप चल बसे, पत्नी है तो वह दुख-सुख साझा नहीं करती। यहाँ शाँति को पाकर सोचा था कि सारे गम गलत हो जाएँगे, मगर दिल बहलावे का यह खिलौना जी का जंजाल हो गया है और आगे क्या होगा ? राम जाने।
यह सब कुछ सोचकर वह निराश हो जाता है। निराशा में जब वह बाहर खुले आसमां की तरफ देखता है, सूरज डूब रहा है। काले बादलों के टुकड़ों के साथ लालिमा ऐसे ही व्याप्त है, जैसे आग की लपटें और धुआँ इकट्‌ट्ठे मिल रहे हों। इस दृष्य को देखकर वह चौंक जाता है कि कहीं शांति की बात उसके घर को ही जला न दे। कहीं यूँ ही उसका सूर्य डूब न जाए। कहीं...कहीं....
क्रमशः