युगांतर - भाग 6 Dr. Dilbag Singh Virk द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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युगांतर - भाग 6

किसी भी विधायक को मंत्री बनने के बाद अपने सहयोगियों का उद्धार करने की सोच ज़रूर रखनी चाहिए। उसका अपना उद्धार तो उसी दिन हो जाता है, जिस दिन वह चुनाव जीतता है, लेकिन जिन सहयोगियों ने उसकी जीत को मुमकिन बनाया होता है, उनका उद्धार तब तक नहीं हो पाता, जब तक नेता जी अपना आशीर्वाद उन्हें प्रदान नहीं करते। आमतौर पर सभी नेता मलाई मिलते ही अपने सहयोगियों को भी थोड़ा-बहुत हिस्सा देना शुरु कर देते हैं। आखिर इन्हीं सहयोगियों की मदद से तो वे यहाँ तक पहुँचते हैं। फिर ये सहयोगी अपना घर-बार चौपट करते हैं, तो इसी उद्देश्य से कि उनकी बर्बादी के बाद आबादी का मौसम भी आएगा | 'तुम मुझे सहयोग दो, मैं तुम्हे सहयोग दूँगा' का अलिखित समझौता उनके दरम्यान सदा विद्यमान रहता है। चुनाव से पहले कार्यकर्त्ता सहयोग करते हैं और सत्ता हासिल करने के बाद विधायक महोदय कार्यकर्त्ताओं को कमाने के पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं। कार्यकर्त्ताओं को सदा सहयोग बनाए रखने का आश्वासन भी देना होता है, जो ज्यादा चालाक बनता है, उसके पर काटने का काम भी नेताजी को करना होता, इसलिए नेताजी का सजग होना ज़रूरी होता है। राजनीति इसी कारण शतरंज जैसी है। यहाँ प्यादा भी बादशाह को मात दे सकता है, इसलिए राजनीति में वही कामयाब होते हैं, जो हर समय चौकन्ने होते हैं। राजनीति में निष्ठाएँ बड़ी महत्त्वपूर्ण होती हैं। किसी एक पक्ष की बेईमानी से नौका डूब सकती है। नौका डूबने का नुकसान तो दोनों को ही होता है, इसलिए यह समझौता जब तक ईमानदारी से निभता है, तब तक सब चाँदी काटते हैं। कार्यकर्ताओं को डर रहता है कि उन अकेलों का अस्तित्व ही क्या है। वे तो उस बूँद के समान हैं, जिसके होने, न होने से समुद्र को कोई फर्क नहीं पड़ता और नेता जी को डर है कि इन बूँदों के मेल से ही मेरा अस्तित्व है, अगर एक-एक करके कहीं ये अलग हो गई तो एक-न-एक दिन सब खाली हो जाएगा। इसके अतिरिक्त चुनाव न जाने कब हो जाएँ, की लटकती तलवार भी उन्हें बाँधे रखती है। इस लटकती तलवार से बचने के लिए सत्ता में आते ही ऐसे कार्यक्रम बनाए जाते हैं कि चुनाव कभी भी आ जाएँ, आर्थिक पक्ष से वे हर पल सबल हों। जितना खर्च चुनावों में किया जाता है, उतना जल्दी-से-जल्दी पूरा करने के लिए हाथ पाँव मारने शुरु हो जाते हैं। पहली सोच अपना घर भरने की होती, जनता का बाद में सोचा जाता है या उतना ही सोचा जाता है, जितना खुद का घर भरने के लिए ज़रूरी हो। जनता का भला नेताजी अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से करते हैं। किस कार्यकर्ता को किस क्षेत्र में और कितना अधिकार देना है, इसका निर्धारण नेता जी स्वयं करते हैं।
शंभूदीन ने भी अपने प्रमुख कार्यकर्ताओं को उनकी योग्यतानुसार काम बाँट दिए हैं। यादवेंद्र उसके मुख्य सहयोगियों में से एक था। चुनावों में इसने काफी मेहनत की थी, इसलिए सुविधाएँ प्राप्त करने वालों में वह मुख्य था, इसकी उसे जरूरत भी थी क्योंकि चुनाव के दौरान खर्च अधिक हो जाने के कारण उसका घरेलू बजट गड़बड़ा गया था, लेकिन शंभूदीन यह निर्धारित नहीं कर पा रहा था कि उसे क्या सौंपा जाए, हालाँकि वे वस्तुस्थिति से परिचित थे। यादवेंद्र भी अपनी स्थिति से परेशान था, क्योंकि राजनीति में आने से कमाई में बढ़ोतरी तो होनी क्या थी, ब्याज का खर्च और बढ़ गया था। मंत्री जी का सहयोगी होने के नाते जीवन स्तर को भी ऊँचा उठाना ज़रूरी है, जिसके लिए अधिक आमदन की ज़रूरत है। वैसे उसका जीवन स्तर पहले भी अच्छा था और जीवन स्तर ऐसी चीज है, जिसे हम उठा तो कभी भी सकते हैं, मगर गिरा नहीं सकते। यादवेंद्र की कमाई का साधन कृषि था, जो अब मजदूरों से करवाई जाती थी, क्योंकि प्रताप सिंह अब इतना सक्षम नहीं था कि स्वयं खेती कर सके। सारी फसल ब्याज में चली जाती और खर्च उधार लिए पैसों के सहारे चलता । प्रतापसिंह भी परेशान था। वह चाहता था कि बेटा अगर स्वयं खेती की देखभाल शुरु कर दे तो शायद हालात सुधर सकते हैं, लेकिन यादवेंद्र इसके लिए तैयार नहीं था।
यादवेंद्र आज रोज की तरह सुबह-सुबह अखबार पढ़ रहा था। प्रताप सिंह उसके पास आकर कहते हैं, "बेटा क्या मिलेगा इस अखबार से। खेती संभालो, नहीं तो भीख माँगने की नौबत आ जाएगी तुम्हारी इस राजनीति से।"
"यह तो मैं भी मानता हूँ कि हमारी आर्थिक स्थिति गड़बड़ा रही है, मगर पिता जी अब मुझसे खेतीबाड़ी न होगी। मैं कोशिश तो कर रहा हूँ शायद बंदोंबस्त हो जाए।"
"कब होगा बंदोबस्त? क्या तब, जब भूखे रहने की स्थिति आ जाएगी।"
"आप बेफिक्र रहें, मेरे रहते ऐसे दिन नहीं आ सकते।"
यह कहकर यादवेन्द्र घर से निकल गया। वह सीधा मंत्री जी के पास पहुँचा जो इन दिनों शहर में आए हुए थे। मंत्री जी उसकी बेचैनी भाँप गए थे। दूसरे लोगों के बाहर जाते ही वे उससे बोले, "क्या बात है यादवेंद्र, बड़े परेशान दिख रहे हो?"
"फाके के दिनों में परेशान न होंगे तो और क्या होंगे?"
"अपनी सरकार रहते यह नौबत न आएगी।"
"जो नौबत आनी थी, व तो आ चुकी है। अब तो जमीन जायदाद बिकने की तैयारी है।"
"जमीन जायदाद बेचने के नहीं, बनाने के दिन हैं यादवेंद्र, मगर मुझे खुद समझ नहीं आ रहा कि तुझे कौन-सा काम सौंपू, जो तेरे स्वभाव के अनुसार हो।"
"ये तो आपको ही सोचना होगा और जल्दी भी। कहीं ऐसा न हो कि आपके कुछ सोचने से पहले ही सरकार गिर जाए।"- यादवेंद्र ने दुखी होकर कहा।
"यार तुम भी कैसी मनहूस बातें सोचते रहते हो, भला ऐसा भी..." - अपनी बात को अधूरा छोडते मंत्री जी कुछ सोचने लगे, फिर कुछ क्षण के बाद बोले, "अरे सुन एक तरीका है पैसे कमाने का, पैसे कमाने का क्या, लूटने का कहो. करोगे तुम?"
"अंधा क्या चाहे दो आँखें।"
"तो समझो मिल गई तुम्हें तुम्हारी आँखें।"
"वैसे काम क्या है?" - यादवेन्द्र ने उतावले होते हुए पूछा।
"पोस्त-अफीम का।"
"नहीं, ये काम न होगा मुझसे।" - यादवेंद्र ने नेताजी के सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा।
"यार तुम भी कैसी बातें करते हो। अपनी सरकार में डर कैसा? नशे का व्यापार सत्ता के संरक्षण में ही चलता है और अब सत्ता हमारे हाथ में है, फिर तुझे बार्डर पार से समलिंग तो करनी नहीं है। अपने खेत मे बड़ा-सा हाल बनवा ले। वहीं सब स्टोर करना और आगे थोक में बेचना। साल में लखपति बन जाओगे।"
"पर…"
"पर-वर को मार गोली और आज से ही तैयारी शुरु कर दे। तू खेत में हाल बनवा बाकी का बंदोवस्त मैं खुद करवा दूँगा। काम चलाने के लिए आदमी भी भेज दिए जाएँगे। तुम्हें कुछ नहीं करना सिवाय अपनी जेबें भरने के।"
"पिता जी से बात कर लूँ एक बार।" - तुरंत निर्णय न ले पाने की स्थिति में खुद को पाकर यादवेन्द्र ने कहा।"
"ज़रूर, लेकिन डरने की कोई बात नहीं। मैं हूँ न साथ। मैं घर भी आऊँगा अंकल जी के पास, यदि वे नहीं मानेंगे तो उनको भी समझाएँगे। तेरी बहुत चिंता है मुझे और तेरे लिए मुझे इससे बढ़कर कोई काम नहीं दिख रहा फ़िलहाल।" - शंभूदीन ने उसे पुनः आश्वस्त किया।
यादवेंद्र पूरी तरह से सहमत हो गया हो ऐसा तो नहीं, लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था। पैसे तो कमाने ही हैं। मंत्री जी को प्रणाम करके वह वापस घर चल पड़ा, ताकि पिता जी से बात कर सके।

क्रमशः