युगांतर - भाग 10 Dr. Dilbag Singh Virk द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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युगांतर - भाग 10

मायके जाने का ख्याल भले उसे आया, लेकिन उसे पता था कि इस प्रकार मायके जाना अच्छी बात नहीं। 'पति-पत्नी में अगर तकरार हो जाए तो मायके का रौब नहीं दिखाना', यही तो सिखाया था उसकी माँ ने। वह खुद भी समझती थी कि रूठकर मायके जाने से रिश्ता नहीं निभ सकता। पति अब कैसा भी काम करता हो, अब उसका पति है। पत्नी के नाते वह पति से हर बात जानना चाहती है। पति की उसे चिंता है, इसीलिए वह पति से बात करना चाहती थी, उसे समझाना चाहती थी कि वे गलत कार्य न करें क्योंकि गलत कामों का नतीजा अच्छा नहीं होता, लेकिन पति का यह कह देना कि औरतों को हर बात बतानी ज़रूरी नहीं, ने उसे बहुत आहत किया था और इसीलिए उसके मन में मायके जाने का ख्याल आया, यह जानते हुए भी कि यह कभी हकीकत नहीं बनेगा। तभी रजवंत ने आवाज दी, "बेटी जरा पानी देना।"
"आई मम्मी!" कहकर रमन सासू माँ के कमरे की तरफ चल पड़ी। पानी पकड़ा कर वह वहीं बैठ गई। उदासी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। रजवंत ने उसे परेशान देखकर पूछा, "क्या बात है बेटी?"
"कुछ नहीं मम्मी।"
"यादवेंद्र कहाँ है?'
"अभी बाहर वाले घर की तरफ गए हैं।"
"यादवेन्द्र क्या कह रहा था?" - माँ को यादवेंद्र की ऊँची आवाज सुनाई दी थी और उसका लहज़ा गुस्से वाला था, हालांकि उसे सुना कुछ नहीं था, लेकिन उसे लग रहा था कि वह पत्नी से नाराज होकर गया है।
"बस यूँ ही..." - रमन ने बात छुपाते हुए कहा।
"गुस्सा हो रहा था न।" - अपनी बात की स्वीकृति चाहते हुए उसने पूछा
"हाँ।"
"क्यों?"
"जब आप गिर गई थी तो मैं उस तरफ चली गई थी, वे इसीलिए डाँट रहे थे कि मैं उधर न जाया करूँ।"
चाहती तो रजवंत कौर भी यही थी, लेकिन साफ-साफ मना करने को ठीक नहीं समझती थी। यादवेंद्र इतनी सी बात से गुस्सा था या बात कुछ और थी, यह जानने के लिए उसने कहा, "इसमें गुस्सा होने वाली कौन सी बात है। अपना घर है, अपने पशुओं की देखभाल के लिए भी जाना पड़ ही सकता है। आने दे यादवेंद्र को, मैं पूछूँगी कि रमन क्यों नहीं जा सकती उधर।"
"नहीं, मम्मी, बात इतनी सी नहीं। दरअसल उधर जो ट्रक आया हुआ था, तो मैंने उसके बारे में जानना चाहा था।"
"फसल बेचनी होगी।" - माँ ने अनजान बनने का नाटक किया।
"नहीं, मम्मी, दरअसल मुझे लगा कि पैकटों में कुछ ऐसा सामान था, जो ठीक नहीं।" - रमन ने भी अधूरा सच बोला, क्योंकि उसको पता था कि पैकेट अफीम के हैं। आखिर वह विज्ञान की छात्रा रही है।
"इस बारे में यादवेंद्र ने तुझे पहले नहीं बताया।" - माता जी ने भी अब सुर बदल लिया।
"नहीं, और मुझे इसी बात का गुस्सा है कि एक तो उन्होंने मुझसे ये सब छुपाया और जब मैंने पूछा तो बोले कि औरतों को ऐसी बातें नहीं बताई जाती। मम्मी क्या एक पत्नी को पति के हर राज़ का राज़दार नहीं होना चाहिए?" - रमन की आँखों से आक्रोश टपक रहा था
"बिल्कुल होना चाहिए। पति-पत्नी में पर्दा कैसा। यह हर बात को सांझा करने का बंधन है।" - माँ ने सहमति दी।
"मैंने उनसे कहा कि कमाई का यह साधन अच्छा नहीं है तो बोले तुम्हें सलाह देने की जरूरत नहीं।"
"आने दे उसे मैं समझा दूँगी कि पत्नी से यूँ लड़ना ठीक नहीं।"
"नहीं मम्मी, मुझे इस बात का गुस्सा नहीं, बस यह काम...।" - उसने अपनी बात को अधूरा ही छोड़ दिया।
"समझाया तो हमने भी बहुत था मगर वह माना ही नहीं। कहता है मंत्री जी यह काम करवाते हैं, हमें तो कमीशन मिलता है।"
इतना में यादवेन्द्र भी आ गया। रमन को बैठा देख वापिस लौटने को हुआ ही था कि रजवंत ने आवाज दी, "आओ बेटा, बैठो। मैंने तुमसे एक बात करनी है।"
"क्या बात है?"
"तुम रमन से लड़ते क्यों हो?"
"मैं कहाँ लड़ता हूँ, ये खुद ही मेरे काम में टाँग अडाती है।"
"बेटा तेरी पत्नी है वह और पत्नियाँ कामों में टांग नहीं अडाया करती, पति का साथ दिया करती हैं। तुम इसे अपनी बातें बताओगे, तभी तो यह तुम्हारा साथ देगी। पति-पत्नी को कोई भी बात एक-दूसरे से छुपानी नहीं चाहिए।"
"क्या छुपाया है मैंने?" - यादवेंद्र ने अनजान बनते हुए कहा।
"यही अपने धंधे के बारे में।"
"यदि बताया होता, तो पहले भी यही होना था।"
"नहीं होता फिर, तुम विश्वास तो करो इस पर।" फिर वह रमन का हाथ पकड़ कर बोली, "बेटा, नसीब अच्छा है हमारा, जो हमें इतनी अच्छी बहू मिली, अब तो यही इच्छा है कि मरने से पहले पोते का मुँह देख लूँ।"
रमण ने शर्माते हुए कहा, "मम्मी ऐसी बातें क्यों करती हो, अभी आपको हुआ ही क्या है, जो अभी से मरने की बात सोचती हो।"
"मरना तो सभी को है बेटी।"
सासू माँ की बातें सुनकर उसका गुस्सा उतर चुका था। धंधा अच्छा है या बुरा, इससे भी उसका ध्यान हट चुका था। 'पत्नी से हर बात सांझी की जानी चाहिए' माँ से यह स्वीकृति पाकर वह धन्य हो गई थी। उसने अपने पति की तरफ देखा। वह सिर झुकाए बैठा था। उन्हें इस तरह गुनहगार की तरह नजर झुकाए बैठे देखकर रहा-सहा गुस्सा भी गायब हो गया। वह सोचने लगी कि मैं भी कितनी पागल हूँ, जो जरा सी बात पर मायके जाने की सोचने लगी थी। भला ऐसे भी घर चलते हैं। बात को खत्म करने के लिए वह बहाना ढूँढने लगी और फिर याद करते हुए बोली, "जी, आपने तो अभी तक रोटी भी नहीं खाई।" '
"खाता हूँ, वह उधर..." - यादवेंद्र से कोई जवाब देते न बन रहा था।
"खाना लाऊँ?"
"हाँ ले आओ।" - यादवेन्द्र में रमन की तरफ देखा। उसकी आँखों में प्यार था। उसे माँ की बात सच लग रही थी कि 'पत्नी पति के कामों में टाँग नहीं अड़ाती, साथ दिया करती है।' और यह सोचकर वह खुश भी था और अपने आप पर गुस्सा भी हो रहा था।
धीरे धीरे सब कुछ सामान्य होने लगा। दिन बीतते गए। राजवंत-प्रताप की अब एक ही तमन्ना थी कि पोता-पोती उनके आँगन में खेलें। हर उम्मीद की तरह यह उम्मीद भी जल्दी ही पूरी हो गई। घर में एक गुलाब खिला। माँ-बाप खूबसूरत थे, तो बच्चे को भी खूबसूरत होना ही था। दादा-दादी के लिए तो एक खिलौना घर में आ गया। प्रतापसिंह को उम्मीद थी, कि यह लड़का बड़ा होकर खूब यश कमाएगा, इसलिए इसका नाम 'यशवंत' रखा गया। दादी तो हर वक्त उसे अपने पास रखती थी। उसके लिए अपने आप को संभालना भी मुश्किल था, मगर वह इस नन्हीं जान को बड़ी खुशी से संभालती थी और इसी खुशी के लिए तो वह जी रही थी। इसे पाकर अब इससे दूर रहना कैसे संभव था, मगर बीमार व्यक्ति के लिए जैसे अधिक गम हानिकारक होते हैं, वैसे ही अधिक खुशी भी हानिकारक होती है। रजवंत भी इस खुशी को सहन न कर पाई और इस संसार से दूसरे संसार की ओर कूच कर गई और छोड़ गई एक उदासी। यह उदासी प्रतापसिंह के लिए अधिक थी। हंसों के जोड़े में से एक का जाना दूसरे को अन्दर ही अन्दर तोड़ रहा था। रजवंत और प्रताप सिंह सच में ही दो जिस्म एक जान थे। उनमें कभी भी किसी भी बात को लेकर झगड़ा नहीं हुआ। जो एक कहता दूसरा उसे मान लेता। रजवंत के जाने का दुख प्रतापसिंह सहन नहीं कर पाए और उन्होंने अब चारपाई पकड़ ली और ऐसे पकड़ी कि फिर उठ न पाए। साल भर में ही घर की दशा बदल गई। खुशियों की बरसात के बाद गम का सूखा आन पड़ा। बच्चा आने की खुशी, माँ-बाप के चले जाने का गम लेकर आई। वे तीन से पाँच हुए ही थे कि फिर तीन रह गए।
यादवेन्द्र ने माँ-बाप दोनों की मृत्यु पर भोज दिए, धार्मिक रस्में पूरी की। समाज की रीतियों की यह अजीब विडम्बना है कि मृत्यु के शोक पर भी भोज दिए जाते हैं। शायद इन रिवाजों में सार्थकता कम है और ढकोसला अधिक है। मृत्यु पर इस प्रकार के भोज का आयोजन भी प्रतिष्ठा का द्योतक है। हर व्यक्ति ऐसे भोजों पर बढ़ चढ़कर पैसे खर्च करता है। यादवेन्द्र भी पीछे रहने वाला कहाँ था। अपार दुख के क्षणों में भी वह प्रतिष्ठा बढ़ाने में लगा हुआ था। उसका दुख दिखावा नहीं, अपितु वास्तविक है, क्योंकि उसे अपने पिता से अत्यधिक प्रेम था। उम्र के अन्तराल के कारण अक्सर पिता-पुत्र में जो तकरार दिखाई देती है, उसका उनके घर में नामो-निशां न था। पिता सिर्फ पिता नहीं, अपितु उसके दोस्त भी थे। पिता की मृत्यु के बाद वह अकेला हो गया क्योंकि यशवंत तो अभी बच्चा था। रमन को वह चाहकर भी अपना सहयोगी न बना पाया था। सहयोगी न समझने कारण यह नहीं था कि उसे औरत की स्वतंत्रता मंजूर न थी, बल्कि यह था कि उनके विचारों में समता न होने पाई थी। सास (रजवंत) की बातों का पालन करते हुए उसने पति का विरोध करना तो छोड़ दिया था, मगर सहयोग करना अभी उसे नहीं आया था, खासकर जब बात नैतिकता की आती और राजनेताओं का नैतिकता से दूर का रिश्ता भी नहीं होता। विरोध की बजाए वह अब खामोशी धारण करने लगी थी, मगर उसकी यह समझदारी भी उनका दुर्भाग्य बन गई। खामोशी धीरे-धीरे उनके जीवन का अंग बन गई। बोलचाल ही तो पति-पत्नी के सम्बन्धों को मजबूत बनाता है और उसका खामोश रहना, गिला-शिकवा न करना घर को महज सराय बना रहा था, यहाँ दोनों रैन-बसेरा कर रहे थे। जब घर, घर न रहकर सराए बन जाता है, तब घर से खुशियाँ ऐसे ही दूर भागती हैं, जैसे कोई चोर पुलिस से भागता है।

क्रमशः