जादुई मन - 9 - स्त्री पुरूषों में आकर्षण क्यों होता है ? Captain Dharnidhar द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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जादुई मन - 9 - स्त्री पुरूषों में आकर्षण क्यों होता है ?

पंचतन्मात्रा की साधना के बारे मे पिछले अध्यायों में हमने चर्चा की थी ।

आकर्षण के हेतु -
रूप, रस , गंध , स्पर्श, शब्द ये पंच तन्मात्रा है
रूप - इसकी ज्ञानेन्द्री नेत्र हैं । इसमें सौन्दर्य के प्रति आकर्षण आजाता है । शारीरिक सौन्दर्य जन्मजात हो या प्रसाधनो द्वारा हो आकर्षण का हेतु बन जाता है । अलंकार धारण व उद्वर्तनादि सौन्दर्य वृद्धि मे सहायक होते हैं । बाह्य रूप का दर्शन वैराग्य को राग मे बदल सकता है । अतः रूप देखने का कार्य नेत्रों द्वारा होता है । नेत्रों द्वारा ही भाव कुभाव बनते हैं । मानव मन मे एक विद्युत प्रवाह सा दौड़ने लगता है । यदि मन का संयोग नेत्रों से अपने विवेक से हटा दिया जाये , मन को हानि लाभ गिनाये जाये तो संभवतः वह प्रवाह अवरूद्ध हो जायेगा ।
दूसरा पहलू - पुरूष नारी सदृश किशोरों को देखकर भी उन्मत्त हो सकता है । यहां यह विचारणीय बात है की मैने स्त्री से मन हटा लिया है किशोर के प्रति मेरा आकर्षण हो रहा है तो मेरा ब्रह्मचर्य बना रहेगा , यह धारणा गलत है । क्योकि नेत्र किशोर मे वह सुख ढूंढ रहे है ।
अपनी प्राण ऊर्जा का क्षरण किसी भी प्रकार से न हो ऐसा यत्न करना पड़ेगा ।
शरीर में ऊर्जा का निर्माण हमारे आहार से होता है वे आहार भी त्याज्य है जिनसे ज्ञानेन्द्री उत्तेजित होती हो । बिन्दु त्राटक या दीपक की लौ पर ध्यान का अभ्यास करने से व अंतर त्राटक भ्रकुटी मध्य मे करने से विवेक शक्ति भी मजबूत होती है । सौन्दर्य देखकर भी मनोभाव को दिशा दी जा सकती है ।
पंचतन्मात्रा मन के अधीन हैं पर इन पर विवेक का अंकुश जरूरी है वर्ना विश्वामित्र की तरह अर्जित सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है । और पुनः लंबे समय तक अभ्यास करना पड़ता है । जैसे विश्वामित्र ने पुनः साधना की थी ।
रस - इसकी ज्ञानेन्द्री जीभ है । सुस्वादु भोजन की लालसा या स्त्री सौन्दर्य रस पान की लालसा बाधक बनती है ।
गंध - इसकी ज्ञानेन्द्री नासिका है उत्तम गंध की लालसा इसमे बाधक बनती है । स्त्री यौवन गंध पान की लालसा बंधन का कारण बनती है ।
शब्द - इसकी ज्ञानेन्द्री कान है मधुर शब्द मधुर वाणी इसमे उद्वेलित करने में कारण बनती है ।
नुपुर ध्वनि या चूड़ियों की खनक मन को झंकृत करती है यह इस तरह बाधक बनती है ।
स्पर्श - इसकी ज्ञानेन्द्री त्वचा है त्वचा से सुकोमल स्पर्श की अनुभूति का स्मरण मन को रहता है । सुकोमल काया के स्पर्श सुख की स्मृति मन मे उद्दीपन का कार्य करती है ।
अतः रूप सौन्दर्य को देखने मात्र से पांचो तन्मात्राओ का बोध ज्ञानेन्द्रियां मनको तुरंत करा देती हैं । यह बोध ही इतना प्रबल होता है की स्त्री पुरूषो मे आकर्षण का हेतु बनता है ।

भंवरा गंधपान का सुख भोगने को लालायित हो कमल की पंखुरी मे बंद होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । सूर्यास्त होने पर कमल की पंखुड़ियां बंद हो जाती हैं । भंवरा गंध की मस्ती मे मस्त हो जाता है उसे पता ही नही चलता कि वह पंखुड़ियों मे बंद हो रहा है ।


पतंगा अग्नि के रूप को देखकर उसे पाने की इच्छा से खिंचा चला आता है और जलकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।

हिरण शब्द की स्वर लहरी से खिंचकर चला आता है इतना मुग्ध हो जाता है उसे यह ज्ञान ही नही रहता कि वह शिकार हो जायेगा ।

हाथी स्पर्श सुख की चाह मे मदोन्मत्त हो जाता है हथिनी को पाने के लिए अपने बच्चे तक की हत्या कर देता है । या महावत द्वारा गढे मे गिरा लिया जाता है ।

चींटी गंध सुख के कारण मधु मे गिरकर अपनी जान दे देती है ।
मीन जल के बिना नही रह सकती वह जल के बिना मर जाती है ।

ये जितने जीव है ये तो सिर्फ एक एक ज्ञानेन्द्री के दास है परन्तु उस मनुष्य का क्या जो पांच पांच ज्ञानेन्द्रियो का दास है । स्त्री ईश्वर की ऐसी कृति है जिसमे रूप रस गंध शब्द स्पर्श पांचो एक ही जगह मिल जाते हैं । स्त्री पुरूष ऋण व धन आवेश की तरह है । जिस प्रकार चुंबक लोहे को खींचता है जब तक मिलन नही हो जाता तब तक खींचतान चलती रहती है ।
मै कामोपभोग की वर्जना नही करता किन्तु साधना पक्ष को ध्यान मे रखकर यह बात कही है । आध्यात्म कहता है पति पत्नी संतानोत्पत्ति के निमित्त ही संसर्ग करे वर्ना दोनों संयमित जीवन जीये।