नो ड्यूज़ Prabodh Kumar Govil द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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नो ड्यूज़

देखो ये अनार कितना सुंदर है? कितना लाल, कितना सुनहरा... खिला- खिला। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हुए प्रज्ञा ने अनार को हाथ में लेकर फिरकी की तरह घुमाते हुए कहा।
- इसे रख लो, कल काम में लेना... प्रतीक बोला।
ये सुनते ही प्रज्ञा बुझ गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने उफनते दूध पर पानी के छींटे मार दिए हों। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कल आने वाले प्रतीक के दोस्त इम्तियाज़ में ऐसी क्या ख़ास बात है जिसके लिए प्रतीक तीन दिन से इतना उत्साहित है। इतना खुश और सचेत तो उसने प्रतीक को पहले कभी तब भी नहीं देखा जब प्रज्ञा के घर वाले या प्रतीक के ही ऑफिस वाले डिनर पर आए हों। बल्कि पिछले माह जब प्रज्ञा की मम्मी बनारस से आई थीं तो कितनी ही बार प्रज्ञा ने रसोई में कुछ नया पकाते हुए प्रतीक की उपेक्षा ही झेली थी। पूछने पर कह देता - कुछ भी बना लो, ज़्यादा भूख तो है नहीं। यह सुनकर प्रज्ञा के साथ- साथ उसकी मम्मी भी संकोच से गढ़ जातीं और प्रज्ञा कोई नई डिश छोड़ कर वही दाल- सब्ज़ी- रोटी पकाने में जुट जाती।
लेकिन इस बार बात कुछ और ही थी। प्रज्ञा दो- तीन दिन से देख रही थी कि प्रतीक अपने दोस्त की खातिरदारी की प्लानिंग में सब कुछ भूला हुआ था...वो वाली क्रॉकरी निकाल दो जो दीदी ने गिफ्ट की थी, दही घर में जमाना बाज़ार का अच्छा नहीं होता, चिकन मैं "बाइट" से लाऊंगा, फ्रूट - सलाद में काले अंगूर ज़रूर डालना..
प्रज्ञा हैरान थी। ठीक है कि प्रतीक का दोस्त बीस साल बाद उससे मिल रहा था, लेकिन था तो दोस्त ही न... फिर ऐसी क्या बात थी जो प्रतीक उसके आने की ख़ास तैयारी में खुद भी हलकान था और प्रज्ञा को भी हिदायतों में पैक किए जा रहा था। एक बार तो प्रज्ञा उल्टा- सीधा भी सोच बैठी - इम्तियाज़ के साथ उसकी पत्नी भी तो आ रही है, कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं?
कुछ भी हो, लड़के खाने - पीने की बातों पर इतना ध्यान कहां देते हैं, प्रतीक तो ऐसे तैयारी में लगा है जैसे किसी बड़ी पार्टी का आयोजन हो। दो ही लोग तो आ रहे हैं। प्रज्ञा ने तो दस- दस लोगों को घर पर ही खाना बना कर खिलाया है। कभी किसी को मीन- मेख निकालने का मौक़ा नहीं दिया। हमेशा उसकी कुकिंग और सलीके की तारीफ़ ही हुई है। कभी प्रतीक को यह सब करने - सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ी। फिर इस बार ऐसी क्या बात है जो प्रतीक एक- एक चीज़ को ख़ुद देख रहा है और प्रज्ञा पर अविश्वास करके खाने की तैयारी में भी दखल दे रहा है...ये बनाना, वो पकाना, ये मंगा लेना, वैसे परोसना... करते हुए प्रतीक ने दो जनों के लिए किलो भर तो ड्राई - फ्रूट्स ही लाकर रख दिए।
क्या बात है, प्रतीक का दोस्त इतना पेटू है क्या? या उसे दो - चार साल से भरपेट खाना नहीं मिला? या फिर प्रतीक और वो पार्टनरशिप में साथ मिलकर कोई होटल खोलने वाले हैं? प्रज्ञा मन ही मन सारी संभावनाओं को इस तरह देखती जाती जैसे मटर छील रही हो।
इम्तियाज़ कई साल से दोहा में था। पढ़ाई पूरी होते ही यहां से दुबई गया फिर कतर की राजधानी दोहा में शिफ्ट हो गया। प्रतीक उसके बारे में कभी - कभी कुछ सामान्य बातें बताता था, खास कर जब उसकी शादी का निमंत्रण आया तब काफ़ी बातें हुईं। शादी में तो वो लोग नहीं जा सके क्योंकि शादी वहीं हुई, पर लड़की ज़रूर इंडिया की ही थी। आजकल वो लोग भारत आए हुए थे और अब अपनी पत्नी रुखसाना के साथ इम्तियाज़ एक दिन के लिए उन लोगों से मिलने जयपुर भी आ रहा था। वैसे उनका घर चेन्नई में था।
प्रज्ञा का दिमाग़ उसे इस बात का कोई जवाब नहीं दे पा रहा था कि प्रतीक अपने बचपन के दोस्त की खातिरदारी को लेकर इतना सतर्क क्यों था? बचपन के दोस्त तो मिलने पर बातों से पेट भरते हैं। उन्हें खाने- पीने की सुध ही कहां रहती है, वे अतीत में गोते लगाते हैं, बीती हुई युवावस्था की खुशबू एक दूसरे की आंखों में सूंघते हैं, आप- बीती के किस्से कहानियां एक दूसरे के गाल पर अबीर - गुलाल की तरह मलते हैं। मगर यहां तो माजरा ही कुछ अलग था। प्रतीक ऐसे तैयारी कर रहा था जैसे निकट भविष्य में उसका प्रमोशन ड्यू हो और उसका बॉस खाने पर आ रहा हो।
"इम्तियाज़ अहमद अंसारी, इंजीनियर" इस नाम से कोई ऐसी छवि तो नहीं बनती थी कि वो कोई भोजन- भट्ट होगा जो केवल खाने- पीने पर ही सारा ध्यान देगा। प्रज्ञा ने उसकी तस्वीर भी देखी थी। वह पहलवानों जैसे डील - डौल वाला भी न था कि उसकी पंसेरी खुराक हो। वह तो मासूम से दमकते चेहरे वाला एक खूबसूरत नौजवान दिखता था। प्रज्ञा की उलझन सुलझने का नाम ही नहीं लेती थी पर वह प्रतीक के इशारों पर तैयारी में लगी थी।
आख़िर इम्तियाज़ और उसकी पत्नी आकर चले गए। वर्षों बाद मिले ये दोनों दोस्त। शाम को चार बजे वो आए, और रात को ग्यारह बजे की उनकी वापसी की फ्लाइट थी चेन्नई की। मुश्किल से कुछ घंटे मिले। उसमें भी दोनों मित्र कमरे में इस तरह घुसे रहे कि उन्हें न शाम होने का पता चला और न रात गहराने का। नाश्ता खाना सब ऐसे ही रखा रह गया।
मुश्किल से दो- तीन चम्मच बिरयानी खाई इम्तियाज़ ने, फिर नेपकिन से हाथ पौंछ कर झट दोनों दोस्त जा घुसे कमरे में गप्पें लड़ाने। इधर प्रज्ञा और रुखसाना भी एक दूसरे से ऐसे मिलीं जैसे बरसों पुरानी सहेलियां हों। दोनों घंटों बातें करती रहीं। कॉफी के प्याले भी दो - चार सिप के बाद ऐसे ही रखे रहे।
प्रज्ञा को रुखसाना ने बताया कि इम्तियाज़ प्रतीक को कई बार याद करता है। बचपन की उसकी बातें बताता है। दोनों स्कूल के दिनों में हॉस्टल में एक साथ रहे थे। कई साल तो रूम पार्टनर्स भी रहे।
रुखसाना ने प्रज्ञा को एक किस्सा सुनाया जो उसने अपने पति से सुना था। ये दोनों पंद्रह साल की उम्र में जब हॉस्टल में एक साथ रहते थे तो इनके स्कूल में एक फंक्शन था। उसमें प्रतीक को कल्चरल प्रोग्राम में रवींद्रनाथ टैगोर की कविताएं पढ़नी थीं। प्रतीक बचपन से ही पढ़ने के लिए चश्मा लगाता था। इम्तियाज़ ने ऐसे ही मज़ाक करने के लिए कार्यक्रम से कुछ देर पहले प्रतीक का चश्मा छिपा दिया। प्रतीक अपना नाम अनाउंस होने पर स्टेज पर चला तो गया, मगर जब टैगोर की कविताओं का कागज़ एक हाथ में ले, दूसरे हाथ से चश्मे के लिए जेब टटोली तो उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। उसने बदहवास होकर चश्मा इधर - उधर ढूंढा और न मिलने पर रूआंसा हो गया। इम्तियाज़ डर गया और डांट के भय से उसकी हिम्मत ही नहीं हुई कि स्टेज पर आकर सबके सामने प्रतीक का चश्मा लौटाए। प्रतीक की खूब किरकिरी हुई। तीन- चार मिनट उहापोह में बिताकर उसे स्टेज से ऐसे ही वापस लौटना पड़ा।
दोनों महिलाएं किस्से का मज़ा लेकर देर तक खिलखिलाती रहीं...तो ऐसी थी इनकी दोस्ती।
मेहमान जब रात को एयरपोर्ट के लिए निकल गए, तो प्रज्ञा जैसे प्रतीक पर झल्ला ही पड़ी। उसने रसोई में बर्तन खोल- खोल कर उसे बचा हुआ खाना दिखाया और लगभग चिल्लाते हुए बोली - देखा, सारा खाना ऐसा का ऐसा पड़ा है, कुछ नहीं खाया। प्रज्ञा बोलती जाती थी और खीजती जाती थी।
प्रतीक चुपचाप सिर झुकाए सब सुनता रहा। रात को सोने के लिए जब दोनों बेडरूम में आए, तब तक भी प्रज्ञा का गुस्सा उतरा नहीं था। वह थकी भी थी अतः चुपचाप मुंह फेरकर लेट गई।
प्रतीक ने उसके कंधे पर हाथ लगाकर उसका मुंह अपनी ओर घुमाया और उसे ये किस्सा सुनाने लगा - जानती हो, जब हम दोनों स्कूल हॉस्टल में रहते थे तब मुझसे मज़ाक- मज़ाक में ही एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी। रमजान का महीना शुरू हुआ था। इम्तियाज़ ने रोज़ा रखा। वार्डन ने मैस के वर्करों को रात को ही कह दिया था कि सुबह चार बजे ही नाश्ता तैयार कर दें और जब इम्तियाज़ आए तो उसे खिला दें। इम्तियाज़ घड़ी में सुबह साढ़े तीन बजे का अलार्म लगा कर सो गया। रात को एक बार मेरी नींद खुली तो मैं पानी पीने के लिए उठा। मुझे न जाने क्या सूझा, मैंने मज़ाक करने के लिए घड़ी का अलार्म बदल कर सुबह पांच बजे का लगा दिया और सो गया।
सुबह मेरी आंख खुली तो इम्तियाज़ आंखें मलते हुए खिड़की में खड़ा सूरज को देख रहा था जो काफ़ी ऊपर आ चुका था। वह समय पर मैस में नहीं जा सका था और फिर दिन भर के लिए उसे बिना कुछ खाए- पिए रहना पड़ा। मुझे मन ही मन बहुत पश्चाताप हुआ मगर वार्डन की डांट के डर से मैं किसी से कुछ न बोला।
आज मुझे ऐसा लग रहा था कि मुझे अपनी भूल सुधारने का मौक़ा मिला है तो मैं इम्तियाज़ को दुनिया भर का खाना लाकर खिला दूं...।
प्रज्ञा झटके से उठ बैठी। उसने तत्काल कमरे की लाइट जला दी। वह प्रतीक की आंखों में गहराई से देखने लगी जहां आंसू थे।
प्रज्ञा ने अलमारी से वह गिफ्ट- पैकेट निकाला और तेज़ी से उसे खोलने लगी जो इम्तियाज़ प्रतीक को देकर गया था। सुंदर से बॉक्स में एक सुनहरा चश्मे का केस था, बेहद कीमती...!
छोटा सुनहरा केस प्रतीक की आंखों में झिलमिलाने लगा। प्रज्ञा को लगा जैसे बरसों बाद दो मित्रों ने ज़िंदगी का कर्ज़ चुका दिया हो।
वह बत्ती बुझा कर प्रतीक के करीब आ लेटी।
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