नक्षत्र कैलाश के - 27 Madhavi Marathe द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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नक्षत्र कैलाश के - 27

  

 

                                                                                                  27

किसी के साथ झगडे होने कारण उनके मन खेदपुर्वक क्षमाप्रार्थी हो गए। कोई किसी से गिला शिकवा नही रखना चाहता था ,क्यों की ऑक्सिजन की कमी ,हायअल्टिट्यूड़ के कारण अपने मन पर नियंत्रण ना रहा होगा यह बात समझ सकते थे। आदमी कभी बुरा नही होता, बुरे होते हैं हालात , इतनी समझ ,परिपक्वता सब में थी।

इसके बाद इमिग्रेशन का काम पूरा हुआ। चिनी अधिकारी लोग थोडा हँसकर बात करे तो अच्छा लगेगा ऐसे लग रहा था। उनके रूखे बर्ताव के कारण हम परदेस में हैं यह बात चुभन सी लग रही थी। अब हमारे गाईड़ भी बदलने वाले थे। कम समय में दृढ रिश्ता बनानेवाले और फिर कभी भी ना मिलने वाले ,कठिनाईयों से भरे वातावरण में अनज़ान वादीयों, रास्तों में साथ निभानेवाले गाईड़ हमसे विदा लेने के लिए आ गए थे। खाना खाने के बाद साथ में बाते करने बैठ गए। हर एक ने गाईड़ को याद के तौर पर कुछ ना कुछ दे दिया। पैसों की दुनिया से बेखबर यह लोग मन से अमिर थे। प्राकृतिक सौंदर्य , शारीरिक क्षमता ,कठिनाई भरे वातावरण में जीने की उम्मीद ,दुसरों की सहायता करने की आदत यह उनका स्थायी भाव था। इन्होंने किसी के साथ कोई बदतमीजी नही की थी। लालच नही दिखाया था। जीवनभर के लिए हम इनके शुक्रगुज़ार रहेंगे। सदिच्छा भेंट खत्म करते हुए वहाँ से चली आ गई। सबके मन को अब मातृभुमी आकर्षित करने लगी।

आज सुबह पाँच बजे ही निकलना था। ठंड़ तो बहुत थी, लेकिन खुशी के कारण सब के चेहरे खिले हुए थे। एक दुसरे से सहायता करने की होड़ लगी । परदेस का आखरी चाय नाश्ता खत्म करते हुए हम गाडी में ज़ा बैठे। सामान तो पहले ही चढा दिया था। यहाँ से एक चीनी इमिग्रेशन अधिकारी साथ आता हैं। बॅच हँड़ओव्हर करता हैं। एक साथ प्रार्थना गीत गाते हुए लिपु पास लाँघने के लिए सिध्द हो गए। तिबेट के समयानुसार सुबह पाँच बजे और भारतीय समयानुसार सुबह तीन बजे हमने तकलाकोट छोड़ दिया। अभी सुर्योदय नही हुआ था। गाडी अब छोटी नदी पार कर रही थी। तभी यकायक एक पत्थर से वह अटक गई। ऐसी घटनाऐं सफर में होती रहती हैं इस कारण किसी ने इतना ध्यान नही दिया। ड्रायव्हर ठंडे पानी में उतरते हुए गाडी निकालने की कोशिश करने लगा। लेकिन पत्थर हिलने का नाम नही ले रहा था। सुबह की बेला ,ठंडी हवाँऐं , बर्फ जैसा पानी ऐसी स्थिती में ड्रायव्हर लगातार कोशिश कर रहा था। बस पानी में थी इस कारण नीचे कोई उतरा नही पर अब एक एक करते सबको नीचे उतारा गया । बस पूरी खाली हो गई फिर भी वह हिलने का नाम नही ले रही थी। ठंडे पानी में पैर जमने लगे। शरीर कपकपाँने लगा। अंत में पुरूष लोगों ने एक दुसरे का हाथ पकड़ कर जंजीर तैयार कर दी और एक एक करते नदी से पार कर दिया। हमारी राह देख रहे घोडेवाले ढुंढते हुए यहाँ तक पहुँच गए। फिर घोडों को रस्सी बाँधकर खिंचने का प्रयास किया गया। लेकिन सब व्यर्थ। हमें पहुँचने में तीन घंटे की देरी हो गई थी। पानी में खडे रहते ही सामान निकालकर घोडों पर चढा दिया और हम पैदल चलने लगे। आगे का सफर पैदल करना अनिवार्य हो गया। लिपुपास की 2 कि.मी. की दूरी लाँघते हुए बर्फ की ढ़लान लाँघनी पड़ती हैं। छोटे पगडंडियों के रास्ते से गुजरते, बीच बीच में बर्फ से भरे चमकीले पर्बतों के दर्शन हो रहे थे। फिर कभी ऐसी वादीयाँ देखने,नसीब में हैं या नही पता नही, इसीलिए जी भर के वह नज़ारा देख रही थी। लिपुपास लाँघने में 11 बज गए। सात बजे पहुँचने वाली हमारी बॅच 11 बजे तक ना पहुँचने के कारण, भारतीय सरहद्द पर रूकी हुई बॅच को बहुत तकलिफ उठानी पड़ी। चायपानी नही,खुले आँसमान के नीचे वह ठंड़ और थकान से से बेहाल हो गए। रात को दो बजे वह बॅच निकल चुकी थी। । जोरदार हवाँ के बहते एक जगह खडा रहना मुश्किल हो गया था। इतने में हम लोग दिखाई दिए तो उनके आनन्द का ठिकाना न रहा और हम तो मातृभुमी में प्रवेश कर रहे थे, तो हमारा आनन्द भी आँसमान छु रहा था।

हमारे साथ आए गाईड़, अधिकारीयों से साश्रुपूर्ण विदाई ली। क्या ऋणानुबंध होंगे, की इतने कम समय में कुछ लोग अपनेसे लगने लगते हैं। उनसे विदाई लेते आगे निकलनेवालीही थी इतने में मेरा पोर्टर सामने आकर पैर पड़ते हुए बोला “माँजी सँभलकर ज़ाना और हमे याद रखना” ऐसा कहते हुए आँसु छिपाते चला गया। माया तेरी अजब कहानी ऐसा सोचते हुए मैं आगे बढने लगी। तभी हमारे भारतीय पोर्टर्स, घोडेवाले सामने आ गए। कैसी स्थिती से मन गुजर रहा था। कुछ छुटने का गम ,कुछ बिछडे हुए मिलने का आनन्द ,हँसे या रोए ? फिर घर के कोई रिश्तेदार मिल ज़ाए ऐसी भावना उमड़ने लगी। अंदर से हँसी फुटने लगी। अपने मिट्टी का गंध लुभाने लगा।“कैसे हो गए दर्शन ? अच्छे हो गए ना ? आपका घोडा आपकी राह देख रहा हैं।“ ऐसी अपनेपन की बाते सुनकर खुशी हुई। बाते करते करते यात्रा आगे बढने लगी । अगला पड़ाव नाभीढांग का था। पिछे देखते हाथ हिल रहे थे, एक मोड़ आया और सब अदृश्य हो गया। अब माया ने हमारे सामने नया परदा खोला था। आज घरवालों से बात करना मुमकीन था। चिरपरिचीत आवाँज कानों में गुंजनेवाली थी। एक हसीन चाँदनी मन में समा गई।

 एक तरफ ठंड़ तो एक तरफ धूप ऐसे बीच में हम चल रहे थे। फुलों से भरा नज़ारा सामने आने लगा। हरियाली, झरने,पर्बतों की नक्काशी, लुभावना नीला आँसमान ,उड़ते पंछी ऐसा परिपुर्ण चित्र दिखाई दे रहा था। जल्दी ही नाभीढांग पहुँच गए। कँम्प पहुँचते मैं तो बगिचे में बैठ गई। पिछे की घटनाएँ सपनें जैसे लग ही थी। वहाँ काम करते लोगों ने प्यार से हँसते हुए चाय की प्याली हाथ में थमा दी। मानो हमारी शारीरिक, मानसिक अवस्थाओं से वह वाकिफ थे। कितनी देर तक मैं वहाँ बैठी रही। यही से ओम पर्बत के दर्शन हो ज़ाते हैं। कैलाश ज़ाते समय भी ओम के दर्शन नही हुए और आज भी दर्शन होने के आसार नजर नही आ रहे थे। दोपहर के बाद आँसमान में बादल छा ज़ाते हैं तो वातावरण धुंदला हो गया था। ऐसे लगा के मंदिर तो गए पर नंदी के दर्शन ना हो पाए। मन में खयाल आ गया ठीक हैं अगली बार देखेंगे। इस बात पर होठों पर हँसी आ गई। मन ने तो फिर से आने की तैयारी भी कर ली। खाने का समय हो गया तब अंदर चली गई। 17 दिनों बाद भारतीय खाने का स्वाद चख रही थी। कितना अच्छा लग रहा था। कैसे आदत से मजबूर होते हैं हम। बाद में फोन करने चली गई । कुछ लोगों की बाते हो भी गई थी। मन में एक लहर सी दौड़ गई। पहिले फोन पर पती से बात की । मुझसे बात करने का आनन्द वह छुपा नही पा रहे थे। यात्रा सफल हो गई,कैलाश दर्शन हो गए इस बात से धन्य हो गए। मनिषा, महेश, मेधा, शामा,माधवी सब से बाते हो गई। हर एक के स्वर में स्वागत की भावना  थी। कैसे, कब कहाँ की जिग्ज्ञासा थी। समय के अभाव के कारण वही बात खत्म करनी पडी। चीन में प्रवेश करते समय नाभीढांग के लॉकर में जो सामान रखा हुआ था वह सब वापिस मिल गया। आगे चलने का इशारा होते ही सब आगे बढने लगे। थकान के कारण घोडे पर बैठकर ही सफर शुरू किया। कालापानी ज़ाते ज़ाते कुछ गुफाएँ नजर आ गई। कितने तपस्वीयों ने यहाँ साधना की होगी ? जल्दी ही कालापानी पहुँच गए। ITBP के जवान ,पोर्टर, अधिकारी साथ में थे। यहाँ भारत का चेकनाका हैं। पासपोर्ट पर भारतीय स्टँप लगाते हुए वह क्रिया पूर्ण हो ज़ाती हैं। मैं कमरे के तरफ बढ गई, बुखार जैसे महसूस होने लगा था। कभी नींद से उठे ही नही ऐसी क्षीणता में आँख लग गई। कितनी देर हुई पता नही क्षितिज की आवाँज कानों में आ गई। कही दूर से कोई पुकार रह हो ऐसा आभास होने लगा। मेरा चेहरा देखकर क्षितिज घबरा गई, डॉक्टर को लेकर आती हूँ कहने लगी। किसी तरह उसे रोकते हुए मैं  बिस्तर पर बैठ गई। क्षितिज चाय लेकर आ गई और दो क्रोसिन देते हुए मेरे पास बैठ गई। थोडी देर के बाद मेरे ज़ान में ज़ान आ गई। क्षितिज ने बताया की “अपने स्वागत के लिए काली मंदिर में एक कार्यक्रम आयोजित किया हैं आप आ सकोगे?” धीरे धीरे मैं उसके साथ मंदिर चली गई। मंदिर में सब बैठे हुए थे। प्रथम कैलाशधिपती की प्रार्थना करते हुए स्वागत किया गया और यात्रा की यशस्विता पर बधाई देते हुए कैलाशयात्रा समाप्ती की घोषणा कर दी। कैलाश रूप का एक स्मृति चिन्ह हरेक यात्री को प्रदान किया गया। सच में यात्रा समाप्त हो गई इस बात पर यकीन नही हो रहा था। एक बरस तक आव्हानात्मक यात्रा पूरी करने का जोश मन पर सवाँर था। कितनी कल्पनाओंसे मन गुजरा, फॉर्म भरना हैं,मेरा चुनाव होगा के नही,बाद में रिजेक्ट तो नही करेंगे ,ट्रीप की शारीरिक,मानसिक,भावनिक,आर्थिक,तैयारी करते करते पूरा साल बीत चुका था।

(क्रमशः)