स्वीकृति - 14 GAYATRI THAKUR द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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स्वीकृति - 14

बड़के चाचा के इस दावे से, कि पिछले 2 दिन से होटल के उस कमरे में जो महिला बंद पड़ी थी उसे वह जानते है, वह उनकी ही परिचित हैं , पुलिस वाले ने राहत की सांस ली कि चलो.., इस मामले से जल्दी ही निपटारा मिल जाएगा और अधिक मेहनत करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, इधर होटल मैनेजर ने भी चैन की सांस ली कि जैसे भी करके यह मामला यहीं शांतिपूर्वक सुलझाया जा सकता है, उसे किसी भी सूरत में होटल की बदनामी नहीं चाहिए थी...
 
होटल के उस कमरे के दरवाजे पर खड़े बड़के चाचा पर उस महिला की नजर जैसे ही पड़ी उसने घबराकर अपने दोनों हथेलियों से अपने चेहरे को ढक लिया लेकिन उसका रोना...सुबकना जारी रहा, उसके इस हालत को देख बड़के चाचा का कलेजा पसीज गया ..,मन द्रवित हो उठा,कमरे के अंदर आ कर उसे ढांढस बंधाने हेतु वे उसकी तरफ मुखातिब हुए ही थे कि.…...,
" आप इन्हें कैसे जानते हैं..?',' पुलिस वाले ने नजरें तिरछी करते हुए एक दनदनाता सा सवाल चाचा जी की ओर उछाल फेंका.
 
''जी , ये मेरे छोटे भाई की समधन है...,मेरा मतलब है कि इनकी बेटी मेरे घर की बहु है.... मेरे भतीजे से उसकी शादी हुई है...'' ,चाचाजी ने अपनी बातों को स्पष्ट करने के भाव से कहा.
 
"ठीक है, ठीक है..., लेकिन है तो आपकी रिश्तेदार ही न ....'', पुलिस वाला अपने मूछों पर ताव देते हुए चाचाजी को सिर से पांव तक निहारने लगा मानो जैसे कुछ तलाश रहा हो और उसके द्वारा ढुंढी जा रही वह चीज चाचा जी ने छुपा रखी हों और जब उसकी तलाश खत्म हो गई उसने वापस एक और सवाल उछाल फेंका, '' आप करते क्या हैं..मेरा मतलब आपका पेशा.., आपका काम क्या है?'',
 
" जी , मैं वकील हूं '', चाचा जी ने बेहद शांत और संक्षिप्त सा उत्तर दिया '',
 
"और आप इस होटल में कितने दिनों से ठहरे हुए हैं?"
" जी, तीन दिन.., मैं पिछले तीन दिनों से यहां हूं, "
" और फिर भी इनसे आपकी मुलाकात नहीं हुई....!, एक ही होटल में रहते हुए आपने इन्हें देखा तक नहीं..! भला यह कैसे मुमकिन है?.. हमें बेवकूफ समझ रखा है क्या..,''पुलिस वाला चिल्ला पड़ा.
 
"देखिए आप बेमतलब मुझे इस मामले में घसीट रहे हैं... शायद, आपने ठीक से सुना नहीं, मैं एक वकील हूं, समाज का एक प्रतिष्ठित और जिम्मेदार नागरिक.." इतनी देर तक शांत और संयमित खड़े चाचा जी ने भी अब अपनी आवाज ऊंची कर दी.
 
" बेशक होंगे आप वकील…! लेकिन इस बात से आपको अपराध करने का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता...,सच ..सच बताइए यहां क्या चल रहा था, वरना..!
 
" वरना क्या.. क्या कर लेंगे आप..'', चाचा जी ने भी ठीक उसी के अंदाज में गरजते हुए पूछा.
''देखिए इस बात को और अधिक खींचने का कोई फायदा नहीं .., होटल मैनेजर बात हाथ से निकलता देख अचानक ही बीच बचाव करते हुए बोल पड़ा, ..'' इन सबसे बदनामी अपकी ही होगी, '' उसका इशारा चाचाजी की ओर था ,
"अच्छा यही होगा कि इस बात को आपसी सहमति से यही खत्म कर दिया जाए ..., वैसे, मेरा ख्याल है इन्हें फिलहाल आराम की जरूरत है.. होटल मैनेजर का इशारा उस महिला की ओर था, " इन्हें और परेशान करना उचित नहीं..., आप लोग जब तक चाहे रूके .., इनकी स्थिति में सुधार होने पर जा सकते हैं " , होटल मैनेजर ने उदारता दिखलाई.
" हां.., हां.., यही उचित रहेगा..'', पुलिस वाले ने भी विनम्रता दिखाई .., और फिर वे दोनों चाचा जी को उसी कमरे में छोड़ बड़े ही शिष्टता पूर्वक वहां से चल निकले.
 
सुष्मिता की मां या फिर ताराचंद की पत्नी , शायद उसकी यही इतनी सी ही पहचान थी और इन्हीं दायरों में वह सिमटी हुई थी और वह दायरा सिकुड़ती हुयी और भी छोटी हो गई थी इतनी कि वहां से उठ पाना भी उसके लिए अत्यंत कठीन हों गया था, अपने चेहरे को अपने ही हाथों से छुपाती हुई वह चाचा जी के वहां से चले जाने की प्रतीक्षा कर रही थी, " आपको इस तरह चेहरा छिपाने की जरूरत नहीं, '' चाचा जी ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा. "आपके साथ गलत हुआ है .., आपने ग़लत किया नहीं है '' और फिर उन्होंने सामने के टेबल से एक ग्लास में पानी भर उसकी ओर बढ़ा दिया ," कृपया आप खुद को सजा मत दें ''
मै नहीं जानता आपके साथ क्या हुआ है... लेकिन इतना तो जरूर है कि आपके साथ कुछ तो बहुत ग़लत हुआ है, खैर, वह जो कुछ भी है यदि आपकी इच्छा हो तब ही बताइएगा वरना रहने दें,..''
क्रमशः
_गायत्री ठाकुर.