स्वीकृति - 10 GAYATRI THAKUR द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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स्वीकृति - 10

स्वीकृति 10


निरंजन संदीप को अपने साथ चलने के लिए कहता है परंतु संदीप उसके साथ चलने से इनकार कर देता है. तब निरंजन उससे जोर देते हुए कहता है, "अगर तुम्हें सच में काम चाहिए ..तो, तुम मेरे साथ चलो . मैं तुम्हें ऐसी जगह ले जाऊंगा ..जहां तुम्हें तुम्हारे उम्मीद से भी ज्यादा पैसे मिलेंगे ...''

"लेकिन ,भाई मेरे..., वो ऐसी कौन सी जगह है , जहां तुम मुझे लेकर जाना चाहते हो? तुम्हारी बातों से तो ऐसा लगता है , मानों कि जैसे .., तुम्हें अलादीन का कोई चिराग मिल गया है .. या फिर कहीं कोई गड़ा हुआ खजाना हाथ आ गया...! ऐसा कौन सा काम मिल गया तुझे ? " संदीप निरंजन को बीच में ही टोकते हुए आश्चर्य के भाव से पूछता है.


"भाई! ना तो मुझे ऐसा कोई चिराग मिला है और ना ही खजाना. परंतु मैं जो काम कर रहा हूं उसमें पैसे काफी मिल रहे है.. तुम यूं समझ लो..,कि आम के आम और गुठली के भी दाम जैसी वाली बात है ......, और फिर काम का क्या है... काम तो आखिर काम होता है... , चाहे जैसा भी काम है जीने के लिए करना पड़ता है.. पेट की भूख ऐसी चीज है जिसके खातिर वह सब कुछ करना पड़ता है....,जिसे करने के लिए आपका मन.. आपका अंतरात्मा आपका साथ नहीं देता...," इतना कहने के साथ ही निरंजन एक गहरी श्वास छोड़ते हुए संदीप की ओर इस उम्मीद से देखता है कि शायद वह अब उसके कहने का तात्पर्य समझ गया हो.


"क्या तुम्हारा यह काम ..,मेरे पूछने का अर्थ है...., जिस काम का तुम्हें इतना पैसा मिल रहा है..वह सम्मानजनक तो है ना..? मेरा मतलब है, कहीं तुम किसी गलत धंधे में तो नहीं....! क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं तुम्हें भी उसी दिन काम से निकाला गया था जिस दिन मुझे निकाला गया था. इतने कम समय में तुम्हें ऐसा कौन सा काम मिल गया…, जबकि मैं अभी तक काम की तलाश में हूं...,नौकरी की तलाश में अभी तक इधर-उधर भटक रहा हूं . परंतु , तुम्हें देख कर ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है.... , मेरे भाई! इसलिए सवाल पूछ रहा हूं .."संदीप ने अपनी चिंता जाहिर की.


"सम्मान.., प्रतिष्ठा.., यह सब सिर्फ सामाजिक सत्य है, सिर्फ किताबी सच्चाई परंतु इन सबके ऊपर एक कड़वी सच्चाई है...,एक वास्तविक सत्य हैं जिसे इस देश की व्यवस्था ने दिया है वह है बेरोजगारी ..,पेट की भूख..,यही एक मात्र ऐसा सत्य है जिसके आगे यह तमाम सामाजिक सत्य घुटने टेक देते हैं पेट की आग के ज्वाला में यह सारी बड़ी-बड़ी बातें सभी कुछ जलकर राख हो जाती हैं.. , इमानदारी, सच्चाई.. ऐसे बडे़ बड़े शब्दों को गढ़ने वाले लोग शायद अपनी बीमार मां के इलाज के लिए पैसे ना जुटा पाने की विवशता...,उस तकलीफ.., उस दर्द को महसूस नहीं किए होगें.और ना ही इलाज के अभाव में अपनी मां को दम तोड़ते हुए देखा होगा...खैर, छोड़ो ...,मैं तो तुम्हारी बस मदद करना चाह रहा था .आगे तुम्हारी मर्जी ,अगर साथ चल सको तो अच्छा ..परन्तु, काम क्या करना है ..इसे जानने के लिए तुम्हें एक बार मेरे साथ वहां चलना ही होगा, सारी बातें मै तुम्हें यहां पर नहीं समझा सकता...तुम साथ चलकर एक बार देख समझ लो, तुम्हारा मन हो तो ही करना. कोई जबरदस्ती नहीं है... , आगे तुम्हारी इच्छा...", और फिर निरंजन संदीप को वही खड़ा छोड़ टैक्सी में बैठने के लिए आगे की तरफ बढ़ जाता है .


निरंजन टैक्सी में बैठने ही वाला था कि उसके सामने संदीप आकर खड़ा हो जाता है और बोलता है, "ठीक है ..,मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार हूं ."और फिर वे दोनों ही साथ साथ टैक्सी में बैठ कर वहां से चल देते हैं .


निरंजन टैक्सी वाले को 'लाजपत नगर ' चलने के लिए कहता है.

उस भीड़ भाड़ वाले दुकान के अंदर आकर सुष्मिता को थोड़ी देर के लिए शान्ति का एहसास होता है. जिस घबराहट और डर के बीच से निकलकर वह आयी थी,अपने आसपास के इस भीड़ और कोलाहल के बीच भी उसे एक अजीब तरह की शांति का अनुभव हो रहा था, उसने आहिस्ते से नज़र उठाकर दुकान के बाहर देखा, दुकान के बाहर उसे एक विचित्र तरह का शख्स खड़ा दिखा, यह विचित्रता उस शख्स के वेशभूषा उसके पहनावे में थी, जिसे भीड़ में भी दूर से पहचाना जा सकता था. बाहर खड़े उस शख्स ने अपने आँखों पर काले रंग के धूप का चश्मा चढ़ा रखा था और काले रंग की बड़ी सी टोपी पहनी हुई थी, उसकी लंबी घनी दाढ़ी उसके सीने को छू रही थी , उसकी सघन लम्बी काली दाढ़ी के बीच के कुछ सफेद बाल ऐसे प्रतीत होते थे मानों छोटे छोटे सफेद धागे उलझे हुए हो, जिसे देखकर उसके अधेड़ उम्र के होने का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता था. बाहर खड़ा वह शख्स मोबाइल फोन पर किसी से बातें कर रहा था , उसने अपने बायें हाथ से फोन को पकड़ कर अपने कानों से सटा रखा था सुष्मिता की नजर उसके उंगलियों पर जाकर ठहर जाती है, उसने अपने पांचों उंगलियों में अंगूठी पहन रखी थी सुष्मिता की नजर उसके अंगूठे पर आकर रुक जाती है लाल पत्थर जड़ा हुआ वह बड़े आकार की अंगूठी सुष्मिता ने पहले भी कहीं देखी थी पर उसे याद नहीं आ रहा था कि उसने कब और कहां देखी थी . लेकिन, जल्द ही उसे कुछ याद आ जाता है ..


इधर फूफा जी को गाँव आए हुए काफी दिन हो गया था मंदिर के लिए चंदा एकत्रित करने के साथ साथ ही उन्हें पार्टी के आलाकमान के तरफ से एक और बेहद महत्वपूर्ण काम की जिम्मेदारी सौपी गयी थी और यदि वे उस काम को करने में सफल हो जाते तो उसके इनाम स्वरूप उन्हें कुछ बड़ा मिलने की उम्मीद थी. खबर थी कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पार्टी के तरफ से टिकट भी मिल सकती है. इस खबर में कितनी सच्चाई थी इसका तो पता नहीं परंतु इस खबर के मिलते ही फूफा जी पूरे जी जान से इस कार्य को करने में जुट गए थे.. उन्हें काम मिला था कि मंदिर के परिसर के विस्तार के कार्य में आने वाली उस समस्या का समाधान अत्यंत शांतिमय तरीके से करे , वे उन किसानों को किसी भी तरह से समझा बुझा कर अपनी जमीन देने के लिए राजी कर ले ताकि मंदिर परिसर के विस्तार का काम जल्द से जल्द पूरा हो सके...पर दिक्कत यह था कि परिसर विस्तार के कार्य के लिए वहां के किसान अपनी जमीन देने से इनकार कर रहे थे..जिन किसानों ने अपनी जमीन को देने से इंकार कर दिया था उन किसानो में फूफा जी का खुद का छोटा भाई भी था वह किसी भी हाल में अपनी जमीन को देने के लिए राजी नहीं थे. अत: फूफा जी के लिए यह काम अब काफी मुश्किल होता जा रहा था . उनका भाई बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं था वह अपना जमीन किसी भी हाल में मंदिर परिसर के विस्तार के लिए देने को तैयार नहीं थे यही कारण था कि फूफा जी का अपने छोटे भाई से काफी दिनों से अनबन चल रहा था. फूफा जी अपने छोटे भाई को मना पाने में असफल हो चूके थे और फिर ऐसे में जमीन को लेकर उनका अपने भाई के साथ यह विवाद बढता ही चला जा रहा था.


टैक्सी ड्राइवर ने श्रीकांत की ओर पैनी नजरों से देखा और उसके द्वारा समझाए गए रास्ते की ओर टैक्सी को आगे बढा दिया.


शाम का अंधेरा अब धिरे धिरे गहरा होता जा रहा था. श्रीकांत ने अपने मोबाइल पर उस अजनबी द्बारा भेजे गए तस्वीर को एक बार फिर से देखा उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नही आ रहा था .सुष्मिता की ऐसी हालत देखकर उसे अत्यधिक पीड़ा का अनुभव हो रहा था . उस तस्वीर में सुष्मिता किसी बंद कमरे में कुर्सी पर बेसुध बंधी पड़ी थी , उसके हाथों और पैरों को किसी मजबूत रस्सी से बांधा गया था . ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसे किसी अंजान जगह पर किसी बंद कमरे में कैद कर रखा हो....


क्रमशः


गायत्री ठाकुर