Golu Bhaga Ghar se - 26 books and stories free download online pdf in Hindi

गोलू भागा घर से - 26

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रहमान चाचा

अब गोलू पुलिस डी.आई.जी रहमान खाँ के सामने बैठा था और पास ही पुलिस इंस्पेक्टर भी था। रहमान खाँ गौर से गोलू का दिया हुआ नीला लिफाफा खोलकर अंदर के कागज पढ़ रहे थे। उनका चेहरा गंभीर, बेहद गंभीर था। बोले, “हमारे सैनिक ठिकानों के बारे में इतनी गोपनीय सूचनाएँ! यह लिफाफा आया कहाँ से तुम्हारे पास?”

“मुझे यह लिफाफा जर्मन दूतावास के एक अधिकारी को देना था। लिफाफा मिस्टर विन पॉल ने दिया था।” गोलू ने धीरे से कहा।

“कौन मिस्टर विन पॉल? तुम उसे कैसे जानते हो? उसने तुम्हीं को क्यों दिया?” मिस्टर रहमान ने गौर से उसे देखते हुए कहा।

“यह लंबी कहानी है। मैं अनजाने ही मि. विन पॉल के चक्कर में फँस गया था। मैं नहीं जानता था कि वहाँ ये सारे काम होते हैं।...आप मेरी पूरी कहानी सुन लीजिए रहमान चाचा। फिर आप खुद सारी बातें जान जाएँगे।” गोलू ने कहा।

और फिर उसने सक्षेप में मक्खनपुर से भागकर दिल्ली आने की...और फिर जिस तरह मिस्टर विन पॉल के चंगुल में फँसा, वह पूरी कहानी सुना दी।

डी.आई.जी रहमान खाँ गोलू की सारी बातें ध्यान से सुनते रहे। फिर बोले, “जिसने तुम्हें लिफाफा पकड़ाया था और अपना नाम रफीक भाई बताया था, पुलिस को उसकी कई मामलों में तलाश है। इसलिए वह भागा-भागा फिरता है और चोरी-छिपे तुम जैसे सीधे-सादे लड़कों को फँसाने के लिए जाल डालता है। बच्चों पर कोई शक नहीं करता, शायद इसलिए वे लोग जान-बूझकर बच्चों को फँसाते हैं। उन्हें आगे-आगे रखकर, पीछे अपना काला धंधा चलाते रहते हैं। पर तुमने सचमुच बहादुरी का काम किया है गोलू। ऐसी हिम्मत कोई-कोई कर पाता है। तुम्हारे भीतर देशभक्ति का जज्बा है, इसलिए तुम यह कर पाए! सच तो यह है कि देश के साथ गद्दारी करने से तो अच्छा है भूखा मर जाना।”

सुनकर गोलू रोमांचित हो गया। बोला, “माफ कीजिए, क्यों मैं आपको रहमान चाचा कहकर बुला सकता हूँ?”

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं?” कहकर रहमान चाचा ने गोलू की स्नेहपूर्वक पीठ थपथपाई।

फिर बोले, “तुम बहादुर बच्चे हो। मुझे उम्मीद है, तुम जीवन में कुछ बड़ा काम करोगे। बहुत आगे जाओगे।”

सुनकर गोलू को बड़ा अच्छा लगा। पर उसके मन में खुदर-बुदर चल रही थी। बोला, “रहमान चाचा, आपने इतना प्यार दिया, यह मैं कभी भूल न पाऊँगा। पर अब हमें जल्दी करनी चाहिए। कहीं अपराधी भाग न जाएँ। अब तक तो उन्हें पता चल गया होगा कि पुलिस का छापा पड़ने वाला है।”

“तुमने ठीक अनुमान लगाया।” रहमान चाचा बोले, “पर वे अब भागकर कहीं नहीं जा पाएँगे। पूरी दिल्ली की पुलिस को अलर्ट कर दिया गया है।”

फिर रहमान चाचा ने गोलू को अपनी कार में बिठाया। कुछ सिपाही और बड़े अधिकारी भी कार में बैठे। और फिर रहमान चाचा की कार किंग्सवे कैंप की ओर दौड़ पड़ी। पीछे-पीछे पुलिस के सिपाहियों को भी आने का आदेश दे दिया गया।

जैसा कि पहले ही अंदाजा था, मिस्टर विन पॉल और उनके साथी कोठी को खाली करके भाग गए थे। फिर भी छापा पड़ा तो बहुत-सी काम की चीजें पुलिस के कब्जे में आ गईं। उनसे अपराधियों के काले कारनामों के बारे में काफी कुछ पता चला। उनकी पहचान के बारे में भी और यह भी कि वे किन-किन लोगों से मिलकर काम करते थे। सूचनाएँ किन अधिकारियों से हासिल करते थे और उन्हें कहाँ-कहाँ पहुँचाते थे। मि. विन पॉल के संपर्कों का जाल कहाँ-कहाँ तक फैला हुआ था, ये सभी सूचनाएँ और नाम एक डायरी में मिल गए।...

सख्त पूछताछ हुई तो और भी काम की सूचनाएँ मिलती गईं। तीसरे दिन मि. विन पॉल समेत सभी अपराधियों को पकड़ लिया गया।

पुलिस ने जब गवाह के रूप में गोलू को आगे किया, तो सबकी हालत खराब हो गई। सभी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया।

इस बीच गोलू रहमान चाचा के घर पर ही रहा, क्योंकि रहमान चाचा समझ गए थे कि गोलू के प्राणों पर संकट मँडरा रहा है। अपराधी अपनी जान बचाने के लिए उसे मार भी सकते हैं।

रहमान चाचा और सफिया चाची गोलू को खूब प्यार करते। फिराक और शौकत उनके दो बेटे थे, जिनमें शौक बिल्कुल गोलू की ही उम्र का था। गोलू, फिराक और शौकत के साथ दिन भी खेलता और बातें करता रहता। वे उसका खूब जी बहलाते। फिर भी कभी-कभी गोलू को घर की याद आ जाती और वह रो पड़ता।

सफिया चाची उसे प्यार करते हुए कहतीं, “रो मत गोलू, तूने तो इतना बड़ा बहादुरी का काम किया है। अब तक तेरे माता-पिता को भी तेरी बहादुरी की खबर लग गई होगी। फिर भी तेरे रहमान चाचा कह रहे थे कि मैं गोलू को अकेले नहीं जाने दूँगा। खुद अपने साथ ले जाकर घर छोड़कर आऊँगा।”

अब तक इस गद्दारी और जासूसी कांड की पूरी अखबारों में छप चुकी थी। जिन भ्रष्ट अधिकारियों को इसमें लिप्त पाया गया, उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। इसी तरह विदेशी दूतावासों के जिन अधिकारियों को जासूसी में लिप्त पाया गया, उनकी सूची भारत सरकार ने जारी कर दी। उन्हें तत्काल देश छोड़ने का आदेश दिया गया।

अखबारों में गोलू की प्रशंसा में लेख छपे। उसकी तसवीर भी छपी। उसी शाम रहमान चाचा अपनी गाड़ी में गोलू को बिठाकर खुद उसके घर मक्खनपुर की ओर चल पड़े।

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