ये इश्क नहीं आसां Sushma Tiwari द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ये इश्क नहीं आसां

ऐसा कहा जाता है कि "जब इंसान प्यार में होता है तो थोड़ा ज्यादा जिंदा होता है" लेकिन राज और नन्दिनी के लिए, उनकी प्रेम कहानी ने उन्हें कई रंग दिखाए। उलझे हुए अपनी अपनी जिंदगी में सोचा इश्क उन्हें सुलझा देगा पर उनकी गिरहें आपस में यूँ उलझी की....

राज काफी समय पहले नन्दिनी से एक ब्रेकफास्ट शॉप पर टकराया था। वे दोनों रोजाना की तरह अपने अपने काम पर जा रहे थे और उस दिन काम पर देरी होने के वजह से ब्रेकफास्ट करने के लिए संयोग वश एक ही आउटलेट पर रुक गए... लेकिन नन्दिनी हमेशा की तरह झल्लाई हुई, आदतन, क्योंकि उसे पहले ही काफी देर हो चुकी थी और उसके बाद वो बिखर सी जाती थी। अपने बालों को मेसी बन मे बांधे, कान से फोन चिपकाए उसने फटाफट अपना ऑर्डर कलेक्ट किया और जाने के लिए जैसे ही मुड़ी, वह राज से जा टकराई जो ठीक उसके पीछे लाइन में खड़ा था। एक ही पल में उसने पूरी प्लेट राज के उपर बिखेर दी।



"हे भगवान! ये क्या किया मैंने... प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिए।" घबराई हुई वो माफ़ी मांगने लगी।

"नहीं नहीं... ठीक है, हो जाता है, कोई बात नहीं।" वह झुक गया और उसका बिखरा सामान उठाने में मदद करने लगा।

"आपका शुक्रिया, सच में.. एक बार फिर से माफ़ी चाहूँगी।" नन्दिनी ने कहा और सामान उठाया और चली गई।
राज एक पल को उसे देखता रह गया।

राज जब शॉप से बाहर आया तो नन्दिनी अब भी वहीं खड़ी थी।
"आप अब भी यहीं हैं?"

"मैं ...आप पर यूँ पूरा दाग लगने के बाद मैं ऐसे ही नहीं जा सकती थी।" नन्दिनी थोड़ी सकपकाई सी, सीधे अपनी बात कह गई थी।
ये एहसास उसे बाहर आने के बाद हुआ कि इस तरह से उसका व्यवहार कितना बुरा लगा होगा सामने वाले को। अपनी गलतियों को हर पर जीने वालों मे से थी नंदिनी तभी इतनी उलझी उलझी रहती थी।

"नहीं ठीक है। मेरी कार में एक एक्स्ट्रा शर्ट है, मैं चेंज कर लूँगा!"

"पक्का ना... आप ठीक हैं?"

"हाँ।"

"मैं ... मुझे माफ़ करें, एक बार फिर से।" नंदिनी ने कहा और चली गई। राज उसे जाते हुए देख रहा था और मुस्कुरा रहा था। नुकसान होने के बावजूद उसका मूड उतना खराब नहीं हुआ, जितना नुकसान करके नन्दिनी खुद पर बिफरे पड़ी थी।

नन्दिनी जो ऑफिस देर से पहुंची थी, उसे इसका इनाम मिल गया था और हर दूसरे दिन की तरह, देर से आने के लिए उसपर चिल्लाया गया और फाइलों का एक बड़ा सा ढेर और बहुत सारे असाइनमेंट मिल चुके थे।


"वाह! यही बाकी था... " नन्दिनी अपनी कुर्सी पर पसर गई।
"एक और दिन बकवास से भरा।"

"तुम्हे देरी क्यों हुई?" उसकी सहेली रेणु, जिसकी मेज ठीक उसके सामने ही थी, ने उससे पूछा।

नंदिनी ने आह भरी।
"मैं ... क्या बताऊँ यार कोई खास बात नहीं, वही चीजें, रोज का है मेरा तो।"

बिलकुल सही। नन्दिनी के लिए हर दिन हमेशा एक जैसा लगता था।
उसे काम से, घर वापस जाना पड़ता था, कभी-कभी मौका मिला तो क्लब और मॉल चली जाती थी। ऐसा लग रहा था कि उसका जीवन बिना किसी दिशा गोल गोल घूम रहा है।

खैर उसका दिन खत्म होते होते, उसे थका हुआ और हमेशा की तरह उनींदे छोड़ फिर अगले दिन आने के लिए चल दिया। उसने अपनी चीजें उठाईं, जिन जरूरी फाइलों पर उसे काम करने की जरूरत थी और घर जाने के लिए निकल पड़ी। घर जाते हुए उसे खुशी इस बात की रहती थी कि कम से कम, वह अपने घमंडी बॉस से दूर थी और खुल कर सांस ले सकती थी।

नन्दिनी बेपरवाह मजे से गाड़ी चला रही थी और उसके फोन की घंटी बजी तो उसने उसी बेपरवाही से उस तक पहुंचने की कोशिश की जिस चक्कर में ब्रेक लगाने के बावजूद उसकी गाड़ी किसी की कार से टकरा गई। वह कार से उतरी, उसकी आँखें दहशत से भर गईं।
"हे भगवान! क्या अब मेरे हाथो कत्ल भी हो गया...!" वह चिल्लाई, उस गाड़ी में उसे ड्राईवर स्टीयरिंग व्हील पर नहीं दिखा।

दरअसल वह कार से उतर आया था।

"अरे ठीक है, मैं हूँ...नहीं लगी... तुम प्लीज चिल्लाना बंद करो" उसने उसकी ओर देखा।

"आप!" वे दोनों चिल्लाए।

"सुबह ब्रेकफास्ट शॉप... " उसने एक राहत की साँस ली और फिर मुस्कराई।

"तुम हमेशा ही इतनी लापरवाह हो, है ना?" वो हँसा।

"मैं ... मैं बहुत शर्मिंदा हूँ सच।" वह सोचने के लिए रुकी। "एक मिनट... हमेशा लापरवाह? आपका क्या मतलब है?
हम केवल दो बार टकराए हैं।"

"चलो, रहने भी दो।" वह मुस्कराया।

"हाय! मैं राज हूँ।"

"मैं...नंद... हे भगवान! अपनी कार को तो देखो, मैंने इसका सत्यानाश कर दिया।"

राज नन्दिनी के साफ व्यवहार से इम्प्रेस हो चुका था, वह मुस्कराया। "जाने भी दो बस कुछ खरोंच है।"

"मैं..." नन्दिनी वापस अपनी कार में गई और एक कार्ड ले आई।
"यहाँ, मुझे बाद में कॉल करिए और हम आपकी कार की मरम्मत के बिल पर बात करेंगे।"

"अरे नहीं..." फिर राज ने कुछ सोचकर खुद को रोक लिया।
"ज़रूर।"
नन्दिनी ने ध्यान नहीं दिया कि दो मुलाकात में राज आप से तुम तक का सफर तय कर चुका था।
उसके बाद वे बाद में अपने अलग रास्ते चले गए और राज ने उसे कुछ दिनों तक कार्ड रहते हुए भी कॉन्टेक्ट नहीं किया।
फ़िर एक दिन...
"हे ब्यूटीफुल! "

"गुड मॉर्निंग।"

नन्दिनी ऑफिस जाने की तैयारी कर रही थी और उसका फोन उसके कान और कंधे के बीच में था। "कौन…?"

"राज। उस दिन ब्रेकफास्ट शॉप में। क्या तुम …?"

"अरे हाँ, याद आया, मैं आज ही हिसाब करती हूँ।" नन्दिनी ने आह भरी।
"आपने मुझे कार रिपेयर का बिल देने के लिए कॉल किया है, है ना?"

"अरे यार, रहने भी दो। चलो आज दोपहर या शाम को मिलते हैं जो भी तुम्हें सूट करे।" राज ने कहा।

"शाम?"

"शाम को पक्का ना नन्दिनी?"

"आप पहले से ही मेरा नाम जानते हैं?"

"कम ऑन! यह तुम्हारे कार्ड पर लिखा है।"

"ओह्ह्ह्ह्ह्..... वह हँसी।
"मैं सच मे भूल गई कि मैंने तुम्हें कार्ड दिया था।"
इस खूबसूरत मुलाकात के बाद राज और नंदिनी अक्सर मिलने लगे, एक-दूसरे को ऑफिस से पिक अप किया , डेट पर गए, एक-दूसरे के साथ का आनंद लिया और देखते देखते उन्हें एक दूजे से प्यार हो गया। यह इतनी तेजी से हुआ कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वे कब नाइट आउट करने लगे और एक दूसरे के फ्लैट पर कई दिन बिताने लगे।

नंदिनी अब कम लापरवाह हो गई, उसे कोई ऐसा मिल गया जिसे वह चाहती थी और खुश रहती थी। इससे पहले वह हमेशा अपने बॉस, अपनी दिनचर्या और यहाँ तक कि अपने जीवन की हर चीज से नफरत करती थी। उसके पास किसी भी चीज़ की कोई प्लानिंग नहीं होती थी और वह कुछ भी सही करने के लिए बहुत ही बेतरतीब हो गई थी।

राज जो हमेशा कोमल और नरम स्वभाव और अंतर्मुखी रहा था, लेकिन नन्दिनी के साथ, उसने कुछ अलग महसूस किया। कभी भी उसके जैसा किसी को ना देखा या ना ही किसी से दोस्ती रही थी। नन्दिनी के साथ ही उसके कुछ दोस्तों से राज की दोस्ती भी हुई। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वह उससे और अधिक जुड़ गया कि उसने उसे अपने साथ रहने के लिए मना लिया। नन्दिनी ने राज के साथ रहने की स्वीकृति तो दी लेकिन अपना अपार्टमेंट किराए पर नहीं दिया। वह वीकेंड पर या राज से नोक-झोंक होने पर वहाँ वापस आ जाती थी। नन्दिनी एक सेफ लकीर के इर्द-गिर्द ही रहती थी।


समय के साथ उनकी प्रेम कहानी अलग हो गई। नन्दिनी के देर से आने या राज के फोन नहीं उठाने जैसी छोटी बातों पर उनके बीच व्यर्थ के तर्क वितर्क और निरर्थक झगड़े होने लगे। समय के साथ चीजें बदतर होती गईं क्योंकि राज का नन्दिनी के लिए प्यार एक जुनून में बदल गया था। वह नहीं चाहता था कि उसके आस-पास के लोग, उससे बात करें या उसे सिद्दत से देखे भी।

"तुम्हारी समस्या क्या है, राज?" नन्दिनी ने एक दिन उससे पूछा।

"तुम सब जानते हुए मुझसे ये पूछ रही हो!"

"हाँ बिल्कुल! मैं तुमसे साफ सुनना चाहती हूँ राज मैं थक चुकी हूँ... जो लोग मेरे करीब आते हैं, उनके साथ तुम्हारा आपे के बाहर आकर व्यवहार.. तुम जो करते हो कभी उसपर सोचा है शांति से।" नन्दिनी परेशान हो उठी थी।

"ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।"

"तुम्हें क्या लगता है प्यार क्या है?" उसने पूछा।
"तुम्हें लगता है कि प्यार सिर्फ एक साथ रहने, बिस्तर या कमरा साझा करने और हमेशा रोमांस में डूबा रहना है?"

"नहीं, मैं..." राज उसके करीब चला गया। "ऐसी बात नहीं है…"

"मुझे मत छुओ राज!"

"अच्छा, वाह!... लेकिन और लोग छू.... "

"राज!" नन्दिनी घृणा से चीख उठी।
"यदि तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं तो मुझे यकीन है कि हमारे बीच ये जो कुछ भी है यह प्यार नहीं है और मैं ऐसे रिश्ते में नहीं बंधना चाहती जो मेरी आत्मा को धिक्कारने लगे।"

वह जाने के लिए मुड़ी तो राज ने उसका हाथ पकड़ लिया, और उसे आगोश में भर लिया। ये वो जगह थी जहाँ हर बार नन्दिनी पिघल जाती थी और इस बार भी यही हुआ। एक रात की नई सुबह और दोनों ने खुद को वापस वहीं पाया जहाँ उन्होंने शुरू किया था। उनके विषाक्त संबंधों का मूल जड़ उनका ही ये समझोता बन गया। उनके लिए, एक साथ वापस करीब होने से उस पल के लिए वो समस्या हल हो जाती थी, वो हर अपमान भूल जाते थे।


जिस तरह से उनका रिश्ता बना, उससे वे दोनों सहज नहीं थे, लेकिन चीजों को बदलने के लिए उन्होंने कोई मजबूत प्रयास भी नहीं किए।

राज एक शाम घर लौटा, गुस्से में क्योंकि वह अपनी जॉब से हाथ धो चुका था उसने चारो ओर देखा नन्दिनी नहीं दिखाई दी तो पारा गर्म होकर चढ़ गया!
कुछ देर बाद नन्दिनी आई तो दोनों में फिर से झगड़ा हुआ। नन्दिनी टूट गई थी। इस बार उसने भावनाओ में बहने से खुद को रोक लिया। हर बार के झगडे का अंत राज का जुनूनी प्रेम या बस यूँ ही माफी मांग लेना नहीं हो सकता था।

वह चुपचाप अपने फ्लैट पर लौट आई। उसने ध्यान दिया इस बार वो काफी दिनों बाद लौटी थी। घर बिखरा हुआ छोड़ गई थी पिछली बार, आज बिखरे रिश्ते के साथ लौटी थी। पिछली बार अचानक ही राज अपनी ऑफिसिअल ट्रिप बीच में छोड़ आया था और वो हमेशा से ही नन्दिनी को आँखों के सामने पाना चाहता था।
बीती यादो के बोझ तले थकी हारी नन्दिनी बिस्तर पर पसर गई।
सुबह कई बार बज रही फोन की घण्टी से नन्दिनी की नींद खुली।

"बोलो राज.. क्या हुआ?" नन्दिनी ने आह भरते हुए कहा। वो खुद को समान्य रखते हुए बात कर रही थी ।
"क्या तुम अब भी नाराज़ हो?"

"नहीं, मैं ठीक हूँ। मुझे लगता है राज मैं तुमसे दूर रहकर ज्यादा खुश हूँ। तुम्हें क्या दुख हो रहा है कि इसबार मेरे दिल को बिना ज्यादा छलनी तुमने जाने दिया!"

"नहीं! प्लीज नन्दिनी मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहता…कल की बात भूल जाओ!"


"हाँ सही कहा राज.. भूल जाते हैं, मुझे लगता है हमे एक ब्रेक लेना चाहिए। "

"क्या? क्यों…? मैं माफी मांग रहा हूँ ना यार!"

"ये हमारी बेहतरी के लिए है।"

"मतलब तुम मुझे अपनी जिंदगी से निकाल रही हो, छुटकारा पा रही हो मुझसे!"

"पता नहीं राज! बस यही बेहतर होगा कि हम इस विषाक्त रिश्ते से बाहर निकलना ही होगा, ये हमे अंदर ही अंदर खा रहा है... "

"मुझे माफ कर दो।" राज गिड़गिड़ा रहा था इस उम्मीद से कि नन्दिनी इस कठोर फैसले को बदल दे।

"इसके लिए अब बहुत देर हो चुकी है। चलो एक ब्रेक लेते हैं आखिर पता तो चले कि हम वास्तव में इस रिश्ते से चाहते क्या हैं?"

"प्लीज मेरे साथ ऐसा मत करो... "

"हम ब्रेक अप नहीं कर रहे हैं, राज... बस अभी ब्रेक ले रहे हैं। प्लीज अब बार बार खुद को और मुझे परेशान मत करना!" नन्दिनी ने कहा और फोन रख दिया।

राज के अंदर भी कुछ टूट सा गया, खुद से वादा किया अब कम से कम वो नन्दिनी को और परेशान नहीं करेगा, जैसे वो चाहे वही होगा।



दो महीने बाद…

राज और नन्दिनी को रिलेशनशिप से ब्रेक लिए हुए दो महीने हो चुके थे। हालाँकि वे लगातार एक-दूसरे के बारे में सोचते रहें और चाहकर भी अपने दिल में उठ रहे भावनाओ की ज्वारभाटा से ब्रेक नहीं ले पाए थे, लेकिन लिए गए प्रण अनुसार वे न तो आपस में बात करते थे और न ही मिलते थे।
हालाँकि अपनी नॉर्मल जिंदगी में अब वे दोनों ऐसे काम करते थे जो वे सामान्यतः कभी नहीं करते थे, भरी महफिल में भी वे खोए हुए और सुस्त दिखते क्योंकि पिछली कुछ ही दिनों के भीतर एक दूसरे की आदत बन चुके थे। शायद वे एक-दूसरे के बिना जीना ही भूल गए थे पर साथ रहना भी दम घोंटता था। कोई कड़ी अब भी इन्हें जोड़े हुए थी तो वह उनके कॉमन फ्रेंड्स जो अब भी दोनों से मिलते थे और उनके इस निर्णय का सम्मान - सर्मथन भी कर रहे थे। कुछ चीजे टूट कर भी खूबसूरत दिखती हैं इसलिए अलग होने पर भी उनका जीवन ठीक ठाक ही चल रहा था ।


जो अच्छा हुआ उसमे से एक यह था कि अब राज ज्यादातर सोच-समझ कर फैसले लेता और अंतर्मुखी स्वभाव से बाहर आकर खुलकर दोस्तों से बात करता था, उनकी अच्छी सलाह पर अमल भी करता था। उधर नन्दिनी भी अपने जीवन के महत्वपूर्ण हिस्सों में बदलाव कर रही थी। अपने जीवन को, घर को, काम को व्यवस्थित कर रही थी और उसका बॉस काम के प्रति उसके लगन को देख कर इतने कम समय ही उससे प्रभावित हो रहा था। नई चीजे करना, नई जगह घूमना जैसे वह खुद को ही फिर से तलाश रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि राज के साथ उसके बिगड़े रिश्ते में उसका भी उतना ही हाथ था। खुद की उलझन को इतना खुला छोड़ा था जिसमें उसका प्यार भी उलझ कर रह गया।

रेणु ने पार्टी रखी तो नन्दिनी मना नहीं कर पाई आने से। वैसे भी राज से ध्यान हटाने के लिए वो हर सम्भव प्रयास कर ही रही थी।

"अरे! तुम कमाल लग रही हो!! थैंक्स आने के लिए, मेरी पार्टी मे चार चांद लगा दिए तुमने! " रेणु ने नन्दिनी को गले लगा कर कहा।
नन्दिनी ब्लैक कलर की साड़ी में सचमुच तारों भरी रात सी चमक रही थी।

"वाह चार चांद.. क्या उपमा दी.. कहाँ है बाकी तीन चांद... ।" नन्दिनी कहते हुए रुक गई। उसकी नजर रोहित पर पड़ी। राज, रेणु, नंदिनी और रोहित... उनकी चौकड़ी का चौथा शख्स, रेणु का होने वाला मंगेतर जो राज का भी खास दोस्त बन चुका था। उसने नन्दिनी को इशारे से अभिनन्दन किया। वो समझ गई अगर रोहित है तो राज भी होगा ही।


नंदिनी मुस्कुराई और रोहित के पास बैठ गई। "तुमने मुझे नहीं बताया कि तुम उसे भी बुला रहे हो?"

"हम दोनों तो अब भी दोस्त हैं तो मैं क्यों नहीं बुला सकता? खैर मैं कोई पुरानी बात नहीं छेड़ूंगा।"

"जो भी हो... छोड़ो जाने दो!" नन्दिनी ने वेटर को इशारा कर अपने लिए कुछ खाने को मंगा लिया।

पार्टी में बज रहा गाना...
" तेरी आँखों के दरिया का
उतरना भी ज़रूरी था
मोहब्बत भी ज़रूरी थी
बिछडना भी ज़रूरी था

उसके अंदर कुछ तोड़ रहा था। उसे लगा इसी पल वो इस जगह से दूर चली जाए।

अचानक उसे किसी ने कन्धे पर थपकी दी। जैसे ही वह मुड़ी, उसने राज को देखा।

"तुम!" खाना उसके गले में आ फँसा।

"क्या तुम ठीक हो, नन्दिनी?" राज घबरा कर बोल बैठा और रोहित ने नन्दिनी के पीठ पर थपकी दी।

"तुम जाओ!!" नन्दिनी धीरे से चिल्लाई, जोर से खांसने से या किसी और कारण उसकी आंखें नम हो आई थी।

"तो क्या अब हम दुश्मन भी हैं?"

"नहीं दुश्मन तो नहीं, फिर भी देखो तो, तुमने बिना छुए मेरा गला घोंट दिया और भोलेपन से सवाल पूछ रहे हो?" नन्दिनी ने खुद को संभालते हुए कहा। जैसे कुछ था जो बाहर आना चाहता था, एक घुटन को आजादी चाहिए थी, फोन पर की गई बातचीत में कोई कितना तोड़ता एक दूजे को।

हालाँकि इसके आगे वह अपने मुंह से शब्द नहीं निकाल पा रही थी। राज को देखने के बाद वह अब उस माहौल में असहज हो उठी थी। उसने ध्यान दिया कि ईन दो महीने मे राज पहले की तुलना में अधिक सुंदर, नया सा और बेहतर लग रहा था। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था। ज़बान दिल का साथ नहीं दे रही थी।

वह वहाँ और एक क्षण भी अधिक नहीं बैठ सकती थी। राज की उपस्थिति उसके अंदर कुछ बदल रही थी।

"ठीक है, मैं चलती हूँ, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।" उसने अपना पर्स उठाया और रेणु को बाय कहा।
जब वह जाने के लिए मुड़ी तो राज ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"अभी मत जाओ, प्लीज।"
उसकी आँखों ने दर्द साफ दिख रहा था क्योंकि वह जानता था कि वह उसे फिर से खोने वाला है। उन दो महीनों में उसके बिना रहना उसके लिए आसान नहीं था और वह उसे फिर से जाने नहीं देना चाहता था।

"मैं ... मैं ..." नन्दिनी ने उसकी आँखों में देखा और तुरंत मुँह फ़ेर लिया।
"देखो हाथ छोड़ दो, यहाँ तमाशा करने की कोई जरूरत नहीं है मैं यहाँ नहीं रुक सकती.. मुझे यहाँ होना ही नहीं चाहिये था।"

उसने धीरे से उसका हाथ छुड़ाया और चली गई।

राज ने उदास होकर आह भरी और कुर्सी पर बैठ गया।

"तो तुम क्या यहाँ खाना खाने आए हो ?" रोहित ने कहा तो राज चौंक गया।

"अरे जाओ भाई। उसके पीछे जाओ! ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा, इतनी दूरियाँ काफी रही... "।

"वह मुझे नहीं चाहती रोहित। वो..." राज की आंखों में आंसू आ गए।

"वो चाहती है! वह तुमसे बहुत प्यार करती है, क्या तुम उसकी आँखों में नहीं देख सकते जो ना चाहते हुए भी तुम्हें ही तलाश रही थी? और यदि तुम्हें अपनी गलतियों का एहसास है तो जाओ बताओ! " रोहित चिल्लाया।
सच में मुझे ऐसा करना चाहिए? कहीं वो हमेशा के लिए ना नाराज हो जाए?"


"यार तुम सच मे ऐसे हो या तुम्हारे दिल से वो शिद्दत चली गई है?" रेणु ने पूछा।

"या यों कहें, ये जनाब आशिकी का नाटक कर रहे हैं।"

उनके ताने फिर भी सहनीय थे पर नंदिनी से दूरी असहनीय!

राज पार्टी से बाहर भागा और उसकी दो प्रतीक्षित व्याकुल आँखे किसी को ढूंढ रही थी। बेतहाशा पार्किंग, गार्डन मे ढूंढने के बाद वो एक बेंच पर आ बैठा।

"मुझे ढूंढ रहे हो?"

नन्दिनी की आवाज पर वह उसे देखने के लिए मुड़ा और उसे कसकर गले लगा लिया।

"मैं ... मुझे माफ़ कर दो।" वह फूट कर रोया, अपने बिखरे हुए अंतस को समेटते हुए आज सब कुछ आंसुओ के रास्ते बहा देने को तैयार दिखा।

"रोहित ने मुझसे कहा था कि तुम मुझसे एक बार मिलना चाहते हो।"
नन्दिनी अब भी संयत लग रही थी।

"हाँ। मैं...मैं...क्या सिर्फ यही वजह है तुम रुकी हो यहाँ?"

"क्या तुम्हें मेरी याद आती है?" नन्दिनी ने पूछा।

"आई मिस्ड यू बैडली , नन्दिनी।" राज ने आह भरी। "काश मैं कह सकता कि मुझे याद आती थी क्योंकि ऐसा एक पल नहीं गुजरा जब तुम्हें भूला हूँ, तुम साँस बनकर मुझमे प्रवाहित थी... अपनी नादानी मे तुम्हें खो दिया था, किस मुँह से तुम्हें परेशान करता..."

नन्दिनी ने उसका चेहरा थाम कर कहा " और मैंने...मैंने भी तो ना खुद को समझने की कोशिश की ना इस रिश्ते को सुलझाने की, आदतन भाग खड़ी हुई!... "

"मत रुको, प्लीज मत रुको.. कोसो, बोलो पर दूर मत जाना... " ज़माने बाद वो दोनों एक दूजे के करीब थे, सिर्फ शरीर से नहीं बल्कि आत्मा तक एक दूजे के साथ को तरस रही थी, जैसे दो अपूर्ण लोग एक साथ रहकर ही पूर्ण होते बेशक अपनी अपूर्णता को स्वीकार सके तो!


"मैंने तुम्हें बहुत याद किया, नन्दिनी! मुझे लगा कि तुमने हमेशा के लिए छोड़ दिया है, तुम्हें वापस पाने की उम्मीद खो चुका था मैं।"

"नहीं, बेवकूफ। हमने एक ब्रेक लिया था, तुम्हें पता है मैं लापरवाह हूँ पर बातें सीधी करती हूँ। ” नन्दिनी हँस पड़ी।

"हमारे बीच जो बुरा हुआ उसके लिए मुझे बहुत अफसोस है, मैं तुमसे वादा करता हूँ कि अब जो तुम्हारे सामने है एक बदला हुआ राज है।"

"मुझे भी अफसोस है, राज।"

उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया और दुनिया जहान को भुला खुद को तलाशने लगे उस रिश्ते में जो उनके जीवन का हिस्सा बन चुका था। हर बार परफेक्शन जरूरी नहीं, कई बार चाहत भारी पड़ जाती है। मुकम्मल जहान किसे मिला है जिसे तलाशने मे बचा खुचा भी लुटा दें।

राज अचानक घुटनों पर आ गया।

"मुझसे शादी करोगी नन्दिनी? इस बेवकूफ को तुम्हारी ताउम्र जरूरत है.. हाँ तुम मेरी चाहत और जरूरत दोनों हो.. हाँ मैं मतलबी हूँ और दिल के हाथो मजबूर हूँ.. तुम्हारी ना पर भी तुम्हारा इंतजार नहीं छोड़ूंगा!"

"हाँ मिस्टर! तुम मुझे जैसे हो मंजूर हो.. सुधार लूँगी अपने लायक, अब मैदान नहीं छोड़ूंगी..."

दिल के हाथो मजबूर राज और नन्दिनी... जानते थे वो दोनों नॉर्मल इंसान है और इतना सुधरना उनके बस की नहीं, फिर भी दो प्रेमी अब वापस साथ थे। दुनिया बची रहे इसके लिए जरूरी है प्यार करने वाले बचे रहें।

मोहब्बत में दगा की थी
सो काफिर थे सो काफिर हैं
मिली हैं मंजिलें फिर भी
मुसाफिर थे, मुसाफिर हैं....


-सुषमा तिवारी