अनोखा बंधन Archana Anupriya द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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अनोखा बंधन

"अनोखा बंधन"


न जाने किस जन्म का कौन सा संबंध था भूरी का माँ के साथ कि हम तीन भाई-बहनों के साथ भूरी भी माँ की चौथी संतान बन गई थी। सफेद और काले रंग के मिश्रण वाली भूरी वैसे तो एक गाय थी,परंतु,घर में उसका रौब हम बच्चों से कतई भी कम नहीं था.. बल्कि कई मामलों में तो उसके नखरे हम भाई;बहनों से बढ़कर ही थे। सांझ ढलते ही हम तीनो भाई बहनों को नाश्ता,दूध आदि देने के बाद माँ सीधा घर के पिछवाड़े बने उसकी गौशाला में पहुंच जाती थी और भूसी-खल्ली आदि जब तक अपने हाथ से मिलाकर उसके मुँह तक न ले जाती,भूरी बैठी रहती पर नाद में मुँह नहीं डालती थी। हमारा नौकर, लालू पुचकार-पुचकार कर थक जाता था लेकिन, भूरी माँ के आने तक वहीं बैठी चुपचाप जुगाली करती रहती, मानो उसने कुछ सुना ही नहीं। माँ को यदि कभी उसके पास जाने में देर हो जाती तो वह गुस्सा भी दिखाती थी।उनके आते ही मुँह घुमा लेती थी। फिर, माँ उसे मनातीं--" अरे, काहे गुस्सा करती है री...बच्चों को खिला-पिला रही थी तो थोड़ी देर हो गई... चल अब गुस्सा छोड़ और खा ले..फिर पुचकारकर जरा मुँह पर जरा हाथ फेरतीं तो भूरी पूँछ हिलाकर खुश हो कर खड़ी हो जाती और माँ के हाथ से गुड़-खल्ली खा कर फिर नाद में मुँह घुसा कर खाने लग जाती।हम सभी यह देखकर बड़े हैरान होते पर भूरी के साथ माँ का लगाव कुछ ऐसा ही था।

भूरी के घर आने की कहानी भी बड़ी अजीब थी। हुआ यूँ कि एक बार ढाई-तीन साल का हमारा छोटा भाई,संजू बीमार पड़ गया। उसे फ्लू हुआ था। बुखार ठीक होने पर उसकी कमजोरी दूर करने हेतु दूध, दही, घी आदि प्रचुर मात्रा में देने की डॉक्टरी सलाह दी गई। हम जिस ग्वाले से दूध लेते थे, उसे अक्सर दूध में पानी मिलाते हुए देखा गया था। संजू घर में सबसे छोटा और माँ-पापा का बड़ा ही लाडला था। उसकी सेहत की कमजोरी दूर करने और और अपने बच्चों को शुद्ध दूध पिलाने के लिए दूसरे दिन ही पापा एक गाय खरीद लाए।पापा को गाय के विषय में कुछ भी पता नहीं था और जल्दबाजी में किसी से पूछा भी नहीं,बस गए और खरीद लाए।उन्हें बस अपने बच्चों की सेहत के लिए एकदम शुद्ध दूध चाहिए था।उन दिनों न तो पैकेट दूध का चलन था न ही ऐसा कोई सेंटर होता था,जहाँ से दूध लाया जाए।लोग या तो घर में गाय पालते थे या किसी ग्वाले से दूध खरीदते थे। माँ पहले तो बहुत झल्लाईं कि बिना सोचे समझे, बगैर किसी तरह की नस्ल की जानकारी के गाय क्यों खरीद लाए लेकिन फिर गेट पर खड़ी गाय के स्वागत के लिए हाथों में फूल,माला, आरती और मिठाई लेकर चल पड़ीं। गाय को टीका लगाया, माला पहनायी, आरती उतारी और प्यार से उसके मुँह पर हाथ फेरा।भूरी गाय को तो जैसे माँ मिल गयी।खुशी से पूँछ हिलायी,गोबर किया और माँ के पैर चाटने लगी।मुझे आज भी याद है कि भूरी के लिए गौशाला माँ ने कड़कती धूप में खुद खड़ी होकर अपने निर्देशन में भूरी की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बनवाया था। जाड़े के दिनों के लिए कंबल, गर्मी के दिनों के लिए पंखे की व्यवस्था, बछड़े के लिए बैठने की व्यवस्था, खाने के लिए नाद,पानी की नाद वगैरह-वगैरह।भूरी यूँ तो जल्दबाजी में बिना किसी जानकारी और अनुभव के खरीदी गई थी, पापा ने तो यह सोचा था कि आधा-एक सेर दूध भी दे देगी तब भी कम से कम बच्चों को शुद्ध दूध तो मिलेगा.. परंतु भूरी तो बड़े उत्तम किस्म की नस्ल वाली और चौदह सेर दूध देने वाली गाय निकली। उसके आने के बाद तो घर में जैसे दूध की नदियाँ बहने लगीं। दूध की मिठाईयाँ,पनीर, दही,छाछ,घी आदि केवल हम ही नहीं हमारे घर में काम करने वाले नौकर- मजदूर भी खा-खाकर अघा गए। अब तो कॉलोनी के हर घर में हमारे घर के दूध, दही, लस्सी, घी आदि पहुँचने लगे। भूरी नाम भी मेरे छोटे भाई संजू का ही दिया हुआ था। हम सब की दिनचर्या में भूरी ऐसे शामिल हो गई थी कि स्कूल जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद हम तीनों भाई- बहन का पहले गोशाला में जाकर भूरी को पुचकारना और उसके मुँह पर हाथ फेरना एक अटूट नियम सा बन गया था। भूरी भी हम तीनों को देखकर ऐसी खुश होती जैसी माँ अपने बच्चों को देख कर खुश होती है। हम तीन बजे स्कूल से लौटते और साढ़े तीन -चार बजे भूरी को बाहर की हरी-हरी घास चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। वह इधर-उधर से घास चर करके ठीक साढ़े चार-पाँच बजते-बजते गेट पर आकर खड़ी हो जाती और रँभाने लगती... मानो फाटक खोलने के लिए किसी को पुकार रही हो।गेट खुलते ही सीधी अपनी गौशाला में जाकर खड़ी हो जाती और रंभा- रंभा कर माँ को बुलाने लग जाती थी। माँ भी जैसे उसकी आवाज में उसका बुलावा पहचानती थी। उसकी आवाज सुनकर अंदर से ही आवाज लगाती हुई आतीं--"आ रहे हैं... आ रहे हैं क्यों हल्ला कर रही है.." फिर गोशाला उसके पास पहुँचकर उस पर प्यार से हाथ फेरतीं, फिर नौकर से कहकर पानी का नाद उसके आगे रखवा देतीं। भूरी माँ के प्यार का स्पर्श पाकर पूँछ हिला-हिला कर खूब इतराती और तब कहीं जाकर खाने-पानी को मुँह लगाती थी। कई बार तो माँ को जल्दी वापस जाने ही नहीं देती थी। माँ जब पानी का बर्तन रखवा कर निकलने को होतीं तो भूरी उनकी साड़ी का आँचल मुँह से दबाकर पकड़ लेती या उनके आगे आकर खड़ी हो जाती मानो कह रही हो कि अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं.. माँ भूरी से कहतीं--" अरे जाने दे भूरी, बच्चे ट्यूशन से आते होंगे... साहब के ऑफिस से आने का टाइम हो गया है... नहीं जाने देगी तो उन लोगों के लिए नाश्ता-खाना कैसे होगा ?" और फिर भूरी जैसे उनकी मजबूरी समझ जाती और मुँह में दबा माँ का आंचल छोड़ देती। ऐसा मंजर देख कर हम लोग आश्चर्य में पड़ जाते कि गाय जानवर होकर माँ की भाषा और माँ गाय की भाषा कैसे समझ लेती हैं।कई बार तो माँ और भूरी का प्यार देखकर हम बच्चों को ईर्ष्या होती थी। हमलोग माँ पर बिगड़ कर रूठ जाया करते थे।छोटा भाई, संजू उनसे रूठता कि तुम हम सबसे ज्यादा भूरी को प्यार करती हो।सुनकर, माँ हँस देतीं और हमें समझातीं-" जानवर, पक्षी, इंसान सबको प्यार चाहिए... भूरी हमें अपना दूध देती है, घर की सदस्य जैसी है तो हमें भी उसका उसी तरह ध्यान रखना और प्यार करना पड़ेगा न..।" माँ के समझाने का असर यह होता कि हम सब भूरी को और भी चाहने लग जाते थे।

कुछ दिनों के बाद जब भूरी गर्भवती हुई और बछड़े को जन्म दिया तो माँ ने उसका वैसे ही ख्याल रखा जैसे प्रसव के लिए मायके आई बेटी का ध्यान रखा जाता है। प्रतिदिन मेवे के लड्डू ताकत के लिए बना कर खिलाना, आग की गर्मी से उसकी सिंकायी करना, बच्चे को समय से दूध पिलवाना आदि सब कुछ खुद से खड़ी होकर करवाती थीं। कभी भूरी या उसका बच्चा बीमार हो जाए तो पापा और माँ -दोनों चिंतित होकर ऐलोपैथिक,होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक दवाइयाँ आदि का रात-रात भर जाग कर इस तरह ध्यान दिया करते जैसे हम बच्चों के बीमार होने पर हमारा ध्यान रखा करते थे।

हमारे नाना जी एग्रीकल्चर इंजीनियर तो थे ही, जमींदार भी थे।पाँच सौ बीघे की खेती थी और दसियों गायें और भैंसें दरवाजे पर बँधी होती थीं। माँ को खेती-बाड़ी का बड़ा ही अद्भुत ज्ञान था। हमारे बँगले में अच्छी खासी जमीन थी और बंगले की उस जमीन में मसालों को छोड़कर माँ हर चीज उपजा लिया करती थीं-- पपीता, ककड़ी, खीरा, अमरूद, आम, शरीफा, लीची, मटर, भिंडी, आलू, अरहर,धान और न जाने क्या-क्या…. भुट्टे का मौसम आने पर जब मकई की खेती हो जाती तो भूरी को हरे हरे-हरे पत्ते खाने के के लिए खेत में छोड़ दिया जाता था। माँ कहतीं-" देख भूरी मकई के पत्तों को ही खाना, बगल में आलू, गोभी, पालक लगा हुआ है, उसे मत बिगाड़ देना और... किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह भूरी सिर्फ मकई के हरे- हरे पत्ते ही खाती... किसी दूसरे पौधे की तरफ देखती तक नहीं। आज भी सोचती हूँ,तो मन आश्चर्य से भर उठता है कि जानवर अक्षरशः इतनी बात समझ सकते हैं क्या..? परंतु ये बातें तो आँखों देखी हैं तो कैसे झूठलाई जायें..?

समय गुजरता रहा और भूरी हमारे परिवार का अहम हिस्सा बनकर हम सबकी लाडली बनी रही। इसी बीच पापा का प्रमोशन हुआ और दूसरे शहर में तबादला हो गया, जो इस शहर से बहुत दूर था। हम जहाँ थे, वह राज्य के मानचित्र में दक्षिण में था जबकि जहाँ तबादला हुआ,वह शहर राज्य के बिल्कुल उत्तर में स्थित था। जाड़े का महीना था और बिहार के उत्तरी जिले हिमालय की तराई में होने की वजह से कड़ाके की ठंड और घने कोहरे से भरे रहते थे। पहले तय हुआ कि भूरी को एक अलग ट्रक में सँभालकर ले जाया जाए ... परंतु मुश्किल यह थी कि भूरी गर्भवती थी और इतनी ठंड में इतनी दूर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ले जाना उसके लिए खतरनाक और घातक हो सकता था। इसके अतिरिक्त, हम जहाँ जा रहे थे, वहाँ घर कैसा मिलेगा,भूरी के रहने के लिए पर्याप्त इंतजाम हो पायेगा कि नहीं हमें यह भी पता नहीं था। इसीलिए तय हुआ कि भूरी को फिलहाल किसी पहचान के ग्वाले के पास रख दिया जाए और नए शहर पहुंचकर सारा इंतजाम कर लिया जाए फिर,कुछ महीनों के बाद भूरी और उसके बच्चे को ले आया जाएगा। यह सोचकर पहचान के एक ग्वाले से बात की गई और जाने के दस दिन पहले भूरी को उसके पास भेज दिया गया ताकि वह भूरी की हर आदत से वाकिफ हो सके और कोई परेशानी हो तो हम उसे गाईड कर सकें। अगले दिन से ही पैकिंग शुरू होनी थी। भूरी गर्भवती थी और उसकी देखभाल में किसी तरह की कोताही न हो इसलिए उसे ग्वाले के पास भेज दिया गया,जहाँ और भी गायें थीं तो भूरी की देखभाल अच्छी तरह से हो सकती थी। भूरी को वहाँ भेज कर माँ थोड़ी उदास लग रही थीं और खुद को संयत करती हुई पैकिंग में लगी थीं। शाम के 4:00 4:30 बज रहे थे कि अचानक भूरी के रँभाने की आवाज आयी। पहले तो लगा कि शायद भ्रम है... परंतु बार-बार रँभाने की आवाज आई तो हम सब पैकिंग छोड़ कर बाहर आ गए। देखा, तो भूरी गेट पर खड़ी जोर-जोर से रंभा-रंभा कर मानो माँ को पुकार रही थी।माँ सब छोड़कर दौड़ पड़ीं। जल्दी से बाहर का फाटक खोला गया और हम सब बाहर आए। फिर,अचानक एक अजीब सी बात हुई।भूरी माँ को देखते ही उनके पास आकर मानो माँ से लिपट गयी और रो पड़ी। माँ भूरी को गले लगाकर प्यार करने लगीं। दोनों की आँखों से झर-झर आँसू गिर रहे थे। अजीब सा दृश्य था।माँ भूरी के गले से लिपटीं थीं और भूरी मानो उनकी गोद में आने को बेताब थी। सारे कॉलोनी वाले इस अनोखे दृश्य की चर्चा करने लगे थे और देखने के लिए इकट्ठे हो गए थे। माँ और भूरी का यह अनोखा प्रेम देखकर सभी हतप्रभ थे।एक दूसरे के गले से लिपट कर दोनों रोये जा रही थीं। एक गाय की आँखों से इंसान की तरह मां से लिपटकर अनवरत आंसू गिराते देखकर सब के आश्चर्य की सीमा नहीं थी। ऐसा लग रहा था मानो माँ अपनी ब्याही बेटी के पहली बार घर आने पर गले मिल कर रो रही हैं। वह अद्भुत नजारा तो आज भी भुलाए नहीं भूलता। पीछे से वह ग्वाला दौड़ा चला आ रहा था। आकर उसने बताया कि भूरी ने आज दिन भर खाने को मुँह ही नहीं लगाया है।माँ ने जैसे ही यह सुना तो सारी पैकिंग वैकिंग छोड़कर भूरी के खाने के इंतजाम में लग गयीं। भूरी थी कि उन्हें छोड़ ही नहीं रही थी अपने मुँह में उनकी साड़ी का आँचल दबाकर बार बार वहीं बैठ जाती थी। माँ उसे बच्चों की तरह समझा रही थीं--" बेटा, कुछ तो खा ले.. तू माँ बनने वाली है... इसलिए तो तुझे छोड़कर जाना पड़ रहा है...एक बार बच्चा हो जाए, फिर ,तुझे अपने पास बुला लूँगी बेटा... ऐसे रोएगी तो मैं कैसे जा पाऊँगी... मत रो बेटा..मैं यहाँ तेरे लिए रूकना चाहती थी लेकिन रुक गयी तो वहाँ साहब को, बच्चों को कौन देखेगा..नये स्कूल में बच्चों का एडमिशन भी तो कराना होगा न..तू तो समझदार है,मेरी मजबूरी नहीं समझेगी बेटा..मत रो"...करीब आधे-पौने घंटे तक यह अद्भुत दृश्य आँखों के आगे चलता रहा।भूरी एक आज्ञाकारी छोटे बच्चे की तरह सिर झुकाये आँसू गिराती माँ की बातें सुन रही थी। बड़ी मुश्किल से खिला- पिलाकर माँ ने भूरी को उस ग्वाले के हवाले किया। जाते-जाते भी कई बार भूरी ग्वाले के हाथ से अपनी रस्सी छुड़ा छुड़ाकर भाग आती थी और माँ उसे फिर से प्यार कर ,समझा-बुझा कर वापस भेज देती थीं। अंधेरा होने वाला था परंतु माँ वहीं गेट पर तब तक खड़ी भूरी को जाती देखती रहीं, जब तक भूरी पूरी तरह से आँखों से ओझल नहीं हो गई।माँ और भूरी का यह प्यारा संबंध हम सबको निहाल कर गया।

आज भी जब वह मंजर याद करती हूँ तो आंखों में प्यार के आँसू आ जाते हैं। अब न माँ हैं न भूरी, लेकिन, उनके आपसी अनोखे प्रेम के संबंध ने यह तो साबित कर ही दिया कि प्यार ही वह भाषा है जो हर बात से परे हटकर इंसान, जानवर, पक्षी हर-- किसी को एक सूत्र में बाँध सकती है। जहाँ प्यार और अपनापन है, वहाँ हर जीव हर बंधन से आजाद होकर एक दूसरे से मिलते हैं,एक दूसरे को समझते हैं और वहीं वास होता है प्रेम का, विश्वास का, ईश्वर का...।

अर्चना अनुप्रिया।