लीला - (भाग-14) अशोक असफल द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

लीला - (भाग-14)

यात्रा के अंतिम छोर पर जब वे अपने सामान लादे होटल ‘‘मानसरोवर’’ पहुँचे तो अपना डीलक्स रूम देखकर सचमुच दंग रह गए, जो ख़्वाब से भी बढ़कर था!
‘‘येऽहै, ज़िंदगी-तो!’’ लीला बेड पर पसर कर अंगड़ाइयाँ लेने लगी। अजान प्रशंसा में बावला-सा फ्रेश होने चला गया। लौटा तो पाया, वह कलर टीवी का आनंद उठा रही है...!
‘‘गर्मियाँ होतीं, ए.सी. चलता तो और मज़ा आता...!’’ अजान ने दुर्भाग्य जताया। पर उसने कोई ध्यान न दिया, उठकर फ्रेश होने चली गई। तब उसका ध्यान ख़ुद पर चला गया। वह उघारे बदन आईने में बड़ा अद्भुत दिख रहा था। मनोज से भी सुडौल भरी-भरी देह वाला चित्ताकर्षक युवा!
मनोज की कुछ ऐसी छाप पड़ी थी कि उसने बीड़ी छोड़ दी और नियमित दाढ़ी बनाने लगा। छोटी-छोटी मूँछें ज़रूर रख लेता जो उसे और भी हैंडसम बना देतीं...। आइनों में उसके हर कोण की आकृतियाँ मौजूद थीं। वह उस आलीशान बेड पर आत्ममुग्ध-सा इधर से उधर करवटें लेने लगा...। फिर उसने रिमोट से चैनल बदले तो एक ऐसा चैनल भी सर्च कर लिया जिस पर कोई नीली फ़िल्म चल रही थी...। वह मन ही मन उत्तेजित होने लगा। तब उसने टीवी आफ कर दिया। यह गुप्त रहस्य अपने भीतर दबा कर कि लीला के आने पर अचानक आन कर देगा! फ़िलहाल तो बाथरूम में गिरते जल की संगति में लीला के कण्ठ से रह-रहकर गीत की कोमल स्वर लहरियाँ फूट रही थीं,
‘जल कैसे भरूँ जमुना गहरी...जल कैसे!
ठाडें भरूँ तो सैंया देखत हैं ऽ ...
बैठें भरूँ भींजे चुनरी! जल कैसे...
धीरें चलूँ तो सैंया पकड़त हैं!
जल्दी चलूँ छलके गगरी...जल कैसे!’
अजान चमत्कृत! लीला का यह रूप पहली बार देख रहा था वह। गीत के हास्य और लालित्य ने उसे चकित कर दिया था। और उसके सुरीले बोल की तो वह तारीफ़ क्या करता! कान उधर ही दिये मस्ती के आलम में आँखें मूँदें पड़ा था उघारे बदन। दिल होले-होले धड़क रहा था। तभी अचानक गेट धप् से खुला तो वह कुछ घबरा-सा गया! लीला मुस्कराती हुई आगे बढ़कर पलंग पर उसकी ओर पाँव पसार कर लेट रही। दूसरी ओर बाल फैलाकर फर्श तक लटका लिये उसने। अजान उसे नख से शिख तक निरख कर अभिभूत हो उठा...। इस नयनाभिराम और जीवंत दृश्य के आगे वह बेजान टीवी की सेक्सुअल फ़िल्म कभी नहीं देख पाएगा। कभी नहीं देख पाएगा उस बदनाम औरत का अभिनय जो बेड पर चीता बन जाती है। ...वो सेक्सी गर्ल जो रोज़ मर्द बदलती है। वे कामपिपासु किशोरियाँ जो रात-रातभर मुख मैथुन करती हैं...। उसे अपनी प्राण-प्रेयसी सर्वांग सुंदरी लीला पर भारी गर्व हो रहा था।
भावावेश में वह उसके गोरे-गोरे पंजे सहला उठा।
और ऐसे अविनाशी समय में फोन की धीमी घंटी बज उठी, तो उसने तक़दीर को कोसते हुए रिसीवर उठा लिया बेमन।
उधर से बेहद नम्र स्वर फूटा, ‘‘सर! प्लीज, डिस्टर्ब के लिये माफ़ कीजियेगा...डिनर तैयार है...डाइनिंग हाल में हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं...सर, न आना चाहें तो खाना रूम में बुलवा लें, प्लीज!’’
सुनकर वह अचकचा गया, बोला, ‘‘आते हैं-आते हैं!’’
‘‘ऐइऽ उठो!’’ उसने स्वप्न भंग लीला के विवर्ण गालों को थपथपाया, ‘‘चलो, हाल में खाने पर सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं!’’
‘‘क्या ऽ!’’ क्लेश झर गया जैसे! वह ख़ुशी से झूमकर उठी और अटैची खोलकर कपड़े चुनने लगी। ...थोड़ी देर में उसने महरून कलर की साड़ी और उससे मैच करता स्लीवलैस ब्लाउज निकाल लिया और अजान अब भी यूँ ही बैठा उसे कौतुकी निगाहों से निहारे जा रहा था, जबकि वह ड्रेसिंग टेबिल के आगे बैठकर मेकअप करने लगी थी। उसे इस तरह सजते-संवरते देख उसके भीतर पहली बार ऐसी हिलोर उठी, जैसी बादलों के घिर आने पर मोर के हृदय में उठती है! फिर जब वह साड़ी बाँधकर सम्मुख खड़ी हुई तो अजान की आँखें ही चुँधिया गईं। उसने फिर एक अजीब-सी हिलोर महसूस की और ड्रेसिंग टेबिल से स्प्रे उठाकर उसके सीने पर सुगंधित फुहार छोड़ दी...। और भीनी-भीनी ख़ुशबू में, सजी-धजी परी की तरह उड़ने को तैयार खड़ी लीला को देखकर सोचने लगा कि क्या ये वही है, कीचड़ भरे खेत में धोती का कछोटा मारे धान की चहोर कराती और पसीने से लथपथ ढीले-ढाले ब्लाउज में सिर ऊपर पूलियाँ ढोती, धान झुराती लीला चमार!? और तब उसके भीतर से जवाब आया कि, इंसान पेट से चमार-मेहतर बनकर जनम नहीं लेता...सब उसी बूँद से उपजते हैं! यह तो व्यवस्था है जो उन्हें शूद्र और सवर्ण बना देती है...।
वे जब डाइनिंग हाल में पहुँचे, वहाँ रोशनी की जगमग में जवान जोड़े मद्धिम संगीत लहरियों के मध्य लजीज़ खाना खा रहे थे। इतनी वैरायटी, यक़ीनन षटरस व्यंजन कि जिनकी महक से ही आत्मा भर जाय और उनके प्रकार चखते-चखते पेट!
और वे पहुँचे तो अधिकांश नेत्र लीला की ओर उठ गए! जैसे, प्रिंसेस डायना पधारी हों! अनुपम वस्त्राभूषणों से लकदक! इस चीज़ का बड़ा शौक था उसे। तमाम लेटेस्ट ज्वेलरी ख़रीद रखी थी, जिसकी क़ीमत अब वसूल हो रही थी...।
पर उन्होंने वाइन नहीं ली और खाने के बाद आइसक्रीम रूम में ही मँगा ली। बैरा जब चला गया तो लीला ने अपनी साड़ी खोलकर सोफे पर डाल दी और आभूषण-सज्जित, आइसक्रीम खाने लगी। स्लीवलैस ब्लाउज-पेटीकोट पर दमकती ज्वैलरी में उसका भव्य रूप देख अजान चकित रह गया! इन बेशकीमती क्षणों में वह इतनी काम्य लग रही थी कि किसी भी नायिका से उसकी तुलना नहीं कर पा रहा था वह...और उसने खूब सोचा, पर ऐसा कोई डायलोग न सूझा जो इस मौके पर दिल की भावना को व्यक्त कर पाता!
तब उसे किंकर्तव्यविमूढ़ पा लीला ने रिमोट उठाकर टीवी चला दिया...तो स्क्रीन पर वही फ़िल्म नाच उठी जो उसकी अनुपस्थिति में अजान ने सर्च कर ली थी! दम तोड़ती स्त्री, मानों दरक रही हो धरती...और हाँफता पुरुष, जैसे फटता हो बादल!

(क्रमशः)


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कैप्टन धरणीधर

कैप्टन धरणीधर मातृभारती सत्यापित 3 महीना पहले

असफल नहीं सफल लेखक