वीरा हमारी बहादुर मुखिया - 9 Pooja Singh द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

वीरा हमारी बहादुर मुखिया - 9

उधर बरखा इशिता के पास पहुंचती है...... इशिता बहुत गौर से कुछ फोटोग्राफस को देख रही थी तभी बरखा उसके पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखती है जिससे इशिता तुरंत आंसू पोछकर पीछे घुमती है....
इशिता : बरखा.....
बरखा : वीरा.... चाची तुम्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहती थी ... उन्होंने बस ऐसे ही पुछ लिया....
इशिता : कोई बात नहीं बरखा....ये तो किस्मत है....आज मैं किसी को नहीं साथ बांध पाई....बस अकेले ही रह गई....
बरखा : वीरा ..... मुझे नहीं पता कि तुम्हारे साथ क्या हुआ है न ही मैं पुछना चाहती हूं ...बस अब ये समझ लो तुम अकेली नहीं हो मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं...ये गांव तुम्हारे साथ है....(तभी आवाज आती है)
" और हम भी आपके साथ है" दोनों हैरानी से पीछे मुड़ती है
बरखा : तुम दोनों....
इशिता : सोमेश सुमित.... क्या हुआ...?
सोमेश : वीरा जी हुआ कुछ नहीं है हम तो बस ऐसे ही आ गये...आपको परेशान देखकर....
इशिता : थैंक्स .....
सुमित : लेकिन किस लिए.....
इशिता : कुछ नहीं..... सुमित कल हम डीएम आफिस जाएंगे रैडी रहना.....
सुमित : जी मैं कल समय पर पहुंच जाऊंगा...
तभी बरखा बोलती है...." तुम दोनों जाओ अब .. मैं वीरा के दवाई लगाऊंगी..."
सोमेश : जा रहे हैं.... वीरा जी.. मां ने आपके लिए खाना भिजवाया है वहीं देने आए थे...आप तो अब यहां आ गई रहने मां ने मना किया था फिर भी..."
इशिता : कोई बात नहीं सोमेश... मैं अच्छे से हूं यहां...और चाची को थैंक्स कहना खाने के लिए....!
सोमेश : ठीक है वीरा जी.....
इतना कहकर दोनों चले जाते हैं......
बरखा : वीरा ....आओ मैं तुम्हारे बाल बना दूं....!
इशिता : नहीं बरखा इन्हें ऐसे ही रहने दो बंद ...
बरखा : अपने बालों के साथ क्यूं जुल्म ढा रही हो ...इन्हो तो बहती हवा में झुमने दो......
इशिता : नहीं बरखा ये मेरी मर्जी के बिना नहीं झुमेंगे.....
बरखा : ठीक है वीरा......तुम आराम करो मैं जाती हूं....(बरखा जाते जाते वापिस आती है)... अरे ! मैं तो तुम्हारे हाथ में दवाई लगाना भूल गई .....
वीरा : कोई बात नहीं बरखा तुम जाओ.....
बरखा : ठीक है......
बरखा चली जाती हैं ... इशिता लेटे लेटे बस किसी ख्यालों में खोई हुई सो जाती है......
अगले दिन.... इशिता जाने के लिए तैयार होकर दरवाजे कुछ तरफ बढ़ती वैसे ही दरवाजा की खटखटाने की आवाज आती है... इशिता दरवाजा खोलती सामने सुमित और सोमेश खड़
थे.....
इशिता : तुम दोनों.....
सुमित : वीरा जी आपने ही तो कहा था सुबह कलेक्टर साहब के घर जाएंगे....(इशिता हंस जाती है और कहती हैं)..
" कलेक्टर साहब के घर नहीं डीएम आफिस जाएंगे.... तुम भी न सुमित...."
पहली बार इशिता के चेहरे पर गंभीर भाव की जगह हंसी देखी थी इसे देखकर सोमेश बोल पड़ता है.....
" वीरा जी...आप हंसते हुए बहुत अच्छी लगती हैं ऐसे ही मुस्कुराते रहिए....(इशिता सोमेश की बात को अनसुना करते हुए कहती हैं...)
" तो ठीक है फिर चलो....और सोमेश तुम बताओ कुछ काम था..."
सोमेश : नहीं वीरा जी.... मां आपको बुला रही है वहीं बताने आया हूं....!
इशिता : ठीक है फिर बस चलती हूं.....
तीनों निराली के यहां पहुंचते हैं....
निराली : वीरा बेटी आ गई तुम..... नंदिता जल्दी दही और शक्कर लेकर आ.....(नंदिता दही शक्कर लेकर आती है)
इशिता : चाची....ये क्यूं.....?
निराली : बेटा...इसे खाकर जाओ देखना तुम्हारा काम सफल होगा....!
इशिता बिना कोई सवाल जवाब किए दही शक्कर खाकर डीएम आफिस के लिए चली जाती हैं....... इशिता के जाने के बाद रांगा गांव में पहुंचता है.....




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Swatiba Aniruddhsinh Zala

Swatiba Aniruddhsinh Zala 5 महीना पहले

कैप्टन धरणीधर

कैप्टन धरणीधर मातृभारती सत्यापित 5 महीना पहले