एक थी...आरजू - 7 Satyam Mishra द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

एक थी...आरजू - 7

   


             सुबह जब काफी देर इंतजार करने के बाद भी आरजू ब्रेकफास्ट के लिए न आयी तो हरिओम के कहने पर नैना ने खुद उसके रूम में जा कर चेक किया। 
                  दरवाजा खुला हुआ था।
                  उसे ठेल कर जब वह अंदर दाखिल हुई तो आरजू उन्हें कहीं नजर न आयी। रूम से अटैच्ड बाथरूम भी चेक किया पर होती तो नजर आती न। आरजू को वहां न पा कर उनके होश उड़ गए। कपडो की सेफ खुली हुई थी जिसमें से कई कपड़े नदारद थे और बचे हुए उलझे पड़े थे। उनका दिल पसलियों तक धाड़ धाड़ कर बज उठा।
                  तमाम बुरी आशंकाओं ने एक साथ दिमाग पर धावा बोल दिया।
                  तेजी से डायनिंग टेबल तक पहुंची जहां पर हरिओम बैठे दोनो की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्हें हवासगुम देख कर हरिओम ने जब कारण पूछा तो नैना ने रोते हुए बताया की आरजू अपने रूम में नहीं है-गायब है। हरिओम की तो सिट्टीपिट्टी गुम। 
                  उन्होंने अपना सिर पकड लिया-"ओह गॉड,कहाँ गई मेरी आरजू?"
                  पति पत्नी ने सारा घर छान मारा पर कहीं आरजू न मिली।
                 
                   ● ● ●

                  सारी रात शहजाद कार ड्राइव करता रहा था।
                  बीच बीच में आरजू को झपकी भी आ गई थी। बीच में एक दो जगह रुक कर शहजाद ने आराम भी किया था और कुछ देर रुकने के बाद फिर से कार आगे बढ़ा दी। जब शहजाद ने कार रोकी तब तक सुबह के आठ बज चुके थे।
                   उसने कार जहां रोकी थी वह किसी रिहायशी शहर के बीच बनी एक सँकरी सी गली का आखरी सिरा था। दोनो कार से उतरे। शहजाद का लॉन्ग ड्राइविंग के कारण जिस्म टूट रहा था। आरजू का भी यही हाल था। 
                  उसने चारो ओर निगाह दौड़ाई तो उसे बस गली के दोनो ओर पुराने जमाने के जर्जर से खड़े दो-चार मंजिला मकान नजर आये जिनपर तमाम लाइटे,झालरें आदि जल रही थी। गन्दी से नजर आने वाली उस गली में चारों तरफ एक अजीब किस्म की महक घुली हुई थी जैसे किसी सुगन्ध,किसी सेंट या परफ्यूम की। 
                  शहजाद ने कार से वह बैग उठा कर अपने कन्धे पर डाला जो आरजू अपने साथ ले कर चली थी-और सामने बने एक चार मंजिला मकान की ओर बढ़ गया। आरजू उसके पीछे हो ली।
                  बेहद सँकरे,अंधेरे और जर्जर जीने से होते हुए दोनों मकान के उपरले खंड पर पहुंचे। जब वह जीने के रास्ते से ऊपर जा रहे थे तब दो चार आदमी ऊपर से नीचे आते हुए दिखे। अंदर आरजू को बीचोबीच एक टेबल रखी हुई दिखी जिसपर पान बनाने का हरेक समान कुछ इस कदर करीने से लगा हुआ था जैसे वह किसी पनवाड़ी का अड्डा हो। टेबल के बगल में रखे सोफे पर चार लोगों के बैठने भर के लिए अच्छी खासी जगह मुहैया थी लेकिन उस वक्त उस पर एक मोटी सी औरत धंसी हुई थी। भरा पूरा गहनों से लदा जिस्म,आंखों में काजल और माथे पर सिक्के के आकार की बड़ी सी बिंदी इसकी खासी पहचान थी। इस औरत की उम्र पचास से किसी मायने में कम न थी लेकिन डार्क मेकअप के जरिये 'पैंतीस की' बनने में उसने कोई कसर बाकी न छोड़ी थी। उसके मुंह में पान की लाली नजर आ रही थी।
                  -ये शांता थी।
                  "मौसी"-शहजाद उसकी ओर बढ़ा।
                  आवाज ने उस औरत का ध्यान दोनों की ओर आकर्षित किया। शहजाद के साथ आरजू को देख कर उसकी आंखे जुगनुओं की तरह चमक गईं। 
                  शहजाद ने आगे बढ़ कर शांता के गले में बाहें डाल दी और जब अभिवादन से फारिग हुआ तो आरजू से बोला की मौसी के चरण स्पर्श करे।
                  आरजू ने आगे बढ़ कर उसके पैर छू लिए।
                  शांता ने उसे ऊपर उठा कर गौर से देखते हुए कहा-"वाह शहजाद तूने तो कमाल ही कर दिया। क्या खूब बहु ढूंढ कर लाया है तू मेरे लिए-एकदम चांद का टुकड़ा है। ये तो लाखों में एक है। इसके आगे तो सब फेल हो जाएंगी। वाह शहजाद।"
                  अपनी तारीफ सुन कर हया के मारे आरजू के चेहरे पर लाली दौड़ गई। उसकी निगाहें जमीन पर गड़ गईं।
                  शहजाद ने शांता को सारे घटनाक्रम से अवगत कराया और अपनी परेशानी से वाकिफ कराया। सारी बातें सुन कर बीच बीच में शांता मुस्कराई और अंत में अपने चेहरे पर दुनिया भर की गम्भीरता समेट कर बोली-''अब तुम्हे परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है शहजाद। तुम लोग अपने ठिकाने को ले कर चिंता में हो न-यही सोच रहे हो न की इतने बड़े अनजान शहर में इस लड़की को ले कर कहाँ जाओगे,क्या करोगे? अपनी चिंता छोड़ दो-आरजू अब से यहीं रहेगी मेरे साथ। यहां पर और भी कई लड़कियां हैं-जल्द ही उनके साथ घुल मिल जाएगी।"-फिर उसने आरजू के सिर पर प्रेम से हाथ रखा और स्नेहसिक्त बोली-"डोंट वरी आरजू,इसे अपना नया दौलतखाना समझो। शहजाद तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखा दे रहा है,जा कर आराम कर लो,रात के सफर से तुम्हारा ये खूबसूरत जिस्म टूट रहा होगा। शहजाद इसे इसका नया रूम दिखा दो,और लौट कर मेरे पास आओ-तुम्हारा हिसाब देखना है...मेरा मतलब,तुमसे कुछ बातचीत करनी हैं मुझे...।"
                  "जी मौसी"-कहकर शहजाद सीधा खड़ा हो गया। आरजू भी उसके समीप आ गई। इसके बाद वह उसे ले कर एक रूम में ले गया। आरजू ने देखा कमरा छोटा था लेकिन दो लोगों के लिए कम्फर्टेबल था। समान के नाम पर ज्यादा चीजें तो न थी पर मेकअप और साज श्रृंगार के लिए वो सभी कुछ मौजूद था जिसकी आरजू को दरकार थी।
                  "डार्लिंग जरा थोड़ी देर के लिए तुम्हारा मोबाइल ले सकता हूँ मैं?"-शहजाद बोला था।
                  "क्यों तुम्हारे पास भी तो है न..?"
                  "है तो सही लेकिन फिलहाल नेटवर्किंग प्रॉब्लम आ रही है। एक इम्पोर्टेन्ट कॉल करनी है। तुम्हारा मोबाइल मिल सकता है?"
                  "व्हाय नॉट?"-आरजू ने अपना मोबाइल उसे थमा दिया। शहजाद ने मोबाइल जेब में ठूंस लिया और उठ गया।
                  जब शहजाद वापस शांता के पास पहुंचा तब तक शांता ने पुराना पान थूक कर नया मुंह में ठूंस लिया था। शहजाद पर नजर पड़ते ही उसके होंठो पर धूर्ततापूर्वक मुस्कान नृत्य कर उठी,वह उसकी ओर नोटों की एक गड्डी बढ़ाती हुई बोली-"वाह शहजाद,इस बार क्या मस्त चिड़िया फांस के लाया है तू- इसके तो पूरे पचास हजार दूंगी मैं। मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की इस जैसी कोई भी लड़की अब तक हमारे कारोबार में नहीं आई है,इसपर तो हर ग्राहक पानी की तरह पैसे बहा देगा।"
                  "जी मौसी जी।"-शहजाद उसी प्रकार धूर्ततापूर्वक मुस्कराते हुए बोला और उसने हाथ बढ़ा कर गड्डी उठा ली। उसने आरजू का बैग उठाया और कन्धे पर लाद कर बाहर निकल गया-उसमे भरा 'माल' भी अब उसका था।

                  ● ● ●

                  बंसल साहब ने आरजू के सारे दोस्तों और वाकिफकारों को फोन कर उनसे आरजू के बारे में पूछताछ की पर कोई भी उन्हें आरजू के बारे में न बता सका। रंजना से भी पूछा पर कुछ पता न चला। नैना जी के मोबाइल में भी आरजू के जितने दोस्तों के नम्बर सेव थे उन सबको उन्होंने मिला कर देख लिया पर कोई भी आरजू की बाबत उन्हें सन्तोषजनक उत्तर न दे सका। पल प्रतिपल पति पत्नी दोनों की चिंता बढ़ती जा रही थी। आशंकाओं के अनगिनत सर्प उनके दिलोंदिमाग पर जहर उगलते जा रहे थे। 'आखिर कहाँ जा सकती है उनकी बेटी' सोच सोच कर हरिओम जी का दिमाग फटा जा रहा था की अचानक उनके दिमाग में एक झटका सा लगा और जहन में एक नाम फ़्लैश कर गया,वह बड़बड़ाये-"वो लड़का।"
                  "कौन लड़का?"-नैना जी कसमसाई।
                  "वही लड़का जो कल हमारे घर आया था।"
                  "वो आरजू का दोस्त?"
                  "हां वही-उसी की बात कर रहा हूँ मैं। क्या नाम बताया था उसने....हाँ याद आया...संजय।"
                  "आप कहना क्या चाहते हैं...कहीं उसने तो नहीं हमारी बेटी आरजू को....।"
                  "नहीं उसने नहीं"-हरिओम की आवाज थरथरा रही थी-"लेकिन उसने कल हमें जो कुछ भी बताया था अगर वो हकीकत थी तो उसके मुताबिक जरूर आरजू हमारा घर छोड़ कर उसी लड़के के साथ भाग गई है...।"
                  सुनकर नैना जी का सर्वांग कांप गया।
                  मानो पति की बातें उसके कानों में गर्म गर्म पिघले शीशे की तरह ही जा समाई हों।
                  "ओह गॉड,ये आप क्या कह रहे हैं जी?"
                  "ये हमारा आइडिया है। हम कन्फर्म हो कर नहीं कह रहे हैं,बस अंदाजा लगा रहे हैं। यदि उस लड़के संजय की बात सच थी तो बकौल उसके हमारी आरजू बुरी तरह से बिगड़ चुकी है और उस लड़के के साथ भाग गई है।"
                  "कौन है वो लड़का?"
                  "नाम तो मुझे मालूम नहीं,लेकिन कोई मुस्लिम है वो। अगर ये बात सच है,तो मैं..मैं...।"-सांसे तेज हो चली उनकी गुस्से की ज्यादती के कारण।
                  "आप प्लीज खुद को काबू में रखिये। ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा। हमें इस वक्त अपनी आरजू को ढूंढना होगा,जाने कहाँ और किन हालातों में होगी वह।"
                  "हमने अपनी तरफ से सारी कोशिशें कर ली हैं अब सिवाय पुलिस स्टेशन जाने के और कोई रास्ता नहीं बचा है। मैं पुलिस स्टेशन जा कर आरजू के मिसिंग होने की कम्प्लेंट लिखवा कर आता हूँ।"
                  हरिओम बंसल की आंखों से चिंगारियां सी फूट रही थी और नैना के आंखों से नीर धाराएं।

           क्रमशः.................
                  


रेट व् टिपण्णी करें

Dev Mavapuri

Dev Mavapuri 6 महीना पहले

S Nagpal

S Nagpal 6 महीना पहले