एक थी...आरजू - 6 Satyam Mishra द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

एक थी...आरजू - 6



"डिंग डाँग"
दरवाजे पर लगी कॉलबैल की आवाज घर के अंदर गूंज उठी। नैना जी ने उठ कर दरवाजा खोला तो कुछ देर पहले उनके साथ वाले सोफे पर बैठे हरिओम जी की नजर दरवाजे की ओर दौड़ गईं। दरवाजा खुला तो तकरीबन अट्ठाइस वर्षीय एक युवक नजर आया। युवक ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया तो नैना जी ने पलट कर हरिओम पर इस तरह से दृष्टिपात किया की शायद वह उस अजनबी आगन्तुक से वाकिफ हो,लेकिन हरिओम भी उसे पहचान न पाए। वह सोफे से उठ कर दरवाजे तक आये और नैना को भीतर जाने को बोल कर नौजवान से मुखातिब हुए। नैना बिना किसी हुज्जत के अंदर चली गई।
"कहिये? किससे मिलना है आपको?"
"जी मेरा नाम संजय है।"-वह थोड़ा झिझकते हुए बोला।
"आय थिंक"-हरिओम जी उसके चेहरे का गम्भीरता से मुआयना करते हुए बोले-"मैं आपसे पहले कभी नहीं मिला हूँ और न ही इस नाम से वाकिफ हूँ जो आपने बताया?"
"सर,ये हमारी पहली मुलाकात है।"
"ओह,तो बताइये मिस्टर आप कौन हैं और किस सिलसिले में मुझसे मिलने के तलबगार हैं?"
"जी मुझे मिस्टर बंसल से मिलना था। आप बंसल साहब ही हैं न?"
"यस, आय एम हरिओम बंसल। कहिये क्या बात है?"
"जी मुझे आरजू के बारे में बात करनी थी...वो ..वो आपकी ही बेटी है न?"
आरजू का नाम एक अजनबी के मुंह से सुन कर हरिओम बंसल के चेहरे पर सीरियस भावों ने डेरा डाल लिया। उन्होंने उसे अंदर आने को कहा।
संजय भीतर दाखिल हुआ।
"जी हाँ,वो मेरी ही बेटी है। आप उसे कैसे जानते हैं,और आप उसकी बाबत मुझसे क्यों तबसरा करना चाहते हैं?"
"देखिए मैं आपको कुछ ऐसा बताना चाहता हूँ जो आपका जानना निहायत ही जरूरी है। अगर आपको ये बातें अभी न पता चलीं तो भगवान ही जाने आपका भविष्य कितना अंधकारमय हो जाएगा। दरअसल आपकी बेटी आरजू...।"- कहते कहते उसकी जुबान अटक सी गई।
"क्या बात है लड़के? क्या कहना चाहते हो तुम हमारी आरजू की बाबत? साफ साफ कहो,हम तुम्हारी बातों का इंतजार कर रहे हैं?"-हरिओम जी के आवाज में कठोरता झलक आई।
"बात ये है बंसल साहब की अपनी जिस बेटी पर आप आंख बन्द करके भरोसा किये जा रहे हैं वही आपकी पीठ पीछे आप पर विश्वासघात का वो खंजर भोंक रही है जिसके बारे में आप ख्वाबों में भी गुमान नहीं कर सकते हैं। आप अपनी जिस बेटी पर विश्वास करके उसे खुली छूट दे रहे हैं वही आपके विश्वास का कत्ल करके उस छूट और आजादी का नाजायज फायदा उठा रही है। उसके कदम इस हद तक बहक गए हैं की उसे अपने अच्छे बुरे का भी ख्याल न रहा।"
"क्या बक रहे हो तुम?"-हरिओम जी की भृकुटियां तन गईं। वह गुर्रा उठे।
"जी मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ उसके एक एक हर्फ़ में सच्चाई समाई हुई है"-वह अपने एक एक लफ्ज को चबाता हुआ बोला-"आपकी अपनी बेटी आपकी पीठ पीछे एक मुस्लिम लड़के से इश्क फरमा रही है। उसके साथ घूमती फिरती है,मजे लुटती है। इतना ही नहीं देर रात तक उसकी बाहों में भी खोई रहती है। आपको शायद इस बात का पता भी नहीं है की वो लेट नाइट बार की पार्टियों में सिगरेट और शराब के नशे में डूबी रहती है। मॉर्डन होने के नाम पर उसने आपसे जो छूट और आजादी हासिल की है,उसका बेजा फायदा उठा रही है वह।"
"लगता है तुम अपने होश में नहीं हो लड़के"-हरिओम के चेहरे पर क्रोध के बादल गरज उठे-"हमारे दौलतखाने में खड़े होकर हमारी ही बेटी के खिलाफ इतने गन्दे और बेबुनियाद इल्जाम लगाने का अंजाम भी सोचा है। हमें अपनी बेटी पर पूरा विश्वास है-वो इतनी ओछी हरकत कभी नहीं कर सकती। मुझे अपनी बेटी पर फख्र है,वो कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिसकी वजह से मेरा सिर झुके। लगता है तुम किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हुए हो,इसीलिए तो बेसिरपैर की बातें कर के हमारा दिमाग खराब कर रहे हो। निकल जाओ यहां से,और आइंदा अपनी सूरत न दिखाना मुझे-गेट लॉस्ट।"
"देखिए,मैं आपको एक बार फिर से समझाता हूँ"-वह अनुनयपूर्ण स्वर में बोला-"आपकी बेटी जिस लड़के के जाल में फंसी हुई है वह अच्छा लड़का नहीं है। वह आपकी बेटी की जिंदगी तबाह कर देगा,बर्बाद कर के रख देगा।"
"अपनी जुबान को लगाम दे। अगर तूने अपनी गन्दी जुबान से एक बार और मेरी आरजू के बारे में इस तरह की कोई बात निकली तो ये तेरे हक में अच्छा नहीं होगा। तुम्हारी खैर इसी में है,की अभी के अभी दफा हो जाओ यहां से-आय सेड गेट आउट फ्रॉम हियर।"
"जाता हूँ,लेकिन एक बात जरूर कह कर जाना चाहता हूँ"-संजय के लहजे में पूर्ण विश्वास का समावेश था-"एक दिन आपके आंखों पर चढ़ी ये पट्टी जरूर खुलेगी और उस दिन आपको मेरी बातें याद आएंगी लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी-और उस घड़ी आपके पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा-शायद आपकी बेटी भी नहीं।"
"गेट लॉस्ट।"-हरिओम दहाड़ उठे।
युवक पलटा और लम्बे लम्बे डग भरता हुआ तेजी से बाहर की ओर निकल गया। उसके जाने के बाद हरिओम जी सोफे पर गिर पड़े-तेजी के साथ उखड़ी हुई सांसो को बटोरने लगे। उनके चेहरे के सामने अपनी आरजू की छवि घूम गई।
"कितनी प्यारी और भोली है मेरी बेटी और वो बास्टर्ड कैसे उसपर बेबुनियाद और नाकाबिलेयकीन इल्जामात लगा रहा था। साला सिरफिरा दिमाग।"-वह आप ही बड़बड़ाये।
उसी शाम जब आरजू घर लौटी तो हरिओम जी ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ रखा और बोले-"आरजू मैं तुम पर पूरा यकीन करता हूँ-इतना की जितना शायद खुद पर नहीं करता-मेरे विश्वास का कभी खून मत होने देना। तुम सिर्फ मेरी बेटी ही नहीं,बल्कि समाज में मेरी इज्जत हो,मेरी नाक हो-इसे कभी कटने मत देना।"
अपने डैडी के मुंह से ये बातें सुन कर एक पल के लिए तो आरजू की आंखों के सामने शहजाद,बार में होने वाली नाइट पार्टी,सिगरेट और शराब के सेशन,होटलों के रूम में रंगरलियां सभी कुछ घूम गया। वह लरज गई। फिर खुद ही संयत हो कर बोली-"डैड आप आज ये कैसी बातें कर रहे हैं,बिल्कुल मॉम की तरह। मैं आपकी बेटी हूँ,आपकी इज्जत का ख्याल मुझे भी है। डोंट वरी मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगी जिसकी वजह से आपको हर्ट हो-ओके। नाओ हैप्पी?"
"बहुत खुश बेटी।"-कहकर हरिओम ने आरजू को गले से लगा कर उसके माथे पर किस कर लिया।
तभी आरजू के मोबाइल पर कोई व्हाट्सएप मैसेज आया। उसने स्क्रीन पर उभरने वाला नाम देखा तो वह शहजाद का था। वह हरिओम की बाहों के फंदे से जुदा हुई और उन्हें बाय बोल कर अपने प्राइवेट रूम की ओर बढ़ चली। अपने रूम में आ कर वह शहजाद के साथ उस चैटिंग में लग गई जिसका अहम मुद्दा आज रात उन दोनों के घर छोड़ कर भागने का प्लान था।

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रात के ठीक दस बजकर पचास मिनट पर-यानी ग्यारह बजने से दस मिनट पहले ही-आरजू के व्हाट्सएप पर शहजाद का मैसेज आया। ये मैसेज आरजू के लिए इस बात का इशारा था की शहजाद उसके घर के पास वाले ब्रिज पर आ पहुंचा है और उसका इंतजार कर रहा है। अब तक आरजू अपने जरूरी सामानों,चंद शार्ट ड्रेसों,कुछ नकदी जो एटीएम से निकली थी आदि को एक बैग में भर कर रेडी हो चुकी थी।
हरिओम जी नैना के साथ अपने रूम में बेहोशी सी नींद में सोये हुए थे जब आरजू घर से बाहर निकली-दबे पांव।
उसके दिलोदिमाग में शहजाद का एक ही लफ्ज घूम रहा था-"हमारी मोहब्बत की एक दुनिया होगी,जहां किसी की दखल न होगी-सिर्फ हम दोनों होंगे।"
अपने घर की दहलीज पार करते हुए उसका कलेजा बिल्कुल भी नहीं फट रहा था। उसे तो इस बात की टेंशन हो रही थी की जल्द से जल्द अपने शहजाद के पास जा पहुंचे बिना किसी की नजर में आये। घर के बाहर बनी सड़क पर रोडलाइट्स का मद्धिम सा प्रकाश ही सड़क पर पड़ रहा था। कहीं कहीं पर अंधेरा गहराया हुआ था। दूर कहीं कुत्ते भोंक रहे थे। आरजू अंधेरे का हिस्सा बनती हुए तेज कदमों से बढ़ चली। उसने एक हाथ में बैग थाम रखा था।
कुछ ही देर में वह ब्रिज तक जा पहुंची-निर्विध्न-बीच में किसी ने उसे न देखा।
वहां शहजाद को उसने व्हाइट कलर की एक कार में बैठा अपनी ही प्रतीक्षा करता हुआ पाया। आरजू को देख कर शहजाद की आंखों में हजार वाट के बल्ब की चमक दौड़ गई। उसने लपक कर दूसरी साइड का डोर ओपन कर दिया। आरजू ने अपना बैग कार की पिछली सीट पर डाला और उसके बगल वाली सीट पर बैठ कर दरवाजा बन्द कर लिया।
"तो तुम आ ही गई डार्लिंग"-शहजाद उसके गर्म होंठो को चूम कर बोला-"तुमने साबित कर दिया की तुम मुझसे कितनी मोहब्बत करती हो स्वीट हार्ट। लव यू जान।"
"आखिर मुझे तुम्हारे पास तो आना ही था-तुमसे सच्चा प्यार जो किया है मैंने शहजाद। ले चलो मुझे यहां से,इस दुनिया से जहां हमारी सच्ची मोहब्बत की कद्र करने वाला कोई नहीं है। जहाँ प्यार करना गुनाह है।"
"यस बेबी,इसीलिए तो आया हूँ मैं। तुम्हे यहां से दूर,बहुत दूर ले जाने के वास्ते। अब तुम बिल्कुल आजाद होगी,और खुद अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी जीने का हक रख सकोगी। लेट्स गो।"
शहजाद ने कार स्टार्ट कर दी।
कुछ ही पलों में कार उस जगह को कुछ कर गई और अपने पीछे छोड़ गई उड़ती हुई धूल और आरजू की खोखली हंसी की गूंज...।
वहां के माहौल में एकाएक अजब सी उदासी और गजब की वीरानी पसर गई।

क्रमशः.................


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