एक थी...आरजू - 3 Satyam Mishra द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

एक थी...आरजू - 3

   

                 अगले दिन,
                 एक कॉफी हाउस में आरजू इत्तेफाकन उस नौजवान से टकरा गई जिसका नाम शहजाद था। आरजू की नजर जब उसपर पड़ी तो उसे अपनी ओर देखता ही पाया। वह अपने टेबल से उठ कर उस ओर चली गई जिधर वह बैठा न जाने कब से उसे ही देखे जा रहा था।
                 "हैलो हैंडसम"--वह उसके समीप जा कर कातिलाना अंदाज में मुस्कराई--"तुम यहां कैसे?"
                 "क्यों मैडम मैं यहां नहीं आ सकता--इस जगह पर क्या सिर्फ आपका ही हक है?"
                 "नो...मेरा ऐसा मतलब नहीं था?''
                 "जानता हूँ"--वह हौले से हँसा,बोला--"मजाक कर रहा था। वेट कर रहा हूँ मैं यहां अपने फ्रेंड का। आपको देखा तो देखता रह गया...आप प्लीज तशरीफ़ रखिये।"
                 वह एक चेयर खिसका कर बैठ गई।
                 "कल मैं अच्छी तरह से आपको थैंक्यू भी न कह सकी थी। कहाँ चले गए थे आप? काफी देर तक आपको ढूंढती रही थी। अच्छा हुआ की हम एक बार फिर से यहाँ मिल गए। आपको एक कप कॉफी पिला कर थैंक्यू बोलना चाहती हूँ-?"
                 "व्हाय नॉट। श्योर। आपके साथ कॉफी पी कर मैं खुद को खुशनसीब समझूँगा।"
                 शहजाद की रजामंदी पा कर आरजू ने पास से गुजर रहे वेटर को अपनी ओर बुलाया और उसे दो कप कॉफी और पिज्जा लाने का ऑर्डर दिया।
                 वेटर लपक कर गया और जब वापस आया तो उसके साथ कॉफी और पिज्जा थे। उसने नाश्ता सर्व किया और फिर दूसरी ओर जा कर अपने कामों में मशगूल हो गया।
                 ''अपने बारे में कुछ बताइये न?"
                 "क्या बताऊँ?"
                 "कुछ भी"--आरजू ने गुजारिश की।
                 "मसलन-?"
                 "तुम्हारे घर में और कौन कौन है?"-वह सीधे 'आप' से 'तुम' पर आते हुई बोली।
                 "कोई नहीं है। फिलहाल तो एकदम तन्हा हूँ।"-वह एक लम्बी सांस ले कर बोला। मानो किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो-"वालिद साहब तो बचपन में ही इंतकाल फरमा गए थे। एक छोटा भाई था जिसे भी एक जानलेवा बीमारी के जरिये खुदा ने मुझसे छीन लिया। हाँ एक दूर की मौसी हैं जिनके पास बहुत ही कम जाना हो पाता है। रह सह के एक दोस्त ही है-संजय,जिसे अपना कह सकता हूँ इस दुनिया में।"
                 "कितना दर्द है तुममें,कितनी पीड़ा है तुम्हारी जिंदगी में।"--उसके स्वर में शहजाद के लिए बेशुमार भावनाएं और सहानुभूति प्रकट हो रही थी--"शहजाद तुम बिल्कुल अकेले नहीं हैं-मैं हूँ न। मेरे रहते तुम कभी खुद को अकेला और तन्हा मत समझना।"
                 "थैंक्यू आरजू,मुझे खुशी हुई की इस दुनिया में कोई मुझे समझने वाला तो मिला। कोई ऐसा तो मिला जिसे मेरे दुख, दर्द और तन्हापन से सरोकार हो। तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया।"
                 आरजू ने कप उठाया और शहजाद की ओर नजर दौड़ाई तो उसे अपनी ओर देखता ही पाया। ऐसा लग रहा था की वह उसके चेहरे के दीदार में दीन दुनिया से बेखबर खोया था। आरजू ने उसे आवाज दी पर उसे सुनाई न दिया। जब उसने उसके आंखों के सामने चुटकी बजाई तो उसकी तन्द्रा टूटी। वह झेंप सा गया।
                 "क्या बात है मिस्टर-किन ख्यालों में गुम हो गये थे?"--वह कॉफी सिप करते हुए बोली।
                 "तुम्हे पता है आरजू ये जो तुम्हारी आंखे हैं,वो समंदर से भी ज्यादा गहरी हैं,बस इन्ही में डूब गया था मैं।"
                 "कहीं तुम फिर से मजाक तो नहीं करने लगे।"
                 "नहीं आरजू"--अनजाने तौर पर शहजाद की नीली आंखे आरजू के आंखों में फिक्स हो गईं--"इस दफा मैं कोई मजाक नहीं कर रहा हूँ,मैं जो भी कह रहा हूँ वो हकीकत है। सचमुच ही तुम्हारी आंखों में डूब कर खो जाने को जी चाहता है,तुम्हारे परीचेहरा को देखते रहने को दिल करता है। तुम्हारी आंखे,ये सुतवां नाक,गुलाब के पंखुड़ियों के जैसे तुम्हारे ये रसभरे होंठ,ये रुखसार--सब कुछ तो तुममे गजब का है आरजू। तुम्हारे जिस्म से फूटती जवानी की ये महक किसे पागल नहीं कर देती है। मुझे...मुझे..तो ऐसा लग रहा है की मैं बस तुम्हे देखता जाऊं,तुम्हे चूम लूँ...।"
                 आरजू ने कप टेबल पर रख दिया।
                 उसकी आंखों में प्रेम के दीप जल उठे।
                 "शहजाद मैंने भी जबसे तुम्हे देखा है ऐसा लगता है की अपने काबू में नहीं रही हूँ।"--आरजू उसके समीप खिसक आई,इतना करीब की उसकी सांसे शहजाद के चेहरे पर टकराने लगी--"रात को तुम्हारे की ख्वाब देखती रही। सारी रात तुम्हारे बिना मिले चले जाने के कारण परेशां रही। आज जब फिर से तुम्हे देखा तो दिल खुश हो गया। ऐसा लगता है की मेरा दिल मेरे वश में नहीं रहा,आई थिंक मुझे तुमसे लव हो गया है। आय लव यू शहजाद।"
                 अगले ही पल,
                 जज्बातों का ऐसा तूफान उड़ा जिसमे दोनों खो गए। आरजू के जिस्म से उड़ रही परफ्यूम की भीनी भीनी और दिलकश महक शहजाद के दिमाग पर हावी हो चुकी थी। वह आसपास की दुनिया को भूल कर बस आरजू में खोया हुआ था। उसने आगे बढ़ कर बड़े हिम्मत के साथ अपने हाथ को उसके सिर के पीछे ले जा कर पकड़ा और अपने होंठ उसके थरथराते हुए लबों पर रख दिए। आरजू का वजूद उस जोरदार किस के असर से झनझना उठा। उसके सीने में तरंगे से उठने लगीं। उसने आंखे बन्द कर ली और सारे जहाँ को भूल कर बस उसमे खोती चली गई। जब शहजाद उससे परे हटा तो उसे आसपास का ख्याल आया। उसने आंखे खोल दी। उसके लबों की लाली बिखर गई थी जिसे उसने अपने रुमाल से साफ किया।
                 शहजाद उसे बहुत ही प्यार से देख रहा था।
                 मुस्करा रहा था।
                 मुस्कराता भी क्यों न-उसका प्यार कामयाब जो हो गया था।
                 "अब ऐसे क्या देख रहे हो"--आरजू ने फिर से उसे कहा--"कॉफी तो ठंढी हो गई तुम्हारी।"
                 "और दिल की आग भी"--उसने हाथ आगे बढ़ा कर पेशकश की--"अब अगर शहजादी साहिबा की इजाजत हो तो चलें कहीं घूमने?"
                 "व्हाय नॉट।"-आरजू ने उसके हाथों पर अपना हाथ रख दिया।
                 "माशाअल्लाह"-वह चौंका-"तुम्हारे हाथ कितने गर्म हैं? यू आर सो हॉट?"
                 वह उसकी शरारत पर मुस्कराई-"नॉटी बॉय।"
                 "वेटर-।"-फिर शहजाद ने घूमकर वेटर को आवाज लगाई।
                 वह करीब आया।
                 शहजाद ने बिल पे किया और वेटर को लम्बी टिप दी जिससे वेटर खुश हो गया। सलाम ठोंक कर वह चला गया तो दोनों भी अपनी अपनी चेयर से उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ पकड़े दोनों कॉफी हाउस के बाहर की ओर निकल पड़े जहां शहजाद की रॉयल इनफील्ड खड़ी थी।
                 दूर सड़क के पार दो निगाहें बराबर दोनों को घूरे जा रही थी।

                  क्रमशः.................

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Vishwa

Vishwa 4 महीना पहले

Maushmi Shekhar

Maushmi Shekhar 6 महीना पहले

Ranjna

Ranjna 6 महीना पहले