भटकन ही भटकन

-आलेख

 

भटकन ही भटकन

                                                                                                                                                                  -रामनारायण सुनगरया

 

            यह ऐसी स्थिति होती है कि कोर्इ भी मृगमरीचिका की तरह दिग्‍भ्रमित होकर इधर-उधर डोलता रहता है। कुछ भी निर्णय लेने में अपने आपको अक्षम पाता है। किसी भी स्थिति में उसे विश्‍वास अपने घेरे में नहीं ले पाता।  हर जगह अनिश्‍चय ही अनिश्‍चय प्रतीत होता है।

            किसी भी व्‍यक्ति, किसी भी सिद्धान्‍त, किसी भी परम्‍परा, किसी भी हालात इत्‍यादि पर वह स्‍पष्‍ट स्थिरता नहीं रख पाता है। इन अदृश्‍य बन्धनों में हम ऐसे जकड़ते चले गए। उन कारणों को ज्ञात करना आज अत्‍यावश्‍यक प्रतीत होता है तथा उन पर अंकुश लगाना हर विचारवान नागरिक का सामाजिक दायित्‍व हो गया है। आज जहॉं-जहॉं छोटे-बड़े स्‍वार्थपरक समूह गठित हो गए है, जो स्‍वलाभ के लिए समाज के शाश्‍वत मूल्‍यों को दीमक की तरह चाट रहे हैं। इनकी सक्रियता हर क्षेत्र में व्‍याप्‍त होती जा रही है।

            धर्मो के विशेषज्ञों ने मानवतादी मूल्‍यों को सर्वोपरि कहा है, मगर हमारे कत्ताधर्ताओं ने कठोर यथार्तवादी दृष्टिकोण को ही सारी समस्‍याओं का उद्गम बना दिया है। संवैधानिक, समाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक व पारम्‍परिक इन सभी के अपने-अपने प्रामाणिक नीति नियम है, जो घोषित प्रचारित सर्वमान्‍य व सर्वसुलभ है, यथार्थ में जो जिस डाल पर बैठा है, वह उस डाल का बादशाह है। उसका अपना एक मिशन है, उसके सारे कार्यकलापों का निर्धारण उसी के अनुसार होगा। फिर चाहे कितनी ही पुरानी मान्‍यताएं धूमिल ही क्‍यों न हो।

            भूमण्‍डलीकरण के जमाने में हानिकारक वायरस इतने शक्तिशाली तीव्रवेग से सारी दिवारों को चीरते हुये सम्‍पूर्ण सांस्‍कृतिक ढांचे को तहस-नहस करता हुआ आगे बढ़ रहा है। नैतिक मूल्‍यों का हर स्‍तर पर हास हो रहा है। छीना-झपटी गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा की आंधी ने हर व्‍यक्ति को अपनी चपेट में ले लिया है। हालात यह हो गया है कि चारों ओर भ्रष्‍टाचार, व्‍यवभिचार, बेरोजगार, बेईमानी, अपराध, वह भी नये-नये तरीकों से नि:संकोच बढ़ते जा रहे है़।

            मर्यादाओं व रिश्‍तों की सार्थकता पूरी तरह नष्‍ट हो चुकी है। ऐसे वातावरण में जब सारे प्रजातांत्रिक स्‍तम्‍भ अपनी विश्‍वसनीयता खो चुके हो। सम्‍पूर्ण सिस्‍टम को स्‍वार्थपरता के काले नाग ने जकड़ लिया हो। शाश्‍वत मूल्‍यों की कर्तव्‍यपरायणता की कब्रखुद चुकी हो।

            समाज की मूल शक्ति, युवापीढ़ी उच्‍च से उच्‍च शिक्षित भी, बेरोजगारी की भीषण मार से नहीं बच पर रही हो, किसान मजदूर जी तोड़ मेहनत के बाद भी सुखी ना रह पर रहा है, सिर्फ मुट्ठी भर लोग, सर्वसाधन सुख सम्‍पन्‍न हैं एवं चारों तरफ असंतोष व्‍याप्‍त है, इन सब विषमताओं में जूझते हुए जनता के हृदय में अनेक अपेक्षाएं जाग गई और हर नागरिक अपने-अपने तरीके से सपने बुनने लगा एवं उन्‍हें चरितार्थ करने की कोशिश में लग गया ।

            इसी के साथ पड़ोसी राज्‍यों ने भी कुछ उमीदों रखीं तथा अपने-अपने परिवेश के अनुसार कार्यक्रम तय किए। हर दिशा में तेजी से कार्य प्रारम्‍भ हुए। किसान खेती में जुट गए। तकनीकी कर्मचारी मशीनों में व्‍यस्‍त हो गए। शिक्षा, चिकित्‍सा, निर्माण तथा व्‍यापार में वृद्धि नजर आने लगी। एक आत्‍मस्‍वाभिमान जागृत हो गया।

            हर तरफ बिकास हो ऐसी कोशिश में लगे हैं। सड़क निर्माण, भवन निर्माण, खेती बाड़ी, खदान कार्य, व्‍यापार, नए उघोग लगाने में प्रोत्‍साहन देना, शिक्षा के क्षेत्र में विकास, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं में सुधार, बिजली के मामले में आत्‍मनिर्भरता। कोल्‍ड स्‍टोरेज का निर्माण, संविदा नियुक्त्तियॉं, बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता अथवा रोजगार के अवसर मुहैया करना। नए-नए प्रशिक्षण प्रोग्राम चलाना नगर निकायों एवं नगर पंचायतों को शक्तिशाली तथा आत्‍मनिर्भर बनाना, स्‍वचछ पीने के पानी व्‍यवस्‍था।

            भ्रष्‍टाचार और अपराध पर काबू पाना, पुलिस को चुस्‍त–दुरूस्‍त करना, ट्राफिक पर पर्याप्‍त ध्‍यान देना। परिवहन को सुविधा जनक बनाए रखना। सम्‍पूर्ण बिकास कार्यो की समय-समय पर समीक्षा करते रहना गरीबोन्‍मुखी योजनाओं के क्रियान्‍वयन में लेट लतीफी ना होना। इन्‍हें सुचारू रूप से चलते रहने के लिए आवश्‍यक धन उपलब्‍ध कराते रहना।

            कहने का तात्‍पर्य यह है कि शासन व प्रशासन के हर काम पर पैनी नज़र रखना इन सभी की मॉंनिटरी में जागरूक ना‍गरिक हमेशा सजग प्रतीत होते हैं।

            देश के विकास और समृद्धि में देश के हर नागरिक को अपनी भूमिका सुनिश्चित करके चलना होगा, तभी हम सबके सपने साकार होंगे। जागरूक नागरिकों के होते हुए असमाजिक तत्‍व, नक्‍सलवादी, अलगाववादी, धार्मिक उन्‍मादी, अपराधी इत्‍यादि सर नहीं उठा सकते हैं।

            इनको पैर पसारने से पहले ही पहचानना है, जो हमारी अमूल्‍य धरोहर अनेकता में एकता को खण्डित करना चाहते हैं। उन्‍ह‍ें निकाल बाहर फेंफना है। संगठित समाज, सुरक्षित समाज जो छोटे-छोटे समूह बनाकर समाज में साम्‍प्रदायिक जहर घोर रहें हैं। उन्‍हें बिल्‍कुल भी परपनें नहीं देना है। हर जागरूक नागरिेक का दायित्‍व है कि अपने देश को आदर्शोन्‍मुख बनाने देश यथोचित योगदान करें।

            आपको किसी और की तरफ ताकने की आवश्‍यकता नहीं है आप स्‍वयं विशाल प्राकृतिक संपदा सांस्‍कृतिक धरोहर लोक जीवन, विकसीत भारी उघोग-व्‍यापार शैक्षणिक स्‍तर पर उँचाइयां पहले से ही उपलब्‍ध हैं। जरूरत सिर्फ उन्‍हें व्‍यवस्थित करने की आवश्‍यक ऊर्जा सहित इन सब की दौलत का भण्‍डार जिसके पास हो वह विपन्‍न कैसे रह सकता है। बस जरूरत सिर्फ आत्‍माकलन एवं दृढ़ इच्‍छा शक्ति की है।

            देश निर्माताओं की परिकल्‍पनाओं के अनुरूप विकास की ओर अग्रसर हो, ऐसी व्‍यवस्‍थाओं के लिए सरकार के साथ-साथ आम नागरिक के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता है। गठन की प्रक्रिया में अनेक बुराइयां भी जन्‍म लेती है। विनाशकारी तत्‍व अपनी जड़ जमाने लगते हैं। मौका परस्‍त लोग, ताक में रहते हैं कि कब संवेदनशील समय या परिस्थिति आये और वे अपनी विनाशलीला को अंजाम दे डालते हैं।

            ऐसे विषैल दरिन्‍दों को समूल नष्‍ट करने में मदद करें। हमारा देश निर्बाध रूप से फले-फूले कर तरफ हंसी-खुशी हो, चारों ओर हरियाली की छटा बिखरी हो। प्रफुल्‍लतापूर्ण वातावरण में हर प्रतिभा को उभरने तथा प्र‍गति करने का समुचित करने का समुचित अवसर मिले। सम्‍पूर्ण माहौल में खुशियां व्‍याप्‍त हों।

            प्रत्‍येक सार्वजिनक कार्यो में पार‍दर्शिमा का अपना एक महत्‍व है। यह सब तभी सम्‍भव है जब आम जनता भी हमारे कर्णधारों के कार्यक्रमों नीति-रीति पर कड़ी नज़र रखे। उनके क्रियाकलापों को परखते रहें और समय-समय पर आगाह करते रहें। ताकि बहुसंख्‍यक जनता के कल्‍याण में, विकासशील कामों को बल मिले। किसी तरह की संदिग्‍धता न हो यदि हम भटके तो सारा का सारा माहोल भटक जाएगा एवं चारों ओर दुविधा की स्थिति निर्मित हो जाएगी तथा सम्‍पूर्ण वातावरण में अस्‍पष्‍ट भटकन व्‍याप्‍त हो जाएगी, चारों ओर अविश्‍वास के बादल मंडराने लगेंगे एवं भटकन और भटकन का सिलसिला फिर चल पड़ेगा।

            इससे बचने के लिए सभी वर्गों को समान विकास के अवसर देकर संगठित रखना ही आदर्श देश का मूल मंत्र है।.........

 

                                              ♥♥♥ इति ♥♥♥

 

 

संक्षिप्‍त परिचय

 

 

1-नाम:-   रामनारयण सुनगरया

2- जन्‍म:–   01/ 08/ 1956.

3-शिक्षा –  अभियॉंत्रिकी स्‍नातक

4-साहित्यिक शिक्षा:– 1.  लेखक प्रशिक्षण महाविद्यालय सहारनपुर से

           साहित्‍यालंकार की उपाधि।

            2.  कहानी लेखन प्रशिक्षण महाविद्यालय अम्‍बाला

              छावनी से ।

5-प्रकाशन:--  1.  अखिल भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में कहानी लेख इत्‍यादि

समय- समय पर प्रकाशित एवं चर्चित।

          2. साहित्यिक पत्रिका ‘’भिलाई प्रकाशन’’ का पॉंच साल

              तक सफल सम्‍पादन एवं प्रकाशन अखिल भारतीय स्‍तर

              पर सराहना मिली ।

6- प्रकाशनाधीन:-- विभिन्‍न विषयक कृति ।

7- सम्‍प्रति---    स्वृनिवृत्त्िा के पश्‍चात् ऑफसेट प्रिन्टिंग प्रेस का संचालन

              एवं  स्‍वतंत्र लेखन।

8- सम्‍पर्क :-     6ए/1/8 भिलाई, जिला-दुर्ग (छ. ग.)

                मो./ व्‍हाट्सएप्‍प नं.- 91318-94197   

 

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Ramnarayan Sungariya

Ramnarayan Sungariya 4 महीना पहले

युवाओं की भटकन का सजीव चित्रण ।पठनीय है ।