स्वतंत्र सक्सेना की कहानियाँ - 2 बेदराम प्रजापति "मनमस्त" द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

स्वतंत्र सक्सेना की कहानियाँ - 2

स्वतंत्र सक्सेना की कहानियाँ

swatantr saxena ki kahaniyan

संपादकीय

स्वतंत्र कुमार सक्सेना की कहानियाँ को पढ़ते हुये

वेदराम प्रजापति ‘मनमस्त’

कहानी स्मृति की पोटली होती है| जो कुछ घट चुका है उसमें से काम की बातें छाँटने का सिलसिला कहानीकार के मन में निरंतर चलता रहता है| सार-तत्व को ग्रहण कर और थोथे को उड़ाते हुए सजग कहानीकार अपनी स्मृतियों को अद्यतन करता रहता है, प्रासंगिक बनाता रहता है|

स्वतंत्र ने समाज को अपने तरीके से समझा है | वे अपने आसपास पसरे यथार्थ को अपनी कहानियों के लिए चुनते हैं| समाज व्यवस्था, राज व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की विद्रूपताओं को सामने लाने में स्वतंत्र सन्नद्ध होते हैं| राम प्रसाद, किशन और दिलीप के चरित्र हमारे लिए जाने-पहचाने हैं | ये चरित्र शासनतंत्र से असंतुष्ट हैं और संघर्षशील हैं| उन्हें पता है कि लड़ाई बड़ी कठिन है| एक तरफ पूरी सत्ता है और दूसरी तरफ एकल व्यक्ति |

अपने कथाकार की सीमाओं की खुद ही पहचान करते हुए स्वतंत्र लेखनकार्य में निरंतर लगे रहें, हमारी यही कामना है|

संपादक

कहानी

परफॉरमेंस

स्वतंत्र कुमार सक्सेना

अरे!मास्साब !आज तुम फिर आ गए अबे काल ई तो आए ते

दिलीप -‘इसमें ऐसे क्यो आश्‍चर्य कर रहे हैं। रोज स्कूल आना मेरी ड्यूटी है।’

-‘पहले वाले मास्साब तो अटठा के अटठा आते। ’

-‘किस दिन आया करते?’

-‘जो ऊ पक्को न रहतो जब उनको मन होए’

दिलीप-‘ फिर रोज स्कूल कौन खोलता ?’

-‘अरे तुम सोऊ मास्साब! मोड़ा मोडी खोल लेते। दोपहरी के भोजन बँटतो न । दार रोटी कभँऊ खीर पूड़ी।’

दिलीप-‘जब अफसरों का दौरा होता तब ?’

-‘अरे वे बिने फोन कर देते उनके हितू संघाती बता देते अब तो मोबाइल चल गए सो मास्साब आ जाते ।’

आज दिलीप जी अपनी नई पदस्थापना के स्कूल में दूसरे दिन आए थे। समय पर स्कूल पहंचे। वे लगातार पंद्रह किलो मीटर साईकिल चला कर पहुंचे थे।एक ग्रामीण ने उन्हें देखा उससे वार्तालाप हो रहा था।उनके स्कूल के प्राध्यापक महोदय एक बजे दोपहर मोटर साईकिल सें आए। उन्हें देखते ही बोले-‘अरे!दिलीप जी आप इतनी जल्दी आ गए ,कैसी तो सड़ी गर्मी पड़ रही है। गाँव में बिजली भी नहीं है।’

स्कूल के बच्चे अपने बस्ते में किताबों की जगह पर थाली कटोरी गिलास रख कर लाए थे। आते ही सब लाईन लगा कर बैठ गए । खाना क्या था अधपकी पानी वाली दाल/सब्जी कच्ची पक्की जली रोटियां। दो तीन दिन वे देखते रहे। फिर एक दिन जब बच्चे खाना खाने तैयार हुए तो उन्होने अपने थैले से एक लाइफबॉय साबुन की टिकिया निकाली और बोले -‘चलो बच्चो!खाना खाने से पहले सब हैन्ड पम्प पर हाथ धोएंगे।’बच्चे उनके आदेश पालन में लाईन लगा पर हैन्ड पम्प पर पहुंचे।स्वयं दिलीप जी हैन्ड पम्प चलाने लगे फिर एक बड़े बच्चे ने हैन्ड पम्प का हत्था सम्हाल लिया ।दिलीप जी बोले अच्छा बच्चो बताओ-‘ कब कब हाथ धोना चाहिए ।’

बच्चे पहले तो मौन रहे फिर एक छोटी बच्ची साहस कर के बोली -‘खाना खाने से पहले ।

दिलीप जी -‘शाबास;’ और कब?

बहुत सोच कर दूसरा बच्चा बोला -‘मास्साब।’ दिलीप जी -‘मास्साब नहीं गुःरु जी ’

लड़का -‘गुरु जी बाहर जाने के बाद ।’

दिलीप जी -‘शाबास !हाँ बिल्कुल सही सब लेाग मेरे साथ मिल कर बोलो शौच के बाद ।’

तब तक स्वसहायता समूह की रामकली हाथ धोने आ गईं दिलीप जी उन्हें देख कर उनकी ओर इशारा कर बच्चों से बोले -‘ ये क्यों हाथ धोने आ गईं?

सब बच्चे एक साथ बोले-‘ भोजन परोसने से पहले ।’

दिलीप जी -‘ अच्छा और कब?

सब बच्चे फिर चिल्लाए -‘ भोजन बनाने से पहले।’

दिलीप जी-‘ आप सब को याद तो है पर हाथ धोते नहीं थे भूल जाते थे आज से हम रोज धोएंगे ठीक है बच्चो।’

कुछ बच्चे अलग पंक्ति में बैठे थे।दिलीप जी ने रामकली से पूंछा -‘ अरे ये इतनी दूर क्यों बैठे हैं?’ रामकली कुछ न बोली ं बस हल्के से मुस्करा दीं । दिलीप जी उन पंक्तियों को तो एक न कर सके पर एक दिन उनके पास बैठ गए और बोले-‘ मुझे भी एक रोटी व दाल दे दो ।’

कुछ दिनों के बाद वे एक दिन बच्चो से बोले -‘हाथ धोने के बाद सब बच्चे मेरे साथ गिनती बोलेगे ।’वे प्रतिदिन संख्या बढ़ा देते फिर पहाड़ों का क्रम चालू हो गया ।। इससे भोजन के पहले का मौन वातावरण कोलाहल में बदल जाता बच्चे पूरी ताकत से चिल्लाते कि दिलीप जी की आवाज दब जाती ।

यह हंगामा कुछ दिन देखते रहने के बाद एक दिन मुख्य अध्यापक महोदय बोले-‘ क्यों बेकार जोर लगाते हो। इस मेहनत को कोई देखने वाला नहीं ।इसका कोई मूल्योकन नहीं पढ़ाओ या नहीं ।’

दिलीप जी -‘ स्कूल की प्रगति को कोई नहीं देखता ?’

मुख्य अध्यापक महोदय-‘ कोई नहीं। अब यह मत कहें भगवान देखता है ।मुझे नहीं मालूम।

दिलीप जी -‘पर अफसर जो बहुत आते हैं। निरीक्षण टीप भी लिखीं गई हैं ।’

मुख्य अध्यापक महोदय मुस्करा दिए ।

एक दिन वे बच्चों को अंग्रेजी के अक्षर सिखा रहे थे। कि एक ग्रामीण बुजुर्ग आकर र्बठ गए -‘अरे गुरुजी आप तो उन्हें अंग्रेजी सिखा रहे!’

थ्दलीप जी -‘ हाँ थोड़ी अभी सीख जाएंगे तो आगे सरलता होगी ।’

ग्रामीण बुजुर्ग-‘ अरे पर उन्हें का काम आएगी । खोदने तो वो ई माटी है।’

दिलीप जी -‘माटी खोदने? दादा क्या मतलब?’

ग्रामीण बुजुर्ग-‘हाँ कौन से लाट कलेक्टर बननों गूजर हैं वे ई रहेंगे किसान के बेटा।’

दिलीप -‘गूजर जाट यह क्या दादा ?’

ग्रामीण बुजुर्ग-‘हाँ सरकारी नौकरी तो मिलनो न माटी ही खोदेंगे और का करेंगे?’

दिलीप जी -‘तो क्या दादा मात्र सरकारी नौकरी के लिए पढ़ा जाता है।फिर गुर्जर तो बड़े बड़े पदों पर हैं मंत्री हैं अफसर हैं उद्योग चला रहे हैं व्यापारी हैं क्या नहीं हैं ।’

ग्रामीण-‘अरे विनकी नईं कहत वे बड़े बड़े आदमी ज गाँव के तो बस हल हांकेंगे खेती करेंगे या भैंसें चराएंगे।’ तुम का उन्हे नौकरी दिलाओगे?’

दिलीप जी-‘हाँ दादा! बच्चे पढ़ेंगे तो आगे बढ़ेंगे मात्र नौकरी ही नहीं न जाने क्या क्या करेंगे ज्ञान जिंदगी को सरल बनाता है हमें समस्याओं से लड़ने की शक्ति देता हैं। सूझ बूझ देता है।इन्हें पढ़ने से न रोकें।

ग्रामीण-‘अरे मैं कहाँ रेाक रओ तुम जांदा लगे रहत तईं मैंने कही । अपनी ड्यूटी करते । जांदा कछू नहीं होने ऐन लगे रओ ।’

दिलीप -‘नहीं दादा ज्यादा कुछ होगा जरूर होगा ।’

एक दिन वे स्कूल आ रहे थे कि गाँव में घर से बाहर खाट पर एक किशोर कुछ पढ़ता दिखा उसने नमस्कार किया -‘ गुरुजी नमस्ते।’

दिलीप-‘नमस्ते क्या पढ़ रहे हो?

बालक -‘गुरु जी!परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ।कुछ समझ नहीं आ रहा तो याद भी नहीं हो रहा ।’

दिलीप -‘मेरी कक्षा की पढ़ाई पूरी हो जाने पर आ जाना मिल कर समझ लेगे।’

और धीरे धीरे और भी विद्यार्थी पहुचने लगे नवीं दसवीं ग्यारहवीं बारहवीं के उनकी भी एक अतिरिक्त कक्षा लगने लगी ।

जब परीक्षा हुई तो उनके विद्यालय का एक विद्यार्थी पूरे जिले में प्रथम आया व मिडिल का परीक्षा परिणाम शत प्रतिशत आया । सभी आश्‍चर्य चकित थे।उनकी अतिरिक्त कक्षा के नवीं दसवीं ग्यारहवीं बारहवीं के विद्यार्थी भी सफल रहे कुछ प्रथम श्रेणी में सफल रहे। ऐसा उस गाँव में पहली बार हुआ ।गाँव वाले तो इस सबका श्रेय दिलीप जी को दे रहे थे। सारे विद्यार्थी उनके चरण स्‍पर्श कर रहे थे उनके माता पिता कृतज्ञता ज्ञापन कर रहे थे । पर विभाग ने इसका श्रेय मुख्य अध्यापक महोदय को दिया।अगले सत्र में अब विद्यालय का वातावरण ही बदल गया था। अन्य अध्यापक भी नियमित कक्षाएं लेने लगे।पढ़ाई का स्तर बढ़ गया ।विद्यार्थियों की संख्या बढ़ गई।नियमित आने लगे । गाँव वाले सहयोग करने लगे । स्कूल में अन्य गतिविधियां होने लगीं । और एक दिन दिलीप जी का स्थानान्तरण आदेश आ गया।वे कार्य मुक्त हो कर चले गए ।गाँव वालों ने बढ़ी भाव भीनी विदाई दी ।

एक दिन वे जिला शिक्षा अधिकारी के दफतर में बैठे थे। तो बड़े बाबू हलधर बाबू ने उन्हें बताया।

हलधर बाबू-‘अरे दिलीप जी !आपका ट्रांसफर होता नहीं पर डी. ई.ओ साहब (जिला शिक्षा अधिकारी महोदय) दबाव में थे।

दिलीप -‘ अरे साहब मेरे काम से असंतुष्ट थे?’

हलधर बाबू -‘ नहीं वे तो संतुष्ट थे ।उन्हें आपसे कोई शिकायत नहीं थी। असल में उन्हें आपसे कोई ज्यादा मतलब ही नहीं था।’

दिलीप-‘ फिर?’

हलधर बाबू-‘ एम. एल. ए. साहब की तरफ से दबाव था।’ उनको निर्देश था।

दिलीप -‘क्यों?’

हलधर बाबू-‘ आपने सब गड़बड़ कर दिया।’

दिलीप -‘आश्‍चर्य चकित होते ,मुझे बताएं क्या गड़बड़ कर दिया ताकि मैं सुधार सकूं।

हलधर बाबू -‘अब क्या सुधारोगे। आप रोज स्कूल जाते थे। तो अन्य स्टाफ व वर्मा जी (मुख्य अध्यापक महोदय) को भी जाना पड़ता था।’

दिलीप-‘ पर वह तो हम सब की ड्यूटी है!’

हलधर बाबू -‘ आप अब भी नहीं समझे। वर्मा जी अपने निवास पर नियमित कोचिंग क्लास चलाते हैं ।नवीं दसवीं ग्यारहवीं के स्टूडेंट्स को घर पर ट्यूशन से पढ़ाते हैं। अतः स्कूल जाने का टाईम नहीं रहता ।प्रतिदिन आपके स्कूल जाने से उन्हें भी ज्यादा स्कूल जाना पड़ा अतः कोचिगं का टाईम टेबिल गड़बड़ा गया । दूसरे आप नवीं दसवीं से बारहवीं तक के स्टूडेंट्स को फ्री में फालतू में गांव में ही ट्यूशन देने लगे ।

दिलीप -‘वे तो थोड़े से ही विद्यार्थी थे फिर मात्र एक घंटा वह भी दो माह तक सिर्फ गाईड करता था। वे मेहनती बेहतरीन विद्यार्थी थे। फिर वे ट्यूशन करने में सक्षम न थे वरना पहले ही कहीं ट्यूशन करते, वे सफल हुए मुझे खुशी हुई।।’इसमें मैं ने क्या गलत कर दिया?’

हलधर बाबू-‘सफल अरे मिडिल का एक स्टूडेंट पूरे डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट बाकी सारे पास सेंट पर सेंट रिजल्ट। आपने जो पंदरह स्टूडेंट नवीं दसवीं ......के पढ़ाए उनमें से छह फर्स्ट डिवीजन बाकी गुड सेकेन्ड फिर केवल दो महीने की कोचिंग जैसा आप कह रहे केवल गाईड किया गधे घोड़े बना दिए ऐसा क्या किया घोल कर पिला दिया!आपने जादू कर दिया ।

दिलीप -‘पर मैने इसका कोई क्रेडिट नहीं लिया । स्कूल का नाम हुआ । वर्मा जी पुरुस्कृत हुए ।’

हलधर बाबू -‘क्रेडिट! अरे आपके नाम का सारे जिले में डंका बज गया है। सारे ट्यूशन वाले ि‍शक्षक आर्थिक क्षति की आशंका से परेशान हैं केवल दो महीने की कोचिंग वह भी गांव में घर बैठे फ्री में वह भी केवल गाईड जैसा आप कह रहे हैं ।वह भी ऐसा चमत्कारिक रिजल्ट ! फिर साल भर ट्यूशन कौन पढ़ेगा । सारा मार्केट खराब करके रख दिया। नकल माफिया अलग रोष में है कापी किस ने जांची फिर से वेल्यूएशन हो कहीं कुछ गड़बड़ है।जरूर पेपर आऊट होगा ।वर्मा जी ने ही एम.एल. ए. साहब से प्रेशर डलवाया। विभाग को भी प्रसन्न किया।

दिलीप जी -‘पर वर्मा जी तो बड़े दुखी हो रहे थे। मेरे काम पर बार बार कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

हलधर बाबू -‘समझा करो वह तो आपकी किस्मत अच्छी थी ।एम. एल. ए. साहब का ड्राईवर कल्लू अड़ गया -‘वाह साहब काऊ ने अच्छो काम करो तुम वाये जो इनाम दे रये?उसका बेटा सुरेन्द्र दो साल से मिडिल में फेल हो रहा था ।कल्लू का साढ़ू महाराज पुर में ही है।वहीं भर्ती करा दिया थाकि कैसे भी पास हो जाए । वह पास हो गया वह कल्लू (बाप)से रोज रोज आपकी बढ़ाई किया करता था। अतः कल्लू के कहने से आपको दूर न फेंक कर नगर के पास की आदिवासी बस्ती मेंस्थानान्तरित कर दिया।इधर वर्मा जी भी बार बार चक्कर काट रहे थे कि उस स्कूल में नहीं रहना चाहिये ।साहब मेरी बात रखें ।अतः बीच का रास्ता निकाला गया । आपका आदेश निकलते ही सब हँस रहे थे अब वहाँ सहरियों में दिखाएं अपना परफॉरमेंस।

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ramgopal bhavuk

ramgopal bhavuk मातृभारती सत्यापित 1 साल पहले

राजनारायण बोहरे

शिक्षा जगत की सच्ची दास्तान

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