त्रिखंडिता - 7 Ranjana Jaiswal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

त्रिखंडिता - 7

त्रिखंडिता

7

उसे परेशान देखकर तड़प उठता| उन दिनों आनंद की हरकतों से वह दुखी थी| अपने को असहाय और अकेला महसूस करती थी| वह तन से ज्यादा मन का अकेलापन था, जो धीरे धीरे उसे खाने लगा था| फिर अनवर ने उसके अकेलेपन को भर दिया| आनंद के बारे में भी अनवर ने बहुत बातें बताईं थीं, पर तब उसने उसे डांट दिया था| विश्वास ही नहीं था कि प्रगतिशील विचारधारा वाले आनंद ऐसा भी कर सकते हैं पर बाद में उसे खुद सबूत मिलता गया | तब उसे लगा कि अनवर उसे आनंद के खिलाफ भड़का नहीं रहा, बल्कि उसके लिए चिंतित है|

उसके घर के ठीक पीछे एक मकान है, जिसमें उन दिनों बतौर किराएदार एक गरीब मुस्लिम परिवार रहता था| उस परिवार में नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक किशोरी भी थी| अलग बाथरूम न होने के कारण पीछे बने छोटे से आँगन में, जहां हैंडपाइप था –वह परिवार नहाया करता था | आँगन ऊपर से खुला था| अगल-बगल की छतों से वह आँगन साफ दिखता था| सुबह स्कूल जाने से पहले वह किशोरी आँगन में निश्चिंत नहाती थी | उस समय आस-पास की छतों पर कोई नहीं होता था | पर इस बात से वह बेखबर थी कि दो जोड़ी अधेड़ आँखें उसे रोज निहारती हैं| अनामा को भी यह बात पता नहीं थी, पर वह देखती थी कि सुबह होते ही आनंद हाथ में ब्रश लेकर छत पर चले जाते हैं | वह घर के काम में लगी रहती थी | मन में कोई शक भी नहीं था| पर एक दिन अनवर ने फोन पर उससे पूछा –आपके घर के पीछे कोई माल रहता है, उसे देखने आना है | वह चौक पड़ी–माल ..!नहीं तो ...|

रहता है जानदार माल !..हर सुबह दो सूरज उगते है वहाँ ...| उसका जलवा आह !

-क्या बक रहे हो ?मेरे घर के पीछे तो एक बच्ची अपने परिवार के साथ रहती है | फिर तुम तो कभी मेरी छत पर गए नहीं, फिर कैसे जानते हो?

वही तो..... बूझिए ...आपके पति रस ले-लेकर छत से देखे गए रसलीला की बातें आफिस में सबसे बताते फिर रहे हैं| एक दिन खुद देख लीजिए| इतनी भोली बनकर धोखा खाएँगी | अपने आदर्श पति के तथाकथित माल के दर्शन तो कर लीजिए|

-पहली बात मुझे 'माल' शब्द से चिढ़ है | लड़की को माल कहने वालों को मैं माफ नहीं कर सकती| दूसरी बात पीछे बेहद गरीब नौवीं में पढ़ने वाली मुस्लिम बच्ची रहती है, कोई बड़ी लड़की नहीं ..|

मुसलमान शब्द सुनकर अनवर का स्वर गंभीर हो गया| उसे शायद बुरा लगा था| अभी तक हिन्दू परिवार की लड़की समझकर वह भी मजे ले रहा था, अब वही बात उसे अनैतिक लगने लगी थी| कितने गहरे होते हैं ये धर्म के संस्कार| पर कोई भी धर्म मानवता से बड़ा तो नहीं हो सकता| गलत चीज तो हर हाल में गलत होती है धर्म के कारण बदल कैसे सकती है ?पर धर्म के उन्माद में लोग मानवता भूल जाते हैं तभी तो हर दंगे-फसाद, युद्ध या आपदा में एक कौम दूसरी कौम की स्त्रियॉं के साथ बुरा सलूक करती है| जबकि स्त्री तो हमेशा शांति चाहती है| मर्द ही अपनी महत्वाकांक्षा के कारण युद्ध ठानते हैं पर यातना सहती हैं स्त्रियाँ |

उसने आनंद को अनवर से हुई बातचीत के संबंध में कुछ नही बताया| पर दूसरे दिन सुबह जब वे छत पर गए तो चुपके से दबे पाँव वह भी वहाँ जा पहुंची| छत का दृश्य देखकर तो उसे मानो काठ मार गया| छत की कच्ची बाउंड्री की एक ईंट निकालकर मोका बनाया गया था, जिससे पीछे के आँगन में देखा जा सके | बाद में उसमें ईंट लगा दी जाती थी ताकि उसे पता न चले| छत पर खड़े होकर देखने से आँगन में नहा रहा व्यक्ति जान लेता की कौन झांक रहा है, फिर विवाद हो सकता था, इसलिए उसका प्रगतिशील, नारी अधिकारों का पक्षधर पति छत पर उकड़ूँ बैठा मोके से झांक रहा था | उसने आँगन में देखा तो बच्ची मात्र चड्ढी में नहा रही थी| गोरे कमसीन शरीर पर बिजली के खिले फूल पानी की बूंदों से धुलकर और भी धवल आभा से चमचमा रहे थे|

उसकी आहट पाकर आनंद के होश उड़ गए| उसने पूछा-ऐसे उकड़ू क्यों बैठे हुए हैं ?कहाँ झांक रहे हैं ?

वे घबराकर उठ खड़े हुए –कुछ नहीं बस ऐसे ही व्यायाम कर रहा था|

-हाथों में ब्रश लेकर मोके से झांकना भी व्यायाम है क्या | व्यायाम आँखों का है या फिर ... | आप रोज इसी व्यायाम के लिए छत पर आते हैं |

‘तुम मेरी जासूसी कर रही हो ..?

-मुझे पहले से पता था पर खुद देखना चाहती थी|

‘अच्छा! पर तुम कैसे जानती थी ?

-सारी दुनिया को आप अपनी बहादुरी के कारनामे बताते हैं तो कैसे नहीं जानती ?

‘समझ गया जरूर उस अनवर ने चुगली की होगी | एक कमीना है|

-और आप कैसे हैं ?बेटी की उम्र की बच्ची को नहाते हुए देखते हैं| और लोगों से रस ले-लेकर उसके अंग-प्रत्यंगों का बखान करते हैं | कितनी भूख है आपको देह की ?वैसे तो बड़ी-बड़ी प्रगतिशील बाते करते हैं|

क्या हो गया ?लोग ब्लू फिल्म भी तो देखते हैं | देखने वाली चीज को तो देखेँगे ही|

-शर्म नहीं आती अगर वह आपकी बेटी होती तो..|

‘चलकर साले की खबर लेता हूँ आग लगाता है | यह कहते हुए आनंद बिना किसी ग्लानि के नीचे उतर आए | वह उनकी इस बेहयाई पर अवाक रह गयी|

...तो... अनवर ठीक कहता है इनके बारे में|

ये तब की बात थी, जब अनवर से उसके रिश्ते प्रगाढ़ नहीं हुए थे बस सामान्य सा परिचय था| शादी के बाद आनंद के आफिस वालों ने पार्टी देने पर ज़ोर दिया तो एक छोटी सी पार्टी हुई थी| पहली बार अनवर ने उसे वहीं देखा था| उसने तो उसपर ध्यान नहीं दिया, पर वह उसे पसंद करने लगा था| फिर आफिस से आनंद के सामने ही फोन करने लगा | आनंद ने भी उसे कभी मना नहीं किया | तब उनसे काफी क्लोज था| आफिस में सबसे कम उम्र का होते हुए भी काम-काज में कुशल था, इसी कारण सभी का चहेता बन गया था| सभी को उससे काम पड़ता था | मैनेजमेंट तक उसकी पहुँच थी|

उससे परिचय होने के बाद वह आनंद की हर बात उससे बताने लगा| विशेषकर वे बातें जो आफिस या और कहीं भी वे उसके बारे में कहते थे | उसे बुरा लगता कि कोई अपनी पत्नी का जिक्र सिर्फ देह रूप में कैसे कर सकता है ?कितनी तरह की काम-कलाएं और कितनी बार आनंद के प्रिय विषय बन गए थे | अनवर उससे कहता –‘मुझे अच्छा नहीं लगता उनका आफिस में बिस्तर की बातें शेयर करना | कोई और शख्स तो नहीं करता इस तरह की बातें, वो भी पत्नी के संबंध में| मुझे तो लगता है वे आपको पत्नी ही नहीं मानते|

अनामा को बुरा लगता | पर उसे पता था कि आनंद इस तरह की बातें कर सकते हैं | घर पर उसके सामने ही फोन पर अपने मित्रों से वे इस प्रकार की नग्न भाषा का प्रयोग करते कि वह कट कर रह जाती | पर क्या करती ?यह उनके स्वभाव का जैसे एक अंग ही था| प्रारम्भ से ही वे ऐसे लोगों के बीच उठते-बैठते रहे थे, जो खुलेपन व नंगेपन को ही प्रगतिशीलता समझते हैं| सामाजिक अनुशासन जिनके लिए पिछड़ापन है और सभ्य भाषा, सभ्य आचरण सामंतवाद | वे तो अपनी समलैंगिकता के किस्से भी यूं बता जाते, गोया इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं| अपने मामा से भी उनके ऐसे रिश्ते रहे और कईयों से भी| यह खुद उन्होने ही उसे बताया था| उनके पास कोई भी लड़का चैन से नहीं सो सकता था | एक बार उनका रिश्ते का भतीजा घर आया था| कमरा एक ही था इसलिए उसने दोनों को एक साथ सोने को कहा और खुद छत पर जाकर सो गयी | सुबह भतीजे की लाल आँखें देखकर उसने कारण पूछा, तो वह शर्माते हुए बोला-आंटी अंकल नींद में रात भर परेशान करते हैं| उसने सोचा- शायद 40 की उम्र तक स्त्री सुख से वंचित रहने के कारण ये यौन-कुंठित हो गए हैं| बेचारे बदसूरत और खाली जेब होने के कारण किसी लड़की को तो नहीं पटा पाए होंगे या फिर शायद यह भी उनके प्रगतिशील होने का प्रमाण हो |

एक बार वह और शर्मिंदा हुई, जब उसके एक मित्र कामता प्रसाद ने उससे उनकी शिकायत की | मित्र की पत्नी इन्हें राखी बांधती थी| इस नाते उसकी किशोर बेटियाँ इन्हें मामा कहकर पैर छूती थीं| मित्र का आरोप था कि झुक कर पैर छूने वाली बेटियों को वे बगल से पकड़कर उठाते हैं| समय-कुसमय कभी भी घर आ टपकते हैं और सीधे बड़ी बेटी के कमरे मे चले जाते हैं | उसके बिस्तर पर लेट जाते हैं रज़ाई में घुस जाते हैं | उसे छू-छूकर बात करते हैं | उनके या दूसरे कमरों में नहीं बैठते | संकोच की वजह से पत्नी कुछ कह नहीं पातीं| आप उन्हें मना कर दीजिए | घर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है | बाकी बच्चे उन्हें देखते ही मुस्कुराने लगते हैं कि अब ये सीधे दीदी के कमरे मे घुसेंगे| बहुत बुरा लगता है | आपके नाते ही रिश्ता जुड़ा था| आप ही इस तरह समझा दीजिए कि उन्हें बुरा भी न लगे| उसने उन्हें आश्वस्त किया पर खुद संकोच में पड गयी कि उनसे इस तरह की बात कैसे करे ?जब वे घर आए तो सहज भाव से उसने बस इतना ही कहा-आप मेरे साथ ही कामता प्रसाद जी के घर जाया करें|

उसके इतना कहते ही आनंद बमक उठे –क्यों कुछ कह रहा था क्या ?ठीक कर दूँगा उसे| उसे आश्चर्य हुआ कि उसने अभी उन्हें कुछ बताया ही नहीं, फिर भी !इसका अर्थ सूचना सही है| इसे ही कहते हैं 'चोर की दाढ़ी में तिनका'| वह तो अभी तक कामतप्रसाद की बातों को पूर्वाग्रह ही मान रही थी |

आनंद पर इतना विश्वास तो था कि वे रिश्तों की कदर करेंगे| वे खुले विचारों के हैं नीयत में खोट नहीं | शायद इसीलिए बच्ची के कमरे में चले जाते होंगे| छू-छूकर बात करते होंगे, पर उनका नाराज होना कुछ और ही कह रहा था |

उसके कुछ ही दिन बाद मुस्लिम किशोरी वाली घटना हुई, फिर तो जैसे इनकी कलई ही उतरने लगी | वह गौर करने लगी कि उसके साथ होते हुए भी वे उससे आँखेँ बचाकर किशोरियों के उभरते यौवन को निहारा करते हैं | एक दिन तो हद हो गयी | वे कुछ नीली फिल्में ले आए और उसे भी साथ देखने का आग्रह करने लगे| वह थकी हुई थी दिन भर नौकरी की थकान उसे रात में जागने की इजाजत नहीं दे रही थी| उसके मना करने पर नाराजगी दिखाने लगे| उनका मन रखने के लिए उसने उड़ती नजरों से फिल्म पर नजर डाली और घोर वितृष्णा से उसका मन भर गया| फिल्म की नायिकाएँ किशोरियाँ ही थीं, बच्चियाँ कहना ज्यादा सही होगा| एक सहवास के दृश्य में चेहरा बच्ची का था| उसकी भाव-मुद्राएँ देखकर वह सहम गयी थी| पर जब कैमरा उसके कमर के नीचे के जिस्म पर फोकस हुआ और सहवास दिखाया जाने लगा तो वह मुंह फेर कर लेट गयी| तभी उसने जो सुना, उसे सुनकर लगा जैसे किसी ने पिघला शीशा उसकी कान में डाल दिया हो| आनंद कह रहे थे –बेवकूफ बना रहे हैं नीली फिल्म बनाने वाले | चेहरा तो कमसीन लड़की का है पर कमर के नीचे का सब कुछ किसी अधेड़ औरत का है|

स्त्री होकर भी स्त्री के गुप्त अंगों की पहचान वह इस तरह नहीं कर सकती थी| उस दिन उसे महसूस हो गया कि उसने गलत आदमी से विवाह कर लिया है| ये काफी खेले-खाए आदमी है| जरूर वेश्यागमन भी करते रहे होगें| पैसे कम होने की वजह से सस्ती वेश्याएँ ही इन्हें उपलब्ध हुई होंगी, इसीलिए इनके पास इस तरह के अनुभव और भाषा है| वह देखती है कि गरीब तबके की नौकरानियों व मज़दूरिनों को देखते समय इनकी आँखों में एक भूख चमकने लगती हैं| प्रेम संबंध के लिए न वे कोई स्तर देखते है न किसी नैतिकता को मानते है | उनकी आँखों पर बस एक ही चश्मा है, जिससे स्त्री मात्र मादा नजर आती है | प्रगतिशीलता, स्त्री स्वाधीनता, स्त्री कल्याण की बड़ी-2 बातें तो वह चारा है, जिससे प्रबुद्ध वर्ग की स्त्रियॉं का विश्वास हासिलकर उनका भी शिकार किया जा सके| उससे विवाह का कारण भी उन्होंने एक दिन बताया –अगर विवाह नहीं करता तो पतित हो जाता| यानि यौन संतुष्टि मात्र के लिए उन्होंने उसे चुना था| इस चुनाव से हमेशा और हर समय के लिए उन्हें मुफ्त में एक सुंदर युवा देह उपलब्ध हो गयी थी| पर वह सिर्फ देह नहीं थी, इसलिए धीरे-धीरे बागी होती गयी थी |

ऐसे चरित्र वाले पति से वह अपेक्षा कर रही थी कि वे उसके प्रेम को समझेंगे और उसे अनवर से मिलवा देंगे| लेकिन जिसने जीवन में कभी प्रेम ही नहीं किया हो, वह प्रेम को कैसे समझता? थोड़ी देर वे अपनत्व दिखाते रहे ....समझाते रहे फिर बिफर पड़े –सुंदर और जवान लौंडे को देखकर तुम्हारी नीयत खराब हो गयी| अपनी उम्र का भी ख्याल नहीं रहा| यह प्रेम नहीं लस्ट है| उस कमीने को भी फ्री में मजे मिल रहे हैं तो क्यों पीछे हटे ?आनंद का यह रौद्र रूप देखकर वह सन्न रह गयी| अभी जरा देर पहले कितने प्रेम से समझा रहे थे और अभी ...| यही उनका असली रूप था | वह कैसे भूल गयी थी कि लस्ट ही जिसका जीवन रहा है, वह उसके जज़्बात नहीं समझ सकता| अभी तक उससे राज उगलवाने के लिए उन्होंने अच्छे पति का मुखौटा पहन रखा था| वह भी अपने दुख में डूबी सच बोल बैठी| अब अनवर की बात उसे याद आ रही थी –हमेशा ध्यान रखना कि हमारे बीच के सम्बन्धों की भनक किसी को न लगे, वरना तुम्हारी छिछालेदर हो जाएगी| पुरूष प्रधान समाज स्त्री को स्वतंत्र प्रेम की इजाजत नहीं देता| पति व पर्दे की आड़ में चाहे वह कुछ भी करे | मर्द का कुछ नहीं बिगड़ता सारा खामियाजा स्त्री भोगती है|

पर वह भी क्या करती ?किसी को धोखा देना उसका स्वभाव नहीं था | वह अनवर से प्रेम करती है, इस सत्य को वह आनंद से नहीं छिपाना चाहती थी| यद्यपि वर्तमान में अनवर उससे दूर जा चुका था | फिर भी आनंद से वह सामान्य रिश्ते नहीं बना पा रही थी| उसे लग रहा था कि वह उसे सच न बता कर उसे धोखा दे रही है इसीलिए वह तड़प रही थी| अंत मे उसने निर्णय किया था कि वह सच बता देगी फिर आनंद का जो निर्णय होगा, उसे स्वीकार करेगी | अगर उसने गुनाह किया है, तो उसकी सजा भुगतेगी | आनंद उसे छोड़ भी देंगे तो एकाकी जीवन व्यतीत करेगी| कम से कम उसकी आत्मा पर कोई बोझ तो नहीं रहेगा| वह चाहती तो दोनों से अपने रिश्ते को निभा सकती थी, पर एक साथ दो नावों की सवारी उसकी आत्मा नहीं स्वीकार कर सकी थी|

इस बीच अनवर का असली रूप भी सामने आ गया था| वह जान गयी थी कि उसमें उसके जैसा साहस नहीं है कि सच स्वीकार कर संसार के सामने उसे अपना ले| वह उससे आड़ में चोरी-छिपे रिश्ता रखना चाहता था| जबकि वह साफ-सुथरा रिश्ता चाहती थी| आनंद ने जो कुछ अनवर के बारे में कहा था, सच साबित हो रहा था| मर्द एक-दूसरे को कितनी अच्छी तरह जानते- समझते हैं –खग जाने खग ही की भाषा| वह तो औरतों की ही भाषा नहीं समझ पाती थी, मर्द की भला क्या समझती ? सच जानने के बाद आनंद उसे छोड़ना चाहते थे और अनवर अपनाना नहीं चाहता था | वह पलायन कर गया था | उससे सारे रिश्ते तोड़कर जाने कहाँ जा छिपा था ?वह दोनों के बीच फंसी हुई थी|

दोनों उसके जीवन के सत्य थे, पर शायद वह दोनों के लिए ही महज एक औरत थी| अनवर के बारे में आनंद पहले ही भविष्य वाणी कर चुके थे कि वह समाज के सामने उसे कभी नहीं अपनाएगा, क्योंकि दोनों के बीच किसी भी स्तर पर समानता नहीं है| न धर्म-जाति की, न उम्र-अनुभव की, न शिक्षा की, ना विचारों की | उनके अनुसार अनवर को अपने धर्म की सुंदर, कमसीन लड़की आसानी से मिल सकती है, फिर वह क्यों सेकेंड हैंड पर जाएगा उधर अनवर ने रिश्ते की शुरूवात के पहले ही उससे बताया था कि आनंद उसे छोड़ना चाहते हैं | आनंद ने उससे कहा था-ऊब चुका हूँ इस रिश्ते से, वापसी चाहता हूँ पर कोई बहाना नहीं मिल रहा | समाज की जबाबदेही है | उधर घर वाले वापसी पर ज़ोर दे रहे हैं | अनवर को उससे सहानुभूति थी इसलिए आनंद का यह पलायन उसे नहीं भाया था| यह सहानुभूति ही उनके बीच रिश्ते की कड़ी बनी थी |

आनंद को अब बहाना मिल चुका था | उसने सच स्वीकार कर उन्हें मार्ग दे दिया था| पर वे घर छोड़ने में भी उसकी भूमिका चाहते थे | वह उन्हें अपने घर से स्वयं निकाल दे ताकि लोगों को उसकी चरित्रहीनता का पक्का विश्वास हो जाए| पर वह ऐसा नहीं कर रही थी| अब वे रात-दिन उसे ताने मारते, गालियां बकते| रात-रात भर जगा कर पूछते कि अनवर से उसके रिश्ते की हद कहाँ तक थी ?वह लाख कहती थी कि अनवर से उसके रिश्ते जिस्मानी स्तर तक नहीं पहुंचे थे| फिर अब वह जा चुका है, पर वे नहीं मानते और उसे टार्चर करते रहते| रात भर जागने के कारण वह अपने आफिस में ठीक से काम नहीं कर पा रही थी| तनाव व नींद की गोलियां लेने लगी थी, पर आनंद को इस बात से कुछ लेना-देना नहीं था| न तो उनमें घर छोडकर चले जाने का साहस था, ना फिर से नई शुरूवात करने का, जबकि वह दोनों तरह से राजी थी|

एक दिन हद ही हो गयी जब उन्होंने कहा –मैं जानता हूँ तुमने अपनी तरफ से पहल नहीं की होगी | उसी ने तुम्हें गुमराह किया होगा| मैं तुम्हें एक मौका और दे सकता हूँ, पर तुम्हें मेरा एक काम करना होगा| तुम उसे फोन करके बुलाओ | मैं उसे रंगों हाथों पकड़ लूँ | और सारी मीडिया के सामने नंगा कर दूँ |

अभी तो सब-कुछ करने के बाद भी वह बेदाग घूम रहा है| मुझे मुस्कुराकर देखता है जैसे कह रहा हो –देखो मैंने तुम्हारी बीबी को ...|

वह सोचने लगी उसके जीवन के दोनों पुरूष कितने शातिर हैं | एक अपने प्रेम को गुनाह की तरह छिपाना चाहता है, ताकि किसी भी ज़िम्मेदारी और जबावदेही से बच जाए| साथ ही उसका वर्तमान और भविष्य दोनों बेदाग और सुरक्षित रहे और दूसरा उसे चौराहे पर खड़ा करके उसका तमाशा बनाना चाहता है | क्या अनवर को अपने घर में अपने साथ रंगे हाथों पकड़वाने से वह बदनामी से बच जाएगी?

दोनों ने एक-दूसरे को नीचा दिखने के लिए उसका इस्तेमाल किया था और आगे भी करना चाह रहे थे, पर वह इतनी भी नादान नहीं थी| एक दिन उसने आनंद को कह दिया –अगर आप मेरे साथ ठीक से नहीं रहना चाहते तो जा सकते हैं| आनंद फौरन निकल गए जैसे इसी बात की उन्हें प्रतीक्षा थी | सारे समाज ने उन्होंने फैला दिया कि उसने उन्हें अपने घर से निकाल दिया| अब वे कभी नहीं लौटेंगे आखिर उनका भी स्वाभिमान है | बाद में उसने कई बार उन्हें वापस लाने का जतन किया पर वे नहीं लौटे | अनवर भी नहीं लौटा|

पूरे आठ वर्षों बाद पूरी तरह व्यवस्थित होने के बाद आज अनवर ने उसे फोन किया है और पूछ रहा है-मेरी याद नहीं आती ...वह समझता है कि वह आज भी उसी तरह उसके प्रेम मे बावली है | वह नहीं जानता कि उसने उसकी यादों को अपने मन की स्लेट से खुरच-खुरचकर निकाल दिया था और उसके मन में उसके लिए कुछ भी नहीं है| वह जैसे पिछले जन्म का हिस्सा था |