राम रचि राखा - 6 - 3 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 6 - 3

राम रचि राखा

(3)

"मैंने तो तुम्हें दोपहर में ही बुलाया था। समय से आ गए होते तो अब तक गेहूँ कट भी गया होता। यह नौबत ही नहीं आती...।" हीरा ने अपने ऊपर आने वाली किसी भी किस्म के लांछन को परे धकेलते हुए कहा। फिर सांत्वना देते हुए बोले - "लेकिन जो होना होता है, हो ही जाता है... होनी को कौन टाल सकता है।"

मुन्नर एकटक जली हुयी गाँठों को देख रहे थे। उसके राख की कालिमा उनके अन्दर उतरने लगी थी। जैसे साँझ का अँधेरा सूरज की कमजोर पड़ रही किरणों को निगलते हुए हुए धरती पर उतर आता है और धीरे-धीरे सब कुछ अपनी गिरफ्त में ले लेता है। बाहर अभी साँझ घिरने में थोड़ा वक़्त था पर मुन्नर को सूर्य की पीली किरणें काली दिखने लगी थीं। वहीं जमीन पर बैठ गए। यूँ लग रहा था कि किसी बिना किनारे वाली स्याह नदी में धीरे-धीरे डूब रहे हों।

"मुन्नर, अब घर जाओ, जो होना था वह तो हो चुका। अब यहाँ बैठे रहने से तो कुछ न होगा।" साँझ घिरने लगी थी। किसी ने मुन्नर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। "ओह! एक दाना भी न बच सका।" अपना दुःख व्यक्त किया।

मुन्नर ने एक गहरी साँस ली और सर हिलाया जैसे कह रहे हों "जो नहीं होना चाहिए था वो हो गया।" फिर उठकर खड़े हो गए।

घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पैर नहीं उठ रहे थे। लग रहा था जैसे पैरों में एक-एक मन वजन का पत्थर बाँध दिया गया हो। किसी तरह स्वयं को घसीटते हुए घर की ओर चल दिए।

गाँव में बात जंगल की आग की तरह फैल गयी कि मुन्नर ताश खेलने में लगे रहे और उनका सारा गेहूँ जल कर राख हो गया।

कुएँ के चबूतरे पर माई बैठी थीं। पास पड़ोस की औरतें उन्हें सांत्वना दे रही थीं। माई को दोहरी चिंता खाए जा रही थी। एक तो फसल के जल जाने की और दूसरे भैया के क्रोध की।

ज्यों ही मुन्नर द्वार पर पहुँचे, भौजी, जो अभी-अभी विलाप करके रुकी थीं और सिसकियाँ ले रही थीं, अचानक शेरनी की तरह मुन्नर की ओर झपटीं।

"अब यहाँ क्या लेने आया है रे दुसाध ! ख़त्म हो गयी तेरी मंडली...!" मुन्नर के कुर्ते का कालर पकड़ कर झकझोरते हुए चीख-चीख कर बोलने लगीं। औरतों ने आकर मुन्नर का कालर छुडाया।

"अरे, इस पातकी ने सब कुछ स्वाहा कर दिया रे...! बच्चों के मुँह का निवाला छीन लिया हत्यारे ने...!" भौजी बेतहाशा मुन्नर को कोसती हुयी, श्राप देती हुयी चीखे जा रही थीं, "तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी पापी…जा कहीं जाकर चुल्लू भर पानी में डूब मर…" औरतें उन्हें शांत कराने का प्रयत्न कर रही थीं।

मुन्नर मड़ई में घुस गए और धम्म से चारपाई पर बैठ गए। न तो उन्हें कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ सोच पा रहे थे। जड़ हो गए थे। काफी देर तक भौजी हिस्टीरिया के रोगी की तरह चीखती रहीं।

शाम को खाना नहीं बना। भौजी और माई दोनों ही बिना खाए ही सो गयीं। मुन्नी ने दिन का बचा खाना स्वयं खाया और छोटी बहन को भी खिला दिया।

रात गहराने लगी थी। पर मुन्नर की आँखों में नींद नहीं थी। चेतना धीरे-धीरे लौटने लगी थी- यह क्या हो गया मुझसे? भैया ठीक कहते हैं कि मुझसे कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता है। अब क्या होगा? घर में अनाज का एक दाना भी न आ सका। सब लोग क्या खाएँगे? एक तो पहले से ही तंगी थी ऊपर से भैंस के मरने से कर्ज भी चढ़ गया है और अब तो बिलकुल ही मौत आ गयी। मुन्नी और छुटकी के भूख से बेहाल चेहरे आँखों के सामने घूमने लगे। कितना बड़ा अनर्थ हो गया मुझसे। कितना बड़ा कलंक लग गया! मेरे कारण सभी लोग कितनी बड़ी मुसीबत में पड़ गए हैं! कल गाँव में हर आदमी मुझे थू थू करेगा।... और भैया ! भैया के सामने कैसे जा सकूँगा। ओह! भौजी ठीक कह रहीं थीं कि मैंने बच्चों के मुँह से कौर छीन लिया है। मैं ही सबकी खुशियों का हत्यारा हूँ ।मुझे अब रहने का कोई हक़ नहीं है । मुझे जीने का कोई हक़ नहीं है। मुझे मर जाना चाहिए।

मुन्नर जितना अधिक सोचते गए उतना ही अधिक स्वयं को दोषी पाते गये और उनके मन में आत्महत्या की भावना उतनी गहरी होती गयी। यही एक मात्र उपाय नज़र आ रहा था उन्हें सारी परेशानियों से बच निकलने का।

अंततः मुन्नर इस फैसले पर पहुँचे कि तिनसुकिया मेल, जो भोर में पास वाले स्टेशन से गुजरती है, उसके नीचे लेट जाऊँगा। एक सेकेण्ड में सब कुछ ख़त्म हो जाएगा। न मैं रहूँगा और न ही कोई परेशानी बचेगी।

अंतिम फैसला करके मुन्नर उठे। लालटेन जलाए और उसकी रोशनी में आत्महत्या का नोट लिखकर रामायण के अन्दर इस तरह रख दिए कि कुछ भाग बाहर झाँकता रहे। फिर लालटेन बुझाकर चारपाई पर लेट गए। सोचने लगे कि माई को बहुत तकलीफ होगी, बहुत विलाप करेगी। चलो कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा। सोचते-सोचते आँख लग गयी ।

कुत्तों के भौकने की आवाज से मुन्नर हड़बड़ाकर उठे। डर था कि कहीं सुबह न हो गयी हो। लेकिन आज की नींद रोज की तरह नहीं थी। क्लेश में लिपटी हुयी थी। दुश्चिंता, भय और दुःख के साए से घिरी हुयी थी। मुश्किल से घंटे भर के लिए ही आँख लगी होगी। मड़ई के बाहर निकल कर आये तो देखा कि चाँद आसमान में सिर के ऊपर था। सोचा बारह-एक तो बज ही रहा होगा। एक घंटा तो स्टेशन पहुँचने में लगेगा। चार कोस दूर है। तिनसुकिया तीन बजे के करीब जाती है शायद। अब चलना चाहिए।

एक बार रामायण में रखे पत्र को देखा और मड़ई से बाहर निकल आये। चलते-चलते एक निगाह घर पर डाले। पश्चिम तरफ का छप्पर पिछले बरसात में चू रहा था। इस बार बारिश से पहले ठीक करना होगा, नहीं तो दीवारें गल कर खदरने लगेंगी। सामने कुएँ का चबूतरा सुनसान पड़ा था। उनके कितने ही एकाकी पलों का साथी रहा था। कितनी रातों में देर तक इस पर बैठ कर उन्होंने स्वयं से बातें की थी। नीम के पत्तों से छन रही चाँदनी जो हमेशा ही मुन्नर को बहुत मोहक लगती थी, आज उसमें कोई रमणीयता नहीं देख पा रहे थे। सब कुछ निस्सार सा लग रहा था।

स्टेशन की ओर चल दिए। सारे मोह-माया के बन्धनों को तोड़कर आत्मघात करने। इस दुनिया से अंतिम विदा लेने। अब तक के जीवन की सारी बातें मन में चलचित्र की तरह उभरने लगीं थीं। भूत की यादों में डूबते-उतराते स्टेशन के पास पहुँच गए ।

"सिग्नल से पहले ही लेटना चाहिए मुझे, क्योंकि सिग्नल के बाद गाड़ी धीमी हो जाती है और मुझे देखकर ड्राईवर गाड़ी रोक भी सकता है।" सोचते हुए मुन्नर सिग्नल से चार-पाँच सौ मीटर पहले आ पहुँचे।

"लगता है गाड़ी आने में अभी समय है। अभी से लेटने का कोई फायदा नहीं है । जब गाड़ी की आवाज़ आएगी तभी लेटूँगा।" बैठकर प्रतीक्षा करने लगे।

मुन्नर की आँखों के सामने आने वाली सुबह का दृश्य उभर आया- उनकी क्षत-विक्षत लाश द्वार पर कुएँ के पास पड़ी है। माई दहाड़ें मार मार कर रो रही हैं। गाँव के लोग जमा हो गए हैं। कोई कह रहा है - "अकारथ ही जिंदगी चली गयी...।"

"जीते जी तो किसी को सुख दे न पाए, मरकर उससे भी बड़ा संताप दे गए। इनकी भी क्या किस्मत है, बुढापे में इतना बड़ा दुःख मिल रहा है...।"

एक पल को मुन्नर सिहर उठे। पहली बार मन में प्रश्न उठा-"क्या मैं ठीक कर रहा हूँ?"

"दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। लोग कुछ न कुछ तो कहेंगे ही। माई भी दो-एक दिन रो-धो कर चुप हो जायेगी।" स्वयं ही जवाब दिया मुन्नर ने।

लगभग एक घंटा बीत गया, परन्तु गाड़ी नहीं आई।

"क्या बात हुयी, मैं बहुत जल्दी आ गया क्या! या फिर गाड़ी लेट हो गयी है। " मुन्नर सोचने लगे।

"चलकर स्टेशन पर पता करता हूँ "। उठकर स्टेशन की ओर चल दिए ।

"आत्महत्या महापाप है। मरने के बाद आत्मा जन्म-जन्मान्तर तक भटकती रहती है। मुक्ति पाने के लिए छटपटाती रहती है।” पहले की पढ़ी-सुनी बातें याद आने लगीं थी।

"क्या मैं मरने के बाद भी चैन न पा सकूँगा…? फिर मरने का क्या फायदा होगा…?" मुन्नर के मन में एक नयी सोच ने जन्म ले लिया और वे इसी उधेड़बुन में स्टेशन पहुँच गए ।

स्टेशन पर बिलकुल सन्नाटा था। कोई भी नहीं था वहाँ। स्टेशन मास्टर अन्दर कुर्सी पर बैठा-बैठा ऊँघ रहा था। सिग्नल खींचने वाला आदमी, सिग्नल खींची जाने वाली मशीन के टिन के छप्पर से लगे एक बेंच पर अर्धनिद्रा में लेटा हुआ था।

"क्यों भाई तीनसुकिया अभी आई नहीं क्या?" मुन्नर ने थोड़ी ऊँची आवाज़ में उसे जगाने के लिए पूछा।

'तीनसुकिया तो यहाँ रूकती नहीं…क्या करोगे जानकार? साढ़े तीन बजे आएगी।" आँखे बंद किये ही वह बोला और फिर सो गया। रेल विभाग की दस साल से नौकरी करते हुए वह सोते हुए जागने का और जागते हुए सोने का अभ्यस्त हो चुका था।

मुन्नर ने देखा स्टेशन का घड़ियाल अभी दो बजा रहा था। वे प्लेटफोर्म के एक सिरे पर रखे बेंच पर जाकर बैठ गए ।

"आत्महत्या करना कितना जायज होगा? और फिर मरने के बाद तो कुछ भी नहीं बचेगा। आत्मा भटकती रहेगी सो अलग।" मन मे उठा नया विचार जोर पकड़ने लगा था। 'कहते हैं कि भुतहा बगीचे में रत्तन डोम की आत्मा अभी तक भटकती है, जिसने जमींदार के जुल्म से तंग आकर फाँसी लगा लिया था। सारी रात वह उसी बगीचे में कलपता रहता है। कभी-कभी उसके रोने की आवाज भी लोगों को सुनाई भी देती है। तीसिया चमारिन, जिसने सास के जुलुम से तंग आकर एक दिन खुद पर ही मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली थी, रात भर हाथ में लुत्ती लेकर सिवान के इस माथे से उस माथे तक दर्द से बिलबिलाती हुयी चौकड़ी भरती है।" इन्ही सब सोचों में डेढ़ घंटे बीत गए। इस बीच तीनसुकिया धड़धड़ाती हुयी निकल गयी।

"लेकिन घर भी तो वापस नहीं जा सकता। कौन सा मुँह लेकर जाऊँगा...! नहीं घर तो बिलकुल भी नहीं जाना है…। बनारस चला जाता हूँ। वहीं गंगा के घाट पर बैठ कर रामायण बाचूँगा। किसी तरह खाने को तो मिल ही जाएगा। लेकिन पास में एक भी पैसा नहीं है, टिकट कैसे लूँगा? टिकट की क्या जरुरत है…इतने भोर में कौन जाँच करने आ रहा है! " अंतिम फैसला लेते लेते भोर होने लगी थी। पाँच बजने वाला था। मुन्नर उठकर स्टेशन की ओर चल दिए गाड़ी का पता करने ।

पता चला कि बनारस जाने वाली पैसेंजर गाड़ी साढ़े पाँच बजे आयेगी। अब मुन्नर के लिए प्रतीक्षा का एक-एक पल भारी लग रहा था।

अंततः गाड़ी आयी और मुन्नर बिना टिकट ही गाड़ी में सवार हो गए, बनारस जाने के लिए ।

लेकिन मुन्नर कि किस्मत...! बनारस पहुँचने से तीन चार स्टेशन पहले ही मजिस्ट्रेट की जाँच हो गयी। मुन्नर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और पन्द्रह दिनों के लिये जेल में डाल दिया। पुलिस को उन्होंने अपना नाम पता गलत बताया और कहा कि घर में कोई नहीं है। अकेला हूँ । नहीं चाहते थे कि बात गाँव में पहुँचे।

क्रमश..

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Pragati Gupta

Pragati Gupta मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

बढ़िया लिखा है

Minakshi Singh

Minakshi Singh 2 साल पहले