राम रचि राखा - 1 - 4 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 1 - 4

राम रचि राखा

अपराजिता

(4)

दिन बहुत तेजी से निकल रहे थे। दो सप्ताह कब बीत गये पता भी नहीं चला। इस बीच अनुराग से फोन पर और इ-मेल से बातचीत की आवृत्ति बढ़ गई थी। जिस भी रुप में वे मेरी जिन्दगी में थे, सुखद लग रहा था। शायद मुझे उनकी आदत सी पड़ने लगी थी।

उस शनिवार को पंद्रह अगस्त था। डांस क्लास बंद था। सुबह के काम निबटाते-निबटाते बारह बज गये। हमलोग आज देर से भी उठे थे। छुट्टी के दिन प्रायः ऐसा ही होता था। हम देर तक सोते रहते थे।

पूर्वी को जाना था। उसका कोई दूर का रिश्तेदार मैदान गढ़ी में रहता था। वहाँ किसी का एंगेजमेंट था। मुझे भी जाने को कह रही थी पर मेरा मन नहीं हुआ। मैं आराम करना चाहती थी। वैसे भी पिछले कई सप्ताह बहुत व्यस्त जा रहे थे। नाश्ता करके वह चली गई। कुछ खाली-खाली सा लग रहा था।

नाश्ता करके मैं बालकनी में आ गई। आसमान पर बादल घिर रहे थे। धूप बिल्कुल भी नहीं थी। वहाँ खड़ा होना अच्छा लगा। हमारा फ़्लैट ग्यारहवीं मंज़िल पर था। आसमान दूर तक दिखाई दे रहा था। सफेद और काले बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े इधर से उधर भाग रहे थे। चिड़ियों के कुछ झुण्ड हवा में अठखेलियाँ कर रहे थे। जी में उठा कि अभी बरसात होने लगे और मैं उसमें भीगने लगूँ। बारिश मुझे बेहद पसंद है।

सामने सड़क पर गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं। बायीं तरफ एक बड़ा सा पार्क था। उसके बीच में घास से ढके मैदान में कुछ बच्चे खेल रहे थे। काफी देर तक मैं खड़ी होकर बाहर का दृश्य देखती रही।

पानी नहीं बरसा और कुछ देर में बादल भी छँटने लगे। बादलों के बीच से सूर्य देव झाँकने लगे। मैं अन्दर आ गई। एक किताब उठाकर बिस्तर में घुस गई। पढ़ते-पढ़ते नीद आ गई।

फोन की घंटी सुनकर नींद खुली तो देखा सामने की दीवार घडी में ढाई बज रहे थे। मैंने उठाया।

"हेल्लो......"

"सो रही थी?"

"अनुराग, तुम !...हाँ सो रही थी।"

"ओह सॉरी, मैंने डिस्टर्ब कर दिया।"

"नहीं, मैं पहले ही काफी सो चुकी हूँ...लगभग डेढ़ -दो घंटे। "

"ओके, फिर ठीक है।"

“तुम क्या कर रहे हो"

"कुछ ख़ास नहीं, अभी-अभी लंच किया...तुमने लंच कर लिया?"

"नहीं, अभी कहाँ किया...ब्रेकफास्ट करके ही सो गई थी। अब करूँगी"

"वैसे अभी तुम्हारा कोई प्रोग्राम है? आई मीन, कहीं जाने का या कोई विशेष काम?"

"नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है...क्यों पूछ रहे हो?"

"क्या खयाल है अगर हम कोई प्ले देखने चलें...तुम्हें प्ले देखना पसंद है? "

"हाँ, प्ले देखना पसंद तो है मुझे...लेकिन कौन सा प्ले देखने जाएँगे...और कहाँ"

"कामिनी थियेटर, मंडी हाउस। हास्य नाट्य महोत्सव चल रहा है।"

"कितने बजे का शो है ?"

"साढ़े चार बजे का।"

"ओके"

"मैं ऐसा करता हूँ, तुम्हारे पास मैं साढ़े तीन तक पहुँचता हूँ। हमें वहाँ से मंडी हाउस पहुँचने में आधा घंटा लगेगा।

"ठीक है, पर...।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा, "तुम्हें मेरे यहाँ तक आने में ढूँढना पड़ेगा। एक काम करते हैं, मैं नॉएडा मोड़ तक ऑटो से आ जाती हूँ। पाँच मिनट लगेगा मुझे। मोड़ के ठीक पहले वाले बस स्टैंड पर मिलते हैं।"

"हाँ यह बेहतर रहेगा...मैं साढ़े तीन बजे वहीं मिलता हूँ।"

लंच करने का मन नहीं हुआ। मैं तैयार होने लगी। सुबह बाल धोया था। अभी भी पूरी तरह से सूखे नहीं थे। मैंने कंघी करके जूड़ा बना लिया। सफ़ेद रंग का वन-पीस ड्रेस पहना।

जब स्टैंड पर पहुँची तो देखा अनुराग वहाँ पहले ही पहुँच चुका था। शायद मुझे फोन करने के तुरंत बाद ही निकल लिया होगा। अपनी कार, बस स्टैंड से थोड़ा पहले खड़ी करके उससे टिककर खड़ा था।

जब मुझपर नज़र पड़ी तो उसकी आँखों में विस्मय और ख़ुशी दोनों साफ़ झलक रहे थे। होठ कुछ देर तक खुले रह गये। आँखें मुझ पर जम गई थीं।

डांस क्लास में मैं हमेशा बालों की एक छोटी बना कर रखती थी। बालों को खुला रखने पर कमर तक चले जाते और उलझ जाने का डर रहता था। डांस करते समय असुविधा भी होती। जूड़ा नहीं बनाती थी क्योंकि उसके खुल जाने का डर रहता था। आज वे मुझे पहली बार बिना चोटी के देख रहे थे।

उसका इस तरह से देखना मुझे अच्छा लगा।

"क्या हुआ ?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा।

"हाऊ ब्यूटीफुल ! तुम कितनी सुन्दर लग रही हो...।" उसकी नज़रें मेरे चेहरे में खो गई थीं।

'रिअली ? थैंक यू सो मच...अब चलें?' मैने हँसते हुए कहा।

'हाँ, श्योर..." जैसे अचानक नीद से जाग गया हो। हम कार में बैठ गये।

सात बजे शो ख़त्म हुआ। कॉमेडी प्ले था। बहुत ही मनोरंजक था। इंडिया गेट के सर्किल से गुजरते हुए अनुराग ने अचानक कार पार्किंग की ओर मोड़ दी और बोला, "चलो, आइस क्रीम खाते हैं, फिर चलेंगे। देर तो नहीं हो रही है तुम्हें?"

"नहीं देर नहीं हो रही है...चलो।"

कार पार्क करके हमने आइसक्रीम खरीदा और बेंचनुमा लगे पत्थरों पर बैठकर खाने लगे। अभी दिन थोड़ा बाकी था किन्तु आसमान में बादल छाये हुए थे, इसलिए अन्धेरा होने लगा था। हालाँकि लेम्प पोस्ट का प्रकाश हमारे आस-पास के अँधेरे को छिन्न कर रहा था।

अचानक फुहारें गिरने लगीं। छोटी-छोटी बूँदें ओस की तरह चेहरे पर झरने लगी थीं। पिकनिक मनाते लोग अपनी चटाईयाँ और चादर समेटने लगे थे। इधर-उधर बैठे और खड़े लोग जल्दी-जल्दी अपने वाहनों की ओर भागने लगे।

"पता है, मुझे बारिश से प्रेम है ...।" मैं खड़ी हो गई। मेरा चेहरा आसमान की ओर था। दोनों हाथ फैलाकर बारिश की बूँदों को उनमें समेटने की कोशिश करने लगी। मेरी आँखें बंद थीं। फुरारें मेरे चेहरे को भिगो रही थीं। मैंने अनुराग की ओर बिना देखे ही कहा, "कभी कभी लगता है कि मैंने अपनी जिन्दगी का कुछ हिस्सा इन बादलों को उधर दे रखा है। जब भी ये बरसते हैं तो लगता है जिन्दगी बूँद बूँद झर रही है और मुझमे समा कर मुझे पूरा कर रही है।"

"या फिर ये बूँदें तुम्हारे स्पर्श में अपना जीवन पाना चाहती हैं।" अनुराग की बातें सुनकर मैंने आँखें खोल दी। वह अभी भी बैठा था और उसकी दृष्टि मेरे चेहरे पर जमी थी। अचानक बादल गरजने लगे और बारिश तेज हो गई। मोटी-मोटी बूँदें गिरने लगीं।

"चलो अब चलते हैं...बारिश तेज हो गई है..." वह उठ खड़ा हुआ।

वह अभी एक पैर बढाया ही होगा कि मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, “ "मुझे भींगना है...'

वह थोड़ा विस्मित सा खड़ा रहा। होठों पर मुस्कराहट और आँखों में सहमति थी। बारिश की बूँदें तेजी से हमें भिगोने लगी थीं। फिर उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये और बोला, "हे, लेट्स डांस...”

'ग्रेट…!" मैं उसके करीब आ गई। हमारे पैर हरी घास पर थिरकने लगे। बारिश पूरे जोरों से होने लगी। बूँदें मेरे शरीर को भिगोने के बाद मेरे मन में रिस कर उतरने लगीं।

हम दस मिनट तक नाचते रहे होंगे। फिर अचानक वह रुक गया और बोला, "अब चलना चाहिए हमें।" मैंने देखा इंडिया गेट के नीचे खड़े गार्डों और पुलिस के सिपाहियों, पेड़ों के नीचे आश्रय लिये कुछ लोगों, सबकी निगाहें हमारी तरफ थीं।

हम कार की तरफ बढ़ गए। मिट्टी गीली होने लगी थी और मेरे सैंडल का नुकीला हील उसमें धँसने लगा था। अनुराग ने देखा मुझे चलने में परेशानी हो रही है। उसने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया। ऐसा नहीं था कि यह पहली बार उसने मुझे अपनी बाहों में उठाया हो। डांस करते समय कितनी ही बार उसे मुझे लिफ्ट करना पड़ता था।

'अरे...ये क्या कर रहे हो...मैं चल लूँगी..."

"चिंता मत करो ... बस सड़क तक...।" उसने हँसते हुए कहा

कार के पास लाकर मुझे उतार दिया।

"ओह, तुम्हारे कार की सीटें भीग जाएँगी।"

'नो प्रॉब्लम, कार हमारे लिए है, हम कार के लिये नहीं" दरवाजा खोल कर अन्दर बैठते हुए उसने दूसरी तरफ का दरवाजा खोल दिया। मैं बैठ गई। हम चल पड़े।

'यकीन नहीं हो रहा है ...लेकिन बहुत मज़ा आया” मेरी तरफ देखकर कहा।

“इसका श्रेय तुम्हें ही जाता है। अच्छा हुआ जो तुमने प्रोग्राम बनाया।" बारिश का पानी मेरे बालों से रिसकर अभी भी मेरे चेहरे और पीठ पर आ रहा था। उसने डैश बोर्ड से निकाल कर तौलिया दी। मैंने उससे अपने बालों को सुखाने का प्रयास करने लगी। जूड़ा खुल गया था और मेरे घने बाल बिखर गये थे।

आधे घंटे में हमलोग मयूर विहार पहुँच गये। मेरी बिल्डिंग के नीचे सड़क पर कार खड़ी कर दी। बारिश अब हल्की हो चुकी थी।

'चलो ऊपर, कॉफी पीकर जाना"

"आज नहीं, देखो कितना भींग चुका हूँ। ठण्ड सी लग रही है। कॉफी फिर कभी पीने आऊँगा"

"ओके, मैं चलूँ" मैंने भी जिद नहीं की। शायद पूर्वी आ चुकी होगी। उसने हाँ में सिर हिलाया। मैंने दरवाजा खोलकर एक पैर बाहर रखा था कि वह बोल पड़ा, "सच कहूँ, बहुत ही कमाल का रहा..."

"क्या...बारिश ?" मैंने उसकी तरफ देख कर कहा।

"आज की पूरी शाम...एक खूबसूरत शाम के लिए तुम्हारा आभारी हूँ ।"

मैंने मुस्करा भर दिया। उसकी आँखों में मैंने एक उगते हुए सूरज की लालिमा देखी। उतरकर मैंने दरवाजा बंद कर दिया और हाथ हिलाकर उसे विदाई दी। उसके जाने के बाद कुछ देर वहीं यूँ ही खड़ी रही।

पूर्वी वापस नहीं आई थी। उसका फोन आया कि वो आज रात में नहीं आ पायेगी। शावर लेने के लिये जब बाथरूम में घुसी तो बरबस ही आईने के सामने कुछ देर के लिये ठिठक गई और अपने चेहरे को देखने लगी। यूँ लगा कि अनुराग के आँखों की लालिमा ने मेरे चेहरे को लाल कर दिया है। क्या था यह सब जो इतना सुखद था? शावर से निकलती पानी की फुहारें जब चहरे पर गिरीं तो लगा कि कुछ देर पहले जिए हुए पल वापस लौटकर आ गये हैं... मूसलाधार बारिश...हरी-हरी घास और मैं भींगते हुए नाच रही हूँ।

क्रमश..

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Pratap Narayan Singh

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Ankit Chaudhary શિવ

Ankit Chaudhary શિવ मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले