राम रचि राखा - 1 - 5 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 1 - 5

राम रचि राखा

अपराजिता

(5)

अगले दिन रविवार को डांस क्लास से जब बाहर निकले तो लान से गुजरते हुए एक बेंच पर हम बैठ गये। कुछ देर तक डांस स्टेप्स के बारे में बातें करते रहे। जब हम चलने को तैयार हुए तो उसने कहा, "अगर तुम्हारे नॉर्मल वोर्किंग आवर्स होते तो हम वीक डेज़ में भी कभी शाम को मिल सकते थे न।" मैं उनकी तरफ देखने लगी थी। ऐसा लगा कि जैसे कोई बच्चा बड़ी मासूमियत से चोकलेट माँग रहा हो।

'हम अब भी मिल सकते हैं...शाम को मैं कभी-कभी जब वर्क लोड ज्यादा न हो तो एक आध घंटे निकाल सकती हूँ। लेकिन हम ऑफिस में ही मिल सकते हैं।"

"दैट्स ग्रेट!" उसकी आँखों में चमक सी आ गई थी।

परफोर्मेंस में अभी तीन सप्ताह बाकी थे। हम पूरा मन लगाकर अभ्यास कर रहे थे। क्लास में भी हम सबसे अच्छे स्टुडेंट्स में से एक थे। पहली बार स्टेज पर हम नृत्य करने के विचार से मन उत्साह से भरा था। अनुराग कहता था कि हमारा परफोर्मेंस सबसे अच्छा होगा।

बीतते दिनों के साथ-साथ हम एक दूसरे को और अधिक जानने लगे थे। हमारा रिश्ता एक प्रगाढ़ता लेने लगा था। अनुराग कभी-कभी शाम को ऑफिस आ जाता और हम कैंटीन में बैठकर बातें करते। उसका साथ बहुत ही सुखद लग रहा था।

अनुराग में कई बातें मुझे बहुत पसंद थीं। उसकी आकर्षक देहयष्टि से लेकर उनका अदम्य आत्मविश्वास और विचारों की दृढ़ता सब मुझे आकर्षित करती थीं। पहली बार जब हम किसी बात पर सहमत नहीं हो पाए थे और बहस करते करते माहौल थोड़ा गर्म हो गया तो वह बोला- हम दो अलग अलग व्यक्ति हैं। हमारा व्यक्तित्व भिन्न है। इसलिए आवश्यक नहीं है कि हम सदा एक दूसरे से सहमत हो सकें, आवश्यक यह है कि हम एक दूसरे के विचारों का सम्मान कर सकें। फिर, दूसरे पल हम दोनों ही अपने-अपने वैचारिक उत्तेजना से बाहर आ गये थे।

इस रविवार को परफोर्मेंस होनी थी। शुक्रवार को हमने ऑफिस से छुट्टी लेकर प्रक्टिस की। मैं चाहती थी कि परफोर्मेंस में कोई भी त्रुटि न हो। शाम को जब घर पहुँची तो शरीर थोड़ा भारी लगा। रात में बुखार आ गया। घर पर पड़ी दवा ली। लेकिन दूसरे दिन सुबह बुखार तेज हो गया तो डॉक्टर के पास गई। उस दिन डांस क्लास जाने की हिम्मत नहीं हुई।

पाँच बजे डांस क्लास से अनुराग का फ़ोन आया। मैंने उसे बताया।सुनकर वह पल भर के लिये बिल्कुल खामोश हो गया। फिर बोला, "अच्छा, मैं आता हूँ"।

अनुराग जब आया, पूर्वी घर पर ही थी। मेरा मन डूब रहा था कि इतनी मेहनत करने के बाद ऐन वक़्त पर यह क्या हो गया। बहुत ही बुरा लग रहा था। अनुराग को भी बहुत बुरा लगेगा। वह भी कितना उत्साहित था। मैं उसे उदास नहीं देखना चाहती थी। जब वह कमरे में घुसा तो पूर्वी भी साथ में थी। एक कुर्सी खींचकर मेरे सिरहाने के पास बैठ गया। मैं थोड़ी ऊपर खिसक कर बैठने की कोशिश करने लगी तो उसने रोक रोक दिया। पूर्वी मेरे बेड पर ही बैठ गई।

"क्या हुआ...लगता है शो का ज्यादा टेंशन ले लिया..." वह मुस्कराते हुए बोला। फिर मेरा हाथ छूकर देखा "अभी भी बुखार है।"

"सुबह से बुखार एक बार भी पूरी तरह नहीं उतरा। कम हो रहा है, फिर आ जा रहा है।" पूर्वी ने कहा। फिर अफ़सोस से बोली , "अब तो लगता नहीं कि कल ये जा पायेगी"

"कोई बात नहीं, पहले ये ठीक हो जाएँ। परफोर्मेंस तो सेकेंडरी चीज है।" ऐसा नहीं लगा कि उसे कल के परफोर्मेंस के न हो पाने का कोई अफ़सोस हो रहा हो।

"अनुराग जी, आप बातें करिए। मैं आपके लिये कॉफी लाती हूँ " कहते हुए पूर्वी उठ खड़ी हुई।

"अभी कैसा लग रहा है?" अनुराग की नज़रें मेरे चेहरे पर टिकी थीं।

"मेरे कारण तुम भी नहीं परफोर्म कर पाओगे...।" कहते हुए अनायास मेरी आँखें भरभरा आयीं।

अनुराग ने मेरे माथे पर अपनी हथेली रख दी और बोला, "हे, ऐसा न करो। वो इतना इम्पोर्टेंट नहीं है। पहले तुम जल्दी से ठीक हो जाओ। उस बारे में बिल्कुल भी न सोचो।"

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली थी। उसकी हथेलियों का स्पर्श मेरे अन्दर समा रहा था। यूँ लग रहा कि जैसे चन्दन का लेप मेरे माथे पर लगा हो और वह मेरे ताप को सोख रहा हो। एक अजीब सा सूकून मिल रहा था। जी कर रहा था कि वह ऐसे ही अपनी हथेली मेरे माथे पर रखे रहे।

उसने आगे कहा, "हमने किसी परफोर्मेंस या कॉम्पिटीशन के लिये तो क्लास नहीं ज्वाइन किया था। हम तो सिर्फ बेसिक सीखने के लिये गये थे और न ही हमें इस फिल्ड में अपना कैरियर बनाना है।" मैंने आँखे खोल दी थी। अपलक उसे देखने लगी।

"प्लीज़ उस बारे में मत सोचो...हमने डांस को बहुत एंजोय किया। हम वहाँ जितना हासिल करने के लिये गये थे उससे कहीं बहुत अधिक हम पा चुके हैं।" उसने मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, "है न ?"

"हूँ..." मैंने सिर हिलाते हुए धीरे से कहा। मेरे होठों पर एक मुस्कराहट उभर उभर आई थी।

तभी पूर्वी कॉफी लेकर आ गई।

"तुम भी पियोगी न? " एक स्टूल पर केतली और कप रखते हुए बोली।

'क्यो नहीं...मैं पहली बार आया हूँ। गेस्ट का साथ तो देना पड़ेगा।" अनुराग ने हँसते हुए कहा, 'वैसे भी कॉफी नुकसान करने वाली चीज नहीं है।"

अनुराग ने मुझे सहारा देकर तकिये के सहारे थोड़ा बिठा दिया। मैं लगभग अधलेटी थी। हम तीनों ही कॉफी पीते हुए बातें करने लगे। तभी इंस्टिट्यूट से डांस टीचर पीयूष फोन आया। अनुराग ने उसे बता दिया था कि मुझे बुखार हो गया था।

हम तीनों बातें करने लगे। तभी डोरबेल बजी।

"कौन आ गया इस वक़्त!" पूर्वी ने उठते हुए कहा।

"आज तुम पहली बार आए और मैं इस हाल में हूँ..." पूर्वी के जाने के बाद मैंने कहा।

"कोई बात नहीं, ठीक हो जाओगी तो फिर आऊँगा और अगली बार कॉफी तुम्हारे हाथ का पियूँगा।" अनुराग ने मुस्कराते हुए कहा।

"ओह्हो तुम हो...आज बड़े दिनों बाद दर्शन दिए।" ड्राईंग रूम से पूर्वी की आवाज़ आई।
'हाँ भाई...खुद तो कभी बुलाती नहीं और आने पर ताना देती हैं। यह भी ठीक है।" अंकित की आवाज़ आई, "अन्दर आने की इजाज़त है या वापस लौट जाऊँ?"

अंकित मेरे सबसे अच्छे मित्रों में से एक था। या यूँ कहें कि सबसे अच्छे मित्र था। हमने पिछली कंपनी में डेढ़ साल तक एक साथ काम किया था। बहुत ही जिंदादिल और मजाकिया इंसान है। कैसा भी माहौल हो उसके आने से हँसी से भर जाती थी।

"अब आ गये हैं तो कॉफी पीकर ही जाइएगा। अन्दर आ जाईये।" पूर्वी ने कहा। वह भी अंकित से बहुत घुली मिली थी।

"कहाँ हैं मैडम साहिबा?"

"बेडरूम में... आइये...।" पूर्वी उसे ले आई।

"गुड एवेनिंग...।" दरवाजे से घुसते ही बोले, "सुना है कि आजकल आपकी बुखार से दोस्ती हो गई है।" मैंने मुस्करा भर दिया। अनुराग को देखकर थोड़ा ठिठका। पूर्वी ने परिचय करवाया।

"वैसे शुक्रिय इस बुखार का कि कम से कम आने के लिये मुझे निमंत्रण का इंतज़ार तो नहीं करना पड़ा।" कुर्सी पर बैठते हुए बोला।

हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे। मैं बहुत कम बोल रही थी। ज्यादातर समय मेरी नज़रें अनुराग के चेहरे पर थीं।

जब अनुराग और अंकित चले गये तो थोड़ा खालीपन सा हो गया था। अनुराग का आना बहुत ही अच्छा रहा। मेरे मन पर जो एक बोझ सा था वो उतर गया था। आँखें बंद करके लेटी तो माथे पर उसका स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा था और उसकी बात "हम वहाँ जितना हासिल करने के लिये गये थे उससे कहीं बहुत अधिक हम पा चुके हैं।" मन में एक गुदगुदी सी कर रही थी।

दूसरे दिन अनुराग ने एक गुलदस्ता भेजा। पूर्वी जब मेरे पास लेकर आई। मैं तुरंत सोकर उठी ही थी। रंग-बिरंगे फूलों का गुलदस्ता था। अन्दर एक कार्ड था। मैंने कार्ड निकाला। लिखा हुआ था –

जल्दी स्वस्थ हो जाओ !

----अनुराग

पूर्वी ने कार्ड मुझसे ले लिया और पढ़कर बोली, "ये जनाब तो शब्दों के बड़े कंजूस निकले। इतने बड़े कार्ड में सिर्फ तीन शब्द!" फिर मेरे पास बैठते हुए बोली, "वैसे कितनी इंटेंस आँखें हैं उनकी...शब्दों की उन्हें जरुरत ही नहीं पड़ती होगी।" मेरी आँखों में झाँकते हुए कह रही थी। मैं चुप रही। मेरी आँखों में उसका चेहरा उभर आया था।

"तेरा तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैं शर्त लगा सकती हूँ कि उसे तुझसे प्यार हो गया है ...?" वह मुझे छेड़ती हुई बोली। मेरे होठों पर एक मुस्कराहट उभर आई। उसकी बातें मुझे गुदगुदा रही थीं।

पूरी तरह ठीक होने में तीन-चार दिन लग गये थे। दोबारा हमने डांस क्लास में एनरोल नहीं कराया। अनुराग ने कहा जितना हमें सीखना था सीख चुके हैं। आगे कुछ नया तो सीखना नहीं है। प्रक्टिस के लिये बेहतर रहेगा कि हम कोई अच्छा सा क्लब ज्वाइन कर लेते हैं। कभी-कभार वहाँ जाकर डांस कर लेंगे। समय की भी कोई बाध्यता नहीं होगी। मुझे उसकी बात सही लगी थी और हमने एक क्लब ज्वाइन कर लिया।

क्रमश..

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Pratap Narayan Singh

Pratap Narayan Singh मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

Suresh

Suresh 2 साल पहले

Minakshi Singh

Minakshi Singh 2 साल पहले

S Nagpal

S Nagpal 2 साल पहले

Pranava Bharti

Pranava Bharti मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

kahani bdhiya chl rhi ,aage ki prteeksha.