राम रचि राखा - 6 - 2 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 6 - 2

राम रचि राखा

(2)

उस दिन जब मुन्नर दिशा फराकत से लौटे, भैया कुएँ पर नहा रहे थे। जल्दी जाना था। एक रिश्तेदारी में किसी का देहांत हो चुका था। सोच रहे थे जल्दी निकल लूँ। बीस कोस साईकिल चलाकर जाना है। दोपहर होने से पहले पहुँच जाऊँ। आजकल दोपहर में चल पाना मुश्किल हो रहा था।

"मैं जा रहा हूँ नेवादा…हीरा से बात कर ली है…चले जाना थ्रेसर पर। दोपहर से पहले वे हमारा गेहूँ लगा देंगे।" भैया देह पोंछते हुए मुन्नर से कह रहे थे।

मुन्नर, भैया के किसी भी बात का जवाब नहीं देते हैं। न हाँ न ना। बस सुन लेते हैं। यह बात भैया भी जानते हैं। ड्योढ़ी पर रखी बाल्टी उठाकर गाय दुहने लगे।

"…और देख लेना दँवायी आज जरूर हो जाए। कल से ही बादल उतरा रहे हैं। कोई भरोसा नहीं है कि कब बरसात हो जाए।"

"…और बंशी से बात कर लेना कि नीचे वाला खेत कब पलटना है। वह भी रोज आज-कल आज-कल कर रहा है।" भैया धोती का कछाना पीछे खोंसते हुए बोले।

माई ओसार में झाड़ू लगा रही थीं। वहीं से बोलीं, "भैया! अब उधर जा ही रहे हो तो थोड़ा रमला के यहाँ भी हो लेना। बहुत दिनों से कोई खोज खबर नहीं मिली। पाहुन का पैर टूटा था, तब भी नहीं जा पाए थे।" रमला, माई की एक मात्र पुत्री थीं, जो भैया से दो साल छोटी थीं। रास्ते में ही उसका गाँव पड़ता था।

"वहाँ जाने का मतलब कि आज तो नहीं लौट पाउँगा...इतना काम पड़ा है..." फिर कुछ सोचकर बोले, "देखूँगा अगर समय से निकल लिया तो चला जाऊँगा। शाम तक लौटने की सोच रहा था। अब भोर में ही निकलना पड़ेगा वहाँ से" भैया जानते थे कि रमला के यहाँ गए तो रात रुकना ही पड़ेगा।

नाश्ता करके भैया सायकिल उठाकर चल दिए और जाते-जाते मुन्नर को हिदायत दे गए -- हम नहीं हैं, जिम्मेवारी से सब काम निबटा लेना, टाइम से बैलों को अलगा देना, अगर दँवायी होने में देर सवेर लग जाए तो गेहूँ को बोरे में भरवा कर वहीं हीरा के ओसार में रखवा देना। कल सुबह घर ले आयेंगे।

मुन्नर दूध की बाल्टी मुन्नी (भैया कि बड़ी बेटी) को पकडा दिए, जो घर में अपनी माँ के पास ले गयी और खुद नीम के पेड़ से दातुन तोड़कर कुएँ पर बैठ गए।

घंटे भर बाद, दातुन करके, बछड़े को वापस उसके खूँटे से बाँध कर, गाय को छाये में करके, बैलों को चारा डालकर, गोबर उठाकर और साफ सफाई करके जब मुन्नर घर में नाश्ता करने के लिए घुसे तो भौजी आँगन लीप रही थीं। मुन्नर ने ध्यान नहीं दिया और उनका पैर लिपे हुए जगह पर पड़ गया। अभी सूखा नहीं था और पैरों से लगकर उखड़ गया।

"दीदा फूट गया है तुम्हारा...दिखाई नहीं देता...सब सत्यानाश कर दिए...।" भौजी की त्योरियाँ चढ़ गयीं। वैसे भी मुन्नर उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते थे और रोज किसी न किसी बात पर एक-आध बार झड़प हो ही जाती थी।

मुन्नर घूरकर भौजी की तरफ देखे पर बोले कुछ नहीं। झगड़ा नहीं करना चाहते थे। आँगन के एक कोने में पड़ी बसँहटी (बाँस की चारपाई) पर बैठ गए ।

"आँख क्या दिखा रहे हो…जलाकर भस्म कर दोगे? आँख जाकर किसी और को दिखाना, यहाँ कोई तुम्हारा गुलाम नहीं है। किस कमाई पर रोब दिखाते हो?"

मुन्नर स्वयं को शांत रखते हुए बोले, "थोड़ा सा पैर पड़ गया तो कौन सी आफत आ गयी जो इतना बिष उगलने लगी, दोबारा लीप दो।"

"हाँ हाँ...मैं तो तुम्हारी दर-खरीद लौंडी हूँ न, जो दिन भर घिसती रहूँ। खरीद के लाये था न मुझे। यहाँ घर में मैं दिन रात पिसती रहूँ और वहाँ खेतों में वे खून जलाते रहें…आप लाट साहब बनकर मौज करते रहें।" भौजी एकदम से भड़क उठीं, "अपने पास तो एक धेला का भी जाँगर नहीं है और चाहते हैं कि बाकी सारे लोग दिन भर खटते रहें।"

इस बीच मुन्नी नाश्ता लाकर चारपाई पर रख दी थी।

"अब चुप हो जाओ, नहीं तो मैं बता रहा हूँ कि ठीक न होगा।" मुन्नर को थोड़ा गुस्सा आ गया।

“क्या ठीक नहीं होगा…? क्या करोगे...?” अब भौजी आपे से बाहर हो गयीं। पहले से अधिक जोर-जोर से चीख कर बोलने लगीं, "मारोगे मुझे…क्या कर लोगे तुम...तुम क्या समझते हो कि तुम्हारी घुड़की सहूँगी मैं…चारों बेला बैठे- बैठे कलेवा मिल जा रहा है तो बहुत चर्बी चढ़ गयी है, जो चले हो हमें धमकाने...।"

अब मुन्नर से न रहा गया, "साला, हर वक्त खिचखिच, जब देखो तब पहड़क, खाना पीना दुस्वार कर दिया है...।" गुस्से में नास्ते की थाली उठाकर जमीन पर पटक दिए और उठकर खड़े हो गए। "इस घर में एक मिनट भी रहने लायक नहीं है।" गुस्से में उठकर बाहर चल दिये।

"हाँ तो चले क्यों नहीं जाते कहीं। हम भी देखें कि कहाँ तुम्हें बैठे-बैठे रोटियाँ तोड़ने को मिलती हैं…और कौन तुम्हारे इस करतब पर बाँदी की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती है…।" भौजी की आवाज ओसार तक मुन्नर का पीछा करती रही।

बाहर आकर कुछ देर कुएँ के चबूतरे पर बैठ गए। धूप धीरे-धीरे बढ़ रही थी। हालाँकि, जहाँ वे बैठे थे वहाँ नीम की छाँव आ रही थी। गिलहरियाँ नीम के पेड़ पर ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर दौड़ लगा रही थीं। ऊपरी डाली पर गौरैया का एक छोटा सा झुंड गायन में तल्लीन था। गिलहरियों और गौरैयों को देखकर उनके मन में कुछ ईर्ष्या उभर आयी और अपने उपर तरस आने लगा- ये इतने तुच्छ जीव कितने मजे से रह रहे हैं और एक मैं…।

सुबह की भैया की बात याद आयी और सोचे की चल कर एक बार देख आता हूँ। पहले बंशी के यहाँ गए तो पता चला कि वह तो सिवान चला गया है। वहाँ से हीरा के थ्रेशर पर चले गए। अभी थ्रेशर चालू करने की तैयारी चल रही थी ।

हीरा ने कहा, “अभी तो तुम्हारा नंबर आने में दो तीन घंटे लग ही जायेंगे। थोड़े अपने गाँठ पड़े हैं काटने को। दोपहर तक तुम्हारी कटाई जरूर शुरू कर दूँगा। तब तक अपनी गाँठें उठवा कर थ्रेशर के पास रखवा दो। अभी तो तुम्हारी गाँठें खलिहान के उस कोने में पड़ी है। घंटा दो घंटा तो उन्हें लाने में लग जाएगा।

गाँव के एक सिरे पर मजदूरों की एक छोटी सी बसावट थी, जो दिहाड़ी पर काम करते थे। मुन्नर सोचे वहाँ से चार मजदूर बुला लाता हूँ। घंटे भर में सारी गाँठें इकट्ठी हो जायेंगी। अभी जाना पड़ेगा नहीं तो एक बार मजदूर काम पर निकल गए तो मिलना मुश्किल होगा। सोचते हुए बस्ती की ओर चल दिए।

प्रभु काका ताश खेलने के पक्के नशेड़ी हैं। सुबह से शाम तक उनके ओसार में ताश की बाजी जमी रहती है। गाँव भर के निठल्ले इकठ्ठा होकर ताश खेलते रहते हैं। मुन्नर भी खाली समय में जाया करते हैं। अच्छा खेलते हैं मुन्नर।

जब उनके ओसार के सामने से निकले तो प्रभु काका ने आवाज़ दी। "इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो मुन्नर?"

आवाज सुनकर मुन्नर ठिठक गए। देखा ओसार में प्रभु काका के अलावा तीन लोग और थे। ताश की बाजी चल रही थी।

"काका! मजदूर लेने जा रहा हूँ…गेहूँ की गाँठें इकट्ठी करानी है, आज दँवायी है।" कहकर मुन्नर आगे बढ़ना चाहे।

"अरे! सुनो तो! एक मिनट यहाँ तो आओ।” जो चौकड़ी जमी थी उसमें एक खिलाड़ी कमजोर पड़ रहा था। प्रभु काका मुन्नर को रोकना चाहते थे।

मुन्नर ओसार में आ गए। अभी खड़े ही थे।

"बैठो तो सही, ऐ बिल्लू! थोड़ा और पीछे होओ, मुन्नर को बैठने दो।"

“नहीं काका मैं मजदूर लगाकर आता हूँ, फिर बैठूँगा।“

“अरे बैठो, चिंता क्यों कर रहे हो, मजदूर मैं यहीं बुलवा देता हूँ।" काका थोड़ा जोर देकर बोले।

मुन्नर हिचकिचाते हुए बैठ गए। सोचे, अच्छा है अगर यहीं बुलवा देते हैं तो बस्ती तक जाना बच जाएगा। वैसे भी अभी दो तीन घंटे से पहले कटाई का नंबर तो आना नहीं है।

"सुनो! लँगड़ा अभी तम्बाकू लेकर आ रहा है। मैं उसे भेजता हूँ, वो बुला लाएगा , बिलकुल भी चिंता न करो। ऐ रामजी! पत्ते बाँटो” काका ने तसल्ली से कहा।

लँगड़ा काका का नौकर है। एक पैर से थोड़ा सा लँगड़ाकर चलता है। इसलिए उसका नाम ही लँगड़ा पड़ गया है। रामजी पत्ते फेटने लगे।

थोड़ी देर में लँगड़ा तम्बाकू लेकर आया और काका का चिलम चढ़ा दिया। काका ने उसे हिदायत देकर भेज दिया, “बस्ती जाकर सल्टू, जगेसर या कोई और भी मिले तो दो आदमी को बुलाकर ले आ। …और लौटते समय बरइया के यहाँ से चार पान भी लगवाते आना।"

लँगड़ा चला गया तो मुन्नर को संतुष्टि हो गयी। वे पत्ते खेलने में तल्लीन हो गए ।

डेढ़ दो घंटे बीत गए तब मुन्नर को होश आया कि न तो लँगड़ा ही वापस आया और न ही मजदूर।

"काका! बड़ी देर हो गयी, लँगड़ा तो वापस आया ही नहीं" मुन्नर के माथे पर चिंता उभर आई।

"हाँ यार, ये कहाँ जाकर मर गया...।" काका को भी आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे कि आखिर क्या हो गया। कहाँ अटक गया वह। तभी वहाँ से मुबारक अली गुजरे।

"अरे मुबारक!, उधर कहीं लँगड़ा दिखा था क्या?" काका ने मुबारक को आवाज देते हुए पूछा।

"हाँ काका, बरइया के यहाँ पान तो लगवा रहा था।" मुबारक कहते हुए आगे बढ़ गए।

"अभी तक क्या कर रहा था साला…।" काका बुदबुदाए, "तुम चिंता न करो अभी आ रहा होगा" मुन्नर से बोले।

खेल फिर आगे शुरू हुआ लेकिन अब मुन्नर का मन नहीं लग रहा था। सोच रहे थे अगर मजदूर नहीं मिले तो बहुत ही मुश्किल हो जायेगी। अगर आज गेहूँ की दँवायी न हुयी तो कल भैया बहुत ही गुस्सा होंगे। अनमने मन से पत्ते फेंकते हुए हुए सोचने लगे। थोड़ी सी आशा थी कि शायद लँगड़ा मजदूर लेकर आ जाए।

दस पंद्रह मिनट बाद लँगड़ा वापस आया। देखते ही काका आग बबूला हो उठे, "साला, तू कहाँ जाकर मर गया था…?"

"विजय भैया का ट्रक्टर ख़राब हो गया था तो वो रोक लिए थे, मैं क्या करता।" लँगड़ा ने अपनी सफाई दी। विजय, काका के बड़े बेटे हैं। काका नरम पड़ गए ।

"…और मजदूरों का क्या हुआ?"

"मैं जब तक पहुँचा, सब काम पर चले गए थे। घर पर कोई नहीं है। बस बिरजू का परिवार है। वे सब अपना मड़ई छा रहे हैं।

मुन्नर के चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। पत्ते फेक कर खड़े हो गए ।

"यह तो बहुत गड़बड़ हो गयी...मैं देखता हूँ " मुन्नर चलने को उद्यत हुए ।

"अरे घबराओ मत मुन्नर, अभी सब दोपहर में खाना खाने आयेंगे तो उन्हें पकड़ लेंगे।" काका ने रोकने की गरज से कहा।

परन्तु मुन्नर रुके नहीं और बस्ती की ओर चल दिए ।

जैसा कि लँगड़ा ने बताया था, वास्तव में बस्ती में कोई मजदूर घर पर नहीं था। मुन्नर ने किसी तरह से बिरजू को उसके भाई के साथ आने के लिए राजी किया। वह अपनी झोपड़ी बना रहा था। उसने घंटे दो घंटे में आने का आश्वासन दिया। उन्हें थोड़ी तसल्ली हुयी कि चलो थोड़ी बहुत देर हो जायेगी लेकिन काम तो आज हो जायेगा लौटते हुए दोपहर घिर आई थी।

रास्ते मे पड़ोस का एक लड़का मिला जिसने बताया कि उनकी माई उन्हें ढ़ूँढ़ रही थीं। मुन्नर सीधे घर आ गए।

सुबह माई जब पड़ोस से लौटी थीं तो मुन्नी ने सारी बात बता दी थी कि "माँ और चच्चा के बीच फिर झगड़ा हुआ और वे बिना कलेवा किये ही चले गए।" इसलिए माई परेशान हो रही थी।

घर आकर मुन्नर ने स्नान किया। माई खाना लेकर आयीं और वे दालान में ही बैठकर खाना खाये। अन्दर नहीं गए। माई को बता दिया था कि मजदूर ठीक करने गए थे और दोपहर के बाद कटाई शुरू हो जायेगी।

खाना खाकर मुन्नर मड़ई में बिरजू का इंतजार करने लगे। चारपाई पर लेटे-लेटे नींद आ गयी। जब नींद खुली तो हड़बड़ाकर उठे। देखे तीसरा पहर घिरने लगा था, तीन चार बज रहे होंगे। बिरजू भी नहीं आया था। भाग कर फिर बस्ती गए। वहाँ से बिरजू और उसके भाई को लेकर खलिहान की तरफ चल दिए।

जब खलिहान से थोड़ी दूर ही थे तो देखा कि एक सिरे से आग की लपट और धुआँ सा उठ रहा है और भगदड़ मची हुयी है। दौड़कर खलिहान में पहुँचे। गेहूँ की गाँठों में आग लग गयी थी। उनकी गाँठे धू-धू कर जल रही थीं। उनके साथ पास में रखी कुछ और लोगों की गाँठें भी। अफरा तफरी मची हुयी थी। पास के कुएँ से लोग बाल्टियों में पानी लाकर आग पर डाल रहे थे।

लोगों के साथ मुन्नर, बिरजू और उसका भाई भी आग बुझाने में जुट गए।

किन्तु जब तक आग बुझाई जा पाती तब तक बहुत कुछ स्वाहा हो चुका था। मुन्नर की गाँठें तो लगभग पूरी तरह जल चुकी थीं। उन्हें काटो तो खून नहीं।

क्रमश..

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Ranjan Rathod

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