राम रचि राखा - 5 - 2 Pratap Narayan Singh द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

राम रचि राखा - 5 - 2

राम रचि राखा

मुझे याद करोगे ?

(2)

रुचि की जब बारहवीं की परीक्षाएँ समाप्त हुई तो दीदी के यहाँ चली आई। आने के पहले बहुत उत्साहित थी, किन्तु इस छोटे से कस्बे में आकर उसका सारा उत्साह जल्दी ही समाप्त हो गया। वह बड़े शहर में पली-बढ़ी थी। पिताजी अच्छे-खासे रईस थे। वहाँ उनका काफी बड़ा बंगला था। यहाँ न तो कहीं घूमने फिरने लायक है और न ही उसकी सहेलियाँ हैं। कस्बे में कुल मिलाकर एक सिनेमाघर था जिसकी कुर्सियों पर तीन घन्टे बैठना भी अपने आप में एक कसरत थी।

सारा दिन तीन कमरों के इस छोटे से प्लैट में बिताना उसे जल्द ही ऊबाऊ लगने लगा। जीजाजी सुबह दस बजे तक अपने क्लीनिक चले जाते और दीदी घर के काम में लग जाती। रुचि टेलीविजन देखती, दीदी से गप्पें मारती, मन होता तो दीदी के काम में हाथ बँटा देती। वैसे बहुत अधिक काम नहीं था। घर में तीन लोग ही थे। दीदी की शादी दो साल पहले ही हुई थी।

उस दिन जब गाँव जाने से पहले आनंद के पिता उसे यहाँ छोड़ने आए थे तब पहली बार रुचि आनंद से मिली। गोल-मटोल चेहरा, गोरा-चिट्टा रंग। छोट- छोटी मासूम आँखों में थोड़ी सी उदासी थी। पहली बार माँ से अलग रहना था, शायद इसी कारण।

सभी लोग ड्राइंग रूम में बैठकर चाय पीते हुए बातें कर रहे थे। सामने सेन्ट्रल टेबल पर चाय के साथ का नाश्ता रखा हुआ था। आनंद चुपचाप बैठा हुआ था। उससे सम्बन्धित कोई भी बात कही या पूछी जाती तो सिर हिलाकर या सिर्फ़ हाँ-ना में उत्तर दे देता। आन्टी जी के बा- बार कहने पर उसने एक समोसा उठा लिया और धीर- धीरे खाने लगा। डाक्टर साहब की पत्नी को वह आन्टी जी कहकर बुलाता था।

"आनंद तो बहुत शर्मीला है।“ रुचि ने कहा।

"अभी इसके पापा यहाँ हैं न इसलिए ऐसा दिख रहा है।“ आन्टी जी ने हँसते हुए कहा, "एक बार उन्हें जाने दो फिर देखना कि कितना शर्मिला है।“ सभी लोग हँसने लगे। आनंद थोड़ा झेंप गया।

फिर आन्टी जी ने बात को सम्भालते हुए उसकी झेंप मिटाने के लिये कहा, "नहीं नहीं, आनंद बहुत ही अच्छा बच्चा है...पढ़ाई मे भी बहुत तेज है।"

वास्तव में आनंद दूसरों से बहुत कम बातचीत करता था। लेकिन उसके अन्दर बाल-सुलभ चंचलता और शरारत काफी थी जिससे आन्टी जी अवगत थीं। दोनों लोगों के घरों में बहुत दूरी न थी। एक दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था। हाँ, वह अपने पापा के सामने वह बहुत शान्त रहता था।

आनंद का बिस्तर रुचि के कमरे में लगा दिया गया और यह तय हुआ कि वह डाक्टर साहब के स्टडी रूम में अपनी पढ़ाई करेगा। उसमें कुर्सी- मेज भी था जिससे पढ़ने में सुविधा होगी। वैसे भी डाक्टर साहब उस कमरे का उपयोग कभी-कभार ही दोपहर के खाने के बाद घन्टे- दो घन्टे के लिए करते थे। रात में क्लीनिक से लौटते लौटते दस-ग्यारह बज जाता था।

शाम को आनंद स्टडी-रूम में पढ़ रहा था। कल उसकी परीक्षा थी। रुचि उत्सुकतावश कमरे में आ गई। बस यह देखने की वह क्या कर रहा है।

"कल किस सब्जेक्ट का पेपर है?" रुचि उसके पास आकर खड़ी हो गई थी।

"साइंस का।"

"सब तैयार कर लिए हो?"

उसने मुस्करा दिया। उस मुस्कराहट का अर्थ हाँ और ना दोनों ही था। वास्तव में उसके समझ में नही आया कि क्या कहूँ। सब तैयार होने का अर्थ हुआ कि प्रत्येक प्रश्न बिल्कुल भर्राटे से याद होना।

"अच्छा देखूँ कितना तैयार है!" रुचि ने उसका नोट-बुक लेते हुए कहा, "मैं क्वेस्चन्स पूछूँ ?

आनंद ने सहमति में सिर हिला दिया। रुचि उससे प्रश्न पूछने लगी। आनंद को काफी कुछ याद था। फिर भी कई जगहों पर भूल जा रहा था। रुचि उसे एक बार अच्छे से सारा दुहराने को कहकर वहाँ से चली गई।

लगभग नौ बजे जब रुचि और आनंद खाना खा चुके तब रुचि ने आनंद से पूछा, "अभी पढ़ोगे या नींद आ रही है"। आनंद ने कहा कि अभी वह थोड़ी देर और पढ़ेगा और स्टडी-रूम में चला गया।

रुचि आधे-एक घन्टे दीदी के साथ टेलीविजन देखती रही, फिर उसे नींद आने लगी तो वह अपने कमरे में सोने चली गई। जाते हुए आनंद से कहकर गई कि अब काफ़ी देर हो चुकी है और वह भी आकर सो जाए। सुबह उठना पड़ेगा।

रात में रुचि की नींद अचानक खुल गई। देखा कि आनंद अपने बिस्तर पर नहीं है। सामने दीवार घड़ी में दो बज रहे थे। कहाँ चला गया? सोचते हुए वह बिस्तर से उतरी। क्या अभी तक पढ़ रहा है? वह स्टडी रूम में गई। आनंद कुर्सी पर बैठा हुआ था और उसका सिर मेज पर टिका था। कमरे की लाइट जल रही थी।

“हे भगवान! यह तो यहीं सो गया।“ वह उसे जगाने के लिए उसके पास आ गई। आनंद का बायाँ हाथ मेज पर फैला हुआ था, जिस पर उसने अपना बायाँ गाल टिका रहा था। दाहिना हाथ नीचे लटक रहा था। वह गहरी नींद में सो रहा था। उसके मासूम चेहरे को देखकर रुचि को एकदम से उसे जगाने की इच्छा नहीं हुई। जी चाहा कि ऐसे सोते ही वह बिस्तर पर पहुँच जाए। किन्तु वह इतना छोटा नहीं था कि वह उसे गोद में उठाकर ले जा पाती। उसे वहाँ इस तरह से सोते छोड़ना तो बिल्कुल भी ठीक नहीं था।

उसने जगाने के लिए पहले आवाज दी। पर वह नहीं जागा। फिर उसका कन्धा पकड़कर झँझोड़ते हुए जगाने लगी, "आनंद..! आनंद...!" एक बार वह कुलबुलाकर जागा। अपना सिर ऊपर उठाया। फिर अपने हाथ से रुचि का हाथ कन्धे से हटाकर दोनो हाथों के ऊपर मेज पर सिर टिकाकर सो गया। अभी भी नींद में था।

"ओह, यह लड़का...हे उठो...आनंद...उठो...!" रुचि ने उसके कन्धों को पकड़कर ऊपर उठाया और पीठ को कुर्सी पर टिका दिया। उसका सिर बायीं तरफ़ झुक गया। आँखें अभी भी बन्द थी। रुचि ने उसके चेहरे को हाथों में पकड़कर हिलाते हुए जगाने लगी। उसने अपनी आँखें थोड़ी सी खोली और अर्धनिद्रा में बड़बड़ाया, "क्या है"। रुचि ने देखा कि वह थोड़ा जगा है, तो उसके कन्धों को पकड़कर खड़ा करते हुए बोली, " आनंद, उठो...चलो बिस्तर पर सोओ...चलो उठो।"

वह कनमनाकर उठ खड़ा हुआ। रुचि उसे अर्धनिद्रा की हालत में ही सहारा देकर कमरे तक ले आई और बिस्तर पर सुला दिया। बिस्तर पर पड़ते ही वह फिर से गहरी नींद में सो गया।

सुबह आन्टी जी ने आनंद को जल्दी जगाकर स्कूल के लिए तैयार किया। आठ बजे से उसकी परीक्षा थी।

दोपहर में खाने के मेज पर रुचि रात की बात सबको बताकर खूब हँसी। पहले तो उसने आनंद से पूछा, "रात में तुम कितने बजे सोने आए थे"। आनंद सोचने लगा। उसे कुछ याद ही नहीं आ रहा था। फिर रुचि ने बताया कि वह कुर्सी पर ही सो गया था। वह उसे किसी तरह से कमरे में ले आयी।

दूसरे दिन शाम को जब वह पढ़ रहा था तब उसे याद आया कि जूते दिन में गन्दे हो गये थे। बिना पालिश किए जूते अगर पहन कर वह जाएगा तो मैम डाटेंगी। अब समस्या यह थी कि जूते कैसे पालिश होंगे? उसने पहले कभी पालिश नहीं किया था। किसी को कहने में झिझक आ रही थी। कुछ देर सोचता रहा। फिर सोचा कि खुद ही कर लेता हूँ। मम्मी को देखा है पालिश करते हुए।

बरामदे में एक स्टैंड पर सभी के जूते-चप्पल रखे जाते थे। उसने देखा था वहीं पर पालिश की डिबिया और ब्रश रखा हुआ था। वह उठकर बरामदे में गया और वहीं बैठकर पालिश करने लगा। आन्टी जी रसोई में थीं और रुचि टेलीविजन देख रही थी।

कुछ देर बाद रुचि किसी काम से बाहर बरामदे में आई। उसने देखा कि आनंद जूते पालिश करने की कोशिश कर रहा है। उसके दोनों हाथों में पालिश लगी हुई है। चेहरे से पसीना चू रहा है। काफ़ी गर्मी थी। वहाँ कोई पंखा भी नहीं था। पसीने को पोछने की कोशिश में चेहरे पर भी पालिश लग गयी थी।

"अरे, ये क्या कर रहे हो...। ?" रुचि की आवाज सुनकर उसने चौंक कर सिर उठाया। फिर बोला, " जूते गन्दे हो गये थे।"

"अच्छा उसे छोड़ो...चलो अन्दर...देखो क्या शकल बना ली है।"

तभी आन्टी जी भी आ गयीं। आनंद का हाल देखकर उन्हें बुरा लगा। उन्होने रुचि से कहा," तुम जूते पालिश कर दो, मैं इसका हाथ-मुँह धुलवाती हूँ।“

हाथ मुँह धुलवाते समय उन्होंने आनंद को प्यार से हिदायद दी- बेटा, तुम्हें जो भी जरुरत हो मुझसे कह दिया करो। बाद में उन्होने रुचि से कहा," रूचि, तुम देख लिया करो कि उसे किस चीज की जरुरत है। वह कहते हुए झिझकता है।"

एक-दो दिन में रुचि ने आनंद की पूरी जिम्मेदारी ले ली। वही उसे स्कूल के लिए तैयार करती। उसके बाल सँवारती, जूते पालिश करती, टाई बाँधती। शाम को उसके पाठ याद करवाती। उसके साथ ही खाना खाती। धीरे-धीरे यह सब करना उसे अच्छा लगने लगा। उसने आनंद के हर काम- पढ़ने, खेलने, खाने-पीने, सोने-जागने का समय निर्धारित कर दिया। अधिकतर समय उसके साथ ही रहती।

पहले दिन जब शाम को आनंद खाना खा रहा था तो रुचि ने देखा कि उसने तीन रोटियाँ खाईं। उसे तीन की संख्या ठीक नहीं लगी थी। दूसरे दिन जब फ़िर आनंद ने तीन रोटियाँ ही खाई तो उसने पूछा, "तुम हमेशा तीन रोटियाँ ही खाते हो ?"

“हाँ..।“ उसने उत्तर दिया।

“तीन की संख्या शुभ नहीं होती। एक और रोटी खा लो।“

“मेरा पेट भर गया है। और नहीं खा पाऊँगा।“

“रहने दे रुचि, उसका मन नहीं है तो जाने दे।“ आंटी जी ने कहा। आनंद अपना प्लेट उठाकर जाने के लिए खड़ा हुआ।

“अच्छा सुनो! मुँह खोलो।“ रुचि ने कहा। आनंद ने मुँह खोला तो उसने एक कौर उसे खिला दिया दिया। फिर बोली, “ठीक है, अब जाओ।“

रुचि ने इस तरह से एक कौर खिलाने का नियम बना लिया। शुरु शुरु में आनंद को उसके हाथ से खाते हुए हिचकिचाहट हुई। क्योंकि दूसरे के हाथ से उसे खाने की आदत नहीं थी। किन्तु जल्दी ही वह बात उसके लिए सामान्य हो गई।

आनंद की परीक्षाओं के बीच में एक-दो दिन का अवकाश होता था। छुट्टी के दिन प्रायः दोपहर में जब वह पढ़ाई से उबने लगता तो रुचि उसके साथ लूडो या कैरम खेलती। जिससे उसका मन बहल जाए। कभी-कभी झगड़ा भी हो जाता। अधिकतर झगडे़ का कारण आनंद की बाल-सुलभ बेईमानी होती।

उस दिन दोनों लूडो खेल रहे थे। एक बार जब वह हारने लगा तो रुचि की नज़र बचाकर अपनी गोटियाँ आगे बढ़ा दी। रुचि को पता चल गया और उसने यह कहते हुए खेलना बन्द दिया, "मैं तुम्हारे साथ नहीं खेलूँगी, तुम हमेशा चीटिंग करते हो"।

वह अपने बिस्तर पर लेट गई और एक बाँह मोड़कर माथे पर रख ली। उसकी आँखें उसके हाथ से ढँक गईं।

"हारने लगीं तो भाग गईं।" आनंद ने उसे उकसाने के लिए कहा।

"मुझे चीटर के साथ नहीं खेलना है।" रुचि लेटे लेटे ही कहा।

"मैनें कोई चीटिंग नहीं की...आपने ठीक से देखा ही नहीं, मेरी गोटियाँ पहले से ही वहीं थीं।" आनंद का मन खेलने को कर रहा था। वह आगे बोला, "अच्छा चलिए फिर से खेलते हैं।"

रुचि चुप रही। कुछ भी नहीं बोली। आनंद उठकर उसके पास आ गया।

“चलिए न, फिर से खेलते हैं।” उसे लगा की रुचि सच में गुस्सा हो गई है। उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली, "अच्छा अब चीटिंग नहीं करूँगा।“

रुचि अब भी चुप ही रही। फिर आनंद ने उसका हाथ माथे से हटाते हुए कहा, "चलिए न..."

"मैं अब नहीं खेलूँगी, मुझे नींद आ रही है।" रुचि ने आँखें बन्द किए हुए ही कहा।

आनंद उसके पास बैठकर उसे मनाने लगा, "नींद नहीं आ रही है...आप झूठ-मूठ की सो रही हैं।" वह रुचि की पलकों को अपनी उँगलियों से खोलने लगा। रुचि ने मुस्करा दिया। फिर हँसते हुए उठ बैठी और खेलने के लिए तैयार हो गई।

आनंद के आने के बाद रुचि का भी मन यहाँ लगने लगा था। आनंद भी उससे खूब घुल-मिल गया था और हर छोटी बड़ी बात उसे बताता।

जब वह स्कूल चला जाता तो रुचि को कुछ खाली खाली सा लगने लगता। वह स्कूल से लौटता तो बाल्कनी में खड़ी उसकी राह देख रही होती। शाम को जब आनंद पार्क में खेलता रहता तो वह बाल्कनी में खड़ी होकर देखती रहती। अँधेरा होने से पहले रोज वहीं से आवाज लगा कर बुलाती, "आनंद, आओ दूध पी लो...।" और आनंद समझ जाता कि अब खेलने का समय खत्म हो चुका है।

उस दिन आनंद की छुट्टी थी। लगभग दस बजे वह अपने एक दोस्त राजीव के घर चला गया। बोलकर गया कि एक-दो घंटे में वापस आ जाएगा। राजीव उसकी कक्षा में ही पढ़ता था। उसके घर भी आनंद का आना-जाना था और आंटी जी से भी जान-पहचान थी। उसका घर इनके घर से थोड़ी दूर था।

दोपहर हो गई लेकिन आनंद वापस नहीं आया। रुचि को एक अजीब बेचैनी सी होने लगी। वह बार-बार बाल्कनी तक जाकर देख आती। आन्टी जी ने कहा,"तुम क्यों इतना परेशान हो रही हो। वहीं रुक गया होगा। शाम तक आ जाएगा। राजीव की मम्मी ने उसे इतनी धूप में नहीं आने दिया होगा।"

"बोलकर तो गया था कि एक-दो घन्टे में आ जाएगा। कल उसका पेपर भी है।"

"कल से वह तैयारी कर तो रहा है। सुबह भी उसने पढ़ाई की थी। और फिर राजीव के यहाँ उसकी मम्मी भी हैं। राजीव को भी एग्जाम देना है। दोनों पढ़ रहे होंगे। तुम बेकार में परेशान हो रही हो, वह शाम तक आ जाएगा।"

बात सिर्फ़ पढा़ई की नहीं थी, यह रुचि को पता था। अगले दिन उसकी गणित की परीक्षा थी, जो कि उसका सबसे पसंदीदा विषय था और उसने पूरा तैयार कर लिया था, यह बात रुचि जानती थी। वास्तव में उसका इतने लम्बे समय तक न होना रुचि को खल रहा था।

शाम को जब वह लौटा तो रुचि उस पर एकदम से बिफर पड़ी, "तुम सारे दिन घूमते रहे...कह कर गये थे कि एक-दो घन्टे में लौट आउँगा...यह कोई तरीका है...। कल पेपर है और तुम्हें पढ़ने-लिखने का कोई होश नहीं है।" यह उसके अपने मन की खीझ थी।

"कोई बात नहीं, अभी वह पढ़ लेगा। तुम उसे डाँटो मत।" आन्टी जी को रुचि का डाँटना अच्छा नहीं लगा। फिर आनंद से पूछीं, "बेटा! भूख लगी है? कुछ खाओगे?" आनंद ने नहीं मे सिर हिला दिया।

"क्यों, दोपहर को ही तो खाए होगे न...अच्छा बिस्किट खा लो और दूध पी लो "।

फिर उन्होनें रुचि को कहा कि वह आनंद को दूध और बिस्किट दे दे।

रुचि के डाँटने के कारण आनंद का चेहरा उतर गया था। वह स्टडी रूम में चला गया और किताब खोलकर बैठ गया। रुचि दूध लेकर आई। उसने चुपचाप दूध पी लिया। वह उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। किन्तु कुछ भी पूछने पर या तो वह चुप रहता या हाँ-ना मे सिर हिला देता।

रुचि को पछतावा होने लगा कि बेकार मे ही उसने डाँट दिया था। वह उसे मनाने लगी। उसे लाकर चाकलेट दी। उसके पेट मे गुदगुदी की। थोड़ी देर मे वह मान गया और सामान्य हो गया।

क्रमश..

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Pragati Gupta

Pragati Gupta मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

USHA RAO

USHA RAO 2 साल पहले

Pratap Narayan Singh

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