रोबोट वाले गुण्डे -2 राज बोहरे द्वारा कल्पित-विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

रोबोट वाले गुण्डे -2

रोबोट वाले गुण्डे

बाल उपन्यास

- राजनारायण बोहरे

2

प्रोफेसर दयाल ने रेडियो बन्द किया और उठ खड़े हुये। अजय अभय भी उठे।

अजय और अभय बहुत दिनों से दयाल अंकल की प्रयोगशाला नही गये थे, वे आज वही जाना चाहते थे। इस समय वे लोग कॉलेज की प्रयोगशाला में बैठे थे।

- “ अंकल, हम आपकी प्रयोगशाला चलें। “ अजय ने पूछा।

- “ नही बेटा ।“ दयाल साहब बोले- “ हम आज कल एक नया प्रयोग कर रहे है, हम प्रयोगशाला में किसी को नही जाने देते। इसीलिये तुम लोगो को कॉलेज की प्रयोगशाला में साथ लाये हैं। सॉरी अजय - अभय । “

इसके बाद दयाल साहब ने स्कूटर पर वे दोनो अपने घर आए।

घर पहुँच कर वे दोनो यही सोचते रहे कि पिछली दिवाली से

दयाल अंकल अपना जो नया प्रयोग कर रहे हैं, यह कौन-सा गुप्त प्रयोग होगा ?

याद आया कि -

उस दिन दिवाली थी, अजय व अभय के पिता श्री ढेर सारी फुलझड़ी फटाके लाए थे। रात का समय था अजय और अभय वही आतिशबाजी का रहे थे।

दयाल अंकल अपने दरवाजे पर थे।

अजय ने अपनी आतिशबाजी की चीजों में से रामबाण रॉकेट का एक डिब्बा पूरा उठाकर अभय से बोतल लाने को कहा था।

भाग कर अभय बोतल लाया अजय ने एक रामबाण रॉकेट लिया था और उसे बोतल में रखकर उसकी पत्ती में आग लगा दी थी।

“सुर्रर” एक तीखी आवाज़ करता रामबाण आकाश में उड़ गया था और प्रोफेसर दयाल देर तक उसे देखते रहे थे।

इसी प्रकार अजय ने अनेक रामबाण चलाये थे, और उसके हाथ से एक रामबाण रॉकेट लेकर उसे उलट-पुलट कर देखते रहे थे, बाद में वे उसे अपने साथ ले गये थे।

इसके बाद दयाल अंकल अपने अविष्कार में जुट गये थे। वे सदा से चुप रहने वाले इंसान थे, न वे किसी के यहां जाते थे और न ही किसी को अपनी प्रयोगशाला में आने देते थे।

इसके पहले कि अजय की एक और बात अजय की याद आई -

काफी समय हुआ तब प्रोफेसर दयाल अपनी प्रयोगशाला में एक अजीब सा प्रयोग करते रहते थे। वे कांच के एक जार में अनेक प्रकार की गैस हवायें भर लेते थे और जार का ढ़क्कन खोलकर धीमे से कोई चीज़ डाल देते थे।

अनेकों बार अजय-अभय ने देखा था कि फुलझड़ी की तरह वे चीजें जार में जल जाती थीं।

एक बार अजय ने पूछा था कि - “आप यह क्या कर रहे हैं?“

तब प्रोफेसर दयाल ने सीधी-सादी समझाया था कि - “बेटे अजय सुनों, हमारी धरती एक गोलाकार गेंद की तरह आकाश में तैर रही हैं। इसके चारों ओर लगभग दो सौ किलो मीटर तक लगभग ऐसी ही गैस भरी है, जैसी की इस जार के भीतर है। यानी कि नाइट्रोजन ऑक्सीजन वगैरह गैस हमारी पृथ्वी के चारो ओर दो सौ किलोमीटर तक धुंध जैसा घेरा बनाये हैं, इसी घेरे को वायुमण्डल कहते हैं। इसमें नयी चीजं़े आते ही जलकर राख हो जाती हैं।“

“ इस प्रयोग से वायु मण्डल का क्या मतलब ?“ अजय ने पूछा

मैं ऐसी चीजों की खोज कर रहा हूँ जो वायुमण्डल में जलें नही।“

और काफी दिनांे बाद एक प्रोफेसर बोले थे कि उन्हंें वह चीज़ मिल गई है,जिसकी उन्हें खोज थी। यह धातु सस्ती है औैर जलेगी नही।

अजय और अभय को अपने खेल और स्कुल से ही कहाँ फुरसत थी जो वे इतनी कठिन और किसी की निजी बातों में अपना दिमाग खराब करते। उन्हें पता था कि जब भी अंकल कोई नया अविष्कार करेंगे हमको जरूर बताएगें।

आज अजय ने पुरानी सब बातें अभय से कही तो वाह बोला - “लगता है कि प्रोफेसर अंकल का अविष्कार पूरा हो गया है, तभी वे आज खुश नजर आ रहे थे।चाहें कुछ हो जाये मैं जरूर कल उनसे इस विषय में पूछूँगा।“

प्रोफेसर दयाल अपने घर में एकमात्र नौकर के साथ अकेले रहा करते थे, अतः कल सुबह ही उनके यहाँ जाने का प्रोग्राम बनाकर अजय-अभय अपने दैनिक कार्यक्रम में व्यस्त हो गये।

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જીગર _અનામી રાઇટર
ramgopal bhavuk

ramgopal bhavuk मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

achchaa hai