कुबेर - 11 Hansa Deep द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

कुबेर - 11

कुबेर

डॉ. हंसा दीप

11

अभी तक इतने सालों बाद भी जो दिल के क़रीब था वह क़रीब ही रहा, कभी दूर हुआ ही नहीं था। वही महक रौशनी की तरह परावर्तित होकर बार-बार आती थी उसके समीप। उसके कानों में फुसफुसा कर चली जाती थी। कह जाती थी अनकही बातें और सुना जाती थी माँ के स्नेहिल आँचल की कहानी।

उसी माँ का लाड़ला धन्नू अब कई बच्चों का भाई डीपी बन चुका था। रविवार की सभा में आने वाले कई लोग सर डीपी कहते। एक जाने-माने जौहरी, दादा के द्वारा तराशा गया डीपी एक ऐसा हीरा बन चुका था कि उसके ज्ञान के सामने हर डिग्री फीकी पड़ जाती। सब देखते थे उसके काम और अध्ययन के ज़ुनून की पराकाष्ठा को, अपने काम के प्रति उसकी निष्ठा को जो एक नशे की तरह थी। जितना अधिक से अधिक काम वह कर सकता था, करता था।

किसी भी असफल कार्य को पूरा करने में जुट जाना उसकी प्रकृति में शामिल था। अत्यधिक प्रयत्न के बाद जब काम का नतीजा नहीं मिलता तो गुस्से के आवेग को रोकना उतना ही कठिन होता जितना माँ-बाबू को अकेले छोड़ते हुए भी उसका गुस्सा जीत गया था। ऐसी जीत जो सदा के लिए हार में बदल चुकी थी। माँ-बाबू की अकस्मात मृत्यु का दोषी वह स्वयं को मानता था और वही अपराधी भाव कहीं न कहीं उसके गुस्से को जाने-अनजाने निकाल देता था। शायद वही गुस्सा उसे ताक़त देता था, काम करने का सम्बल देता था।

एक बार वह मैरी के साथ कहीं जा रहा था। किसी ने ऊपर से कचरा फेंका, उसे इतना गुस्सा आया कि जब तक ऊपर वाले को नीचे बुलाकर कचरा साफ़ नहीं करवाया तब तक उसे बिल्कुल चैन नहीं मिला। मैरी बहुत डर गयी थी कि अगर कभी किसी सिरफिरे ने भी पलट कर अपना गुस्सा दिखा दिया तो वह भाई को कैसे बचा पाएगी।

कई बार उसे समझाने की कोशिश कर चुकी थी। कहती – “भाई इतना गुस्सा न करो, ऐसा न हो कि नैन तुम्हारे गुस्से से डर जाए किसी दिन।”

“तुम तो हो न मैरी, बता देना सब कुछ नैन को, मेरे बारे में और मेरे गुस्से के बारे में भी।”

“लेकिन भाई अब लोग आपको छोटे दादा का दर्जा देने लगे हैं। अब तो आपको उस रोल में गुस्सा बिल्कुल नहीं करना चाहिए।”

“मैं कोशिश करूँगा और कर भी रहा हूँ। देखो तो मुझे बहन मिलने के बाद मैं कितना बदल गया हूँ।”

“बदले तो हो पर गुस्सा अभी भी नहीं बदला है।”

“मैं कोशिश तो करता हूँ मैरी, लेकिन किसी भी ग़लत काम को सहन नहीं कर पाता। नैन को भी आदत हो ही जाएगी।”

उस दिन डीपी ने गंभीरता से सोचा था अपने गुस्से के बारे में। क्या करे, आजकल तो गुस्सा आते ही उल्टी गिनती भी शुरू कर देता है फिर भी यह गुस्सा है कि बिन बुलाए मेहमान की तरह आ ही जाता है। नैन से बात करके बता देगा उसे अपने इस स्वभाव के बारे में भी। इससे नुकसान किसी और का नहीं होता उसका ख़ुद का ही होता है।

कुछ तो करना ही होगा उसे इस बारे में। इससे पहले कि उसकी अपनी सीख पर सवाल उठे, दादा की मेहनत पर उँगली उठे, उससे पहले उसे अपने गुस्से को पीना होगा। सुना था कि लोग उल्टी गिनती शुरू करते हैं गुस्सा आने पर। लेकिन उसका यह प्रयास उसके गुस्से को दोगुना कर देता है। उल्टी गिनती गिनते हुए उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। ऐसा महसूस होता था कि उसे पीछे ले जाया जा रहा है, आगे बढ़ने ही नहीं दिया जा रहा है। किसी भी काम को करने में वह आगे ही बढ़ना चाहता था, कभी पीछे मुड़ कर देखने की आदत ही नहीं थी उसकी।

वे छोटे-छोटे बच्चे भी कई बार डर जाते जिनके साथ वह खेलता है। उसे खेल में भी बेईमानी, धोखा जैसे शब्दों से बहुत चिढ़ होती है। जो भी बच्चा अगर थोड़ी बहुत बेईमानी करते पकड़ा जाता तो उसे अच्छी तरह डाँट पड़ती और अगली बार खेलने का मौका भी नहीं मिलता। ऐसे में अन्य बच्चे सहम जाते थे और खेल में दोबारा वह उत्साह लाने के लिए उसे उन्हें ख़ूब हँसाना पड़ता था।

एक ही बात ऐसी थी जो नैन के स्वभाव के विपरीत थी और वह थी डीपी का गुस्सा। नैन बहुत सीधी-सादी, कम बोलने वाली लड़की थी। बचपन से लेकर आज तक अपने माता-पिता की कमी को हर पल महसूस करती रही। अपने बचपन की बेहद चुलबुली लड़की अब एक ख़ामोश और किताबों में खोयी रहने वाली, चुपचाप रहने वाली लड़की बन गयी थी। हर काम में उसका सिर ‘हाँ’ में हिलता था। बस वैसे ही ख़ामोशी से अपना काम करती रहती थी।

डीपी से भी खुलकर बात करने में उसे काफी समय लगा था। दोनों के जीवन में माता-पिता को खोने की एक समानता थी पर इसके अलावा सारी असमानताएँ ही थीं। वे मिलते रहते, अपनी बातें एक दूसरे को बताते रहते। कभी डीपी चौंकता नैन को सुनकर तो कभी नैन की आँखें फटी की फटी रह जातीं डीपी की आपबीती सुनकर।

कई समानताओं के साथ कई असमानताएँ मिलकर एक ऐसी जोड़ी बना रही थीं जिसे जीवन में साथ-साथ आगे बढ़ना ही था। उन सारी सहानुभूतियों और हमदर्दियों के मेल से एक रास्ता बना था जिस पर दोनों मिलकर साथ चल सकते थे, रास्ता एक, मंज़िल एक।

एक बात तो तय थी कि अब वे साथ चलेंगे मगर कैसे। डीपी का तो कोई घर नहीं था। उसका घर तो जीवन-ज्योत है। जहाँ कई और लोग हैं। तो क्या शादी के बाद भी दोनों दादा के साथ ही रहेंगे। दादा तो यही चाहते थे कि वे वहीं रहें पर दोनों की इच्छा पर छोड़ दिया था। जीवन-ज्योत में एक ही बूढ़े पति-पत्नी थे जो साथ रहते थे, बाकी सभी या तो अकेले थे या फिर शादी करके घर बसाया ही नहीं था।

समय आ गया था जब दोनों को तय करना था, अपना घर बसाने के बारे में सोचना था - “नैन हम शादी के बाद कहाँ रहेंगे, कुछ सोचा है तुमने?”

“जहाँ तुम चाहो” वह जानती थी कि जीवन-ज्योत की बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ डीपी पर हैं और वह काफी जुड़ा हुआ है उन सब लोगों से। ऐसे में अगर वह वहाँ रहना चाहे तो नैन को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसके लिए वह तैयार थी।

“जीवन-ज्योत में तो नहीं पर पास ही कहीं एक किराए का घर ले लेंगे।”

“अच्छा!” थोड़ा आश्चर्य हुआ उसे डीपी की बात सुनकर – “लेकिन डीपी तुम्हारे बिना जीवन-ज्योत में सूना हो जाएगा। साथ ही, दादा बिल्कुल नहीं मानेंगे।” दादा और डीपी का दिन के अधिकांश समय साथ रहकर जीवन-ज्योत का काम देखना नैन से छुपा नहीं था।

“दादा को तो मैं मना लूँगा क्योंकि हम रहेंगे अलग घर में पर काम तो उतना ही करेंगे जितना अभी कर रहे हैं। बस मेरी एक ही चिन्ता है वह यह कि क्या तुम्हारे चाचा-चाची मान जाएँगे।”

“जानती हूँ, नहीं मानेंगे वे, मनाना कठिन होगा पर देर सवेर उन्हें मेरी इच्छा के लिए मानना ही होगा।”

“क्या उन्हें इस बात से एतराज़ नहीं होगा कि उनकी बिटिया को किसी छोटे-से घर में रहना पड़ रहा है।”

“हाँ होगा, पर बिटिया की ख़ुशी के आगे सारी बातें छोटी पड़ेंगी।”

“हमारे नन्हें-मुन्ने आएँगे तब तक तो मैं अपना घर ले ही लूँगा।” प्यार और स्नेह की बुनियाद का घोंसला तैयारी में था, नन्हें-मुन्नों की चाह में।

शरमा गयी नैन, लाल हो गए उसके गाल। आँखें झुक गयीं, बात को घुमाना ज़रूरी था - “मैं भी काम करूँगी डीपी, हम दोनों काम करेंगे।”

“ज़रूर, हम दोनों मिलकर एक अच्छा-सा आशियाना बनाएँगे।”

और दिलों के मेल को किसी डिग्री या किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं पड़ी। नैन्सी के चाचा डॉक्टर थे पर डीपी की क़ाबिलियत जानने के लिए उन्हें किसी कागज़ को देखने की या किसी से पूछने की ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। रास्ते साफ़ होते रहे दिलों के मिलन के लिए। कोई रुकावट नहीं आयी, रिश्ता पक्का था।

मन के रिश्तों को बनने के लिए कभी किसी शब्द की ज़रूरत नहीं पड़ती, वही हुआ। सब रिश्तों में एक अहम् रिश्ता बन गया, डीपी और नैन्सी का। अधिकतर वक़्त साथ बिताने लगे वे दोनों। दादा के कामों में हाथ बँटाने के लिए दो हाथ और बढ़ गए। वे हाथ भी उतने ही समर्पित हो गए थे। मैरी को एक अच्छी दोस्त मिल गयी थी। डीपी, मैरी और नैन, तीनों के बीच एक अच्छी समझ विकसित हो रही थी। तीनों मिलकर कई रोज़मर्रा की दिक्कतों से जूझने में जीवन-ज्योत के मजबूत पिलर की तरह खड़े रहते थे। दादा ने सभी को अलग-अलग काम सौंप रखे थे। मदद के लिए बढ़ते समर्पित हाथों से उनके काम और तनाव काफी हद तक कम हुए थे। वे अपना अधिकांश समय अब उन कामों को देने लगे जो काफी समय से लंबित थे। विदेशों में उनके दौरों का यह अच्छा समय था। कई आमंत्रण आते थे मगर जीवन-ज्योत की व्यस्तताएँ और प्राथमिकताएँ इन दौरों को कभी स्वीकृत नहीं करने देती थीं।

डीपी को दादा के बाहर जाने से सिर्फ़ उनके स्वास्थ्य की चिंता होती थी वरना वह भी चाहता था कि दादा के कामों को पूरे विश्व में लोग जानें-पहचानें। इन दिनों वे स्वस्थ थे। फिर इस आश्वासन के साथ कि वे दवाई बराबर लेंगे उनके दौरों की योजनाएँ कार्यान्वित होने लगीं। डीपी के ऊपर सारा कार्यभार सौंपकर वे विदेश जाते। ये दौरे एक सप्ताह या दो सप्ताह से अधिक के नहीं होते। वापस आकर डीपी से हर दिन की जानकारी लेते। डीपी उनकी अनुपस्थिति में आयी चुनौतियों और परेशानियों का जिक्र करता। नयी भर्ती होती तो उनसे दादा को मिलवाता और ऐसे ही कई कामों की विस्तृत जानकारी उन्हें देता। दादा सब कुछ सुनते, उसके निर्णयों को सराहते और ऐसी कई समस्याएँ जो कि मात्र उनकी अनुपस्थिति से आकर खड़ी हो जातीं उनसे निपटने की तरकीब सुझाते।

*****