अस्वत्थामा ( हो सकता है ) 11 Vipul Patel द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अस्वत्थामा ( हो सकता है ) 11

“ ये पूरी कहानी की शुरुआत तब हुई जब हम अर्कियोलोजि डीपार्टमेंण्ट में लखनऊ सर्कल मे अपनी ड्यूटी कर रहे थे । उस वक्त एक दिन चावडा सर पाकिस्तान के सिंध मे पाए गए पुराने नगर मोहनजो दरो की संदर्भ बुक पढ रहे थे ।किताब पढते पढते उसकी आंखें पुस्तक मे छपी हु़ई पशुपति (भगवान शिव शंकर का एक नाम) की खंडित मुहर ( सिंध प्रदेश मे खुदाई के दौरान पाई गई पुरानी मुहरो में सें एक) के चित्र पे आके अटकी । उसने पुस्तक मे वो चित्र मुजे दिखाया । और मुजे कहेने लगे कुमार गौर से देखो ईस मुहर को ये हम सब को कुछ बताना चाहती है । फिर वो बोले कुमार , ये सब मुहरो पे जो चित्र दौरे गए है वो सब उस समय की सांकेतिक भाषा के है । भविष्य में यदि हममे से कोई ईस संकेतों के सही अर्थ खोज लेगा तो उसे पता चलेगा की ईस संकेतो मे कितनी बडी टेकनोलोजी के रहस्य छुपे पडे है । ये सुन के मैने पूछा क्या सर सच मे ऐसा हो सकता है ? मुजे अभी भी यकीन नहि होता है । तब चावडा सर बोले हा कुमार हा सच मे ऐसा ही है । मैं मेरे अब तक के अनुभवों से इतना तो अवश्य जान चुका हूँ की ईस संकेतों मे इतनी बडी टेकनोलोजि के रहस्य छुपे है । की जिसके सामने हमारी आज की टेकनोलोजि पासाणयुग के समान है । फिर उस दिन के बाद से चावडा सर दिन रात पूरानी किताबो के अध्ययन मे डूबे रहेते थे। ईस तरह लगभग पाँच महीने बीत गए । फिर एक दिन शाम को चावडा सर ने मुजसे कहा , कुमार कल सुबह हम रामनगर जाएँगे । ईस संकेतो से जुडी कुछ कडी हमे वहा से प्राप्त हो सकती है । और दूसरे दिन हम रामनगर पहोचे । और वहा जा के चावडा सर ने अपने पास रहे अती पुराने नकशे के आधार पे स्थल पसंद किया और वहा पे खुदाई का काम शुरु करवाया । चावडा सर के आदेश के अनुसार मे खुदाई काम करने वाले लोगो को सूचनाए देता था और उन लोगो के काम पे देखरेख रखता था । चावडा सर ख़ुद पूरा दिन वहा काम करते रहेते थे । और शाम ढल जाने के बाद हमारे आदमी साइट से थोडी दूर लगाए गए टेंट में जाके खाना खा के सो जाते थे । पर चावडा सर रात में भी वहा बडी बडी हेलोजन लाइट के फोक्स लगवाकर उसके प्रकाश में देर रात तक अकेले अकेले काम करते रहेते थे । उस दौरान एक दिन यू.पि. के स्टेट लेवल के कुछ पुलिस ऑफिसर और स्टेट के कुछ दूसरे ऊपरी अधिकारी एक अमेरिकन गोरे को साथ लेकर वहा चावडा सर की मुलाकात लेने आए । और वहा लगाए हुए टेंट में उन सब की चावडा सर के साथ अकेले में मीटिंग हु़ई उस वक्त मैं वहा टेंट के बाहर खडा था । और मैने जितना सुना उसके मुताबिक उस मीटिंग में उस गोरे ने चावडा सर से कहा की चावडा सर ने मोहनजो दरो के संकेतचित्रो के बारे में अब तक जितनी भी रिसर्च की है उन सारे रिसर्च पेपर्स की कोपि वो उस गोरे को बेंच दे और उसके अमेरिकी वैग्नानिको को ईस रिसर्च पेपर्स के अध्ययन में मदद करे। बदले मे वो गोरा चावडा सर को मुँह माँगी किमंत देने के लिए तैयार था ।और इसके साथ साथ चावडा सर से मुलाकात करवाने वाले वो सब अधिकारिओ को भी भारी रकम चुकाने को तैयार था । लेकिन चावडा सर ने ईस बात से मना कर दीया । और कहा की मैं अपनी पगार मैं ही खुश हूँ । तभी उस गोरे के साथ आए सभी ओफिसरो ने भी चावडा सर को गोरे की बात मानने के लिए तरह तरह से समजाया । पर चावडा सर अपनी बात पे कायम थे । आखिर में वो सभी लोग निराश होके वहा से चले गए । उसी दिन रात को चावडा सर ने अपने सारे रिसर्च पेपर्स को एकत्रित करके एक मजबूत सुटकेश मे भर दीए और उसे अपने साथ लेके कही पे जाने के लिए खडे हुए । मैने उससे उस वक्त पूछा की सर आप ये क्या कर रहे है ? तभी वो निश्वास छोडते हुए बोले, कुमार अब तक ये सारे पेपर्स यहा पे सलामत थे पर अब इसे छुपा के रखने का समय आ गया है । तू जानता है वो गोरा कौन था ? मै बोला नहि । कौन था वो ? चावडा सर बोले वो अमेरिकी जासूसी एजंसी CIA का एजंट था। और उसके साथ हमारे वो ऑफिसर थे जिसके सिर पे अपने देश की जिम्मेदारि है । पर चंद रुपयो के खातिर वो लोग ईस पेपर्स को उस गोरे को सौपने के लिए तैयार हो गए है । वास्तव में उन लोगो की भी इसमे कोई गलती नही है क्यूँकि की उन लोगो को खुद को भी नहि पता की ईस कागजों का मू्‌ल्य क्या है । और इसी वजह से उन लोगो को ये सौदा फायदे का लगता है । फिर थोडी देर चुप रहेने के बाद चावडा सर मेरी ओर देख के बोले आज मै समज गया की अमेरिका पूरी दुनिया मे सबसे आगे क्यू रहेता है । फिर वो मुजे साथ लेकर के उस सुटकेश को छिपाने ले गए । हमने वो सूटकेश हम जहा काम करते थे उसी साइट पे छुपा दी । फिर चावडा सर बोले की कुमार मैं तुजे अपना छोटा भाई मानता हूँ । यदि भविष्य मे मुजे कुछ हो जाए तो ईस पेपर्स को सही सलामत रखने की जिम्मेदारि तुम्हारी होगी। मैने कहा की मान लीजिए की सर मै कल यदी पैसो की लालच मे कही बिक गया तो ? चावडा सर ने मुस्कुराके जवाब दीया की यदी ऐसा हुआ तो वो मेरी नही बलकी हमारे पूरे देश की बदकिस्मति होगी । ईस घटना के थोडे दिन बाद एक दिन आगरा से मेरे घर से मेरी बीबी पूजा का फोन आया की मेरे पाँच साल के बेटे वेद की तबीयत अचानक से खराब हो गई है । में तुरंत चावडा सर से छुट्टी लेकर आगरा पहोचा । और मेरे बेटे वेद को बडे डॉक्टर के पास ले गया । वेद के अलग अलग टेस्ट करवाने के बाद डॉक्टर ने बताया की उसके ह्दय में छेद है । उसकी ओपन हार्ट सर्जरी करके उसका वाल्व रिप्लेस करना पडेगा तभी आपका बेटा ठीक होगा । और उसका तकरीबन चार लाख का खर्च होगा । उस वक्त चार लाख रुपये डॉक्टर को दे सकु ऐसी मेरी हैसियत नही थी। मैं रुपयो का बंधोबस्त कैसे करू उसी सोच में था तभी वो अमेरिकन गोरा की जिसका नाम रिचार्ड था मुजे मिलने मेरे घर आया । और उसने मेरी कंगालीयत का फायदा उठाके मेरे साथ एक सौदा किया । उस सौदे के मुताबिक मुजे बस इतना करना था की चावडा सर ने अब तक जो भी रिसर्च की थी उसके सारे पेपर्स और आगे वो जो भी रिसर्च करे उसके पेपर्स की फोटो मोबाईल मे लेकर उस रिचार्ड को भेजनी थी । ईस काम के लिए रिचार्ड ने मुजे एक नया और बहेतरिन मोबाईल फोन दीया और इस काम के लिए ये नए फोन का उपयोग करने के लिए कहा। ईस सौदे के बदले मे उसने मुजे वही खडे खडे तीस लाख रुपये एडवांस मे दे दिए । और आगे भी जैसे जैसे काम होता जाएगा वैसे वैसे मेरी फेमिलि को रुपये पहोचाने का वादा किया । उसने कूल मिलाके मुजे इस काम के लिए दस करोड रुपये देने का वादा किया । और मैं जानता था की दस करोड मे भी यदि मैं नहि माना होता तो ये रकम ओर कई गुना आसानी से बढ सकती थी । ईस बात से ही मुजे अंदाजा हो चुका था की चावडा सर के पास रहे वो पेपर्स कितने मूल्यवान थे । पर उस वक्त मेरे बेटे की वजह से मे मजबूर था । इसलिए मैने रिचार्ड के साथ उस वक्त सौदा तो कर लिया पर मेरे दिमाग मे कुछ और ही प्लान चल रहा था । मैने मन ही मन तै कर लिया था की मैं रिचार्ड को जो महत्व के नहि थे ऐसे रिसर्च पेपर्स की फोटो भेज दूंगा । ईस तरह चावडा सर के रिसर्च पेपर्स भी बच जाएँगे और मेरा भी काम हो जाएगा । फिर मैने अपने बेटे का इलाज करवाया । और उसकी तबीयत अच्छी तरह से ठीक हो जाने के बाद मैं वापिस रामनगर अपने काम के लिए लौटा । फिर वहा मै अपने प्लान के मुताबिक रिचार्ड को बिन उपयोगी रिसर्च पेपर्स की कोपिया भेजता रहा और उसे यू ही टालता रहा । इसी तरह दिन बीतने लगे । और चावडा सर हररोज की तरह उस दिन भी देर रात तक अकेले अकेले साइट पे काम कर रहे थे । उस वक्त मैं अपने टेंट पे सो रहा था । तभी रात को सायद दो बजे के आसपास मेरे मोबाईल की रिंगटोन बजी । मैने स्क्रीन पे देखा तो चावडा सर का फोन था । मैने तुरंत ही फोन उठाया और पूछा क्या हुआ सर ? तभी सामने से चिंता मिश्रित आवाज मे सर बोले की कुमार तू जल्दी से साइट पे आजा । मेरे हाथो बहोत ही मूल्यवान चीज लगी है । पर मेरे प्राण संकट मे है । इसलिए तू जल्दी से आजा । तभी मैं भागता हुआ साइट पे पहोचा । वहा पहोच के मैने देखा की चावडा सर एक बडे पत्थर के सहारे कमजोर और निस्तेज हो के बैठे थे । उसके पूरे बदन से अती मात्रा मे पसीना बहे रहा था । ईस वजह से उन्हे देख के ऐसा लग रहा था मानो पहेने हुए कपडो समेत स्नान करके ही अभी यहा आके बैठे हो । वो बैठे थे उसके पास ही हम दोनो ने साथ मिलकर जो सुटकेश छिपाई थी वो पडी थी । उसके अलावा जिसपे कुछ अजीब से निशान और चित्र उपसाए हुए थे ऐसे तांबे की धातु के पाँच पत्र बिखरे हुए पडे थे । और हम पानी पीने के लिए जो मटका इस्तेमाल करते थे वो पानी का मटका टूटा हुआ पडा था । और उस मटके का पानी बहने से आसपास की मिट्टी गीली हो गई थी । मैने तुरंत ही सर से पूछा क्या हुआ आपको सर ? चावडा सर नर्वस होते हुए बोले तू मेरी फिकर छोड और मे जो कहेता हूँ वो ध्यान से सुन । तू ये सूटकेश और ये पाँचों ताम्रपत्र लेके अभी यहा से निकल जा और इसे कही सलामत जगह पे छुपा दे । क्यूँकि मेरी मौत के बाद पुलिसवाले यहा छानबीन जरूर करेंगे । और मे नही चाहता की ये मूल्यवान चीजे पुलिस वालो के हाथ लग जाएँ । क्यूँकि तू तो जानता ही है की ये सारी चीजे पुलिस के पास से उस गोरे के हाथो मे आसानी पहोच जाएगी । तभी मैने चावडा सर से कहा मैं आपको ईस हालत में यहा अकेला छोड के कही नहि जाऊंगा । मैं अभी फोन करके डॉक्टर और एम्ब्युलंस को बुलाता हूँ । तभी वो बोले अरे पगले अब कुछ नहि हो सकता अभी मैं कुछ ही मिनिटो का महेमान हूँ। और उन ताम्रपत्रो की ओर इशारा करते हुए वो बोले मैने ईस ताम्रपत्रो को अभी थोडी देर पहेले ही यहा से खोज निकाला है । और अनजाने मे मैंने ईस ताम्रपत्रो को छू लिया है जिसपे सायद प्रस्वेद विष लगा हुआ था । ईस जहेर (विष) का प्राचीन काल मे गुप्त रूप से अपने दुश्मनो को मारने के लिए प्रयोग होता था । ये विष इंसानो के पसीने से बनता है इसलिए इसे प्रस्वेद विष कहा जाता है । अगर गलती से भी कोई आदमी ईस विष को या ये विष लगाई हुई कोई भी चीज को छू ले तो कुछ ही पलो मे उसकी मृत्यु हो जाती है । प्रश्वेद विष की सबसे बडी खासियत ये है की उसमे यदी पानी मिला दो तो उसकी घातक असर खत्म हो जाती है और वो पानी मे तबदील हो जाता है । इसीलिए मैने मटके के पानी से लड़खड़ाती हुई हालत मे ये सारे ताम्रपत्र धो तो दिए है पर ईस दौरान मेरे हाथो से ये मटका तूट चुका है ।फिर चावडा सर ताम्रपत्रो की ओर ईसारा करते हुए बोले अब ईस विष का असर इन ताम्रपत्रो से खत्म हो चुका है । अब दोबारा कोई इसे छू के अपने प्राण नहि गँवाएगा । पर मुजसे अनजाने मे इसे छूने की बहोत बडी गलती हो गई है । इसलिए अब मेरा बच पाना नामुमकिन है । क्यूँकि इस विष का हमारे मेडिकल सायन्स के पास कोई इलाज नहि है । इलाज तो दूर की बात है हमारा सायन्स शरीर मे इसकी हाजरि (मौजुदगी) का भी पता नही लगा सकता है । इसलिए तू मेरी फिकर छोड और में जो कहेता हूँ वैसा कर । सुन, तू ये सारी चीजे लेकर अहमदाबाद चले जाना और वहा मेरा दोस्त ईश्वर रहेता है उसके पास ये चीजे सही सलामत पहोचा देना । क्यूँकि की में जानता हूँ की वही एक ऐसा आदमी है जो ये सारी चिजो को समज सकेगा और इसका सही उपयोग करेगा । और ऐसा करने से ये मूल्यवान चीजे गलत हाथो मे जाने से भी बच जाएगी । ऐसा कहेके चावडा सर ने अपना मोबाईल फोन मुजे दीया और कहा इसमे ईश्वर के मोबाईल नंबर है । तुम इसे अपने साथ ले जाओ और ईस नंबर से तुम उसे फोन करना ताकी वो तुम्हारी बात का यकीन कर सके। चावडा सर ईस तरह अपनी बात कहे रहे थे तभी हम दोनो को सामने से दो तीन बत्तिओ की रौशनी दिखाई दी जो हमारी ओर ही नजदीक आ रही थी । वो लोग थोडे नजदीक आए की तुरंत हमने उसे पहेचान लिया । क्यूँकि वो और कोई नहि पर अमेरिकी गोरा रिचार्ड और उसके दो आदमी थे । इतनी रात को उसे यहा देख के मैं समज गया की मेरे पास उसने दीया हुआ जो मोबाईल था वो टेप हो रहा था । तभी चावडा सर ने उसके पास पडे ताम्रपत्रो को सुटकेश में रख के वो सुटकेस लेके मुजे जल्दी से वहा से भागने को कहा । मैने जल्दी से वो ताम्रपत्र सुटकेश मे रखे । और रिचार्ड और उसके आदमी मेरा लोकेशन सर्च ना कर सके इसलिए में अपना मोबाईल वहा छोड के सुटकेश लेके जल्दी से वहा से भागा । तभी वो गोरा और उसके आदमी ये देख के सीधे मेरे पीछे पडे। में अंधेरे मे उन सब को घंटों तक दौडाता रहा और अंत मे उन सब से पीछा छुडवाने में कामयाब रहा । और फिर सबसे पहेले मैने अपनी फेमिलि को आगरा से निकलवाने का काम किया क्यू की वो गोरा मेरे घर का पता जानता था । फिर मैं अपने बीबी और बच्चे को लेके थोडे दिन मुंबई में छुपा रहा क्यू की अब उस गोरे के साथ साथ पुलिस भी मेरी तलास मे लग गई थी । फिर मे मौका मिलते ही अपनी फेमिलि के साथ यहा अहमदाबाद आया । और ईश्वरभाई का कॉन्टेक्ट कर के हमारे साथ अब तक जो भी घटनाए घटी थी वो सारी बाते उसे बताके वो सूटकेस उसको सौप दीया । फिर यहा से श्रीलंका चले जाकर वही बस जाने का फैसला किया । क्यूँकि यहा यदी में पुलिस के हवाले हो भी जाता तो भी पुलिस मेरा यकीन नहि करने वाली थी । और वो गोरा अपने कॉन्टेक्ट का इस्तेमाल कर के मुज तक पहोच जाता और मुजसे उस सूटकेश के बारे में सब उगलवा के वहा ईश्वरभाई के पास सुटकेश तक पहोच जाता । “