Ashwtthama ho sakta hai - 8 books and stories free download online pdf in Hindi

अस्वत्थामा (हो सकता है) - 8

जिग्नेश अपने घर से यूनिवर्सिटी जाने के लिए अपनी बाइक लेके निकला । रास्ते में चाय के स्टोल पे चाय पीने खडा रहा । चाय पीते पीते उसका ध्यान सामने दीवाल पे चिपकाए हुए कागज के पोस्टर पे गया । जिस पे किशनसिंहजी के आसिस्टंट कुमार कि तसवीर छपी हुई थी और नीचे लिखा था कि इस आदमी का पता बताने वाले को इनाम मिलेगा । ये तसवीर देख के जिग्नेश के दिमाग की ट्यूबलाइट जली क्यूँकि इसी तसवीर को उसने किशनसिंहजी की मृत्यु के समाचार वाले न्यूज पेपर में देखा था । उसने अपना मोबाईल निकाला और उसमे उसने ईश्वर सर से मिलने आए हुए उस दाढी मूँछों वाले अजनबी आदमी की फोटॉ खींची थी ऊसे देखा । और अपनी जेब से पेन निकाल के पोस्टर पे लगी कुमार की तसवीर पे दाढी मूँछ दौरे । अब मोबाईल वाली और पोस्टर वाली तसवीर एक जैसी लगने लगी । फिर जिग्नेश मन ही मन सोचने लगा ईशु सर और कुमार का क्या कनेक्शन हो सकता है ? और ईशु सर तो चावडा सर के दोस्त है फिर भी उन्हो ने कुमार को पुलिस के हवाले क्यू नहीं करवाया ? मुजे इसका पता लगाना पड़ेगा । और फिर वो बाइक लेके यूनिवर्सिटी की ओर चल दीया।

यूनिवर्सिटी मे अब जिग्नेश की नजरे प्रो. ईश्वर पटेल पे ही रहेने लगी । वो बिना किसी को बताए ईश्वर सर की जासूसी करने लगा । और ईश्वर सर की ओफिस के आसपास ही चक्कर काटने लगा । उसे ऐसे ऑफिस के आसपास घूमते देख एक बार प्युन लालजी ने तो उसे कहा भी की पूरा दिन बाज पक्षी की तरह इधर हि क्यू मंडराते रहेते हो ? तुम्हारा यहा पे कुछ खो गया है क्या ? ये सुनके उस वक्त तो जिग्नेश ने कहे दीया की नहीं नहीं में तो यूँ ही घूम रहा हूँ । और वो वहा से चला गया । लेकिन अब वो पूरी तरह सावधान होकर ईश्वर सर की जासूसी करने लगा था ताकी किसीको पता ना चले की वो ईश्वर सर की जासूसी कर रहा है । एक दिन ईश्वर सर अपनी ऑफिस से निकल के कही पे जा रहे थे । तभी जिग्नेश ने उसे देखा और वो भी चुपचाप उसके पीछे जाने लगा । चलते चलते ईश्वर सर मनोविग्नान की क्लास रूम के पास से निकले जहा पे प्रो. जगदिशभाई अपनी मनोविग्नान की क्लास ले रहे थे । ईश्वर सर चलते चलते आगे बढ़े । जिग्नेश उससे थोड़ी दूरी बनाए हुए उसके पीछे पीछे चल रहा था । ऐसे चलते चलते जिग्नेश जब मनोविग्नान की क्लासरूम के पास पहोचा तभी ईश्वर सर ने पलट के पीछे देखा । उसके पीछे देखने कि वजह से जासूसी करते हुए पकड़ा ना जाना पडे इसलिए जिग्नेश तुरंत मनोविग्नान की क्लास में चला गया । और अंदर आके सर से पूछा में आई कम इन सर ? उसे यू अचानक अंदर आया हुआ देख के जगदीश सर बोले आइये आइये जिग्नेश महोदय तो अब आप बायोलॉजी और हिस्ट्री के साथ साथ मनोविग्नान का ग्नान भी ग्रहण करना चाहेगे ? जिग्नेश बोला मैंने सोचा की यूँ ही फोकट में कैम्पस में घूमने की बजाए यहा आके बैठूगा तो थोड़ा बहोत कुछ नया जानने को मिलेगा । सर ने कहा हा ठीक है ठीक है । बैठो । तभी वहा बैठी नताशा बोली इसे मत बैठने दीजिए सर ये पाखंडी आपको अटपटे सवाल पूछ के विषय से भटका देंगा । जगदीशसर ने कहा तुम फिकर मत करो ऐसा कुछ नहीं होगा । जिग्नेश ने बेंच पे बैठ के देखा की ब्लेक बोर्ड पे सबकोंसियस माइन्ड (अवचेतन मन) के बारे मे लिखा हुआ था इससे उसे मालूम हो गया की सर सबकोंसियस माइन्ड के बारे में ही कुछ पढ़ा रहे है । जगदीश सर ने बताया की ये मन हमारे शरिर का बहोत ही पावरफुल और हमारी आँखों से ना दिखाई देने वाला अती सुक्सम अदृश्य हिस्सा है । ये अल्लादिन के जादुई जिन के जैसा है । ये हमारे सारे विचारों को हकीकत में परिवर्तित कर देने की क्षमता रखता है । पर अभी तक हम ये नही जान पाए की हम हमारे ईस मन का सही तरीके से इस्तेमाल कैसे करे । क्यू की ये एक मूक सेवक की तरह है । हमारा चेतन मन (कोंसियस माईण्ड) इसे जितना कहेता है उतना ही ये करता है । और इससे काम करवाने की सही फोरम्युला हमे अभी तक मालूम नहीं पड़ी है । हमारे पास अब तक जो थोड़ी बहोत जानकारी है उसके मुताबिक हम बार बार जैसा सोचते है या दोहराते है उसे ही हमारा अवचेतन मन हमारा आदेश मान लेता है और उसके मुताबिक माहोल बनाने मे लग जाता है । इसी वजह से ही पॉजिटिव थिंकिंग का महिमा गान हमें चारों ओर सुनाई देता है | लेकिन मैं फिर से एक बार कहेता हूँ की अवचेतन मन की कार्य प्रणाली के बारे में हमारे पास जो जानकारी है वो एक परसेंट सें भी कम है । तभी जिग्नेश बोला तो इसका मतलब ये है की अब तक पूरी मनुष्य जाती अपने आप को पूरी तरह पहेचान ही नहीं पाइ है ? जगदीश सर बोले हा इस वक्त तो ये बिलकुल सही है । पर हमारे कुछ पौराणिक ग्रंथो का समज पूर्वक अध्ययन किया जाए तो उसमे हमे कुछ ऐसी महान विभूतिया मिलेगी जो अपने आप से पूरी तरह से वाकेफ थी । तुरंत जिग्नेश बोला जैसे हमारे पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान श्री कॄष्ण । ये सुन के सारा क्लास जिग्नेश की ओर देखने लगा । जगदीश सर ने कहा हा ये सही है । पुराणो मे मिलते इनके वर्णन से तो यही साबित होता है कि वो सच मैं ही पूर्ण पुरुष थे । जिग्नेश बोला पर सर यदी ये बात सही है तो मुजे ये समज मे नहि आता की वासुदेव कॄष्ण ने ये सारा नोलेज अपने आप तक ही क्यू सीमित रखा ? मानव जाती के कल्याण के लिए उसका फैलावा क्यू नही किया ? कही ऐसा तो नहि है की उन्होंने ने जान बुजकर ये सब किसी को भी ना बताया हो। ताकी हम सदिओ तक उनके बारे मे यूँ ही आस्चर्य से पढते रहे और उन्हें भगवान समज के पूजते रहे ? जगदिश सर ने कहा तुम्हारा तर्क भी गौर करने योग्य है । हम तुम्हारे तर्क पे अवस्य चर्चा करेंगे । पर उससे पहेले तुम खडे हो जाओ और मेरे कुछ आसान सवालों के जवाब दो । जिग्नेश ने खडे होके कहा हा पूछिए सर । जगदीश सर ने पूछा तुम्हारे दादाजी का नाम क्या है ? जिग्नेश सवाल सुन के हँसने लगा और बोला जी मेघजीभाई । जगदीश सर ने पूछा वो ज़िंदा है या उनका देहांत हो गया है ? जिग्नेस ने बताया जी ज़िंदा है । जगदीश सर ने फिर पूछा उसके पिताजी का नाम क्या है ? जिग्नेश बोला जी सुंदरजीभाई । जगदीश सर ने कहा अच्छा तो अब ये बताओ की सुंदरजीभाई कौन सा व्यवसाय करते थे ? जिग्नेश बोला वो क्या काम करते थे वो मुजे नहि मालूम सर । जगदीश सर बोले ठीक है कोई बात नहीं । अब मुजे बताओ की सुंदरजीभाई के पिताजी का नाम क्या था ? जिग्नेश बोला सायद कानजीभाई था सर । में स्योर नहीं हूँ । फिर जगदीश सर बोले ठीक है जिग्नेश अब तुम बैठ जाओ । फिर सब की ओर देख के वो बोले अब मेरी बात सब ध्यान से सुनो, जिग्नेश की लाइफ में उसके पापा और उनके दादा और परदादाओ का बहोत बडा योगदान है । उन्ही लोगो के कारण जिग्नेश आज यहा बेफिकर होके पढाई कर रहा है । फिर भी जिग्नेश और उसकी भविष्य में होने वाली पेढ़ीआ उन्हें भूल जाएगी । जिग्नेश तो सिर्फ एक उदाहरण है ये बात हम सब पे लागू होती है । हम अपने नजदीकी पूर्वजो को जल्दी भूल जाते है क्यूंकी उनका योगदान सिर्फ अपनो तक सीमित होता है। और समाज में उसका कोई खास योगदान नहीं होता । और उससे उलटा हम पाँच हजार साल पुराने व्यक्ति के बारे मे कितना कुछ जानते है । क्यू ? क्यूकी उन्होंने उस वक्त अपने कार्यों से मानव जाती पे बहोत बड़ा उपकार किया होगा । इसलिए हम उन्हे आज भी आदर के साथ याद करते है । फिर जगदीश सर जिग्नेश की ओर देख के बोले , इसीलिए जिग्नेश तुम्हारा तर्क मेरे गले नहीं उतरता और मुजे लगता है की श्री कृष्ण ने उस वक्त जो भी किया होगा मानवजाती के कल्याण के लिए किया होगा । जो सायद हमारी समज से परे हो सकता है । तभी वहा बैठी नताशा बोली मैं कहेति थी ना सर इसे यहा मत बैठने दीजिए । देखा ना ये आदमी ने कैसे आपको सायकोलोजी की बजाय हिस्ट्री का टीचर बना दीया । ये सुनके जगदीश सर हँसने लगे और तभी प्रियड पूरा होने की बैल बजी ।

पोलिस स्टेशन मे इन्सपेक्टर वसीम खान ने उसकी ऑफिस की दीवाल पे लटकाए हुए व्हाईट बोर्ड पे किशनसिंहजी के नाम के इर्दगिर्द बहोत सारे नाम लिखे थे । जिसमे किशनसिंह जी की बीबी चारुलता , डी.सि.पि. प्रताप चौहाण , किशनसिंहजी के दोनो भाई वीरेन्द्रसिंह और रामदेवसिंह चावडा और उनकी बहेन अर्चना का नाम था । इसके अलावा किशनसिंहजी के आसीसटण्ट कुमार , उनके दोस्त ईश्वर पटेल , CIA का एजंट रिचार्ड , और जिग्नेश रावल का नाम भी सामिल था । वसीम खान व्हाइट बोर्ड के पास खडे होके सब नामो को देख रहे थे तभी वहा उसके ऑफिसर सावंत और जाडेजा आए । जाडेजा ने अपने साहब को गहेरि सोच मैं डूबे हुए देख के पूछा क्या सोच रहे है सर ? तभी वसीम खान अपने सिर के बाल खुजाते हुए बोले जाडेजा कुछ समज मे नही आ रहा है यार । अब तक कोई क्लु नही मिला जिससे सही दिशा मे इंकवायरी हो सके । तभी बोर्ड पे जिग्नेश का नाम देख के सावंत बोला सर आपने ईस जिग्नेश का नाम क्यू सामिल किया है ? इसे तो ये भी पता नहीं है की किशनसिंहजी की छोटी बहेन अर्चना उसे एक तरफा प्यार करती है । वसीम खान बोले हा ये सही है लेकिन अर्चना ने ये बात अपने भाई किशन को बताई थी । और इस वजह से सायद किशनसिंह और जिग्नेश की मुलाकात हुई हो ऐसा भी हो सकता है । और जिग्नेश हमे कुछ ज्यादा ही स्मार्ट दिखता है इसलिए हमने उसका भी नाम लिख दीया है । तभी जाडेजा बोला सर आपने किशनसिंहजी के दोनो भाईओ को भी इसमे सामिल कर दीया ? माना की प्रॉपर्टी के बँटवारे के दौरान इन लोगो के बिच छोटी सी रकजक हुई थी । पर बाद में आपस में ही बात सुलज गई थी । वसीम खान बोले इसके बावजूद भी ईस केस की जड़ तक पहोचने के लिए हम छोटी से छोटी बात को भी नजर अंदाज नहि कर सकते । फिर सावंत बोला और ये प्रो. ईश्वर पटेल का क्या माजरा है सर ? तभी वसीम खान ने कहा तुम तो जानते हो की ये किशनसिंहजी के जिगरि दोस्त है । और इनके मोबाईल की कौल डिटेल्स से मालूम पडता है की इनके और किशनसिंहजी के बिच अक्सर घंटों बातें हुआ करती थी । और मेरे मानने के मुताबिक गैरो से ज्यादा हमे अपनो से खतरा होता है । समजे सावंत । फिर सावंत की ओर देख के वसीम खान ने पूछा तुम्हे क्या लगता है पी.एस.आइ. सावंत ? इन मे से कौन हो सकता है ? सावंत ने धीरे से कहा डी.सि.पि. चौहाण हो सकते है सर । तभी वसीम खान हँसकर बोले तेरी बीबी और उसके यार की जासूसी थोडी कम करवाया कर , सावंत । ये सुन के सावंत चौंक गया और बोला आपको कैसे पता चला सर ? की मेरी बीबी का कोई फ्रेन्ड भी है और में उसकी जासूसी करवा रहा हूँ । तभी वसीम खान बोले तुमने ही तो अभी बताया सावंत। ये सून के सावंत की समज मे कुछ नही आया और वो वसीम खान की ओर देखता हुआ चुपचाप खडा रहा। ये देख के वसीम खान सावंत को समजाते हुए बोले , देख सावंत , मैंने सब इन्सपेक्टर सावंत को पूछा था की उसे किस पे संदेह है । और एक सब इन्सपेक्टर बिना इंकवायरी किए इतनी जल्दी कोई निर्णय पे नही आ सकता है । लेकिन हा एक पुर्वग्रह पीडित पति ये निर्णय आसानी से कर सकता है । अब समजा सावंत । ये सुन के सावंत हँसने लगा । और बोला सर मेरी बिबि तो बार बार कहेति है की वो दोनो सिर्फ अच्छे दोस्त है । पर मेरा मन नहीं मानता है । क्यूँकि मेरा मानना है की बिबि का यार और एक तरफा प्यार इन दोनों को कभी भि अंडरएस्टीमेट नहीं करना चाहिए । वरना ये घातक और जानलेवा साबित हो सकते है । ये सून के वसीम खान मुस्कुराने लगे । फिर थोड़ी देर बाद दोनों ऑफिसर वहा से निकल के पैट्रोलिंग करने चले गए ।

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