अस्वत्थामा (हो सकता है) - 5 Vipul Patel द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अस्वत्थामा (हो सकता है) - 5

किशनसिंहजी के परम मित्र प्रो. ईश्वरभाई पटेल अपने विध्यार्थिओ को बायोलॉजी की लेब मैं ह्युमन बॉडी सेल्स स्ट्रक्चर (मानव शरिर कोष सरंचना ) के बारे में प्रैक्टिकल के साथ पढ़ा रहे थे । जहा वो हरेक स्टूडण्ट को बारी बारी से वहा रखे माइक्रोस्कोप में अति सुक्सम कोष दिखाके कोष सरंचना का विश्लेशण कर रहे थे और कहे रहे थे की माइक्रोस्कोप मैं आपको जो कोष दिखाई दे रहे है एसे हर एक कोष मैं गुणसुत्रो (क्रोमोजोम) की २३ जोड़े होकर कूल ४६ गुणसूत्र होते है । और पुरुषो और स्त्रीओ में गुणसूत्रों कि २२ जोड समान होती है । २३ वी जोड पुरुसो और महिलाओं के बिच मे भिन्न होती है जिसे जातीय गुणसूत्र कहा जाता है। इन ४६ गुणसूत्रों में से प्रत्येक गुणसूत्र दो DNA मोलेक्युल्स ( डी.एन.ए. के धागे जैसे गुंचले)से बना होता है। और एसे DNA मोलेक्युल्स जेनेटिक मेमरी के पेकेट जैसे होते है। इन DNA में ढेर सारी माहिति कोडेड रूप से जमा हुई होती है । और आप अभी माइक्रोस्कोप में देख रहे है एसे अबजो कोषो से हमारा मानव शरिर बना है । इससे में ये कहूं की हमारा चलता फिरता शरीर बहोत बड़ा डेटा सेन्टर है तो इसमे कोई आस्चर्य की बात नहि है। क्यू की मुजे तो हमारा पूरा शरीर ही एक आस्चर्य लगता है । मैं कई बार मनुष्य शरीर को सुक्स्म रूप से समजने की कोशिश करता हूँ । और जैसे जैसे मैं गहेराइ मैं चला जाता हूँ तो मुजे प्रत्येक मनुष्य का शरीर विशाल ब्रह्मांड की छोटी सी प्रतिकृति मालूम पडता है । कभी कभी मै इस पूरे ब्रह्मांड की एक विराट मानव आकृति के रूप मे कल्पना करता हूँ तब मुजे ये अहेसास होता है की हमारी पृथ्वी ईस पूरे ब्रह्मांड मे एक छोटे से कोष जैसी दिखती होगी । या सायद उससे भी कई गुना छोटी । तब मुजे मन ही मन सवाल होता है की क्या हमारे ब्रह्मा या हमारी पृथ्वी जिसके शरीर मे एक कोष के माफक बसी है उसे हमारे बारे मे पता भी होगा या नही ? क्यूकी हम हमारी यानि की मनुष्यो की ही बात करे तो हरेक मनुष्य के अपने पूरे जीवनकाल के दौरान उसके शरीर मे अबजो कोष सैंकडों बार अपना जीवन चक्र पूरा कर देते है और ज्यादातर मनुष्य उससे अनजान होते है । इसलिए मै सोच मे पड जाता हू की सायद हमारे ब्रह्मा भी हमारे अस्तित्व से बेखबर हो सकते है । क्युकि मुजे लगता है की हमारे शरीर के कोषो मे बसे हुए अती सुक्स्म जीवो के लिए हमारा शरीर ही एक ब्रह्मांड है । फिर भी हम आज तक उसे देखने की बात तो दूर रही उसके बारे मे कुछ जान भी नहि पाए है । मै उस सुक्स्म जीवो की बात कर रहा हूँ जिसे दिखाने में हमारे माइक्रोस्कोप असमर्थ है । मुजे लगता है हम यदि कुछ ऐसी टेकनोलोजि की खोज करले जिसके जरिए हम हमारे शरीर के एक एक कोष को पृथ्वी के आकार के साइज जितना जूम करके देख सके तो सायद हमे उसपे बसे हुए जीवन का पता चल पाए । पर ईस वक्त ऐसी टेकनोलोजी खोजना हमारे लिए सायद असंभव है । ईसलिए मुजे लगता है की जिस दिन हम हमारी उत्पति के बारे में पूरी तरह से पता लगा लेंगे उस दिन हमें ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति का पता अपने आप लग जाएगा। ईश्वरभाई जब ईस तरह पढ़ा रहे थे तब सारे विद्यार्थी आस्चर्यचकित हो के ये सब सून रहे थे । तभी वहा प्युन ने आके ईश्वर सर को बताया की कोई अजनबी आदमी आपसे मिलने आया है और कहेता है की इसी वक्त आपसे मिलना है । और बता रहा है की आपके साथ उसकी फोन पे बात हो चुकी है । ईश्वरभाई ने घड़ी में देखकर कहा मित्रों आज हम यहा रुकते है । आगे की पढ़ाई अब कल करेंगे ठीक है । और वो प्युन के साथ अपनी ऑफिस की ऒर जाने लगे । उसके पीछे पीछे सारे स्टुडन्ट भी लेबोरेटरी रूम से बाहर निकले । बाहर जाते जाते जिग्नेश ने ईश्वर सर की ऑफिस के पास खड़े दाढ़ी मूँछ वाले आदमी को देखा । और उसे ऐसा लगा की ईस आदमी को कई देखा है । उसने अपने साथ चल रहे अपने दोस्त अभी (अभिमन्यु) को भी कहा की सामने ईसू (इश्वर) सर की ऑफिस के पास खड़े उस आदमी को मैंने कही देखा है । पर कहा देखा है वो याद नहीं आ रहा । उसके दोस्त अभी ने कहा वो जो भी हो छोड़ ना यार , हमें क्या लेना देना है उससे । तभी वो आदमी ईश्वरसर के साथ कुछ बात करके उनके साथ उनकी ऑफिस में चला गया और इश्वर सर ने प्युन को कुछ काम करने का आदेश देके उसे वहा से कई भेज दीया और अपनी ऑफिस के दरवाजे बंध कर दिए । आम तौर पे ईश्वर सर की ऑफिस के दरवाजे खुले ही रहेते है , और आज एक अजनबी के साथ बात करने के लिए सर ने दरवाजे बंध कर दिए ये देख के जिग्नेश की जिग्नाशा वृति जाग्रुत हो उठी । उसे लगा की इसमे जरूर कोई राज की बात है इसीलिए सर को दरवाजे बंध करने की जरूरत पड गई । उसने अपने दोस्त अभी से कहा तू आगे चल मैं आता हूँ थोड़ी देर मै । और वो ईश्वर सर की ऑफिस की बंध खिड़की के छिद्र मैं से अंदर जाकने लगा। उसे अंदर चलती हुई बातचित तो सुनाई नहीं दे रही थी पर उसने देखा की आने वाला आदमी बहोत डरा हुआ दिखाई देता था। थोडी देर बात करके उस आदमी ने ईश्वर सर के सामने टॉवेल से लपेटा हुवा एक सूटकेश रखा। ईश्वर सर ने वो खोल के देखा तो उसमें तांबे की धातु के पाँच पत्र थे और कुछ फाइले थी । ईश्वर सर ने वो पत्र अपने हाथो मे लेके देखे । पाँचों एक समान साइज के और चौरस दिखते थे । जो लगभग आधे स्क्वेरफिट साईंज के होगे । जिसमे हर एक पत्र पे कुछ चित्र और अक्षरो जैसे कुछ संकेत उपसाए हुए थे। ऑफिस के बाहर खड़े जिग्नेश ने भी वो चमकते हुए ताम्रपत्र देखें । उसे देख के अंदर क्या बातचित हो रही है ये जान ने की उसकी उत्कंठा और भी बढ़ गई। पर तभी उसने देखा की प्युन चाय लेकर वापस इधर ही आ रहा है । इसलिए वो चुपचाप वहा से चला गया । और ईशु सर की ऑफिस का दरवाजा दिखाई दे वैसे दूर कैम्पस में जाके बैठ गया । और उस आदमी क़े बाहर निकलने का इंतजार करने लगा । आखिर पूरे दो घंटे के बाद वो आदमी बाहर निकला। तभी जिग्नेश ने ते़जी से चुपचाप अपने मोबाईल के केमेरा को जूम करके उसकी तसवीर खींच ली । और बाहर निकलते ही उस आदमी ने इधर उधर चारो ऒर देख लिया और ते़जी से वहा से युनिवर्सिटी के मॆइन गेट की ओर जाने लगा। और जिग्नेश के देखते ही देखते वो वहा से चला गया ।

सुबह मालती अपने घर से तैयार होके यूनिवर्सिटी जाने के लिए बाहर निकली । तभी उसका पडॊशि रमण अपनी बिबि कोमल और दस साल की बेटी नंदीनी के साथ अपने घर से निकला । कोमल ने अपने दोनो हाथो में बड़े बड़े ट्रॉली बैग पकड़े हुए थे। तभी मालती को देखते हि रमण ने उससे बात करने की शुरुआत करते हुए पूछा कैसी है मालती जी ? मालती हँस के बोली बहोत बढिया । आप बताइये आप कैसे है रमणजी । तभी रमण कोमल की ओर इसारा करके बोला इसकी महेरबानी से मैं एकदम मजे में हूँ । ये सुनके मालती मुस्कुराने लगी । और कोमल मालती से कहेने लगी ये भी ना कई भी कुछ भी बोलते रहेते है । फिर कोमल के हाथो मैं बैग देख के मालती बोली आप सब कही घूमने जा रहे है कोमल भाभी ? कोमल बोली नहीं नहीं , घूमने नहि जा रहे है , मैं मैरी बेटी को लेकर अपने माइके राजकोट जा रही हू । वो क्या है की मेरी मां की तबीयत खराब है तो मुजे बुलाया है । हम दोनो एकाद हफ्ता वहा रुक के वापस आ जाएँगे । रमण तो हमे बस स्टैण्ड छोड़ के वहा से अपनी ऑ़फिस चले जाएँगे । मालती बोली तो फिर पूरे हफ्ते तक रमणजी खाना कहा खाएँगे ? कोमल ने बताया दोपहर को तो ऑफिस में ही खा क़े आएँगे । और साम के लिए संध्या भाभी को कहे दीया है । मालती बोली संध्याभाभी को कष्ट ना देना हो तो साम को मैं अपने साथ साथ रमणजी के लिए भी खाना पका दूंगी। कोमल बोली शुक्रिया, पर इसकी जरूरत नहीं है । संध्या भाभी ने मुजे पहेले से ही कहा है की जब तक मैं वापस नहीं आ जाती तब तक जगदीशभाई और रमण दोनो साथ में ही उसके घर पे ही शाम का भोजन करेंगे । ईस तरह बाते चल रही थी उस दौरान रमण घूर घूर के मालती को ही देख रहा था । ईस बात का पता मालती को था पर कोमल ईससे अनजान थी । फिर रमण और मालती अपनी अपनी गाडीया लेकर अपने अपने रास्ते चल दिए ।

उसी दिन युनिवर्सिटी मैं रिसेस टाइम में जगदीशभाई की ऑफिस में बैठ कें मालती और जगदिशभाई बातें कर रहे थे । तभी मालती बोली आपके दोस्त रमणजी को खुबशुरत औरतो मैं कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लगती है, नहीं ? ये सुनके जगदीशभाई ने मालती से पूछा आपको ऐसा क्यू लगा ? मालती ने जवाब दीया की हर औरत के पास सिक्स सेन्स होती है जो उसे अहेसास दिलाती है की कौन सा आदमी उसे किस नजर से देखता है । जगदीशभाई बोले ये तो बहोत अच्छी बात है। फिर मालती बोली मैं जब से यहा आई हूँ तब से रमणजी को जब भी मौका मिलता है तब वो मैरी ओर घूर घूर के देखते रहेते है । जगदीशभाई बोले जब तुम्हें पता है की वो तुम्हें बुरी नजरों से देखता है फिर भी तुम उससे हँस हँस के बातें क्यू करती हो ? मुस्कुराते हुए मालती बोली मुजे मजा आता है इसलिए । जब भी कोई हैंडसम आदमी कामुक होकर मेरी ओर देखता है तो मुजे अच्छा लगता है । और मुजे उसके साथ सेक्स करने की इच्छा हो जाती है । अचानक से मालती की ऐसी बात सुनके जगदीशभाई थोडे से शरमा गए और बोले सच बात बताऊ मालती, मैंने आज तक एक भी औरत ऐसी नहीं देखी जो आपकी तरह अपनी सेक्स करने की इच्छा यू सहजता से बता दे। तभी हँसते हुए मालती बोली लेकिन सेक्स की बात सुनकर लडकीओ की तरह आप क्यू शरमा रहे है ? तभी बैल बजा और जगदीशभाई का प्रियड लेने का समय हो गया। और वो मालती से हँसकर बोले चलो अभी प्रियड का टाइम हो चुका इसलिए चलता हूँ । और वो उठकर क्लासरूम की ओर चल दिए ।

उसी दिन रात को नौ बजे के आसपास रमण जगदीशभाई के वहा से भोजन कर के वापिस आकर के अपने घर पे अकेला ही टीवी पे क्रिकेट मैच देख रहा था। तभी डोर बेल बजा। उसने दरवाजा खोल के देखा तो सामने नाइटड्रेस मैं मालती खड़ी थी । उसके हाथ मे छोटी सि कटोरी थी । कटोरी रमण को दिखाते हुए मालती बोली, ईस वक्त चाय पीने का मेरा बड़ा हि मन हुआ है । पर घऱ पे चीनी खत्म हो गई है । तो मैंने सोचा आपसे अभी एक कटोरी उधार ले लेती हूँ। कल आपको वापिस लौटा दूँगी । रमण स्त्रीदाक्षीण्य दिखाते हूए बोला वापस लौटाने का बोल के, कर दी ना आपने परायो वाली बात । अरे इसे आपका ही घर समजिए । और जब भी जी चाहे आप यहा से कुछ भी बेजिजक होके ले जा सकती है । मालती बोली फिलहाल तो ये एक कटोरी चीनी दे दो । रमण बोला एक काम कीजिए आप अंदर आके खुद ही किचन से ले लीजिए । क्या है ना की कोमल कौन सी चीज कहा पे रखती है वो मुजे नहीं पता । और एक औरत होने के नाते आपको मुजसे पहेले पता लग जाएगा की कोमल ने चीनी कहा पे रखी है। और फिर मालती अंदर किचन में जाके चीनी ढूँढने लगी । उसे किचन की ऊँची अलमारी मैं कतार में रखें छे सात डब्बों में सबसे आखीर मैं रहा चीनी का काँच का डिब्बा दिखाई दीया। और जैसे ही उसने अपने दोनो हाथों को लंबा के चीनी के डिब्बे को उठाया तुरंत उस डिब्बे के आधार पे रखी बेसन की थैली गिर गई । और सारा आटा मालती के सिर पे गिरा । और वो पूरी बेसन बेसन हो गई । ये देख़ के सामने सोफे पे बैठा और मालती को ही देख रहा रमण दौड़ के मालती के पास आया । और बोला सोरी मालती जी ये सारी गलती मेरी है । मालती बोली ओके , इट्स ओल राइट रमणजी इसमे आपकी कोई गलती नहीं है । जरासर मैने ही डिब्बे के पीछे रखी ईस बैग को नहीं देखा था । और जैसे ही मैंने चीनी का डब्बा उठाया वो मुजपे गिरि और मैंने आपका पूरा किचन गंदा कर दीया इसके लिए आइ एम एक्सट्रीमली सोरी । रमण बोला अरे नहीं नहीं आप सोरी मत बोलिए । इसमें आपकी कोई गलती नहीं है । जरासर सारी गलती मैरी है । वो क्या है ना की मुजे आज भजिये (पकोडे) खाने का मन हुवा और में आज ऑफिस से आते वक्त ये बेसन की थैली लेकर आया । और इसमें से जरूर पुरता बेसन निकाल के संध्याभाभी के वहा ले गया और बाकी की ये थैली ऐसे ही यहा अलमारी मे खुली छोड़ दि । और ईस वक्त गलती से ये आप पे गिरी । इसलिए बिना होली के आपको यू आटे से नहेलाने के लिए वन्स अगेन सोरी । मालती बोली कोई बात नहीं मैं घर जाकर साँवर लेकर चेंज कर लूँगी । रमण बोला नहीं नहीं नहीं ,में आपको ईस हालत मैं नहीं जाने दे सकता । यदी बाहर ईस हालत में आपको किसी ने देख लिया तो मैरी इज्जत क्या रहे जाएँगी ? आप एक काम कीजिए यहा ही बाथरूम मैं साँवर लेके कोमल के कपडे पहेन लीजिए । फिर आराम से घर जाइये । मालती बोली इन सबकी कोई जरूरत नहीं है । मैं चली जाऊँगी रमणजी । रमण बोला प्लीज मालतीजी मान जाईये ना । आपको ईस तरह जाने देना मुजे अच्छा नहीं लगता है । रमणका आग्रह देख के मालती बोली चलो ठीक है । मुजे बताइए की कोमल भाभी के कपडे कहा रखे है ? फिर रमण ने उसे अपने बेडरूम में ले जाकर कोमल का कप बोर्ड खोल के उसमे रखे हुए कपड़े दिखाए । और उसे टोवेल देते हुए बोला आपको जो भी अच्छे लगे वो निकाल लीजिए । मालती ने हेंगर पे लटके हुए कपड़ों मैं से रेड टीशर्ट और ब्लू कलर के जीन्स के पेंट की एक जोड़ निकाली । फिर उसने कप बोर्ड का ड्रॉअर खोल के उसमे रखी ब्रा और पैंटी मैं से रेड कलर की ब्रा और ब्लेक कलर की पैंटी निकाली । और वहा बेडरूम में ही कोने में जो बाथरूम था उसमे ही स्नान करने के लिए चली गई ।बाथरूम मे स्नान करने के बाद टॉवेल से वो अपना भीगा बदन पोछ रही थी तभी उसकी नजर वहा निकले हुए कोंक्रोच पे पडी । और वो चिल्लाते हुए टोवेल लपेटी हुई हालत मैं ही बाहर दौडी आई । दौड़कर वहा बेड पे बैठे रमण से लिपट गई । और अचानक से यू रमण के साथ लिपटने से रमण बेड पे पीठ के बल गिर पडा । ईस वजह से मालती का पूरा बदन रमण के उपर गिरा । और इसी जल्दबाजी मैं मालती ने लपेटा हुवा टॉवेल सिर्फ उसकी पीठ ढंककर रहे गया । उसका अगला हिस्सा अब सिर्फ रमण की छाती से ढंका हुआ था । थोडी देर ऐसे ही लेटे रहेने के बाद दोनो को ईस स्थिति का अंदाजा आया । फिर मालती ने अपने जिस्म को रमण की छाती से अलग किया और रमण के पेट पर ही नितंब के बल बैठ खडी हुई । उसी वक्त रमण की नजर मालती की छाती पे पडी और वो देखता ही रहे गया । उसने आज तक कभी ऐसा संगेमरमर सा बदन ऐसे पूरी तरह अनावृत्त नहीं देखा था । वो बिना पलक जबकाए मालती के वक्षस्थलो की अंगभंगीमां देखता रहा । मालती के वक्षस्थल भरावदार होने के बावजूद लचक नही जाते थे ।मालती की अपने शरीर की संपूर्ण देखभाल के कारण उसके वक्षस्थल एकदम फिट थे और उसकी छाती पे पूर्णता दो गोलाकार रचते थे । मालती ने भी अपने वक्षस्थल ढंकने की कोई जल्दी नहीं दिखाई उलटा वो उसी स्थिति में रमण की ओर देखती बैठी रही । तभी रमण की और उसकी आंखें एक दूसरे की आँखों से मिलि । और दोनों को एक दूसरे की आँखों में इससे आगे बढ़ने की तडप साफ साफ दिखाई दे रही थी । तभी मालती ने अपनी पलके जुका दी। अब रमण अपने ऊपर बैठी मालती के पेट और नाभि को छूकर उसे सहेलाने लगा। मालती भी अपनी नजरे जुकाए धीरे धीरे रमण के शर्ट के बटन खोलने लगी । मालती ने जैसे ही रमण के शर्ट के सारे बटन खोल के उसकी छाती खुली करदी उसी वक्त रमण ने मालती को उसके दोनों कंधो से पकड़कर खींच के अपनी छाती से लगा लिया। फिर उसी तरह मालती को टोवेल के साथ अपनी बाहों मैं लपेटे हुए रमण और मालती दोनों नितंबके बल बेड पे खडे हुए । और फिर बेड पे ऐसे बैठे बैठे ही, बेड की सामने वाली बाजु पे मालती को लपेटी हु़ई स्थिति मैं ही उसे पीठ के बल नीचे लेटाकर रमण उसके ऊपर उसी स्थिति में लेट गया । जिस स्थित मे थोडी देर पहेले मालती उसके ऊपर लेटी हु़ई थी । अब मालती नीचे थी और रमण उसके ऊपर था । इसी हालत में दोनों एक दूसरे के होंठों को चूमने लगे। फिर थोड़ी देर बाद रमण की पेन्ट मामूली से आवाज के साथ बैड के कोने मे गिरी । पेंट के साथ उसमें उसकी चड्डी भी सामिल थी । फिर पूरे कमरे में छत पे लटके हुए फेन के घूमने की आवाज के साथ छोटे छोटे सिसकारो की आवाज भी घुलने लगी । दूसरे दिन प्रात सुबह प्रो. जगदीशभाई की बीबी संध्या ने अपनी छत पे ताजा ही धोये हुए कपड़े सुखाते वक्त मालती को देखा । वो रेड टीशर्ट और ब्लू पेन्ट पहेने हुए एक हाथ मे प्लास्टिक की बैग लेकर रमण के घर से निकल के अपने घर जा रही थी।