बच्चों को सुनाएँ - कुरूप सुषमा r k lal द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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बच्चों को सुनाएँ - कुरूप सुषमा

बच्चों को सुनाएँ – 1

“कुरूप सुषमा”

आर० के० लाल

एक गाँव की लड़की की यह कहानी है जो बहुत सुंदर नहीं थी । उसका नाम सुषमा था । सुषमा बड़ी साधारण सी लड़की थी । उसका रंग एकदम काला था और वह बहुत बदसूरत थी। सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे। चपटी और आगे से फैली नाक ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था । लोग उसे अनाप सनाप बातें सुनाते रहते थे । बचपन से ही उसे किसी का प्यार नहीं मिला था । सभी उसे भाग्यहीन , मनहूस कहते और हर समय कुछ न कुछ उलाहना देते रहते थे । सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर रह जाती थी । वह पूरा दिन किसी अँधेरे कोने मॆं बैठी रहती थी । लोगों के कहे शब्द उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन, मनहूस…. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करती रहती थी । हमेशा मरी मरी सी लगती थी ।
उसे पढ़ाने लिखाने के लिए स्कूल नहीं भेजा जाता था । । घर वालों ने जल्दी ही शादी करने की योजन बनाई, परन्तु कुरूप होने के कारण कोई उससे शादी नहीं करना चाहता था और घर वालों उससे जल्दी ही छुटकारा पाना चाहते थे । इसलिए उसके माँ - बाप सभी परेशान हो गए थे । हमारा समाज कितना खराब है कि अगर कोई लड़की कुरूप हो तो उसकी शादी मुश्किल हो जाती है। उस लड़की से शादी करने की एवज में दूल्हा और उसका परिवार ज्यादा दहेज की मांग करते हैं और लड़की के माता पिता दूल्हे की मांग पूरी करने को मजबूर होते हैं । सुषमा के पिता भी पैसों का जुगाड़ नहीं कर पा रहे थे। इसी कारण वे झल्लाते रहते थे और सुषमा को मार पीट भी देते थे । घर के लोग भी उसे प्रताड़ित करने लगे थे । वह बेचारी लड़की दिन रात रोती रहती थी । वह सोचती कि उसकी क्या गलती है। वह तो रात दिन काम करती है। अच्छा खाना बनती, सिलाई करती है , लोगों की सेवा करती है । फिर उसने सोचा कि वह शादी ही नहीं करेगी और किसी तरह पढ़ाई करेगी । वह पढने के बारे में सबसे पूंछती रहती थी।

एक दिन उसके पिता बीमार हो जाते हैं । शाम होते ही उसके पिता को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया और उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है । उनके साथ सुषमा को भी जाना पड़ता है । वहां उसकी मुलाकत एक लड़के पंकज से होती है जो उसे पढने के उपाय बताता है और उसकी मदद करने का वादा करता है । जब वे दोनों बात कर रहे थे तो उसके पिता उन दोनों की बाते सुन रहे थे। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो जाता है । वे अपनी बेटी के लिए कुछ करने की सोचते हैं। सुषमा उनकी बहुत सेवा करती है जिससे दो दिन बाद सुषमा के पिता की तबीयत काफी ठीक लग रही थी । रात में भी वह उनके साथ रहती थी और अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सो जाती थी।

उस दिन पूनम की रात थी । दमकते चाँद की चाँदनी पूरे कमरे में बिखरी थी । तभी उसके पापा ने उसे अपने पास बुलाया और पास में बैठने को कहा । वे उसके सिर पर हांथ फेरते हुये बोले, “मैंने सोच लिया है कि बेटी तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है, वह भी बहुत मजबूती से ..... समझी” ।

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ” पिता ने उसकी बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन नहीँ हो। हर एक व्यक्ति वास्तव में कुदरत का एक अमूल्य उपहार है और कुदरत सभी को समान मानता है । देखो चाँद अपनी चाँदनी सभी पर डाल रहा है और तुम्हारा चेहरा इस चाँदनी में कैसा चमक रहा है। फिर वे बोले कि जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ वह सब हम लोगों की गलत सोच है। तुम पंकज की मदद ले कर जो चाहे कर सकती हो।

पापा से बातें करके सुषमा को लगा जैसे उसके सीने से एक भारी बोझ उतार गया। अस्पताल से वापस आकर उसके पिता ने पंकज के साथ जाकर सारी जानकारिया गाँव के सरपंच से ली। सरपंच ने उन्हें सरकारी योजना “बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ” के बारे में बताया । उन्हें सरकारी सहायता के बारे में भी बताया कि आज लड़कियों की शिक्षा के लिए भी, काफी प्रोत्साहन दिया जाता है ताकि बेटियाँ भी बिना किसी भेदभाव के हों और समान अधिकारों के साथ वे देश की सशक्त नागरिक बनें।
अब सुषमा को स्कूल भेजा जाने लगा था। मगर गाँव वाले, रिश्तेदार आदि उसे खरी खोटी सुनाते ही रहते। दुआएं देने की जगह उसे कोसा ही जाता था । उसकी माँ भी उससे केवल काम कराना चाहती थी, परंतु सभी की इच्छा के विरुद्ध केवल अपने पिता के सहारे वह लड़की हिम्मत करके पढ़ती रही और अंत में इंटर की परीक्षा पास कर लेती है। उसकी नौकरी भी लग जाती है वो भी गाँव में ही नर्स के पद पर।

समय सबसे बड़ा मरहम होता है। सुषमा के घाव भी भरने लगे थे । अचानक एक बड़े अच्छे परिवार से उसके लिए रिश्ता आता है । सब हैरान हो जाते हैं । सुषमा को भी अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था।

आज समाज में जब किसी लड़की की चर्चा होती है तब विषय अक्सर उसका रंग रूप होता है। अक्सर लोग उसकी योग्यता और गुणों को प्राथमिकता नहीं देते । अगर उसे मौका मिले तो वह भी बहुत कुछ कर सकती है। सुषमा की कहानी से गाँव वालों को समझ में आ गया था कि मेहनत के आगे शरीर की कुरूपता आड़े नहीं आती।

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