दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें - 18 Pranava Bharti द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें - 18

दिल की ज़मीन पर ठुकी कीलें

(लघु कथा-संग्रह )

18-शैली

"मम्मा ! हमें भी एक डॉगी पालना है ---" सामने वाले सूद साहब के यहाँ एल्सेशियन को देखकर सोना अपनी माँ से हर रोज़ एक बार तो कहती ही |

"बेटा ! इतना आसान है क्या --मालूम है, कितना काम होता है इसका ?"

"सूद आँटी के घर भी तो है, देखो न ---" सोना यानि सोनाली अक्सर ठुमक जाती |

प्रज्ञा के कान पर जूँ न रेंगती, भली प्रकार जानती थी कि ले आएँगे पर करेगा कौन ? सूद साहब बड़े व्यापारी ! उनके घर पर कर्मचारियों की आवाजावी लगी रहती |कभी कोई बंदा उनके प्रैटी को बाहर ले जाता तो कभी कोई | वैसे उसके लिए उन्होंने एक अलग से बंदा भी रखा था जो कभी-कभी गाँव चला जाता | पर मिसेज़ सूद के ऊपर किसी प्रकार का प्रेशर नहीं था |

सोना के चाचा अहमदाबाद के पास मेहसाणा में रहते थे | उनके पास एक पॉमेरियन की बहुत प्यारी जोड़ी थी | तीनी, तानी की ---वो जब भी अपने बड़े भाई से मिलने आते, उनके साथ दोनों कुत्ते भी कार में सवार होकर आते |जितने दिन वो रहते सोना उनके साथ खूब खेलती |

संयोग कुछ ऐसा बना कि तीनी-तानी ने एक रात एक बच्ची को जन्म दिया | अब क्या था, सोना की तो आई बनी | वैसे भी तीन कुत्तों को पालना उनके लिए आसान नहीं था | किसी न किसीको तो देना ही पड़ता, नए मेहमान को | प्रज्ञा ने सोचा फिर क्यों न उसे सोना के लिए रख लिया जाए, अब देखा जाएगा जो होगा | मालूम तो था ही सब काम उसके ही ऊपर पड़ने वाला था |

ख़ैर, घर में नया मेहमान ठहर गया| नाम रखा गया शैली ! शैली और सोना की मस्ती देखते ही बनती | सोना बहुत खुश हो गई | पॉमेरियन ब्रीड शोर ज़्यादा मचाती है, ज़रा से शोर पर शैली भौंक-भौंककर घर सिर पर उठा लेती |

प्रज्ञा जब कॉलेज जाती तब वह पोर्च से गाड़ी निकलने से पहले जहाँ दरवाज़ा खुला देखती , वहीं गाड़ी में घुसकर बैठ जाती | बड़ी मुश्किल से घर में रहने वाला भगवान नाम का सेवक उसको गोदी में लेकर गाड़ी से नीचे उतारता | जब प्रज्ञा वापिस आती, शैली उससे इतना झगड़ा करती कि प्रज्ञा की नाक में दम आ जाता | बरामदे में पड़ी कुर्सी पर चढ़कर शैली उसके ऊपर छलॉँग लगाती, जाने उसकी कितनी साड़ियाँ फाड़ दीं थीं उसने !

सोना की शैली को कोई कुछ नहीं कह सकता था | सोना के बिस्तर के बराबर ही उसका भी एक खटोला बनवाया गया था लेकिन उसे नहलाना, धुलाना, खिलाना --सब प्रज्ञा को ही करना पड़ता | लगभग चार साल बाद वह बीमार हुई, उसका काफ़ी लंबा इलाज़ करवाया गया | एक बार ठीक भी हो गई फिर लगभग छह माह बाद वह कहीं पर भी गंदा करने लगी | प्रज्ञा ने डॉक्टर की सलाह के अनुसार उसे दवाइयाँ दीं, मुँह और हाथ -पैर बाँधकर कई घंटों के लिए उसे छोड़ दिया जाता फिर नहलाया जाता |

"इसे ऎसी बीमारी हो गई है जो बहुत कम कुत्तों में होती है |यदि यह कोई मनुष्य होती तो वह सुसाइड कर लेता |"

"क्या करूँ डॉक्टर साहब ? " प्रज्ञा के साथ सोना और परिवार के सब ही सदस्य बहुत निराश हो गए थे |

एक दिन पति के ऑफ़िस और सोना के स्कूल जाने के बाद धड़कते दिल से प्रज्ञा ने शैली के डॉक्टर को बुलाकर इंजैक्शन लगवा दिया | इससे पहले शैली खूब खेल रही थी| उसने कटोरा भरकर दूध पीया था | प्रज्ञा बहुत असहज थी, किन्तु डॉक्टर के अनुसार यह ज़रूरी था | देखते ही देखते शैली ने दम तोड़ दिया, प्रज्ञा ज़ोर से हिलक पड़ी | अंतिम बिदाई के लिए नए कपड़े में लपेटकर , नमक आदि लेकर सोसाइटी के जमादार, चौकीदार और नौकर को खेत में भेजा गया, जहाँ उसे दफना दिया गया | प्रज्ञा जानती थी कि परिवार के सभी सदस्य आकर उसे दोषी ठहराएंगे लेकिन उसे डॉक्टर की सलाह से निर्णय लेना ज़रूरी लगा था | उसने अब कभी भी कोई पैट न रखने की क़सम मन ही मन खा ली थी |

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Bhanu Pratap Singh Sikarwar

Bhanu Pratap Singh Sikarwar 2 साल पहले

Usha Trivedi

Usha Trivedi 2 साल पहले